इस दुनिया में कोई भी जाति ऊपर से तो बनकर आई ही नहीं. चमत्कार से तो बस एक स्त्री और एक पुरुष को ही पैदा किया गया होगा. जैसे-जैसे यहां इंसानों की संख्या बढ़ती गई, वैसे-वैसे विचारों, जीवन पद्धति इत्यादि के आधार पर विभिन्न जातियां और धर्म बनते गए. मेरा ख्याल है कि हिंदू धर्म में जो क्षत्रिय जाति थी, उसमें से ये ठाकुर (राजपूत) और जाट निकले हैं. गौर से देखा जाए तो ठाकुरों से जाट काफी मिलते-जुलते हैं. वर्तमान में भले ही जाट ठाकुरों से काफी आगे निकल गए हैं, लेकिन किसी समय ठाकुरों का भी अपना अलग ही रुतबा था. ठाकुर भी योद्धा हैं, किसान हैं, पहलवान हैं, दिखने में आकर्षक हैं और अमूमन स्वभाव भी अच्छा है उनका, वैसा ही जाटों के साथ भी है. कहीं-कहीं तो जाटों और ठाकुरों में वैवाहिक रिश्तों के भी उदाहरण हैं. अगर मैं समाज में जाटों जैसा रहन-सहन और शानो-शौकत कहीं पाता हूं तो वे ठाकुर ही हैं (हालांकि सभी नहीं). ठाकुरों के पतन का कारण उनकी ऐयाश प्रवृत्ति रही, जिस पर वर्तमान में जाट चलते नजर आ रहे हैं. जाटों में बढ़ता ऐयाशी का चलन कोई बढ़िया बात नहीं है.