Jat Martyrs – Neglected by Historians

dndeswal

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जाट वंश के बलिदान
जिनके अमर बलिदानों की गाथा किसी ने नहीं लिखी​

(This article was published in the year 1986, as part of a memoir for the martyrs of First War of Indepencence (1857), edited and published by Swami Omanand. It was again published in the year 2000, in one of his books - see the footnotes at the end of this post).

लेखक ने यह लेख जाटवंश के वीरों की कुछ घटनाओं को लेकर ही लिखा है । इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य वंशीय लोगों के बलिदानों को भुला दिया । वह स्वयं लिखता है कि "इस लेख में मैं केवल जाटों से सम्बन्धित कुछ बातें लिखूंगा । बाकी लोगों के संबन्ध में अन्य लेखों में ।" वैसे लेखक ने जाट, अहीर, राजपूत, ब्राह्मण और वैश्य आदि सभी का सामान्यतः इसमें उल्लेख किया है । जाति-पांति के झंझट में फंसना हमारा सिद्धान्त नहीं परन्तु पृथक-पृथक नामों से कुछ समूह प्रसिद्ध हो चुके हैं । उनका उसी नाम से वर्णन करने में कुछ सुविधा रहती है । जाट एक क्षत्रिय वंश है । उसके नाम मात्र को सुनकर नाक भौं सिकोड़कर साम्प्रदायिक कहना उचित नहीं । लेखक को इतिहास सामग्री से लाभ उठाना ही अभिप्रेप्सित होना चाहिये । - वेदव्रत सम्पादक



पिछले पांच हजार साल से भारत के भाग्य निर्णायक युद्ध हरयाणे की वीर-भूमि में लड़े जाते रहे हैं । धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भाई से भाई का जो युद्ध हुआ उसमें ऐसी परम्परा पड़ी कि आज भी इस धरती पर भाई से भाई लड़ता कतराता नहीं । और इसी हरयाणे की पवित्र भूमि के ठीक मध्य में दिल्ली है जो न्यूनाधिक अपनी स्थापना से आज तक इस राष्ट्र की राजधानी चली आई है । हजारों साल से वे देश के स्वातन्त्र्य युद्धों में सामूहिक रूप से भाग लेते आये हैं । परन्तु इतिहास में उनके अमर बलिदानों की कहानी का उल्लेख नहीं हुआ है । जाट रणभूमि में अपने जौहर बार-बार दिखला चुका है, फिर भी राजपूत, सिख, मराठों जैसे युद्ध सम्बन्धी प्राचीन दन्त-कथायें उसके भाग्य में नहीं हैं । परन्तु अपनी मातृभूमि के लिए जिस दृढ़ता से जाट लड़ सकता है, उनमें से कोई भी नहीं लड़ सकता । अधिक से अधिक प्रतिकूल परिस्थिति में भी पूर्ण रूप से शान्त बने रहने और घबरा न उठने की प्राकृतिक शक्ति से जाट भरपूर होता है । भय तो जाट को छू भी नहीं सकता । जो भी चोट उस पर पड़ती है, उससे वह और भी कड़ा बन जाता है । उद्योग और साहस में तो जाट अद्वितीय होता है । शारीरिक संगठन, भाषा, चरित्र, भावना, शासन-क्षमता, सामाजिक परिस्थिति आदि के विचार से जाट ऊँचा स्थान रखता है ।

भारतीय इतिहास के निर्माण में जाट वंश का महत्वपूर्ण भाग रहा है । हिन्दू जाति और हिन्दू धर्म के लिए जाटों ने जो जो कार्य किये हैं, वे सदैव स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य हैं । परन्तु आज भी आम हिन्दू में जाटों के प्रति जो भावना है उसे भला नहीं कहा जा सकता है । प्रेस और प्लेटफार्म से राजपूत, मराठा, सिख, गोरखों का यशोगान करते रहिये । आपको कोई कुछ न कहेगा परन्तु आपने भूल कर भी जाट के लिये कुछ लिख दिया या कह दिया तो आप फौरन साम्प्रदायिक घोषित कर दिये जावेंगे । जिन जाटों के लिए देश पर बलि देना बायें हाथ का खेल रहा है, जिनके रक्त में पवित्र कर्त्तव्य-पालन और देशभक्ति के भावों के परमाणु पूरी तरह से मिले हुए हैं, जो आन पर लड़ना और जान पर मरना खूब जानते हैं, आन के लिये घर बिगाड़ना जिस जाट के लिए साधारण बात रही है, उसके यशोगान से नफरत करना क्या हिन्दू जाति की ऐसान-फरामोशी नहीं है ?

विशाल हिन्दू जाति में से प्रसिद्ध इतिहासज्ञ श्री कालिका रंजन कानूनगो ही ऐसे हैं जिन्होंने इस ऋण से अनृण होने का प्रयत्न किया है । जाटों के सम्बन्ध में श्री कानूनगो के जो विचार हैं, उन्हें मैं उद्धृत करना आवश्यक समझता हूं । वे लिखते हैं - "एक जाट उतना कल्पनाशील और भावुक नहीं होता जितना सुदृढ़ और धर्मशाली । शब्द प्रमाण की अपेक्षा उस पर प्रत्यक्ष उदाहरण का विशेष प्रभाव पड़ता है । स्वातन्त्र्य-प्रियता और परिश्रम-शीलता उसके विशेष गुण हैं । उसे अपने व्यक्तित्व का बड़ा ध्यान रहता है । वह स्वजाति सत्ता का समर्थक होने के साथ संगठन-कला में भी दक्ष होता है । जाट जिस बात को ठीक समझता है उसे करने में तुरन्त प्रवृत हो जाता है । यद्यपि वह स्वतन्त्र प्रकृति का होने के कारण, अपनी इच्छानुसार ही सब कुछ कर डालता है, तथापि वह उचित बात को सुनने, समझने और तदनुसार काम करने के लिए सदैव तैयार रहता है ।"

