Jat Ekta ka Alap -1

जाट एकता का अलाप-1
आजकल जाट एकता के बारे में जाट पत्र-पत्रिकाओं के संपादकीयों में तथा लेखों में जाट एकता पर विचार-विमर्श चलता रहता है। इसी प्रकार जाट समाज की सभाओं व बैठको में भी इस पर चर्चा होती रहती है। एकता शब्द अपने आप में ही बलवर्धक है और जाट एकता की बात आती है, तो यह शब्द महा शक्तिवर्धक बन जाता है। जब कोई जाट एकता जिंदाबाद का नारा लगाता है तो लगता है कि धरती और आसमान एक हो जाएंगे। शरीर के रोएं खड़े हो जाते हैं। जाटों की भुजाएं फडक़ने लगती हैं और खून खौल उठता है, जो जाट खून की स्वाभाविक प्रतिक्रया है। हर कोई वक्ता जाट एकता पर बल देता है तो तालियां पीटी जाती हैं क्योंकि यह शब्द कहने और सुनने में बहुत ही लुभावना लगता है।
अब प्रश्र यह उठता है कि जाट एकता की बात कब आरंभ हुई? जहां तक इतिहास की बात है, सभी जाट राजा अपनी रियासतों की सीमाएं बढ़ाने व बचाने में लगे रहे, लेकिन ऐसी कोई बड़ी लड़ाई नहीं हुई, जिसमें जाट जाट से आपस में न लड़ा हो। जब सिकंदर भारत आया तो पंजाब में पोरस के साथ लड़ाई के बाद सिकंदर की सेना ने आगे बढऩे से मना कर दिया था। इस पर सिकंदर ने कहा था कि आप यदि नहीं मानते हैं, तो केवल मैं जाटों को लेकर आगे बढ़ जाऊंगा। कहने का अर्थ है सिकंदर की फौज में पहले से जाट थे। राजा पोरस भी तक्षक गौत्र के जाट थे, जो सिकंदर के साथ बहादुरी से लड़े। जाटों की सबसे पहली पहचान अंग्रेजों ने जाट रेजीमेंट खड़ी करके बनाई और जाटों ने प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्ध में अपनी बहादुरी के झंडे गाड़ दिए। जाट कौम का पहला ऐतिहासिक नारा अंग्रेजों ने ही दिया : जाट बलवान, जय भगवान। इसी प्रकार दूसरे विश्वयुद्ध में भी जाट जाट से लड़ा था। मेरे स्वयं के ताऊ जी शहीद बलदेव सिंह जी(द्वितीय जाट बटालियन) आईएनए की तरफ से तथा मेरे ही परिवार के सबसे छोटे दादा जी सूबेदार जुगलाल अंगे्रेजों की तरफ से पांचवीं जाट बटालियन में होते हुए मनीपुर मोर्चे पर चाचा-भतीजा एक दूसरे को गद्दार कहते हुए लड़े थे। जबकि गद्दार कोई नहीं था। दोनों ही अपनी जगह सही थे। हम जानते हैं कि लगभग 1200 वर्ष तक खापों की सेनाओं ने देश और समाज की सुरक्षा के लिए अनेको लड़ाइयां लड़ीं, जिसमें 90 प्रतिशत से अधिक लडऩे वाले जाट ही थे, लेकिन जाट शब्द का कभी इस्तेमाल नहीं किया गया। इसी प्रकार सन् 1857 में जाटों ने देश की आजादी के लिए बहुत खून बहाया, लेकिन कौम का कहीं नाम नहीं। इसी प्रकार आजादी से पहले और बाद में उत्तर भारत में जितने भी किसान आंदोलन और विद्रोह हुए, उनमें भी जाटों की संख्या 90 प्रतिशत से अधिक रही, लेकिन जाट शब्द हमेशा नदारद रहा। इसलिए कभी भी जाट एकता की बात नहीं हुई। सन् 1907 में वीर क्रन्तिकारी राजा महेंद्र प्रताप के प्रयासों से अखिल भारत वर्षीय जाट सभा की स्थापना की गई, जो उस समय जाटों का एकमात्र सामाजिक संगठन बना। लेकिन ऐसा कोई इतिहास नहीं मिलता, जिसमें इस सभा ने कोई क्रन्तिकारी आंदोलन चलाया हो। हालाँकि यह सभा जाट समाज के सामाजिक विकास के लिए प्रयासरत रही, लेकिन समय आते-आते इसके भी टुकड़े होते चले गए और साथ-साथ उत्तर भारत में अनेको जाट सभाएं खड़ी हो गईं, जिनके उद्देश्य बहुत ही सीमित रहे और अधिकतर में लोगों को अपने प्रधान बनने तक सिमटकर रह गए। इस बिखराव पर कभी कोई चिंतन नहीं हुआ और इसे केवल चौधर की लड़ाई कहकर पल्ला झाड़ लिया गया। वास्तव में जाट समाज में अपने समाज के लिए चिंतन की भारी कमी रही है। जाट अभी तक देशभक्ति में ही लीन रहा है। अपनी कौम के बारे में उसे सोचने की बहुत कम फुर्सत रही है। इसी बीच जाट कौम के नाम से जगह-जगह जाट स्कुल, कालेज तथा धर्मशालाएं बनती रहीं जिससे जाटों का आपसी सहयोग तो बढ़ा, लेकिन जाट एकता में ज्यादा इजाफा नहीं हुआ।
