hawasinghsangwan
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जाट एकता का अलाप-1
आजकल जाट एकता के बारे में जाट पत्र-पत्रिकाओं के संपादकीयों में तथा लेखों में जाट एकता पर विचार-विमर्श चलता रहता है। इसी प्रकार जाट समाज की सभाओं व बैठको में भी इस पर चर्चा होती रहती है। एकता शब्द अपने आप में ही बलवर्धक है और जाट एकता की बात आती है, तो यह शब्द महा शक्तिवर्धक बन जाता है। जब कोई जाट एकता जिंदाबाद का नारा लगाता है तो लगता है कि धरती और आसमान एक हो जाएंगे। शरीर के रोएं खड़े हो जाते हैं। जाटों की भुजाएं फडक़ने लगती हैं और खून खौल उठता है, जो जाट खून की स्वाभाविक प्रतिक्रया है। हर कोई वक्ता जाट एकता पर बल देता है तो तालियां पीटी जाती हैं क्योंकि यह शब्द कहने और सुनने में बहुत ही लुभावना लगता है।
अब प्रश्र यह उठता है कि जाट एकता की बात कब आरंभ हुई? जहां तक इतिहास की बात है, सभी जाट राजा अपनी रियासतों की सीमाएं बढ़ाने व बचाने में लगे रहे, लेकिन ऐसी कोई बड़ी लड़ाई नहीं हुई, जिसमें जाट जाट से आपस में न लड़ा हो। जब सिकंदर भारत आया तो पंजाब में पोरस के साथ लड़ाई के बाद सिकंदर की सेना ने आगे बढऩे से मना कर दिया था। इस पर सिकंदर ने कहा था कि आप यदि नहीं मानते हैं, तो केवल मैं जाटों को लेकर आगे बढ़ जाऊंगा। कहने का अर्थ है सिकंदर की फौज में पहले से जाट थे। राजा पोरस भी तक्षक गौत्र के जाट थे, जो सिकंदर के साथ बहादुरी से लड़े। जाटों की सबसे पहली पहचान अंग्रेजों ने जाट रेजीमेंट खड़ी करके बनाई और जाटों ने प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्ध में अपनी बहादुरी के झंडे गाड़ दिए। जाट कौम का पहला ऐतिहासिक नारा अंग्रेजों ने ही दिया : जाट बलवान, जय भगवान। इसी प्रकार दूसरे विश्वयुद्ध में भी जाट जाट से लड़ा था। मेरे स्वयं के ताऊ जी शहीद बलदेव सिंह जी(द्वितीय जाट बटालियन) आईएनए की तरफ से तथा मेरे ही परिवार के सबसे छोटे दादा जी सूबेदार जुगलाल अंगे्रेजों की तरफ से पांचवीं जाट बटालियन में होते हुए मनीपुर मोर्चे पर चाचा-भतीजा एक दूसरे को गद्दार कहते हुए लड़े थे। जबकि गद्दार कोई नहीं था। दोनों ही अपनी जगह सही थे। हम जानते हैं कि लगभग 1200 वर्ष तक खापों की सेनाओं ने देश और समाज की सुरक्षा के लिए अनेको लड़ाइयां लड़ीं, जिसमें 90 प्रतिशत से अधिक लडऩे वाले जाट ही थे, लेकिन जाट शब्द का कभी इस्तेमाल नहीं किया गया। इसी प्रकार सन् 1857 में जाटों ने देश की आजादी के लिए बहुत खून बहाया, लेकिन कौम का कहीं नाम नहीं। इसी प्रकार आजादी से पहले और बाद में उत्तर भारत में जितने भी किसान आंदोलन और विद्रोह हुए, उनमें भी जाटों की संख्या 90 प्रतिशत से अधिक रही, लेकिन जाट शब्द हमेशा नदारद रहा। इसलिए कभी भी जाट एकता की बात नहीं हुई। सन् 1907 में वीर क्रन्तिकारी राजा महेंद्र प्रताप के प्रयासों से अखिल भारत वर्षीय जाट सभा की स्थापना की गई, जो उस समय जाटों का एकमात्र सामाजिक