भारतीय इतिहास में जाटों की जो उपेक्षा की गई है, उसके दोषी जाट स्वयं किसी से कम नहीं है । जाटों ने लेखकों का कभी सम्मान नहीं किया, न ही कभी खुद लिखा । पीढ़ियों से उनके दो ही काम रहे हैं - देश की पुकार पर युद्ध करना और शान्ति के समय हल चलाकर, अन्न पैदा कर देश का पेट भरना । आज जाटों में पढ़े लिखों की कमी नहीं । उनमें अनेक डी.लिट., पी-एच.डी., एम.ए., बी.ए., आचार्य, शास्त्री, प्रभाकर, ज्ञानी इत्यादि हैं । उनके अपने अनेक कालिज हैं, जिनमें अनेक नवयुवक सुन्दर सुखद भविष्य की कल्पना में लीन हैं । आज जाटों के पास साधनों की भी कमी नहीं है । उनमें अनेक शक्तिशाली पुरुष हैं । पर क्या उनमें से कोई माई का लाल नहीं जो जयचन्द्र विद्यालंकार की तरह अपने जीवन को शोध में लगा दे ? क्या जाटों की कोई संस्था है जो ऐसे जन की रोटी, कपड़े, निवास की व्यवस्था कर सके ? ईरान से इलाहाबाद तक के विशाल भूखंड में जाटों के वीरत्व-पूर्ण बलिदानों की कहानियाँ चप्पा-चप्पा भूमि में बिखरी पड़ी हैं । उनका संग्राहक चाहिये । जीवन की बाजी लगाने वाला चाहिये जो भारतीय इतिहास की अनेक टूटी कड़ियों को मिला सके, अपनी शोध द्वारा ।

दो हजार वर्ष पूर्व दुर्दान्त हूणों के आक्रमण से अपने प्रबल पराक्रम द्वारा जाटों ने भारत की रक्षा की और उन्हें देश से निकाल बाहर किया ।

छठी शताब्दी में जाट राजा हर्षवर्धन उत्तर भारत के सर्वशक्तिमान् सम्राट् थे जिनके राज्य-प्रबन्ध की प्रशंसा चीनी यात्रियों ने भी की है । इन्हीं के राज्य में बाण जैसा कवि था जिसके सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि "बाणोच्छिष्टं जगत् सर्वम्" । संस्कृत साहित्य का कोई ऐसा शब्द न होगा जिसका बाण ने प्रयोग न किया हो । सौलह सौ वर्ष पूर्व उत्तर भारत में जाटों के अनेक उदाहरण थे जिनमें रोहतक का यौधेयगण राज्य सर्वाधिक प्रसिद्ध था । यहाँ के वीर क्षत्रियों ने अपने रक्त की अन्तिम बूंद तक बहाकर पंचायती राज्य की रक्षा के लिए अकथनीय बलिदान दिये । उनके समृद्धिशाली राज्य की कहानी रोहतक का खोखरा कोट पुकार-पुकार कर कह रहा है । थानेसर, कैथल, अग्रोहा, सिरसा, भादरा आदि इनके प्रसिद्ध जनपद थे ।

१०२५ में जब महमूद गजनवी गुजरात के संसार-प्रसिद्ध देवालय सोमनाथ को लूटकर रेगिस्तान के रास्ते वापिस गजनवी जा रहा था तब भटिण्डा के जाट राजा विजयराव ने उसे सिन्ध के मरुस्थल में घेरा और उसकी असंख्य धनराशि अपने कब्जे में की तथा उसे खाली हाथ लौटने के लिए (प्राण बचाकर भागने के लिए) विवश किया । नौ सौ साल पहले बुटाना के जाटों ने अत्याचारी मुगलों को घातरट (सफीदों के पास) के मुकाम पर हराया और गठवाले (मलिक) जाटों ने पठानों को कलानौर में शिकस्त दी ।

मुगलिया सल्तनत के दौरान में हरयाणा के वीर-पुत्रों ने सर्वखाप पंचायत के मातहत अनेक लड़ाइयां लड़ीं और महत्वपूर्ण बलिदान दिये जो अलग ही लेख का विषय है । औरंगजेब ने ब्रज के गोकुला जाट को मुसलमान न बनने पर जिन्दा चर्खी पर चढ़ा दिया था और माड़ू जाट की जिन्दा जी खाल (चमड़ी) उतरवा ली थी । उसी समय बोदर के महन्तों की वैरागी फौजों में शामिल होकर जाट मुगलों से निरन्तर संघर्षरत होते रहे ।

महाराजा सूरजमल ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए जो किया उसे भुलाना कृतघ्नता होगी । ढीली पड़ती मुगलिया सल्तनत की कमजोरी से लाभ उठा उन्होंने विशाल राज्य स्थापित किया । वे शरणागत-वत्सल थे । जिस समय जयपुर पर राजपूताने के राजाओं और मराठों की सम्मिलित शक्ति का आक्रमण हुआ तो महाराजा ईश्वरी सिंह की करुण कथा सुन तथा दूत द्वारा केवल पत्र पुष्प ही ग्रहण कर, बीस सहस्र जाट सैनिकों के साथ आमेर जा पहुंचे । राजपूतों तथा मराठों की सम्मिलित शक्ति को पराजित कर ईश्वरीसिंह को निष्कंटक राजा तो बना ही दिया, अपने शक्ति की धाक भी सब पर जमा दी । वे उस समय उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली राजा थे । जिस समय अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर १७६१ में चतुर्थ आक्रमण किया और पेशवा के प्रतिनिधि सदाशिवराव भाऊ ने उसके आक्रमण का प्रतिशोध करने के लिए हिन्दू शक्ति का आह्वान किया, उस समय जहाँ राजपूत राजाओं ने भाऊ का साथ देने से इन्कार किया, वहां महाराजा सूरजमल अपने पचास हजार रणबांकुरों को लेकर मैदान में आ पहुंचे । यही नहीं, उन्होंने विशाल मराठा वाहिनी के लिए अपने खजाने से एक महीने का राशन भी दिया ।