जाटों के अधिकार का पहला विशुद्ध आंदोलन राजस्थान के जाटों ने जाट आरक्षण को लेकर सन 1992 में शुरू किया, जिसे चौधरी ज्ञानप्रकाश पिलानियां, चौधरी विजय पूनियां तथा चौधरी राजाराम मील जैसे कर्मठ जाटों ने इसे 29 अक्टूबर, 1999 को बगैर किसी हिंसा के अपने अंजाम तक पहुंचाया और जाट एकता का परिचय दिया। यही अधिकार दिल्ली, यूपी, हिमाचल, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश और बिहार के जाटों को अपने राज्यों में बगैर किसी आंदोलन के प्राप्त हो गया। इसलिए वहां पर जाट एकता का नारा लगाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। इसलिए जाट इन राज्यों में वैसे के वैसे बिखरे हुए रह गए।
राजस्थान का प्रभाव हरियाणा के जाटों पर पडऩा भी लाजमी था और इसकी सरसराहट सुनाई देने लगी। लेकिन सन् 2007 में अखिल भारतीय जाट सभा के अध्यक्ष चौधरी दारा सिंह ने पानीपत में बयान दिया कि हरियाणा के जाटों को आरक्षण की आवश्यकता नहीं है। इस बयान ने हरियाणा के कुछ समझदार जाटों को बेचैन कर दिया और इस मांग पर सरसराहट एक बार फिर मंदी पड़ गई। जहां तक रिकार्ड की बात है, हरियाणा में जाट आरक्षण पर पहली विधिवत् मीटिंग 26 जनवरी, 2008 को मैंने भिवानी में करवाई, जिसमें कर्नल हरपत सिंह अहलावत तथा अजीत सिंह सांगवान, पूर्व संयुक्त निदेशक मुख्य रूप से उपस्थित थे। जिसके बाद आरक्षण पर पहला पर्चा मैंने विस्तार से छपवाया, जिसका शीर्षक था : अब बताओ, जाट किसान हल कहां चलाए? इस पर्चे में एक किसान के कंधे पर हल दिखाया गया था। इस पर्चे की लाखों प्रतियां गांवों व राजनीतिक पार्टियों की रैलियों में बांटी गईं, जिस पर जाटों की प्रतिक्रिया एक मजाक के तौर पर रही, क्योंकि जाट आरक्षण को केवल दलितों का ही अधिकार समझते हुए आ रहे थे। मंडल कमीशन ने भी अपनी रिपोर्ट को पेज नंबर 294 पर लिखा है कि जाट पिछड़ा कहलाना नहीं चाहते क्योंकि वे समझते हैं कि इससे उनके स्वाभिमान को धक्का लगेगा। हरियाणा में जाट आरक्षण पर मेरा पहला बयान 14 फरवरी, 2008 को दैनिक जागरण में छपा। इससे पहले मैंने इस बारे में चौ. दारासिंह को छोडक़र कभी किसी का बयान नहीं पढ़ा, जो नकारात्मक था। इस आंदोलन के पीछे मेरी एक निजी बड़ी घटना काम कर रही थी, जो अगस्त, 1969 से मेरे दिल और दिमाग में बैठी हुई थी। जब अगस्त, 1969 में मैंने बीए पास करने के बाद सीआरपीएफ में डीएसपी(वर्तमान में सहायक कमांडेंट)पद के लिए परीक्षा में बैठा तो शारीरिक परीक्षा में मेरा तीसरा स्थान होते हुए भी चयन नहीं हो पाया था, जबकि एक बाल्मीकि लडक़ा, जो शारीरिक परीक्षा में मुझसे बहुत पीछे था तथा बीए में उसके भी वही विषय थे, जो मेरे थे, लेकिन उसके कुल अंक 41 प्रतिशत थे, जबकि मेरे 43 प्रतिशत थे। हम दोनों ने ही पंजाब विश्वविद्यालय से बीए पास किया था। लेकिन आरक्षण की वजह से उसका चयन हो गया और मैं रह गया तथा आखिर में कर्नल रिसाल सिंह वर्तमान में सांगवान खाप के प्रधान की सलाह पर मैंने अक्टूबर, 1969 में हवलदार का पद स्वीकार किया। सबसे ज्यादा कष्ट तब हुआ, जब मंडल कमीशन लागू होने पर हमारे समान जातियों को पिछड़ा मान लिया गया और उनके लडक़ों की बैकलॉग भर्ती मुझे अपनी कलम से करनी पड़ी, जिसमें जाटों के बच्चे नदारद थे। इस घटना ने मेरी अगस्त, 1969 की यादगार को और गहरे से दिल और दिमाग में बिठा दिया। यही बात थी कि सेवानिवृत होने के बाद मैंने जाट आरक्षण पर आंदोलन करने की ठानी थी।