संगठन बना। लेकिन ऐसा कोई इतिहास नहीं मिलता, जिसमें इस सभा ने कोई क्रन्तिकारी आंदोलन चलाया हो। हालाँकि यह सभा जाट समाज के सामाजिक विकास के लिए प्रयासरत रही, लेकिन समय आते-आते इसके भी टुकड़े होते चले गए और साथ-साथ उत्तर भारत में अनेको जाट सभाएं खड़ी हो गईं, जिनके उद्देश्य बहुत ही सीमित रहे और अधिकतर में लोगों को अपने प्रधान बनने तक सिमटकर रह गए। इस बिखराव पर कभी कोई चिंतन नहीं हुआ और इसे केवल चौधर की लड़ाई कहकर पल्ला झाड़ लिया गया। वास्तव में जाट समाज में अपने समाज के लिए चिंतन की भारी कमी रही है। जाट अभी तक देशभक्ति में ही लीन रहा है। अपनी कौम के बारे में उसे सोचने की बहुत कम फुर्सत रही है। इसी बीच जाट कौम के नाम से जगह-जगह जाट स्कुल, कालेज तथा धर्मशालाएं बनती रहीं जिससे जाटों का आपसी सहयोग तो बढ़ा, लेकिन जाट एकता में ज्यादा इजाफा नहीं हुआ।
जाटों के अधिकार का पहला विशुद्ध आंदोलन राजस्थान के जाटों ने जाट आरक्षण को लेकर सन 1992 में शुरू किया, जिसे चौधरी ज्ञानप्रकाश पिलानियां, चौधरी विजय पूनियां तथा चौधरी राजाराम मील जैसे कर्मठ जाटों ने इसे 29 अक्टूबर, 1999 को बगैर किसी हिंसा के अपने अंजाम तक पहुंचाया और जाट एकता का परिचय दिया। यही अधिकार दिल्ली, यूपी, हिमाचल, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश और बिहार के जाटों को अपने राज्यों में बगैर किसी आंदोलन के प्राप्त हो गया। इसलिए वहां पर जाट एकता का नारा लगाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। इसलिए जाट इन राज्यों में वैसे के वैसे बिखरे हुए रह गए।
राजस्थान का प्रभाव हरियाणा के जाटों पर पडऩा भी लाजमी था और इसकी सरसराहट सुनाई देने लगी। लेकिन सन् 2007 में अखिल भारतीय जाट सभा के अध्यक्ष चौधरी दारा सिंह ने पानीपत में बयान दिया कि हरियाणा के जाटों को आरक्षण की आवश्यकता नहीं है। इस बयान ने हरियाणा के कुछ समझदार जाटों को बेचैन कर दिया और इस मांग पर सरसराहट एक बार फिर मंदी पड़ गई। जहां तक रिकार्ड की बात है, हरियाणा में जाट आरक्षण पर पहली विधिवत् मीटिंग 26 जनवरी, 2008 को मैंने भिवानी में करवाई, जिसमें कर्नल हरपत सिंह अहलावत तथा अजीत सिंह सांगवान, पूर्व संयुक्त निदेशक मुख्य रूप से उपस्थित थे। जिसके बाद आरक्षण पर पहला पर्चा मैंने विस्तार से छपवाया, जिसका शीर्षक था : अब बताओ, जाट किसान हल कहां चलाए? इस पर्चे में एक किसान के कंधे पर हल दिखाया गया था। इस पर्चे की लाखों प्रतियां गांवों व राजनीतिक पार्टियों की रैलियों में बांटी गईं, जिस पर जाटों की प्रतिक्रिया एक मजाक के तौर पर रही, क्योंकि जाट आरक्षण को केवल दलितों का ही अधिकार समझते हुए आ रहे थे। मंडल कमीशन ने भी अपनी रिपोर्ट को पेज नंबर 294 पर लिखा है कि जाट पिछड़ा कहलाना नहीं चाहते क्योंकि वे समझते हैं कि इससे उनके स्वाभिमान को धक्का लगेगा। हरियाणा में जाट आरक्षण पर मेरा पहला बयान 14 फरवरी, 2008 को दैनिक जागरण में छपा। इससे