बादली के युद्ध में घायल दत्ता जी सिंधिया को उठाकर जाट सैनिक कुम्भेर के दुर्ग में ले गये । अब्दाली के आतंक के कारण दिल्ली के जिस वजीर गाजीउद्दीन को कोई शरण देने के लिए तैयार न था और जो महाराजा सूरजमल का प्रबल विरोधी था, उसे भी उन्होंने शरण दी । यदि सदाशिवराव भाऊ महाराजा सूरजमल की सलाह मान गुरिल्ला युद्ध ठान लेते तथा प्रतापी जाट राजा को अपमानित नहीं करते, तो भारतवर्ष का इतिहास ही दूसरा होता । महाराजा सूरजमल के जाने के बाद भाऊ जब पानीपत के मैदान में खेत रहे, उनका खजाना लुट गया । आज भी हरयाणे में भाऊ की लूट मुहावरे के रूप में प्रसिद्ध है । मराठा सैनिकों और स्त्रियों को कहीं ठिकाना न रहा, तब महाराजा भरतपुर ने अपने दुर्ग के द्वार शरणागतों के लिए खोल दिये । अपने राज्य की प्रजा को आदेश दिया कि वे युद्ध से बचकर भागे मराठा सैनिकों का यथाशक्ति सम्मान करें । स्वयं भरतपुर दुर्ग से महारानी किशोरी अपनी देख रेख में चालीस-चालीस हजार आहत सैनिकों को दोनों समय भोजन कराती थी । एक पखवाड़े तक यह क्रम जारी रहा । इसके उपरान्त उनको विदा करते समय प्रत्येक बड़े सरदार को एक सहस्र रुपये, प्रत्येक सैनिक को सौ रुपये, लत्ते-कपड़े तथा अन्न दिया और अपनी सेना की देख-रेख में ग्वालियर दुर्ग तक भेजा । यदि महाराजा सूरजमल आड़े न आते तो बहुत थोड़े मराठे नर्मदा पार कर अपने देश को पहुंच पाते । यदि वे बदला लेने पर उतारू होते तो एक भी मराठा सैनिक बचकर ग्वालियर न पहुँच पाता । एक मराठा सरदार लिखता है "महाराजा सूरजमल ने हाथ जोड़ कर हम से कहा - मैं तुम्हारे पास का हूँ, मैं तुम्हारा एक सेवक हूं, यह राज्य तुम्हारा ही है ।" सूरजमल जैसे उदार प्रवृत्ति के मनुष्य संसार में बहुत कम हुए हैं ।

जब महाराजा सूरजमल शाहदरा के पास धोखे से मारे गये तो महारानी किशोरी (होडल के प्रभावशाली सोलंकी जाट नेता चौ. काशीराम की पुत्री) ने महाराजा जवाहरसिंह को एक ही ताने में यह कहकर कि "तुम पगड़ी बांधे हुए फिरते हो, तुम्हारे पिता की पगड़ी शाहदरा के झाऊओं में उलटी पड़ी है", युद्ध के लिए तैयार कर दिया । महाराजा जवाहरसिंह ही पहले हिन्दू नरेश थे जिन्होंने आगरे के किले और दिल्ली के लाल किले को जीतकर विजय वैजयन्ती फहराई थी । दिल्ली के लाल किले के युद्ध में जब किसी भी तरह किला फतह न हो पा रहा था तब महाराजा जवाहरसिंह के मामा और महारानी किशोरीबाई के भाई वीरवर बलराम ने किले के फाटकों के लम्बे-लम्बे कीलों पर छाती अड़ा हाथी के मस्तिष्क पर बड़े-बड़े तवे बन्धवा पीलवान से हाथी हूलने को कहा । हाथी की मार से किले के किवाडों और तवों के बीच में बलराम का शरीर निर्जीव हो उलझ गया पर उनके अमर बलिदान से अजेय दुर्ग के फाटक टूट गए और वह जीत लिया गया । भारतीय इतिहास में ऐसे अपूर्व बलिदान की एक ही कहानी और मिलती है और वह है उदयपुर के महाराणा अमरसिंह के समय रणथम्भौर के आक्रमण में चूड़ावतों व शेखावतों के झगड़े में शेखावत सरदार की आत्माहुति ।



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Jat Martyrs - Part -II

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कौन नहीं जानता कि भारतेन्द्र महाराजा जवाहरसिंह ही एकमात्र ऐसे हिन्दू नरेश थे जिन्होंने हिन्दू जाति के मुसलमानों द्वारा नष्ट किये हुए गौरव की रक्षा करके हमारी मान मर्यादा को सुरक्षित किया था । इतिहास-वेत्ता और इतिहास-प्रेमी पाठकों से यह बात छिपी हुई नहीं है कि महमूद गजनवी, चंगेज खाँ, तैमूरलंग, औरंगजेब आदि मुगल आक्रान्ताओं, लुटेरों और बादशाहों ने हिन्दुओं के अनेक मन्दिरों को तोड़ा, मूर्तियों को खण्डित किया, मंदिरों में शंख, घड़ियाल व घण्टों का बजाना बंद कर के उनमें आरती होने तक को बंद करा दिया था । अनेक हिन्दुओं को बलात् मुसलमान बना लिया था । यहां तक कि हिन्दुओं की बहिन-बेटियों को छीनकर मुसलमान बना लिया था । यदि इन अत्याचारों का बदला किसी ने लिया तो सच्चे वीर क्षत्रिय महाराजा जवाहरसिंह ने । उन्होंने आगरा आदि नगरों में अपने राज्य बल से मुल्लाओं को प्रातः-सायं बांग देने से रोक दिया था । आगरा की जामा मस्जिद में बाजार लगवा दिया था परन्तु उसे तुड़वाया नहीं । इससे उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया था । अन्यथा वे चाहते तो क्षण भर में नष्ट भ्रष्ट करा देते और उसका चिन्ह तक मिटा देते । देहली से लौटते हुए उन्होंने सैंकड़ों नव-मुस्लिमों को जाट बना लिया था, जो आज भी हिन्दू जाति का गौरव बढ़ा रहे हैं । वही एक ऐसे प्रातः स्मरणीय हिन्दू नरेश हुए हैं जिन्होंने सच्चे अर्थों में हिन्दुत्व की रक्षा की तथा अकबर के सिंहासन पर बैठकर आगरे में शासन किया ।