सबसे पहले हमने गांव में ताश खेलने वाले जाटों के पास जाकर उन्हें आरक्षण के बारे में समझाया और प्रचार शुरू किया। पहले दिन का प्रचार 3 मार्च, 2008 को भिवानी जिले के गांव बामला, कौंट तथा सांगा से प्रारंभ किया, जिसमें मेरे साथ कर्नल हरपत सिंह और कैप्टन हवासिंह डागर थे। संगठन के बगैर, आंदोलन को आगे बढ़ाना कठिन हो रहा था, इसीलिए अखिल भारतीय जाट सभा के महासचिव चौधरी युद्धवीर सिंह सहरावत से संपर्क किया गया, जिन्होंने हमें अखिल भारतीय जाट सभा के बैनर तले कार्य करने को कहा। इससे प्रचार ने थोड़ी गति पकड़ी तथा आरक्षण पर पहली रैली 14 मार्च, 2008 को जींद की जाट धर्मशाला के साथ वाले मैदान में चौधरी दारासिंह की अध्यक्षता में हुई, जिसमें लगभग 2000 जाट सम्मिलित हुए, जो अधिकाँश भिवानी जिले के रहने वाले थे। इसके बाद जाट आरक्षण पर पहला हवन होली के उपलक्ष्य में 19 मार्च, 2008 को जाट धर्मशाला, पलवल में संपन्न हुआ, जिसमें मेरे अतिरिक्त लखीराम तेवतिया, खेमचंद कुंडू व समुंंद्र सिंह भाखर आदि सम्मिलित थे, जिसमें भाखर को पलवल का अध्यक्ष बनाया गया था, लेकिन इसके बाद भाखर कभी नजर नहीं आए। इसके बाद हरियाणा में जाट रैलियों और खाप पंचायतों का सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें मुख्य तौर पर बिहरोड़ 12 खाप, सतगामा खाप, सांगवान खाप, जाटू खाप 84 धनाना तथा श्योराण खाप पंचायतों के अतिरिक्त लाडवा, महम, बाढड़ा, फतेहाबाद, कलायत, कुरूक्षेत्र, समालखा, जुलाना तथा तोशाम आदि जगहों पर रैलियां हुईं। इसी बीच जब यह सिलसिला चल ही रहा था तो जाट एकता मंच, सोनीपत ने चौ. छोटूराम धर्मशाला, सोनीपत में एक जून, 2008 को सभी जाट संगठनों की बैठक बुलाई, जिसमें मैं भी अखिल भारतीय जाट सभा की तरफ से उपस्थित हुआ। इस मीटिंग में एक अलग से जाट आरक्षण संघर्ष समिति का गठन किया गया, जिसमें उनके मना करने पर भी माननीय चौ. देवीसिंह तेवतिया को अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया और कर्नल ओ.पी. संधू इसके कार्यवाहक अध्यक्ष बने, जो नियमों के विरूद्ध था, क्योंकि कार्यवाहक अध्यक्ष तब बनाया जाता है, जब अध्यक्ष का चुनाव न हो पाया हो। यह पहली गलती थी। उसके बाद इसी मीटिंग में जाट ज्योति के संपादक प्रोफेसर जे.के. गहलावत, पर अनर्गल आरोप लगाए गए, जिनका वहां पर कोई आधार नहीं था। न ही वहां का यह विषय था। इसीलिए वास्तव में इस मीटिंग का ध्येय तो वहीं असफल हो गया था, लेकिन जाट एकता के नाम पर हमारे संगठन ने इनके साथ पांच मीटिंग मन मसोसकर की। जब हमने देखा कि हर मीटिंग में धड़ाधड़ चंदे की रसीद बुके बांटी जा रही हैं और संगठन का वास्तविक अध्यक्ष तेवतिया साहब न होकर संधू साहब बन गए हैं, तो हमने इनसे किनारा कर लिया। हालाँकि हमने कभी भी मीडिया के माध्यम से उनका विरोध नहीं किया। परिणामस्वरूप, इस संगठन की रोहतक और जींद की रैलियां सफल रहीं। जब ये उजागर हो गया कि हम इनके साथ नहीं हैं तो उसके बाद लोगों ने इनके पास आना कम कर दिया और आखिरकार तंग आकर तेवतिया साहब ने भी एक दिन इस्तीफा दे दिया तथा जाट एकता पर फिर से एक बार प्रश्रचिन्ह लग गया।
 