पहले मैंने इस बारे में चौ. दारासिंह को छोडक़र कभी किसी का बयान नहीं पढ़ा, जो नकारात्मक था। इस आंदोलन के पीछे मेरी एक निजी बड़ी घटना काम कर रही थी, जो अगस्त, 1969 से मेरे दिल और दिमाग में बैठी हुई थी। जब अगस्त, 1969 में मैंने बीए पास करने के बाद सीआरपीएफ में डीएसपी(वर्तमान में सहायक कमांडेंट)पद के लिए परीक्षा में बैठा तो शारीरिक परीक्षा में मेरा तीसरा स्थान होते हुए भी चयन नहीं हो पाया था, जबकि एक बाल्मीकि लडक़ा, जो शारीरिक परीक्षा में मुझसे बहुत पीछे था तथा बीए में उसके भी वही विषय थे, जो मेरे थे, लेकिन उसके कुल अंक 41 प्रतिशत थे, जबकि मेरे 43 प्रतिशत थे। हम दोनों ने ही पंजाब विश्वविद्यालय से बीए पास किया था। लेकिन आरक्षण की वजह से उसका चयन हो गया और मैं रह गया तथा आखिर में कर्नल रिसाल सिंह वर्तमान में सांगवान खाप के प्रधान की सलाह पर मैंने अक्टूबर, 1969 में हवलदार का पद स्वीकार किया। सबसे ज्यादा कष्ट तब हुआ, जब मंडल कमीशन लागू होने पर हमारे समान जातियों को पिछड़ा मान लिया गया और उनके लडक़ों की बैकलॉग भर्ती मुझे अपनी कलम से करनी पड़ी, जिसमें जाटों के बच्चे नदारद थे। इस घटना ने मेरी अगस्त, 1969 की यादगार को और गहरे से दिल और दिमाग में बिठा दिया। यही बात थी कि सेवानिवृत होने के बाद मैंने जाट आरक्षण पर आंदोलन करने की ठानी थी।
सबसे पहले हमने गांव में ताश खेलने वाले जाटों के पास जाकर उन्हें आरक्षण के बारे में समझाया और प्रचार शुरू किया। पहले दिन का प्रचार 3 मार्च, 2008 को भिवानी जिले के गांव बामला, कौंट तथा सांगा से प्रारंभ किया, जिसमें मेरे साथ कर्नल हरपत सिंह और कैप्टन हवासिंह डागर थे। संगठन के बगैर, आंदोलन को आगे बढ़ाना कठिन हो रहा था, इसीलिए अखिल भारतीय जाट सभा के महासचिव चौधरी युद्धवीर सिंह सहरावत से संपर्क किया गया, जिन्होंने हमें अखिल भारतीय जाट सभा के बैनर तले कार्य करने को कहा। इससे प्रचार ने थोड़ी गति पकड़ी तथा आरक्षण पर पहली रैली 14 मार्च, 2008 को जींद की जाट धर्मशाला के साथ वाले मैदान में चौधरी दारासिंह की अध्यक्षता में हुई, जिसमें लगभग 2000 जाट सम्मिलित हुए, जो अधिकाँश भिवानी जिले के रहने वाले थे। इसके बाद जाट आरक्षण पर पहला हवन होली के उपलक्ष्य में 19 मार्च, 2008 को जाट धर्मशाला, पलवल में संपन्न हुआ, जिसमें मेरे अतिरिक्त लखीराम तेवतिया, खेमचंद कुंडू व समुंंद्र सिंह भाखर आदि सम्मिलित थे, जिसमें भाखर को पलवल का अध्यक्ष बनाया गया था, लेकिन इसके बाद भाखर कभी नजर नहीं आए। इसके बाद हरियाणा में जाट रैलियों और खाप पंचायतों का सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें मुख्य तौर पर बिहरोड़ 12 खाप, सतगामा खाप, सांगवान खाप, जाटू खाप 84 धनाना तथा श्योराण खाप पंचायतों के अतिरिक्त लाडवा, महम, बाढड़ा, फतेहाबाद, कलायत, कुरूक्षेत्र, समालखा, जुलाना तथा तोशाम आदि जगहों पर रैलियां हुईं। इसी बीच जब यह सिलसिला चल ही रहा था तो जाट एकता मंच, सोनीपत ने चौ. छोटूराम धर्मशाला, सोनीपत में एक जून, 2008 को सभी जाट संगठनों की बैठक बुलाई, जिसमें मैं भी अखिल भारतीय जाट सभा की तरफ से उपस्थित हुआ। इस मीटिंग में एक अलग से जाट आरक्षण संघर्ष समिति का गठन किया गया, जिसमें उनके मना करने पर भी माननीय चौ. देवीसिंह तेवतिया को अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया और कर्नल ओ.