१८०५ में भरतपुर के दुर्ग पर जब अंग्रेजों ने आक्रमण किया तो महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों के जिस तरह दांत खट्टे किये वह तो इतिहास की अद्वितीय गाथा बन गया है । और उसी समय से यह कहावत प्रसिद्ध हो गई है कि - आठ फिरंगी, नौ गोरे, लड़ें जाट के दो छोहरे । कविवर वियोगी हरि ने भी अपनी वीर सतसईं में लिखा है "एही भरतपुर को दुग्ग है, जहं जट्टन के छोहरे .....दिये अंग्रेज सुभट्ट पछारी ।"

मातृभूमि के पैरों में से दासता की बेड़ियाँ उतरवाने के लिए, उसकी स्वतन्त्रता प्राप्ति के हित जो अंग्रेजों के विरुद्ध १८५७ का युद्ध लड़ा गया, उसमें सबसे बढ़-चढ़ कर भाग अहीरों और जाटों ने लिया जिसका फल इन्हें अंग्रेजों के राज्य में बहुत बुरे तरह भोगना पड़ा और इन्हें अनेक राज्यों में विभक्त कर दिया गया ।

१०२ वर्ष पूर्व जीन्द राज्य के प्रसिद्ध गाँव लजवाना में भूरा अन्द निघांईया दो जाट चौधरी बसते थे । मजदा और दुर्गा के बहकाने से महाराजा जीन्द ने उन पर आक्रमण कर दिया । यह युद्ध छः महीने तक चला । भूरा और निघांईया की मदद चारों ओर की जटैत करती थी जो समय के अनुसार घटती, बढ़ती रहती थी । धन, जन की कभी कमी न रहती थी । भूरा और निघांईया अपने मातहत काम करने वालों को आठ रुपये महीना देते थे । तोपची को सोलह रुपये महीना । सात सौ हेड़ी उनकी फौज में तोपची का काम करते थे । गोला, बारूद, रसद उन्हें रिठाना, फड़वाल और खुडाली (किला जफरगढ़) के ठिकानों से पहुंचती थी । खुडाली में तो पुराने घरों में अब तक शोरा, गन्धक, पुरानी बन्दूक, गंडासे आदि बड़ी तादाद में खुदाई पर निकल आते हैं । इस युद्ध में पटियाला, नाभा, जीन्द आदि राज्यों की बीस हजार से अधिक फौज काम आई थी । अंग्रेजी फौज ने आकर बड़ी कठिनाई से लजवाना को फतह किया था । आज भी पटियाला के देहात में बहनें यह गीत बड़े दर्द के साथ गाती हैं कि -

"लजवाने, तेरा नाश जाइयो, तैने बड़े पूत खपाये"​

हरयाणा के स्वाभिमानी पुरुष अंग्रेजी राज्य की स्थापना के कितने विरुद्ध थे, यह उपर्युक्त घटना से अच्छी तरह ज्ञात हो जाता है । अन्त में भूरा और निघांईया पकड़े गये तथा उन्हें कालवा (जीन्द राज्य का प्रसिद्ध गांव) में फांसी पर लटका दिया गया । फांसी गांव के बाहर वृक्षों पर दी गई तथा सारे इलाके के लोगों को बुलाकर, जिससे अंग्रेज की दहशत सब पर छा जावे और कोई भी ब्रिटिश प्रभु के खिलाफ सिर न उठ सके ।

सन् १८०९ में जब कर्नल वारिन पलटन लेकर भिवानी फतह के लिए गये, उस समय उसके चारों ओर बसने वाले जाटों, राजपूतों, ब्राह्मणों और वैश्यों ने डटकर लोहा लिया था । और तो और, जिन वैश्यों की व्यापारी कहकर उपेक्षा की जाती है, उनके अगुआ ला० नन्दराम अपने चार बेटों के साथ युद्ध में काम आये । कोसली के प्रसिद्ध पंडित तुलसीराम जी अपने भाई तोताराम के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में जूझे थे । १८०२ में जार्ज थामस ने पहले पहल हरयाणा की भूमि पर कब्जा किया । उसने बेरी, झज्जर तथा महम अपने अधीन किये, तथा सारे पंजाब पर कब्जा करने का विचार करने लगा । उसकी सफलता का कारण था तत्कालीन राजाओं व नवाबों का आपसी विग्रह । परन्तु हरयाणा वाले जल्दी ही संभल गये और उन्होंने बापू जी सिंधिया तथा भरतपुर के जाट नरेश महाराजा रणजीतसिंह की अध्यक्षता में युद्ध करके जार्ज थाम्स को इस प्रदेश पर से भगा दिया था । बाद में ईस्ट इंडिया कम्पनी की शासन सत्ता छा गई और यहाँ के निवासी सन् ५७ तक अन्दर ही अन्दर अंग्रेज के विरुद्ध धधकते रहे । १८५७ के स्वातन्त्र्य युद्ध में हरयाणे के राजाओं, नवाबों, सैनिकों और जन साधारण ने जो महत्त्वपूर्ण भाग लिया है, वह अलग ही लेख (लेख नहीं, पुस्तक) का विषय है । इस में कोई सन्देह नहीं कि हरयाणा के वीर पुत्रों (सभी जातियों) ने जो भाग आजादी की लड़ाई में लिया उसका उल्लेख बहुत कम हुआ है । रामपुरा, रिवाड़ी, फर्रुखनगर, बहादुरगढ़, झज्जर, बल्लभगढ़, नसीरपुर (नारनौल), श्यामड़ी, रोहतक, थानेसर, पानीपत, करनाल, पाई, कैथल, सिरसा, हाँसी, नंगली, जमालपुर, हिसार आदि सभी स्थान विद्रोहियों के केन्द्र रहे हैं । उपरोक्त सभी स्थानों पर कुछ न कुछ दिन आजादी के दीवानों की हकूमत रही है । इस लेख में मैं केवल जाटों से सम्बन्धित कुछ बातें लिखूंगा । बाकी लोगों के संबन्ध में अन्य लेखों में ।