अखिल भारतीय जाट सभा की ओर से हरियाणा राज्य में जाट आरक्षण के प्रचार की जिम्मेवारी मुझे दी गई थी तथा उत्तर प्रदेश की जिम्मेवारी यशपाल मलिक को दी गई, जो उस समय इस सभा के सचिव थे। 8 फरवरी, 2009 को उत्तरप्रदेश के मेरठ में जाटों की ऐतिहासिक रैली हुई, जिसमें लगभग साढ़े तीन लाख से लेकर साढ़े चार लाख तक जाट और जाटनियां थीं, जिसमें केंद्रीय मंत्री श्रीमति रेणुका चौधरी, चौ. अजीत सिंह, चौ. दारा सिंह के अतिरिक्त उत्तरप्रदेश की सभी राजनीतिक पार्टियों के जाट नेता एक साथ मंच पर उपस्थित थे, जहां पर चौधरी अजीत सिंह ने जाटों को भरोसा दिलाया कि जब भी कभी सत्ता में आएंगे, जाट समाज को आरक्षण दिलवाकर ही रहेंगे। वहां मुझे भी दो मिनट बोलने का समय दिया गया। इसके बाद इतनी बड़ी रैली कभी नहीं हुई। इससे पहले राजस्थान के जाट जयपुर में लगभग तीन लाख की संख्या में इकट्ठे हुए थे। इसके बाद जब कर्नल संधू ने 2009 के चुनाव में मीडिया के माध्यम से एनडीए को वोट डालने की अपील की, तो हमारे एकता के दरवाजे उनके साथ हमेशा के लिए बंद हो गए क्योंकि हमारा शुरू से ही यह सिद्धांत था कि हम किसी भी राजनीतिक पार्टी का समर्थन या विरोध नहीं करेंगे। हम केवल सरकारों से संघर्ष करेंगे, चाहे वहां किसी भी पार्टी की सरकार क्यों न हो। लेकिन जो नेता हमें आरक्षण देगा या दिलाएगा, उसका हम समर्थन जरूर करेंगे, चाहे वह किसी भी पार्टी का हो। दूसरा हमारा सिद्धांत यह है कि हम चंदे के लिए रसीद बुके छापकर चंदा इकट्ठा नहीं करेंगे। इस प्रकार कर्नल संधू की समिति ने दोनों ही सिद्धांतों का उल्लंघन किया। इसीलिए उनके साथ समझौता होने का प्रश्र ही नहीं रहा। इसी बीच इनके संगठन के महासचिव डॉ. ओमप्रकाश धनखड़ पैसों की रसीदों के मामले में उनका साथ छोड़ गए और उसके बाद एक के बाद एक वहां से लोग निकलते चले गए। याद रहे, किसी भी सामाजिक संगठन में सभी राजनीतिक पार्टियों के लोग होते हैं और होने भी चाहिएं, लेकिन जब किसी एक पार्टी का समर्थन या विरोध की बात आएगी, तो यह लाजमी है कि वह संगठन अपने आप ही समाप्त हो जाएगा। इसीलिए हमारे लिए सामाजिक संगठन पहले और पार्टी बाद में होनी चाहिए और किसी भी पार्टी का समर्थन या विरोध करना आत्मघाती है।
