ravindersura
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हम रहबर-ऐ-आज़म चौधरी छोटूराम को अपनी कौम के भगवान् का दर्जा देते हैं । हर साल उनकी जयंतिया मनाई जाती हैं बड़े बड़े भाषण होते हैं चौधरी साहब को आदर्श मानने की बाते की जाती हैं परन्तु जब ज़मीनी हकीक़त पर चौधरी साहब के आदर्शो को अपनाने की बात आती हैं तो लोग तरह तरह के तर्क देते हैं । कौम के इस भगवान् के दिए हुए ज्ञान के बारे में कहते हैं की ये तो बीते ज़माने की बात हैं । चौधरी छोटूराम कोई व्यक्ति नहीं थे वो तो एक सोच थी और आज हमारी कौम जिस मुकाम पर हैं वह सब उस सोच की वजह से हैं । सवाल करते हैं की इस सोच का हत्यारा कौन ? और फिर दोष धरते हैं दूसरों पर , असल में इस सोच का हत्यारा और कोई नहीं खुद हम हैं हमारी कौम का पढ़ा लिखा वर्ग हैं । चौधरी साहब कहते थे की इंसान दिन में चाहे तो तीन बार आस्था बदल सकता हैं परन्तु जाति नहीं बदल सकता । लाहोर में जब जिन्नाह ने अपने पैर पसारने शुरू किये थे तब वहा के मुसलमानों में एक अफरा तफरी का माहौल बन गया था । इस पर चौधरी साहब ने लाहौर में एक रैली कि और मुस्लमान जाटों से पूछा की तुम पहले मुसलमान हो या जाट , इस पर वहा मौजूद मुस्लिम जाटों ने कहा की हम पहले जाट हैं बाद में मुस्लिम । इस घटना के बाद जिन्नाह को लाहौर से निकलना मुश्किल हो गया था । जब तक चौधरी साहब जिए जिन्नाह ने शायद ही लाहौर का रुख किया हो । चौधरी साहब अक्सर एक शेर कहा करते थे...
'' माना की मजहब जान हैं इंसान की ,
इसी के दम से कायम शान हैं इंसान की ,
रंग-ऐ-कौमियत मगर इससे बदल सकता नहीं '
खून आबाई रग-ओ-तन से निकल सकता नहीं ।''
(आबाई - पूर्वज )
जो एकता की माला उन्होंने बनाई थी वह टूट गई । जाटों ने अपने आप को कहीं आस्था के नाम पर बाँट लिया , कहीं पार्टीबाजी के नाम पर , कहीं क्षेत्रवाद के नाम पर तो कहीं बोली के नाम पर । उस महान सोच को बिलकुल दफ़न कर दिया । आस्था के नाम पर बंटे जाटों से कहा जाता हैं की क्यों एक दुसरे को इस खोखली आस्था के नाम पर बाँट रहे हो तो एक दुसरे पर दोष धरते हैं की वो जाट नहीं हमे छोड़ गए । कहा जाता हैं की उनको उस आस्था में कुछ दिखा होगा तभी गए होंगे पर जाति को तो मत बांटो तो कहेंगे की हम कहा बाँट रहे हैं हम तो अपने आप को जाट मानते हैं वो लोग नहीं मानते खुद को जाट , वो लोग पहले आस्था की बात करते हैं । जबकि हकीक़त तो यह हैं सब कबूतर वाली कर रहे हैं जैसे कबूतर बिल्ली को आती देख आँख बंद कर लेता हैं और सोचता हैं की अब बिल्ली उसे नहीं देख पाएगी वैसा ही हम कर रहे हैं । एक दुसरे पर आरोप लगाते हैं खुद की कमी नहीं देखते जिसका फायदा दुसरे उठाते हैं । हम हिन्दू हैं हमने जाति से पहले हिन्दू वाले नजरिये से देखा होगा तभी तो हमे दुसरे भाइयों का मजहब पहले दिखाई दिया जाति नहीं । इस पहले आप पहले आप के चक्कर में जाट पहले की काफी मार खा चुके हैं बहुत कुछ खो चूके हैं इसलिए पहल हमे खुद से करनी होगी तभी कौमी एकता होगी । जब तक दो होंगे बोल-कबोल होंगे , एक होंगे तो न बोल होंगे न कबोल और ना ही किसी दुसरे की हमारे बारे में कुछ कहने की हिम्मत होगी। आये दिन हमारी खापो के खिलाफ खुलम खुला बोला जा रहा , आये दिन कोई ऐरा गैरा नाथू खेरा जाटों के खिलाफ बोल जाता हैं , यह सब इसलिए हैं क्योंकि हमने एक दुसरे को बाँट रखा हैं । वैसे हमारी देशी बोली में धर्म का अर्थ कर्तव्य से हैं , कोई भी गलत काम हो जाए तो हम यही कहते हैं की फैलाना काम करण का धर्म नहीं था । इसलिए हमे इन आस्था जैसे खोखले चक्करों में न पड़ हमारी कौमी एकता पर ध्यान देना चाहिए। कौम की तरक्की एकता में ही हैं और एकता होगी तभी वह महांन सोच जिन्दा होगी । जब दलित भाई 35-40 साल बाद आंबेडकर को जिन्दा कर सकते हैं तो फिर हम रहबर-ऐ-आज़म दीनबंधु चौधरी सर छोटूराम को जिन्दा क्यों नहीं कर सकते ? हमारी यह कौमी एकता चौधरी छोटूराम को सच्ची श्रदांजलि होगी ।