पी. संधू इसके कार्यवाहक अध्यक्ष बने, जो नियमों के विरूद्ध था, क्योंकि कार्यवाहक अध्यक्ष तब बनाया जाता है, जब अध्यक्ष का चुनाव न हो पाया हो। यह पहली गलती थी। उसके बाद इसी मीटिंग में जाट ज्योति के संपादक प्रोफेसर जे.के. गहलावत, पर अनर्गल आरोप लगाए गए, जिनका वहां पर कोई आधार नहीं था। न ही वहां का यह विषय था। इसीलिए वास्तव में इस मीटिंग का ध्येय तो वहीं असफल हो गया था, लेकिन जाट एकता के नाम पर हमारे संगठन ने इनके साथ पांच मीटिंग मन मसोसकर की। जब हमने देखा कि हर मीटिंग में धड़ाधड़ चंदे की रसीद बुके बांटी जा रही हैं और संगठन का वास्तविक अध्यक्ष तेवतिया साहब न होकर संधू साहब बन गए हैं, तो हमने इनसे किनारा कर लिया। हालाँकि हमने कभी भी मीडिया के माध्यम से उनका विरोध नहीं किया। परिणामस्वरूप, इस संगठन की रोहतक और जींद की रैलियां सफल रहीं। जब ये उजागर हो गया कि हम इनके साथ नहीं हैं तो उसके बाद लोगों ने इनके पास आना कम कर दिया और आखिरकार तंग आकर तेवतिया साहब ने भी एक दिन इस्तीफा दे दिया तथा जाट एकता पर फिर से एक बार प्रश्रचिन्ह लग गया।
आजकल जाट एकता के बारे में जाट पत्र-पत्रिकाओं के संपादकीयों में तथा लेखों में जाट एकता पर विचार-विमर्श चलता रहता है। इसी प्रकार जाट समाज की सभाओं व बैठको में भी इस पर चर्चा होती रहती है। एकता शब्द अपने आप में ही बलवर्धक है और जाट एकता की बात आती है, तो यह शब्द महा शक्तिवर्धक बन जाता है। जब कोई जाट एकता जिंदाबाद का नारा लगाता है तो लगता है कि धरती और आसमान एक हो जाएंगे। शरीर के रोएं खड़े हो जाते हैं। जाटों की भुजाएं फडक़ने लगती हैं और खून खौल उठता है, जो जाट खून की स्वाभाविक प्रतिक्रया है। हर कोई वक्ता जाट एकता पर बल देता है तो तालियां पीटी जाती हैं क्योंकि यह शब्द कहने और सुनने में बहुत ही लुभावना लगता है।
अब प्रश्र यह उठता है कि जाट एकता की बात कब आरंभ हुई? जहां तक इतिहास की बात है, सभी जाट राजा अपनी रियासतों की सीमाएं बढ़ाने व बचाने में लगे रहे, लेकिन ऐसी कोई बड़ी लड़ाई नहीं हुई, जिसमें जाट जाट से आपस में न लड़ा हो। जब सिकंदर भारत आया तो पंजाब में पोरस के साथ लड़ाई के बाद सिकंदर की सेना ने आगे बढऩे से मना कर दिया था। इस पर सिकंदर ने कहा था कि आप यदि नहीं मानते हैं, तो केवल मैं जाटों को लेकर आगे बढ़ जाऊंगा। कहने का अर्थ है सिकंदर की फौज में पहले से जाट थे। राजा पोरस भी तक्षक गौत्र के जाट थे, जो सिकंदर के साथ बहादुरी से लड़े। जाटों की सबसे पहली पहचान अंग्रेजों ने जाट रेजीमेंट