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जाटलैंड की चौपाल
सोचा था इंग्लिश में लिखूं - पर फिर खयाल आया कि विषय ही ऐसा है कि हिन्दी और हरयाणवी की मिक्स चटनी में ज्यादा मजा आयेगा ।
चौपाल की परंपरा पुराने जमाने से ही चली आ रही है पर आजकल खतम सी हो गई है - गांवों की चौपालें आजकल सूनी पड़ी रहती हैं । पर नए जमाने में इसका नया रूप शुरू हो गया है - 'cyber chaupal' कहो या कोई और नाम दे दो । अपने जाटलैंड की चौपाल का तो कहना ही क्या । स्कूल कालेज के छात्र तो मेम्बर बनते ही इसलिये हैं कि चौपाल का लुत्फ उठाया जा सके - "चैट" में । और जो बेचारे जाट भाई काल-सेंटर और किसी कंपनी में नौकरी करते हैं, वे भी मेंबर बनने के लिए मजबूर हैं - क्या करें वहां पर 'नेटवर्क' कंप्यूटर होते हैं और कोई दूसरा 'Messenger' (Yahoo, hotmail, google etc.) डाउनलोड नहीं हो सकता । सो, अपने जाटलैंड का 'Chat' क्लिक करो और चाट-पकौड़ी का लो स्वाद ! सुना है कई नौजवान उस चौपाल की एक अलग-सी 'खिड़की' पर रोमांस भी करते हैं ।
एक जमाने में महिलाओं को चौपाल में जाने की मनाही होती थी । बड़े-बूढे शायद यह सोचते थे कि उनमें सहनशक्ति नहीं होती और किसी बात को बीच से न पकड़ कर केवल 'ठोड' (किनारा) से पकड़तीं हैं, बदले की भावना से काम करती हैं, इसलिए न्याय की कुर्सी पर बैठने का उन्हें कोई हक नहीं । यह सोच भी बहुत पुरानी है कि औरत भेद नहीं छुपा सकती । कुन्ती ने यह भेद अपने बाकी पुत्रों से छुपाये रखा कि कर्ण भी उसी का पुत्र है । जब वह कर्ण के शव के पास जाकर रोने लगी तो सबने कहा कि वह एक शत्रु के शव पर क्यों रो रही है । जब कुन्ती ने असली बात बताई तो युधिष्ठिर ने पूरी नारी जाति को ही शाप दे डाला कि वह भविष्य में कोई भेद नहीं छुपा सकेगी - यदि कर्ण का भेद वह न छुपाती तो महाभारत का युद्ध ही न होता।
अपनी महिला मेम्बर इस बात को पढ कर नाराज न हो जायें डरता हूं - यह बात शायद अब लागू नहीं होती । इंदिरा गांधी भी देश पर शासन कर चुकी है - 1974 के परमाणु विस्फोट का उसने दुनियां को भेद ही नहीं चलने दिया था। लिख इसलिये रहा हूं कि आजकल तो चौपालों में महिलाओं का ही राज है ! अमेरिका में तो महिला जज काफी होतीं हैं । अपने गांव की पंचायतों में भी उनका दबदबा बनने लगा है । इस बारे में एक ताऊ का कहा हुआ एक चमौला याद आ रहा है पर उसको यहां न लिखना ही ठीक है, पहले कहीं और लिख चुका हूं।
अब अपने जाटलैंड की चौपाल में ज्यादातर महिलाएं ही बैठी रहती हैं । कल एक बदमाश 'हैकर' घुस गया था चौपाल में और लगा गंदी भाषा लिखने । मुझे भी किसी नकली नाम से घुसना पड़ा और भाई सीताराम को भी यही तरकीब अपनानी पड़ी । जब मैने एक महिला से कहा कि आप सब चौपाल से बाहर जाओ, कोई बदमाश घुस गया है तो वो हैरान हो गई कि ये नया कौन आ गया हमें कहने वाला । चलो, यह समस्या तो नितिन भाई ने जल्दी ही सुलझा दी । तो चौपाल की शौकीन गपौड़ी जाटणियों - अपनी रक्षा खुद करना सीखो - जूडो-कराटे सीखो या साथ में सोटा रखो । बदमासी करने वाले भी अपने जाट लड़के ही हैं, कोई बाहर वाला नहीं !
और ऊत छोहरो, तुम भी सुन लो जो चौपाल में बदमासी करेगा, उसकी खैर नहीं - उसका मुंह काला कर के, पुराने लीत्तर और खौंसड़े की माला पहना कर, गधे पर बैठा कर सारे गांव का चक्कर लगाया जायेगा और उसको जात से बाहर निकाल कर हुक्का पानी बंद ! एक ऐसा सिस्टम लगाने जा रहे हैं कि चौपाल में हम लोग (Moderators) घुसे रहेंगे और तुम लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि हम कब आये और कब गये - तुम्हारी सारी हरकतें नोट होंगी, 'warning level' अपने आप बढ जायेगा और फिर अपने आप तुम चौपाल से तो क्या, सारे जाटलैंड से बाहर निकाल कर काला पानी भेज दिये जाओगे !