"हमें अपने पराये की पहचान नहीं , अपनों पर फब्ती कसते हैं ।
मरघट में छोड़ मलाल को , अपनों पर काठी कसते हैं ।"
इस एकता की पहल पर अमल इस साईट पर भी होना जरुरी हैं यहाँ सारा पढ़ा लिखा वर्ग हैं । इस साईट पर लिखे शब्दों " सिर्फ हिन्दू जाटों के लिए '' से हिन्दू शब्द हटा कर "सिर्फ जाटों के लिए " करना चाहिए । इसके लिए मॉडरेशन का बहाना सिवाए अपनी जिम्मेवारी से भागने के और कुछ नहीं हैं । सिर्फ इस साईट ही नहीं और भी जहाँ जो लोग इस प्रकार का लिखे हुए हैं उन्हें भी समझाना जरुरी हैं ।
'' माना की मजहब जान हैं इंसान की ,
इसी के दम से कायम शान हैं इंसान की ,
रंग-ऐ-कौमियत मगर इससे बदल सकता नहीं '
खून आबाई रग-ओ-तन से निकल सकता नहीं ।''
(आबाई - पूर्वज )
जो एकता की माला उन्होंने बनाई थी वह टूट गई । जाटों ने अपने आप को कहीं आस्था के नाम पर बाँट लिया , कहीं पार्टीबाजी के नाम पर , कहीं क्षेत्रवाद के नाम पर तो कहीं बोली के नाम पर । उस महान सोच को बिलकुल दफ़न कर दिया । आस्था के नाम पर बंटे जाटों से कहा जाता हैं की क्यों एक दुसरे को इस खोखली आस्था के नाम पर बाँट रहे हो तो एक दुसरे पर दोष धरते हैं की वो जाट नहीं हमे छोड़ गए । कहा जाता हैं की उनको उस आस्था में कुछ दिखा होगा तभी गए होंगे पर जाति को तो मत बांटो तो कहेंगे की हम कहा बाँट रहे हैं हम तो अपने आप को जाट मानते हैं वो लोग नहीं मानते खुद को जाट , वो लोग पहले आस्था की बात करते हैं । जबकि हकीक़त तो यह हैं सब कबूतर वाली कर रहे हैं जैसे कबूतर बिल्ली को आती देख आँख बंद कर लेता हैं और सोचता हैं की अब बिल्ली उसे नहीं देख पाएगी वैसा ही हम कर रहे हैं । एक दुसरे पर आरोप लगाते हैं खुद की कमी नहीं देखते जिसका फायदा दुसरे उठाते हैं । हम हिन्दू हैं हमने जाति से पहले हिन्दू वाले नजरिये से देखा होगा तभी तो हमे दुसरे भाइयों का मजहब पहले दिखाई दिया जाति नहीं । इस पहले आप पहले आप के चक्कर में जाट पहले की काफी मार खा चुके हैं बहुत कुछ खो चूके हैं इसलिए पहल हमे खुद से करनी होगी तभी कौमी एकता होगी । जब तक दो होंगे बोल-कबोल होंगे , एक होंगे तो न बोल होंगे न कबोल और ना ही किसी दुसरे की हमारे बारे में कुछ कहने की हिम्मत होगी। आये दिन हमारी खापो के खिलाफ खुलम खुला बोला जा रहा , आये दिन कोई ऐरा गैरा नाथू खेरा जाटों के खिलाफ बोल जाता हैं , यह सब इसलिए हैं क्योंकि हमने एक दुसरे को बाँट रखा हैं । वैसे हमारी देशी बोली में धर्म का अर्थ कर्तव्य से हैं , कोई भी गलत काम हो जाए तो हम यही कहते हैं की फैलाना काम करण का धर्म नहीं था । इसलिए हमे इन आस्था जैसे खोखले चक्करों में न पड़ हमारी कौमी एकता पर ध्यान देना चाहिए। कौम की तरक्की एकता में ही हैं और एकता होगी तभी वह महांन सोच जिन्दा होगी । जब दलित भाई 35-40 साल बाद आंबेडकर को जिन्दा कर सकते हैं तो फिर हम रहबर-ऐ-आज़म दीनबंधु चौधरी सर छोटूराम को जिन्दा क्यों नहीं कर सकते ? हमारी यह कौमी एकता चौधरी छोटूराम को सच्ची श्रदांजलि होगी ।
"हमें अपने पराये की पहचान नहीं , अपनों पर फब्ती कसते हैं ।
मरघट में छोड़ मलाल को , अपनों पर काठी कसते हैं ।"
इस एकता की पहल पर अमल इस साईट पर भी होना जरुरी हैं यहाँ सारा पढ़ा लिखा वर्ग हैं । इस साईट पर लिखे शब्दों " सिर्फ हिन्दू जाटों के लिए '' से हिन्दू शब्द हटा कर "सिर्फ जाटों के लिए " करना चाहिए । इसके लिए मॉडरेशन का बहाना सिवाए अपनी जिम्मेवारी से भागने के और कुछ नहीं हैं । सिर्फ इस साईट ही नहीं और भी जहाँ जो लोग इस प्रकार का लिखे हुए हैं उन्हें भी समझाना जरुरी हैं ।
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