१० मई को मेरठ से जो चिन्गारी छूटी वह ११ को देहली आ पहुँची । मेरठ की फौजों में सबसे अधिक हरयाणे के जाट और राजपूत थे । उनके बाद अहीर । उन फौजी सिपाहियों द्वारा यह आग सारे प्रदेश में व्याप्त हो गई । उस समय तक रोहतक बंगाल के गवर्नर के मातहत था, तथा कमिश्नरी का हेड-क्वार्टर आगरा । यहाँ के डिप्टी कमिश्नर जॉन एडमलौक थे । २३ मई को बहादुरगढ़ में शाही फौज ने प्रवेश किया और २४ मई को रोहतक पहुंची । डिप्टी कमिश्नर गोहाने के रास्ते करनाल भाग गया । रहे हुए अंग्रेज अधिकारी मारे गये । जेल के दरवाजे खोल दिये गये, कचहरी को आग लगा दी गई । शाही दस्ते ने शहर के हिन्दुओं को लूटना चाहा पर जाटों ने ऐसा न करने दिया । दो दिन ठहर कर विद्रोहियों ने खजाने से दो लाख रुपया निकाल लिया । मांडौठी, मदीना, महम की चौकियाँ लूट ली गईं । सांपला तहसील में आग लगा दी गई । सभी अंग्रेज स्त्रियों को जाटों ने मुस्लिम राजपूतों (रांघड़ों) के विरोध के बावजूद सही सलामत उनके ठिकानों पर पहुंचा दिया । गोहाना पर गठवाले जाटों ने कब्जा जमा लिया । ३० मई को अंग्रेजी फौज अंबाला से रोहतक चली, पर देशी फौजों के बिगड़ने से श्यामड़ी के जंगल में हार गई । बचे खुचे अंग्रेज दिल्ली को भागे । लुकते-छिपते ये लोग १० जून को सांपला पहुंचे । डिप्टी कमिश्नर सख्त धूप न सह सकने के कारण अंधा हो गया । रोहतक के विद्रोही १४ जून को दिल्ली पहाड़ी की लड़ाई में सम्मिलित हुए थे । जब अंग्रेज रोहतक पर किसी तरह भी काबू न पा सके तो मजबूर होकर उन्होंने २६ जुलाई सन् ५७ को एक घोषणा द्वारा जींद के महाराजा स्वरूपसिंह को सौंप दिया । दिसम्बर के अन्त तक जहां लोग अंग्रेज से लड़ते रहे, वहां जाटों की खापें आपस में भी एक दूसरे पर आक्रमण करती रहीं और बीच-बीच में रांघड़ों और कसाइयों से भी लड़ते रहे ।

जब गदर समाप्त हुआ तो प्रायः सभी गावों के मुखिया लोगों और खासकर नम्बरदारों को फांसी पर चढ़ा दिया गया था । झज्जर के चारों ओर की सड़कें उल्टे लटके मनुष्यों की लाशों से सड़ उठीं थीं । मुसलमान राजपूत गांवों के नम्बरदारों को तथा श्यामड़ी गांव के १० जाट नम्बरदारों व १ ब्राह्मण को रोहतक की कचहरियों व शहर के बीच नीम के वृक्षों पर (वर्तमान चौधरी छोटूराम की कोठी के सामने के वृक्षों पर) फांसी पर लटका दिया गया था । फांसी देने से पहले दसों जाट नम्बरदारों को बुलाकर अंग्रेज हाकिमों ने पूछा - बोलो क्या चाहते हो ? जाटों ने कहा कि हमारे ग्यारहवें साथी मुल्का ब्राह्मण को छोड़ दो । मुल्का ब्राह्मण ने अपने साथियों से अलग होने से इन्कार कर दिया । उसे भी उनके साथ ही फाँसी दे दी गई । सारी लाशें गाँव में लाकर जलाईं गईं । फांसी पाने वालों के खोज करने के बाद ९ नाम जान सका, दो का पता न चला । क्रमशः नाम ये हैं - मुल्का ब्राह्मण, हरदयाल, श्योगा, हरकू, बहादुरचन्द, जमनासिंह, हरिराम, शिल्का, भाईय्या (सब जाट) ।

कप्तान हडसन १६ अगस्त सन् ५७ को १२ बजे रोहतक पहुंचा था । उसने कुछ लोगों को इकट्ठे देखकर गोली चला दी जिससे १६ आदमी मारे गये । यह घटना चारों ओर के देहात में फैल गई । अगले दिन १७ अगस्त को सिंहपुरा, सुन्दरपुर, टिटौली आदि के १५०० आदमी चढ़ आये, जिनमें से ५० रणभूमि में ही खेत रहे । झज्जर के नवाब अब्दुर्रहमान को २३ दिसम्बर १८५७ को फांसी के तख्ते पर लटका दिया गया । २१ अप्रैल १९५८ को बल्लभगढ़ नरेश नाहरसिंह फांसी पर झुला दिये गये और उन्हीं के साथ नवाब झज्जर के तीन वजीरों में से एक वजीर बादली के गुलाबसिंह जाट भी फांसी पर चढ़ा दिये गये । राव तुलाराम व राव कृष्णगोपाल ने जो अतुल पराक्रम दिखाया, वह स्वर्णाक्षरों में अंकित होने योग्य है । इसी अर्से में बहादुरगढ़, दादरी, फर्रुखनगर के नवाब समाप्त कर दिये गये । फर्रुखनगर के नवाब मुहम्मद अली खाँ को फांसी दी गई और उनके ११ साथियों को गोली से उड़ा दिया गया । महाराजा नाहरसिंह के साथ फांसी पाने वालों में कुंवर खुशहालसिंह और ठाकुर भूरेसिंह भी थे ।

हिसार में सन् ५७ में हरयाणवी फौज की लाइट पलटन तैनात थी और १४वां घुड़सवार रिसाला था । पंजाब के तत्कालीन चीफ कमिश्नर सर जान लारेन्स ने एक अनुभवी सेना नायक जनरल वान कोटलैंड को भेजा । हिसार, सिरसा, हांसी और उनके देहात में जहाँ भी, जो भी अंग्रेज फंसा, समाप्त कर दिया गया । जहाँ रोहतक-करनाल के युद्धों में सिक्खों ने अंग्रेजों की सहायता की, वहां हिसार के युद्ध में महाराजा बीकानेर के ८०० सिपाही अंग्रेज की ओर से लड़े । हांसी के देहात में जो मारकाट मची, वह रोंगटे खड़े करने वाली है । जो अमानवीय अत्याचार यहाँ हुए, वह लिखे नहीं जा सकते । यदि उनका मुकाबला किया जा सकता है तो सन् १९४७ के नरमेध से । जमालपुर मंगली आदि गांव राख के ढ़ेर बना दिये गये । युद्ध की समाप्ति पर देहात से पकड़कर १५० के लगभग लोगों को फांसी पर सरे आम लटका दिया गया ।