इसी प्रकार मार्च, 2008 से लेकर मार्च, 2009 तक लगभग एक वर्ष तक चौधरी युद्धवीर सिंह सहरावत ने सभी रैलियों में आकर बड़े प्रभावशाली भाषण दिए, जो लोगों ने बहुत सराहे और इन्होंने जाटों को बहुत प्रभावित किया। लेकिन चौ. युद्धवीर सिंह भी वही गलती कर बैठे, जो कर्नल ओ.पी. संधू ने की थी क्योंकि अखिल भारतीय जाट सभा ने समाचार पत्रों के द्वारा यह बयान दे दिया की यह सभा चुनाव में कांग्रेस का समर्थन करेगी। इसलिए हम इस सभा से भी अलग हो गए। मैं यहां यह याद दिलाना चाहूंगा कि 8 फरवरी, 2009 की मेरठ रैली से ही चौ. युद्धवीर सिंह तथा यशपाल मलिक के आपसी संबंध रैली की सफलता पर श्रेय लेने के लिए खटास भरे हो गए थे। जब कर्नल संधू और चौ. युद्धवीर सिंह के राजनीतिक बयानों से मैं निराश हुआ तो मैंने यशपाल मलिक से बात की कि वे अलग से एक संघर्ष समिति बनाएं, लेकिन उस समय उन्होंने कहा कि अभी ऐसी कोई बात नहीं करनी चाहिए, वर्ना हमें अखिल भारतीय जाट सभा से अलग कर दिया जाएगा। हालाँकि मैं अखिल भारतीय जाट सभा का कोई पदाधिकारी नहीं था। इन हालातों को देखते हुए मुझे बहुत दु:ख हुआ क्योंकि तीन कारणों से मैं अपने बल पर संगठन खड़ा करने में सक्षम नहीं था। पहला कारण, मेरी मधुमेह की बीमारी, दूसरा बढ़ती हुई उम्र, तीसरा पैसे की कमी। लेकिन हमने फिर भी अपने क्षेत्र में अपने तरीके से प्रचार अभियान जारी रखा। इससे पहले हमने हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नाम एक बहुत बड़ा हिंदी और अंग्रेजी में ज्ञापन तैयार किया, जिसकी प्रतियां हरियाणा के सभी विधायको व मंत्रियों व केंद्र में सभी जाट सांसदों व मंत्रियों के नाम डाक द्वारा भेजे गए और इसकी भी लाखों प्रतियां जगह-जगह बंटवाईं। इसके लिए अलग-अलग जाट महानुभावों ने अपना आर्थिक योगदान भी दिया। लेकिन इसका प्रभाव यह हुआ था कि 3 सितंबर, 2008 को जाट आरक्षण का मुद्दा पहली बार प्रोफेसर छत्तरपाल ने हरियाणा सदन में उठाया तथा तत्कालीन सांसद किशन सिंह सांगवान ने 19 फरवरी, 2009 में संसद में उठाया। लेकिन अफसोस है कि इन्हीं जाट नेताओं को जाटों ने ही चुनाव में हरा दिया और यही इनको जाट समाज ने तोहफा दिया। लेकिन जाट फिर भी एकता की बात करते रहे। इसी बीच एक दिन हम एक जाट नेता से जाट आरक्षण के लिए समर्थन और सहयोग मांगने गए तो उन्होंने कहा कि पहले हम सभी जाट एक हो जाएं। इस पर हमने उनसे प्रार्थना की कि आप केवल पांच जाटों को चौधरी अजीत सिंह, चौधरी भूपेंद्र सिंह हुड्डा, चौधरी ओमप्रकाश चौटाला, सरदार प्रकाश सिंह बादल तथा कैप्टन अमरिंद्र सिंह को इकठ्ठा कर दें तो हम पांच करोड़ जाटों को इकठ्ठा कर सकते हैं। इस पर नेताजी मुस्कराकर रह गए। इसके बाद का कुछ समय निराशाजनक रहा। इस अवधि में हमारे साथ बहुत जाट भाई जुड़े और चले गए, क्योंकि कुछ लोग यह समझकर जोश में आते हैं कि आरक्षण बड़ा जल्दी हो जाएगा, जबकि ऐसे आंदोलनों में लंबे संघर्ष की आवश्यकता होती है।
(करमश:)



