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"आशिक" का एक अर्थ देशभक्त भी होता है । इसका एक किस्सा यहीं लिखता हूं ।
लगभग सौ साल पहले की बात है । आजादी के आशिक-दीवाने सरदार सेवा सिंह कनाडा जा पहुंचे । अपने देश की लक्ष्मी को भारतीयों पर रीझते हुए देखकर कनाडा वासी ईर्ष्या की आग में जल उठे । आजादी का यज्ञ रचाने वाले सिख खास तौर से वहां के अधिकारियों की आंखों में खटक रहे थे । उन लोगों ने एक देशद्रोही बेलासिंह को अपनी ओर मिलाकर दो भारतीयों (भागसिंह और वतनसिंह) की हत्या करा दी ।
वीर सेवासिंह का क्रोध इमीग्रेशन अधिकारी हॉपकिन्स पर उमड़ पड़ा और बदला लेने का भूत उस पर सवार हो गया । सोचा कि यह दुष्ट हॉपकिन्स इसी तरह लोगों की हत्या कराता रहेगा ।
दोस्तों से मिलकर योजना बनी कि हॉपकिन्स से दोस्ती की जाये और तब अच्छा मौका पाकर उसे मारा जाये क्योंकि यह बहुत ही चालाक आदमी था । सेवासिंह ने हॉपकिन्स से दोस्ती कर ली । हॉपकिन्स ने कहा कि अगर सेवासिंह एक दूसरे सिख बलवन्त सिंह को मार दे तो उसे अच्छी नौकरी मिल जायेगी । सेवासिंह ने हां भर ली और हॉपकिन्स ने सेवासिंह को एक रिवाल्वर दे दिया । हॉपकिन्स ने रिवाल्वर देते हुआ कहा कि शिकार करके ही यह रिवाल्वर लौटाना ।
सेवासिंह ने निशानेबाजी सीखनी शुरू की । जितने कारतूस हॉपकिन्स ने दिये थे, वे खतम हो गये और उसने और भी कारतूस खरीदे और निशानेबाजी में उसका हाथ खूब सध गया ।
एक दिन पक्का इरादा करके सेवासिंह हॉपकिन्स के बंगले पर पहुंच गया । उसके लिए अन्दर आने की रोक-टोक नहीं थी । हाथ में भरा हुआ रिवाल्वर था । उस समय हॉपकिन्स आईने के सामने खड़ा था । हाथ में रिवाल्वर लिए सेवासिंह को आते हुए उसने देख लिया और थोड़ी ओट ले ली ।
सेवासिंह ने हालात को समझ लिया और हॉपकिन्स के पास जाकर खुद ही रिवाल्वर हॉपकिन्स को थमा दिया और बोला - "जनाब, मैं तो खुद ही यह रिवाल्वर आपको देने आ रहा था । आप इसे लीजिये और मुझे शूट कर दीजिए । मेरे साथी लोग मुझे आपका आदमी समझकर मुझसे नफरत करने लगे हैं और आप मुझे नौकरी दे नहीं रहे, मैं तो कहीं का नहीं रहा । आज तो आप मुझे शूट कर ही दीजिये ।"
हॉपकिन्स को उसका विश्वास जम गया । उसने रिवाल्वर सेवासिंह को लौटा दिया और जल्दी ही नौकरी दिलाने का भरोसा दिया । थोड़ी देर गपशप हुई और सेवासिंह चला गया ।
अगले दिन अदालत में पेशी थी - हत्या के मामले में सेवासिंह को गवाह के रूप में बुलाया गया था । हॉपकिन्स भी वहां हाजिर था । जज ने सेवासिंह से पूछा - "जिस दिन गुरुद्वारे में वतनसिंह की हत्या हुई, क्या उस समय आप घटनास्थल पर मौजूद थे ?"
सेवासिंह ने "हां" कहा । जज ने फिर पूछा "बेलासिंह ने हत्या किस प्रकार की ?"
यह सवाल सेवासिंह को अच्छा लगा । जेब में भरा हुआ रिवाल्वर था और हॉपकिन्स सामने बैठा था । झट से रिवाल्वर हॉपकिन्स पर खाली करते हुए कहा "हत्या इस प्रकार की गई थी ।"
अदालत में खलबली मच गई । जज के प्रश्न का सटीक जवाब दिया गया था । रिवाल्वर हॉपकिन्स के ऊपर फेंकते हुए सेवासिंह ने कहा - "यह ले अपना रिवाल्वर । शिकार करके ही लौटा रहा हूं । दिया हुआ वचन पूरा किया है ।"
न किसी दूसरे को मारना था और न भागना था । सेवासिंह गिरफ्तार हो गया । आत्मसमर्पण करके वीर सेवासिंह का कहना था - "आज मुझे हार्दिक आनन्द मिला है । हॉपकिन्स को मैंने जानबूझकर मारा है । यह बदला है देश तथा धर्म के अपमान का, यह बदला है हमारे देश के दो नौजवानों की हत्या का, यह जवाब है हमको ‘इंडियन’ कहकर दी जाने वाली गालियों का ।"
उस दिन के बाद किसी कनाडा-वासी ने भारतीयों को घृणित और अपमानजनक शब्दों से सम्बोधित करने का दुस्साहस नहीं किया । हॉपकिन्स की पत्नी ने अपने पति की हत्या का शोक जरूर मनाया, पर वह एक भारतीय की वीरता पर मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकी । उसके शब्द थे - "जिस व्यक्ति ने भरी अदालत में मेरे पति को गोली से उड़ाकर धैर्य के साथ आत्मसमर्पण किया है, मैं उस वीर के दर्शन करना चाहूंगी ।" वह जेल में जाकर सेवासिंह से मिली ।
इस कृत्य के बाद सेवासिंह के मन में न तो मलाल था और न ही पश्चाताप । अपने लिए फांसी की सजा के बारे में उसने यह कहा - "एक सच्चे देशभक्त की भांति कर्त्तव्यपालन करते हुए और ईश्वर का नाम लेते हुए मैं फांसी के तख्ते पर उस ललक के साथ चढूंगा जिस ललक के साथ एक भूखा बच्चा अपनी मां की गोद में लपकता है । मैं बड़ी खुशी से फांसी के फन्दे को ईश्वर के नाम की माला समझकर अपने गले में डालूंगा । मुझे पूरा विश्वास है कि ईश्वर अपने आशीर्वादी हाथों से मुझे उठा लेगा क्योंकि यह काम मैंने अपने निजी लाभ के लिए नहीं, वरन् अपने देशवासियों और कनाडा सरकार के हित में किया है ।"
और सचमुच ही इसी उत्साह और उमंग के साथ सेवासिंह 11 जनवरी 1915 को फांसी के फन्दे पर झूल गया ।
देश की आजादी के उस आशिक का जनाजा बड़ी धूमधाम से निकाला गया ।
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