खड़ी करके बनाई और जाटों ने प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्ध में अपनी बहादुरी के झंडे गाड़ दिए। जाट कौम का पहला ऐतिहासिक नारा अंग्रेजों ने ही दिया : जाट बलवान, जय भगवान। इसी प्रकार दूसरे विश्वयुद्ध में भी जाट जाट से लड़ा था। मेरे स्वयं के ताऊ जी शहीद बलदेव सिंह जी(द्वितीय जाट बटालियन) आईएनए की तरफ से तथा मेरे ही परिवार के सबसे छोटे दादा जी सूबेदार जुगलाल अंगे्रेजों की तरफ से पांचवीं जाट बटालियन में होते हुए मनीपुर मोर्चे पर चाचा-भतीजा एक दूसरे को गद्दार कहते हुए लड़े थे। जबकि गद्दार कोई नहीं था। दोनों ही अपनी जगह सही थे। हम जानते हैं कि लगभग 1200 वर्ष तक खापों की सेनाओं ने देश और समाज की सुरक्षा के लिए अनेको लड़ाइयां लड़ीं, जिसमें 90 प्रतिशत से अधिक लडऩे वाले जाट ही थे, लेकिन जाट शब्द का कभी इस्तेमाल नहीं किया गया। इसी प्रकार सन् 1857 में जाटों ने देश की आजादी के लिए बहुत खून बहाया, लेकिन कौम का कहीं नाम नहीं। इसी प्रकार आजादी से पहले और बाद में उत्तर भारत में जितने भी किसान आंदोलन और विद्रोह हुए, उनमें भी जाटों की संख्या 90 प्रतिशत से अधिक रही, लेकिन जाट शब्द हमेशा नदारद रहा। इसलिए कभी भी जाट एकता की बात नहीं हुई। सन् 1907 में वीर क्रन्तिकारी राजा महेंद्र प्रताप के प्रयासों से अखिल भारत वर्षीय जाट सभा की स्थापना की गई, जो उस समय जाटों का एकमात्र सामाजिक संगठन बना। लेकिन ऐसा कोई इतिहास नहीं मिलता, जिसमें इस सभा ने कोई क्रन्तिकारी आंदोलन चलाया हो। हालाँकि यह सभा जाट समाज के सामाजिक विकास के लिए प्रयासरत रही, लेकिन समय आते-आते इसके भी टुकड़े होते चले गए और साथ-साथ उत्तर भारत में अनेको जाट सभाएं खड़ी हो गईं, जिनके उद्देश्य बहुत ही सीमित रहे और अधिकतर में लोगों को अपने प्रधान बनने तक सिमटकर रह गए। इस बिखराव पर कभी कोई चिंतन नहीं हुआ और इसे केवल चौधर की लड़ाई कहकर पल्ला झाड़ लिया गया। वास्तव में जाट समाज में अपने समाज के लिए चिंतन की भारी कमी रही है। जाट अभी तक देशभक्ति में ही लीन रहा है। अपनी कौम के बारे में उसे सोचने की बहुत कम फुर्सत रही है। इसी बीच जाट कौम के नाम से जगह-जगह जाट स्कुल, कालेज तथा धर्मशालाएं बनती रहीं जिससे जाटों का आपसी सहयोग तो बढ़ा, लेकिन जाट एकता में ज्यादा इजाफा नहीं हुआ।
जाटों के अधिकार का पहला विशुद्ध आंदोलन राजस्थान के जाटों ने जाट आरक्षण को लेकर सन 1992 में शुरू किया, जिसे चौधरी ज्ञानप्रकाश पिलानियां, चौधरी विजय पूनियां तथा चौधरी राजाराम मील जैसे कर्मठ जाटों ने इसे 29 अक्टूबर, 1999 को बगैर किसी हिंसा के अपने अंजाम तक पहुंचाया और जाट एकता का परिचय दिया। यही अधिकार दिल्ली, यूपी, हिमाचल, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश और बिहार के जाटों को अपने राज्यों में बगैर किसी आंदोलन के प्राप्त हो गया। इसलिए वहां पर जाट एकता का नारा लगाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। इसलिए जाट इन राज्यों में वैसे के वैसे बिखरे हुए रह गए।