 
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......दूसरा हमारा सिद्धांत यह है कि हम चंदे के लिए रसीद बुके छापकर चंदा इकट्ठा नहीं करेंगे। इस प्रकार कर्नल संधू की समिति ने दोनों ही सिद्धांतों का उल्लंघन किया। इसीलिए उनके साथ समझौता होने का प्रश्र ही नहीं रहा। इसी बीच इनके संगठन के महासचिव डॉ. ओमप्रकाश धनखड़ पैसों की रसीदों के मामले में उनका साथ छोड़ गए और उसके बाद एक के बाद एक वहां से लोग निकलते चले गए।
.... (करमश:)

Chaudhary Sahib, Your efforts are laudable more so because of your advanced age and 'sugar problem' you have been active to achieve your mission.

But pardon me to say that it is strange to know that you and O P Dhankhar parted company with the persons, who collected money for carrying on the campaign by providing receipts for the donations. What wrong do you perceive in this method of collection of funds as it is universally applied for all types of fund raising and is helpful in conciliation of accounts in a transparent manner?

Thanks
 
Mr Hawa singh ji thanks for your your efforts on jat reservation, but it is not true that you only started this moment in Haryana, Brother, when mr tevetia was elected president, I was very much present on the stage and if you remember, you came to me when we were having lunch and your friends explained your efforts to me and I pledged support of our kharb khap, The voice for jat reservation in Haryana was raised much earlier even ch Hukam singh tried, the voice became little loud after yadav etc were included in OBC many people were working and still working, but certainly they could not got their efforts documented like you, The fact is that you have entered in the field much later, I am unable to understand the aim of this post here, I think such self praise posts may go against your efforts and sincerity, As you know at Hisar people revolted and what they did you know batter, so please keep on working people will recognize your service to the community, let the people praise that will be batter. Please pardon me
 
Friends,

Pahale kaun aur baad mein Kaun? is not the question to be debated at this crucial occasion. We all must unite to show our strong points as why the Jats deserve a fair treatment under the land of the law and Constitution including settling the issue of OBC demand once for all times to come in reasonable time limit!
 
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I dont think its a good idea to accuse someone like this publicly. Not sure what is the purpose but generally people dont believe one sided story. Let people judge themself. Sometime you have to sacrifice your personal preference for the greater goal. If you are doing self less service please continue to do so people will come and go that always happen. People dont win a mission it is the dedicated efforts who do it. Even Subash chander Bose and Gandhi had parted. I know sometime criticism doesnt go well but still.
 
The voice for jat reservation in Haryana was raised much earlier even ch Hukam singh tried, the voice became little loud after yadav etc were included in OBC many people were working and still working, but certainly they could not got their efforts documented like you,

I think at that time there was no Internet existed. That's why they could not document much. But if you look at other Jat leader, "YashPal Malik"(IMHO, an Opportunist JAT leader), you will find him advertising everywhere.
 
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आड़े-ए चार बंदयाँ ने रोला पा दिया | के एक्का होणा स | बखत खोणा स |
 
Dear Dr Rajpal, neither my aim is to disunite people nor I am in different group, In fact I always stood with Mr Hawa singh, Col sandhu approched me along with Gen KHARB for supporting his group, He said that he is senior and Hawa SINGH MUST follow him but I clearly refused and told him that we all must be together. But dear one should not blame others like this and must not raise self on the cost of others, you will agree that mr sandhu, malik etc must have contributed some if not equal to Mr HawaSINGH, RAJPAL YOU ARE IN Haryana you have interest in these matters, you tell me is Mr Hawa singh only a person who started this moment, we had been and are with him. Brother, we all know who has done what, we are doing such service without any gain including fame and mr Hawa SINGH himself had been saying so, than what is aim of this kind of marketing, Now in these days every body understands and I can tell you such efforts always lower the immage of a person concern, In any case his son and mr sura do not allow any opportunity to go to high light even smallest his efforts so there is no need of such post. Again these are my personal views, I may or may not be correct.
 