वैसे अब सच्ची बात तो यह है कि मुझे तो चौपाल में जाने से ही डर सा लगने लगा है - कुछ तो ऊत बैठे रहते हैं और रही सही कसर अपनी जाटणियां पूरी कर देती हैं - थोड़े बहुत ताने भी सुनने पड़ जाते हैं । चलो, खुशी है कि चौपाल का इस्तेमाल तो हो रहा है ना - खाली चौपाल तो बुरी लगती है ।
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जाटलैंड की चौपाल
सोचा था इंग्लिश में लिखूं - पर फिर खयाल आया कि विषय ही ऐसा है कि हिन्दी और हरयाणवी की मिक्स चटनी में ज्यादा मजा आयेगा ।
चौपाल की परंपरा पुराने जमाने से ही चली आ रही है पर आजकल खतम सी हो गई है - गांवों की चौपालें आजकल सूनी पड़ी रहती हैं । पर नए जमाने में इसका नया रूप शुरू हो गया है - 'cyber chaupal' कहो या कोई और नाम दे दो । अपने जाटलैंड की चौपाल का तो कहना ही क्या । स्कूल कालेज के छात्र तो मेम्बर बनते ही इसलिये हैं कि चौपाल का लुत्फ उठाया जा सके - "चैट" में । और जो बेचारे जाट भाई काल-सेंटर और किसी कंपनी में नौकरी करते हैं, वे भी मेंबर बनने के लिए मजबूर हैं - क्या करें वहां पर 'नेटवर्क' कंप्यूटर होते हैं और कोई दूसरा 'Messenger' (Yahoo, hotmail, google etc.) डाउनलोड नहीं हो सकता । सो, अपने जाटलैंड का 'Chat' क्लिक करो और चाट-पकौड़ी का लो स्वाद ! सुना है कई नौजवान उस चौपाल की एक अलग-सी 'खिड़की' पर रोमांस भी करते हैं ।
एक जमाने में महिलाओं को चौपाल में जाने की मनाही होती थी । बड़े-बूढे शायद यह सोचते थे कि उनमें सहनशक्ति नहीं होती और किसी बात को बीच से न पकड़ कर केवल 'ठोड' (किनारा) से पकड़तीं हैं, बदले की भावना से काम करती हैं, इसलिए न्याय की कुर्सी पर बैठने का उन्हें कोई हक नहीं । यह सोच भी बहुत पुरानी है कि औरत भेद नहीं छुपा सकती । कुन्ती ने यह भेद अपने बाकी पुत्रों से छुपाये रखा कि कर्ण भी उसी का पुत्र है । जब वह कर्ण के शव के पास जाकर रोने लगी तो सबने कहा कि वह एक शत्रु के शव पर क्यों रो रही है । जब कुन्ती ने असली बात बताई तो युधिष्ठिर ने पूरी नारी जाति को ही शाप दे डाला कि वह भविष्य में कोई भेद नहीं छुपा सकेगी - यदि कर्ण का भेद वह न छुपाती तो महाभारत का युद्ध ही न होता।
अपनी महिला मेम्बर इस बात को पढ कर नाराज न हो जायें डरता हूं - यह बात शायद अब लागू नहीं होती । इंदिरा गांधी भी देश पर शासन कर चुकी है - 1974 के परमाणु विस्फोट का उसने दुनियां को भेद ही नहीं चलने दिया था। लिख इसलिये रहा हूं कि आजकल तो चौपालों में महिलाओं का ही राज है ! अमेरिका में तो महिला जज काफी होतीं हैं । अपने गांव की पंचायतों में भी उनका दबदबा बनने लगा है । इस बारे में एक ताऊ का कहा हुआ एक चमौला याद आ रहा है पर उसको यहां न लिखना ही ठीक है, पहले कहीं और लिख चुका हूं।
अब अपने जाटलैंड की चौपाल में ज्यादातर महिलाएं ही बैठी रहती हैं । कल एक बदमाश 'हैकर' घुस गया था चौपाल में और लगा गंदी भाषा लिखने । मुझे भी किसी नकली नाम से घुसना पड़ा और भाई सीताराम को भी यही तरकीब अपनानी पड़ी । जब मैने एक महिला से कहा कि आप सब चौपाल से बाहर जाओ, कोई बदमाश घुस गया है तो वो हैरान हो गई कि ये नया कौन आ गया हमें कहने वाला । चलो, यह समस्या तो नितिन भाई ने जल्दी ही सुलझा दी । तो चौपाल की शौकीन गपौड़ी जाटणियों - अपनी रक्षा खुद करना सीखो - जूडो-कराटे सीखो या साथ में सोटा रखो । बदमासी करने वाले भी अपने जाट लड़के ही हैं, कोई बाहर वाला नहीं !
और ऊत छोहरो, तुम भी सुन लो जो चौपाल में बदमासी करेगा, उसकी खैर नहीं - उसका मुंह काला कर के, पुराने लीत्तर और खौंसड़े की माला पहना कर, गधे पर बैठा कर सारे गांव का चक्कर लगाया जायेगा और उसको जात से बाहर निकाल कर हुक्का पानी बंद ! एक ऐसा सिस्टम लगाने जा रहे हैं कि चौपाल में हम लोग (Moderators) घुसे रहेंगे और तुम लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि हम कब आये और कब गये - तुम्हारी सारी हरकतें नोट होंगी, 'warning level' अपने आप बढ जायेगा और फिर अपने आप तुम चौपाल से तो क्या, सारे जाटलैंड से बाहर निकाल कर काला पानी भेज दिये जाओगे !
वैसे अब सच्ची बात तो यह है कि मुझे तो चौपाल में जाने से ही डर सा लगने लगा है - कुछ तो ऊत बैठे रहते हैं और रही सही कसर अपनी जाटणियां पूरी कर देती हैं - थोड़े बहुत ताने भी सुनने पड़ जाते हैं । चलो, खुशी है कि चौपाल का इस्तेमाल तो हो रहा है ना - खाली चौपाल तो बुरी लगती है ।
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