राजस्थान का प्रभाव हरियाणा के जाटों पर पडऩा भी लाजमी था और इसकी सरसराहट सुनाई देने लगी। लेकिन सन् 2007 में अखिल भारतीय जाट सभा के अध्यक्ष चौधरी दारा सिंह ने पानीपत में बयान दिया कि हरियाणा के जाटों को आरक्षण की आवश्यकता नहीं है। इस बयान ने हरियाणा के कुछ समझदार जाटों को बेचैन कर दिया और इस मांग पर सरसराहट एक बार फिर मंदी पड़ गई। जहां तक रिकार्ड की बात है, हरियाणा में जाट आरक्षण पर पहली विधिवत् मीटिंग 26 जनवरी, 2008 को मैंने भिवानी में करवाई, जिसमें कर्नल हरपत सिंह अहलावत तथा अजीत सिंह सांगवान, पूर्व संयुक्त निदेशक मुख्य रूप से उपस्थित थे। जिसके बाद आरक्षण पर पहला पर्चा मैंने विस्तार से छपवाया, जिसका शीर्षक था : अब बताओ, जाट किसान हल कहां चलाए? इस पर्चे में एक किसान के कंधे पर हल दिखाया गया था। इस पर्चे की लाखों प्रतियां गांवों व राजनीतिक पार्टियों की रैलियों में बांटी गईं, जिस पर जाटों की प्रतिक्रिया एक मजाक के तौर पर रही, क्योंकि जाट आरक्षण को केवल दलितों का ही अधिकार समझते हुए आ रहे थे। मंडल कमीशन ने भी अपनी रिपोर्ट को पेज नंबर 294 पर लिखा है कि जाट पिछड़ा कहलाना नहीं चाहते क्योंकि वे समझते हैं कि इससे उनके स्वाभिमान को धक्का लगेगा। हरियाणा में जाट आरक्षण पर मेरा पहला बयान 14 फरवरी, 2008 को दैनिक जागरण में छपा। इससे पहले मैंने इस बारे में चौ. दारासिंह को छोडक़र कभी किसी का बयान नहीं पढ़ा, जो नकारात्मक था। इस आंदोलन के पीछे मेरी एक निजी बड़ी घटना काम कर रही थी, जो अगस्त, 1969 से मेरे दिल और दिमाग में बैठी हुई थी। जब अगस्त, 1969 में मैंने बीए पास करने के बाद सीआरपीएफ में डीएसपी(वर्तमान में सहायक कमांडेंट)पद के लिए परीक्षा में बैठा तो शारीरिक परीक्षा में मेरा तीसरा स्थान होते हुए भी चयन नहीं हो पाया था, जबकि एक बाल्मीकि लडक़ा, जो शारीरिक परीक्षा में मुझसे बहुत पीछे था तथा बीए में उसके भी वही विषय थे, जो मेरे थे, लेकिन उसके कुल अंक 41 प्रतिशत थे, जबकि मेरे 43 प्रतिशत थे। हम दोनों ने ही पंजाब विश्वविद्यालय से बीए पास किया था। लेकिन आरक्षण की वजह से उसका चयन हो गया और मैं रह गया तथा आखिर में कर्नल रिसाल सिंह वर्तमान में सांगवान खाप के प्रधान की सलाह पर मैंने अक्टूबर, 1969 में हवलदार का पद स्वीकार किया। सबसे ज्यादा कष्ट तब हुआ, जब मंडल कमीशन लागू होने पर हमारे समान जातियों को पिछड़ा मान लिया गया और उनके लडक़ों की बैकलॉग भर्ती मुझे अपनी कलम से करनी पड़ी, जिसमें जाटों के बच्चे नदारद थे। इस घटना ने मेरी अगस्त, 1969 की यादगार को और गहरे से दिल और दिमाग में बिठा दिया। यही बात थी कि सेवानिवृत होने के बाद मैंने जाट आरक्षण पर आंदोलन करने की ठानी थी।