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is article ke title 'jat ekta ka alap' ya is article ko padhne ke baad mujhe to yahi samajh ayaa h ki isme sangwan sir apne exp se shayad yah samjhana chahte h ki jat ekta kya hoti h , yah kaise tutti h .
isme do political leaders ka b bataya h ki in leaders ne assembly me jat ki baat ki jato ne unhe hi hara diya . ajeeb ekta h jato ki jo inki baat kare unhe hi hara dete h !!!
 
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Kya inki koi underhand deal mr hooda(cm) se hui hai.
Innka Beta food inspector / food supply inspector laga hai, kab or kaise ye bataye forum ko." aisa log kehte hai jo inke saath rehte the aur inka waada auro ke baccho ko lag wane ka tha aisa bhi batate hai?
 
Dear Dr Rajpal, neither my aim is to disunite people nor I am in different group, In fact I always stood with Mr Hawa singh, Col sandhu approched me along with Gen KHARB for supporting his group, He said that he is senior and Hawa SINGH MUST follow him but I clearly refused and told him that we all must be together. But dear one should not blame others like this and must not raise self on the cost of others, you will agree that mr sandhu, malik etc must have contributed some if not equal to Mr HawaSINGH, RAJPAL YOU ARE IN Haryana you have interest in these matters, you tell me is Mr Hawa singh only a person who started this moment, we had been and are with him. Brother, we all know who has done what, we are doing such service without any gain including fame and mr Hawa SINGH himself had been saying so, than what is aim of this kind of marketing, Now in these days every body understands and I can tell you such efforts always lower the immage of a person concern, In any case his son and mr sura do not allow any opportunity to go to high light even smallest his efforts so there is no need of such post. Again these are my personal views, I may or may not be correct.

Respected JatLanders,

I will be the last person to doubt credentials of the social workers and leaders, so there is no question of reading any other meaning in my posts. They are straight and open.

I reiterate, let us forget about who did what and when did he start or to what extent he was right or wrong. It is the need of the hour to present a united voice for acceptance of our genuine demand.

It is well known that washing dirty linen in public will definitely bring a bad name to the community. Whosoever has anything to contribute in the service of the community is free to articulate his views before the commission appointed for the purpose. Every ounce of information to cement our status counts. Leaders may come and leaders may go but the community must not be harmed to settle personal scores and one-up-man-ship tangle. This is my appeal to all brothers and sisters to come, join and strengthen the demand for OBC in whatever manner and banner of your choice; but do contribute your mite!
Jai Hind.
 
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इसके अतिरिक्त नरेन्द्र खरब, चौ० ओमप्रकाश ग्रेवाल बामलिया, चौ० वेदपाल सांगवान बहादुरगढ़, चौ० राममेहर ठेकेदार सिवाड़ा, चौ० ओमप्रकाश मान बी.जे..पी., चौ० दिलबाग सिंह सांगवान गैस एजेंसी (बिरही कलां), चौ० सुरेन्द्र सिंह ठेकेदार उन्हाणी, प्रकाश ठेकेदार सिवाड़ा, अजय सांगवान एडवोकेट बादल तथा सुखबीर सिंह हुड्डा गांव सांघी व बलजीत सिंह झोझूकलां के नाम उल्लेखनीय हैं जिन्होंने पोस्टर आदि छपवाने के लिए आर्थिक योगदान दिया है। 8 फरवरी 2009 को जाट जागृति अभियान का एक साल पूरा हुआ। उसके बाद सरकारी जागृति अभियान चलेगा।


Fateh ji Praise ki baat to koi nahi hawa singh ji ne to bahut lagon ka naam liya hai apni kitab ASLI LUTERE KAAUN ? MAI jinhone unka is kam m sath diya h usme kuch log jatland ke bhi hai jaise ki narender kharb ji , sukhbir hooda ji

or unhone apni kitab m ye bhi likha h ki jis jis ne andolan m unka sath diya h unka parichay vo apni kitan jo ki is andolan ke bare m likhenge zaroor karenge


is article mai mere khayal se sangwan sahb ne apne nazariye se Jat Unity ke baare m likha h na ki apne baree main
 
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Kya inki koi underhand deal mr hooda(cm) se hui hai.
Innka Beta food inspector / food supply inspector laga hai, kab or kaise ye bataye forum ko." aisa log kehte hai jo inke saath rehte the aur inka waada auro ke baccho ko lag wane ka tha aisa bhi batate hai?