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Jat Martyrs - Part -III

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कुरुक्षेत्र के ब्राह्मणों के आदेश से हरयाणवी फौज ने इलाके के जाटों के साथ मिलकर थानेसर की सरकारी इमारतें जला दीं और तहसील पर कब्जा कर लिया । पाई के जाटों ने कैथल जीत लिया । असन्ध के मुसलमान राजपूत पानीपत तक चढ़ आये । खरखोदा (रोहतक) के लोग दिल्ली की बादशाही फौजों से जा मिले । खरखोदा की देहात के २० आदमी गोली से उड़ा दिये गये और १४ फाँसी पर लटका दिये गये ।

इस तरह हरयाणा के अन्दर फैले विद्रोह को दबाने के लिये सिक्ख व राजपूत फौज के साथ अंग्रेजी फौज ने भारी अत्याचार किये तथा सन् ५७ के अन्त तक सम्पूर्ण प्रदेश पर अधिकार कर लिया । लार्ड केनिंग चाहते थे कि हरयाणे की शूरवीर जातियों का सम्मान करना चाहिये । पर जनरल नील और मिंटगुमरी सम्मान करना तो दूर रहा, उजाड़ने पर तुले हुए थे ।

क्रान्ति १८५७ में हुई थी पर सन् १९०२ तक हरयाणा की सड़कें व जंगल उजाड़े जाते रहे । ग्रामों में संस्कृत की पाठशालायें बंद की गईं । मन्दिर उजाड़े गये । दो और तीन हजार के बीच पंचायतें तोड़ीं गईं । न्यायालयों में हिन्दी के स्थान पर उर्दू जारी की गई । जिन पंजाब वालों से हरयाणा का न रहन-सहन मिलता है न बोल-चाल, उन्हीं के साथ हरयाणा को आगरा से अलग कर मिला दिया गया । कुछ भाग जीन्द, नाभा, पटियाला की रियासतों के साथ मिला दिये गये । पंजाब के मुकाबले में इस प्रदेश की भारी उपेक्षा की गई । नये-नये कर लगाये गये । यहाँ के पैसे से पंजाब में नहरें निकाली गईं । कर्नल रैनक अंग्रेज को डिप्टी कमिश्नर बनाकर, २० वर्ष तक बारी-बारी करनाल, रोहतक, हिसार, गुड़गाँव जिलों में भेजा जाता रहा जो इस प्रदेश के स्वाभिमानी वीर क्षत्रियों के हृदयों को ठेस लगाता रहा । उसने क्रान्ति में भाग लेने वाले अनेकों वंशों की जागीरें छीनीं, अमानुषिक दंड दिये । पर कर्नल रैनक के अत्याचार भी इस प्रदेश की वीरतापूर्ण भावना को दबा न सके ।

ऋषि दयानन्द की कृपा इस प्रदेश पर हुई, आर्यसमाज का प्रचार धीरे-धीरे बढ़ा । सभी जाट आर्यसमाजी हो गये । स्वदेशी की भावना पनपी । जहाँ उन्होंने सन् १९१४ के विश्व युद्ध में फौज में भरती होकर जर्मनी जैसी विश्वशक्ति को युद्ध में पछाड़ा (पहले विश्व-युद्ध में ६ नं. जाट पलटन के जौहर प्रसिद्ध हैं, उनके शौर्य की प्रशंसा शत्रुओं ने भी की है), वहाँ उन्हीं दिनों उनके कानों में जाट सरदार अजीत सिंह की यह आवाज भी पड़ी कि "पगड़ी संभाल ओ जट्टा, पगड़ी संभाल" । उन्होंने गांधी जी के आन्दोलनों में बढ़ चढ़ कर भाग लिया तथा अनेक लोगों ने घर-द्वार छोड़ देश की आजादी के लिये सर्वस्व न्यौछावर किया ।

राजा महेन्द्रप्रताप आजादी की चसक में रियासत छोड़कर ३३ साल तक संसार के अनेक देशों की खाक छानते फिरे परन्तु उनके बलिदान की कीमत किसने की ? आज अनेकों नकारा राजनीतिज्ञ राज्यपाल बने बैठे हुए हैं पर राजा जी लोकसभा में आये तो कांग्रेस के विरोध में ।

द्वितीय विश्वयुद्ध में जब जनरल मोहनसिंह ने आजाद हिन्द फौज बनाई और नेता जी सुभाषचन्द्र बोस ने उसका नेतृत्व संभाला तब उसमें सबसे बड़ी संख्या जाटों की थी । यह बात दूसरी है कि इन्हें वह यश नहीं मिला जो दूसरे लोगों को । कर्नल दिलसुखमान इतने सीनियर आफीसर थे कि वे आज स्थल सेनाध्यक्ष होते । पर आज वे आजाद हिन्द फौज के कारण घर बैठे हैं, उन्हें कोई पूछने वाली नहीं । मांडौठी के कप्तान कंवलसिंह ने नेता जी सुभाषचन्द्र के साथ बर्लिन से टोकियो तक पनडुब्बी में यात्रा की और रंगून से जापान के लिए उड़ने से पहले तक उनके साथ रहे, इस बात को कौन जानता है ? काश्मीर युद्ध में रिटौली, कबूलपुर के जमादार हरद्वारीलाल ने १० हजार फुट की उंचाई पर टैंक चढ़ाकर संसार में अद्भुत आश्चर्य उत्पन्न किया था । आज तक कोई भी इतनी उंचाई तक टैंक नहीं चढ़ा सका है । समाल गाँव के हुशियारसिंह अभी पिछले दिनों नागा पहाड़ियों में नागाओं से लड़ते हुए काम आये । भगतसिंह क्रांति की ज्वाला जलाते-जलाते फाँसी पर झूल गये । ऊधमसिंह सात समुद्र पर जनरल ओडायर को मारकर बलि हो गये । ऊधमसिंह-ताराचन्द अभी पिछले दिनों जोधपुर में डाकू कल्याणसिंह के मुकाबले में कुर्बान हो गये और उनकी कुर्बानी का ही यह परिणाम है कि आज राजस्थान, पाकिस्तान की सीमा डाकू-विहीन हो गई है ।