सबसे पहले हमने गांव में ताश खेलने वाले जाटों के पास जाकर उन्हें आरक्षण के बारे में समझाया और प्रचार शुरू किया। पहले दिन का प्रचार 3 मार्च, 2008 को भिवानी जिले के गांव बामला, कौंट तथा सांगा से प्रारंभ किया, जिसमें मेरे साथ कर्नल हरपत सिंह और कैप्टन हवासिंह डागर थे। संगठन के बगैर, आंदोलन को आगे बढ़ाना कठिन हो रहा था, इसीलिए अखिल भारतीय जाट सभा के महासचिव चौधरी युद्धवीर सिंह सहरावत से संपर्क किया गया, जिन्होंने हमें अखिल भारतीय जाट सभा के बैनर तले कार्य करने को कहा। इससे प्रचार ने थोड़ी गति पकड़ी तथा आरक्षण पर पहली रैली 14 मार्च, 2008 को जींद की जाट धर्मशाला के साथ वाले मैदान में चौधरी दारासिंह की अध्यक्षता में हुई, जिसमें लगभग 2000 जाट सम्मिलित हुए, जो अधिकाँश भिवानी जिले के रहने वाले थे। इसके बाद जाट आरक्षण पर पहला हवन होली के उपलक्ष्य में 19 मार्च, 2008 को जाट धर्मशाला, पलवल में संपन्न हुआ, जिसमें मेरे अतिरिक्त लखीराम तेवतिया, खेमचंद कुंडू व समुंंद्र सिंह भाखर आदि सम्मिलित थे, जिसमें भाखर को पलवल का अध्यक्ष बनाया गया था, लेकिन इसके बाद भाखर कभी नजर नहीं आए। इसके बाद हरियाणा में जाट रैलियों और खाप पंचायतों का सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें मुख्य तौर पर बिहरोड़ 12 खाप, सतगामा खाप, सांगवान खाप, जाटू खाप 84 धनाना तथा श्योराण खाप पंचायतों के अतिरिक्त लाडवा, महम, बाढड़ा, फतेहाबाद, कलायत, कुरूक्षेत्र, समालखा, जुलाना तथा तोशाम आदि जगहों पर रैलियां हुईं। इसी बीच जब यह सिलसिला चल ही रहा था तो जाट एकता मंच, सोनीपत ने चौ. छोटूराम धर्मशाला, सोनीपत में एक जून, 2008 को सभी जाट संगठनों की बैठक बुलाई, जिसमें मैं भी अखिल भारतीय जाट सभा की तरफ से उपस्थित हुआ। इस मीटिंग में एक अलग से जाट आरक्षण संघर्ष समिति का गठन किया गया, जिसमें उनके मना करने पर भी माननीय चौ. देवीसिंह तेवतिया को अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया और कर्नल ओ.पी. संधू इसके कार्यवाहक अध्यक्ष बने, जो नियमों के विरूद्ध था, क्योंकि कार्यवाहक अध्यक्ष तब बनाया जाता है, जब अध्यक्ष का चुनाव न हो पाया हो। यह पहली गलती थी। उसके बाद इसी मीटिंग में जाट ज्योति के संपादक प्रोफेसर जे.के. गहलावत, पर अनर्गल आरोप लगाए गए, जिनका वहां पर कोई आधार नहीं था। न ही वहां का यह विषय था। इसीलिए वास्तव में इस मीटिंग का ध्येय तो वहीं असफल हो गया था, लेकिन जाट एकता के नाम पर हमारे संगठन ने इनके साथ पांच मीटिंग मन मसोसकर की। जब हमने देखा कि हर मीटिंग में धड़ाधड़ चंदे की रसीद बुके बांटी जा रही हैं और संगठन का वास्तविक अध्यक्ष तेवतिया साहब न होकर संधू साहब बन गए हैं, तो हमने इनसे किनारा कर लिया। हालाँकि हमने कभी भी मीडिया के माध्यम से उनका विरोध नहीं किया। परिणामस्वरूप, इस संगठन की रोहतक और जींद की रैलियां सफल रहीं। जब ये उजागर हो गया कि हम इनके साथ नहीं हैं तो उसके बाद लोगों ने इनके पास आना कम कर दिया और आखिरकार तंग आकर तेवतिया साहब ने भी एक दिन इस्तीफा दे दिया तथा जाट एकता पर फिर से एक बार प्रश्रचिन्ह लग गया।