Is desh main bawlikhodoon ki kami nahi h lakra sahb .
hawa singh ji ke 2
chore h Unki umar likad chuki h potte mere khayal t 2/3 main honge unki deal hogayi ho t va nyari baat s
 
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अखिल भारतीय जाट सभा की ओर से हरियाणा राज्य में जाट आरक्षण के प्रचार की जिम्मेवारी मुझे दी गई थी तथा उत्तर प्रदेश की जिम्मेवारी यशपाल मलिक को दी गई, जो उस समय इस सभा के सचिव थे।
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इसका प्रभाव यह हुआ था कि 3 सितंबर, 2008 को जाट आरक्षण का मुद्दा पहली बार प्रोफेसर छत्तरपाल ने हरियाणा सदन में उठाया तथा तत्कालीन सांसद किशन सिंह सांगवान ने 19 फरवरी, 2009 में संसद में उठाया। लेकिन अफसोस है कि इन्हीं जाट नेताओं को जाटों ने ही चुनाव में हरा दिया और यही इनको जाट समाज ने तोहफा दिया।
(करमश:)

None of the persons named above were first or second.

The real position is :

Chaudhary Devi Lal,CM, Haryana appointed Justice Grewal Commission to consider the case of Jat OBC claim along with a few other castes in Haryana. Recommendations of the commission were accepted by Ch. Hukam Singh CM, Haryana in 1990-91.
 
इसके अतिरिक्त नरेन्द्र खरब, चौ० ओमप्रकाश ग्रेवाल बामलिया, चौ० वेदपाल सांगवान बहादुरगढ़, चौ० राममेहर ठेकेदार सिवाड़ा, चौ० ओमप्रकाश मान बी.जे..पी., चौ० दिलबाग सिंह सांगवान गैस एजेंसी (बिरही कलां), चौ० सुरेन्द्र सिंह ठेकेदार उन्हाणी, प्रकाश ठेकेदार सिवाड़ा, अजय सांगवान एडवोकेट बादल तथा सुखबीर सिंह हुड्डा गांव सांघी व बलजीत सिंह झोझूकलां के नाम उल्लेखनीय हैं जिन्होंने पोस्टर आदि छपवाने के लिए आर्थिक योगदान दिया है। 8 फरवरी 2009 को जाट जागृति अभियान का एक साल पूरा हुआ। उसके बाद सरकारी जागृति अभियान चलेगा।


Fateh ji Praise ki baat to koi nahi hawa singh ji ne to bahut lagon ka naam liya hai apni kitab ASLI LUTERE KAAUN ? MAI jinhone unka is kam m sath diya h usme kuch log jatland ke bhi hai jaise ki narender kharb ji , sukhbir hooda ji

or unhone apni kitab m ye bhi likha h ki jis jis ne andolan m unka sath diya h unka parichay vo apni kitan jo ki is andolan ke bare m likhenge zaroor karenge


is article mai mere khayal se sangwan sahb ne apne nazariye se Jat Unity ke baare m likha h na ki apne baree main
[/QUOTE
I know, reality and people you named, I think you need some time to understand the matter
 
Respected JatLanders,

I will be the last person to doubt credentials of the social workers and leaders, so there is no question of reading any other meaning in my posts. They are straight and open.

I reiterate, let us forget about who did what and when did he start or to what extent he was right or wrong. It is the need of the hour to present a united voice for acceptance of our genuine demand.

It is well known that washing dirty linen in public will definitely bring a bad name to the community. Whosoever has anything to contribute in the service of the community is free to articulate his views before the commission appointed for the purpose. Every ounce of information to cement our status counts. Leaders may come and leaders may go but the community must not be harmed to settle personal scores and one-up-man-ship tangle. This is my appeal to all brothers and sisters to come, join and strengthen the demand for OBC in whatever manner and banner of your choice; but do contribute your mite!
Jai Hind.
My dear I meant the same thing and want the same, you have quoted my post but did not reply clearly any of my point, any way thank
 
Kya inki koi underhand deal mr hooda(cm) se hui hai.
Innka Beta food inspector / food supply inspector laga hai, kab or kaise ye bataye forum ko." aisa log kehte hai jo inke saath rehte the aur inka waada auro ke baccho ko lag wane ka tha aisa bhi batate hai?
God know what is truth but in Haryana people are talking lot on your doubt, appointment of his son further strengthen the doubt, any way we have to wait and see.
 
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