जिन मिस्टर जिन्ना से सारे हिन्दुस्तान के राजनीतिज्ञ मुकाबला करते घबराते थे, उन्हीं जिन्ना साहब को विचक्षण जाट राजनीतिज्ञ चौधरी छोटूराम ने कान पकड़कर पंजाब से निकाल दिया था । सन् ४२ में भक्त फूलसिंह जी आतताइयों के हाथ कत्ल हो गये । स्वामी स्वतंत्रानन्द जी महाराज गोरक्षा के लिए बलि हो गये ।

सन् १९४७ के गृह-युद्ध में यदि जाट गिरिराजशरणसिंह उर्फ बच्चूसिंह के नेतृत्व में मेव आक्रमण का मुकाबला न करते तो भारतीय इतिहास की धारा ही दूसरी होती और शायद दिल्ली हमारी न होती । इस गृह-युद्ध में जाट लोगों ने जिस वीरता के साथ भाग लिया है, वह किसी जानकार की लेखनी ही लिख सकती है । यह लम्बी कहानी है । वर्तमान हिन्दी सत्याग्रह संग्राम में जाटों ने ही सब से बढ़-चढ़कर बलिदान दिया । हैदराबाद में घर्मयुद्ध में सबसे अधिक सत्याग्रही हरयाणा से गये और उनमें भी सबसे ज्यादा थे जाट । पर जो यश उन्हें मिलना चाहिए था, नहीं मिला । आज भी जाटों में बलिदाताओं की कमी नहीं है । यदि कमी है तो उनको प्रकाश में लाने वालों की । हो सकता है नई पढ़ी-लिखी सन्तति इस तरफ कुछ ध्यान देकर विशाल भू-प्रदेश में बिखरे अपने इतिहास को संग्रहीत करने का प्रयत्न करे । जाटों का इतिहास उत्तर भारत का इतिहास है । आर्यों के विशाल साम्राज्य का इतिहास है ।

काश ! जाट तलवार की तरह कलम का भी धनी होता तो उनका इतिहास यों छिन्न-भिन्न न होता । इस धर्म-निरपेक्ष गणतन्त्र में वे संभल जायें तो भी अच्छा है । आशा है दूसरे लोग भी जाटों से बिदकना छोड़कर इनकी उदारता से नाजायज लाभ उठाना छोड़ेंगे ।

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उद्धरण (Excerpts from): “देशभक्तों के बलिदान”
पृष्ठ - 325-334 (द्वितीय संस्करण, 2000 AD)
सम्पादक - स्वामी ओमानन्द सरस्वती
(इस लेख के लेखक - श्री कपिलदेव शास्त्री)
प्रकाशक - हरयाणा साहित्य संस्थान, गुरुकुल झज्जर, जिला झज्जर (हरयाणा)



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Last edited:
Bahut bahut dhanyvad Deshwal ji, rongte khade kar dene wala sangrah hai ye to .... kitni sachai hai ki kalam ke karan kitna bhedbhav sahe rahi hai ye kaum.

Un sab bhula diye gae veeron ko sat sat pranam!!!
 
Deshwal ji its really an amazing stuff which you have produced for the benifit of the readers.

We as a cast have been ignored for the credit which we deserve.

Just see how many Maharaja Surajmal Chowks we have in cities, where as in Haryana itself we will find Raja Agarsen Chowk, Balmiki Chowk, Ambedkar Chowk and what not, i am not against these but atleast in states where Jats are dominating even there we dont find any such statues in respect of those great forefathers who have done pride to our cast

Maharaja Surajmal has been described as the Plato of Jat community,,,,,,what respect we are giving to him,,,,lets ask this question,,,,,we can keep on discussing various topics for the upliftment of Jats, but unless a community develope love and respect for its predecessors it can not succeed or it can find the right respect,,,,,,lets start respecting our great leaders

Leave that we dont even remember them on these days,,,,,,,,we Jats are not even fully aware of our glorious past, lets make an effort and ensure that all the educated Jats are fully conversant with our history and in the same process explain that to all the Jats:rock
 
Best post

Best post i have ever read, feeling more proud now Salute to all the great Jat personalities.
Thanks a lot Deshwal sir g for putting this thread.
 
Salutations n kudos to dnd uncle !!

Thanks a ton for this solid solid informative thread about Glorious but suppressed Jat History ... I literally felt Goosebumps !! .... It was quite enlightening and a sense of pride just run down my spin after going thro' this whole write up ! :)

It was Awesome n Amazing ... DND Uncle, You Simply Rock !! :cool:


Rock on
Jit
 
thanks

thank you Deswal Ji
Nice efforts keep it up.
this is true real jat history is ignored by historians.
We have to put the matter right.
My book history of Haryana saravkhap martyrs and freedom fighters.
Cover most of these events. Much more work should be done.
 
history of india is history of jats, n history of indian army is history of jat regiment, said dr zakir hussain,

but brigadier hosiar singh was from rajputana regiment
 
Farukhnagar

Nice article!
Wasn’t it the gate of Farukhnagar? According to folklore the Nawab of Farukhnagar wanted to marry a girl from Surehti-Kasani (Near Jhajjar) by force. To stop this forced wedding Jawahar Singh attacked Farukhnagar and his MAMA sacrificed himself to break this gate as mentioned below. I don’t know the authenticity but that is the popular belief in the area.

.....दिल्ली के लाल किले के युद्ध में जब किसी भी तरह किला फतह न हो पा रहा था तब महाराजा जवाहरसिंह के मामा और महारानी किशोरीबाई के भाई वीरवर बलराम ने किले के फाटकों के लम्बे-लम्बे कीलों पर छाती अड़ा हाथी के मस्तिष्क पर बड़े-बड़े तवे बन्धवा पीलवान से हाथी हूलने को कहा । हाथी की मार से किले के किवाडों और तवों के बीच में बलराम का शरीर निर्जीव हो उलझ गया पर उनके अमर बलिदान से अजेय दुर्ग के फाटक टूट गए और वह जीत लिया गया ।


....continued.


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history is a phenomenon. kisi ke char hath panv koni huye....used 2 b a fight bwn churaman etc.. from democracy to kingship.... n ... churaman ... consumed ... poison....
 
Nice article!
Wasn’t it the gate of Farukhnagar? According to folklore the Nawab of Farukhnagar wanted to marry a girl from Surehti-Kasani (Near Jhajjar) by force. To stop this forced wedding Jawahar Singh attacked Farukhnagar and his MAMA sacrificed himself to break this gate as mentioned below. I don’t know the authenticity but that is the popular belief in the area.

Many stories like this prevail in villages, some of them may be authentic. Placed below is an excerpt from Natwar Singh’s book “Maharaja Suraj Mal” relating to capture of Farukhnagar by Suraj Mal.

http://www.jatland.com/home/Maharaja_Suraj_Mal

Towards the end of 1763, arose a quarrel between the Jats and the Baloch. The expansionist ambitions of the former and the latter’s unfriendly policy towards the Jats formed the general background of this event.

Jawahar Singh directed his attack upon Farrukhnagar, held by a powerful Baloch chief, Musavi Khan. But he having failed to capture it, Suraj Mal himself came and laid siege to strong fort of Farrukhnagar in October, 1763, with all his forces and big artillery. Two months passed away and Musavi Khan being hard pressed, consented to surrender it if Suraj Mal would take an oath on the Ganges water not to hinder his departure. But the Jat on this occasion made the same unscrupulous use of the sanctity of the Ganges as that of the Quran by some Muslim rulers. The Baloch chief was made a prisoner and sent to Bharatpur. Thus, after a siege of two months, the fort of Farrukhnagar, along with all its effects came in the Jat possession on about 12 December 1763.

Garhi Harsaru, Rewari and Rohtak had already fallen into the hands of Suraj Mal. He now turned his arms against Bahadurgarh, about 12 kos to the west of Delhi, the strong-hold of another powerful Baloch chief Bahadur Khan. In his distress, the Baloch chief appealed for help to Najib-ud-daula, who however judged it inexpedient to provoke a war with Suraj Mal, before the arrival of the Abdali.

By the year 1763, the Jat power under Suraj Mal had reached such a glorious height, as had never been attained before. Owner of a spacious kingdom, of the richest and overflowing treasury, and of the most formidable and gallant troops unrivalled in contemporary India, as Suraj Mal was, little wonder that needy persons like Mir Qasim of Bengal, turned their eyes for help to him.

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yes, bharatpur really created havoc and they are the only one among jats to give them the pride of the most powerful kings of north India after 3rd battle of panipat.

babur introduced for the first time barood (explosive) which rajputs nevr could understand but jat churaman ne is ka bhi tod nikala tha. ek mitti ka danda banaya jis me gole dhuns jate or phoot te hi nahi the...

bharatpur jats are the branch of white huns, huns/hanz/hans/henga jats continued to rule china, germany, india, roman empire for a long time. we hear of two clans hengiri n balgiri who gave their name to hungry and balgaria, who were attacking raoman empire...they are henga and bal (baliyan) jats of today..even today china-india relation is never written in n e news paper as chino-indian relation but sino-indian relation..suggesting links of sinsinwars with china ...


that does not mean that sinsin huns migrated from china to India, it may be otherwise also as budhism went from India to china..n not vice versa...

like many other things like martial art etc. like depicted in shaolin ninza were basically indian n that of jats...

once upon a time bahadur shah appointed churaman as the peace maker of the royal route that stretched from delhi to agra. Historians commented that "a wolf was appointed to save got".


in romanian the meaning of jat is wolf, in India its bull, ..


like Jott, khet jotna

.....

we never knew the meaning of gutasya putra....
we always tried to view the terms in black n white...

never caring about the grey areas of indian history...

Recently I came to know that Sogdas are also Jats in Haryana. Greek historians are full of praise of a vast land called Sogdiana.

Arya Samaj did a commendable job for Jats but going a typical religion way like Sikh, Hindu, muslim or cristian way undermines Jat history

jats in fact knew no religion, but jathed puja was common (means ancestral worship)

Jats themselves are ignorant of their own martyres. When a Jat buys a picture of Bhagat Singh he buys one for Rana Pratap also instead of buying the one of Surajmal. Pratap was in no way martyre for nation.

he was in no way as important as Bhagat or Surajmal. But in almost every city pratap chowk or pratap nagar is found
 
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Jats themselves are ignorant of their own martyres. When a Jat buys a picture of Bhagat Singh he buys one for Rana Pratap also instead of buying the one of Surajmal. Pratap was in no way martyre for nation.

Saurav, this is because of the fact that Jat history has been ignored even in our school textbooks. The stories relating to Rana Pratap are found in school textbooks, Suraj Mal is missing. A lot is being taught about Gandhi and Nehru but Sir Chhotu Ram is missing from textbooks. Even Ch. Charan Singh has unfortunately been sidelined.
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chhoturam wrote a letter to gandhi...so n so ..will b the consequences of this bantwara...yadi vo nahin marta to is desh ka bantwara hi nahin hota...
 
Dayanand Deshwali Gi, we go though our history. But as you told that what ever is written in sylabus books that all is not true, the reality is quite different. Recently I got an book written By Sh. BHALE RAM BANIWAL about Jat history ,its really a very good book.
As per my openion :-
Past(History) is to learn
Present is to do,&
Future is to think.
We must have the proper knowledge of our pure History & our sacrifices.
There are lots & lots things about to discuss on such like topics & we must give time to this because this the part of our social duties.

Thanks a lots Deshwal gi,
Wishing you the best of my wishes.
 
but what comments will u give about this single largest community in rajasthan? who r not able to make a sarpanch in their own village, rajasthan, while they are capable of making a jat pm, b4 rajput pms, who always deceived jats in alliance with n e foreign/regional powers...
 
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