भाई किसान का तो राम रुखाला हो स | हमारे ज्यादातर नेता ,अधिकारी इसी किसान बिरादरी से हैं पर पता नहीं यह लोग अपने किसान भाइयो का दर्द कैसे भूल जाते हैं | हमारा कोई जाट नेता हो लोग उसके आगे किसान नेता लिखते हैं , जबकि उन् सभी नेताओ ने तो किसानी छोडे मुद्दत हो ली | असल में किसान नेता वो हैं जो विपक्ष में होने पर अपनी किसानी का काम करता हो , वो ही सच्चा किसान हैं , वो ही किसान का दर्द तकलीफ समझ सकता हैं | | जब आपने अपना कर्म ही छोड़ दिया तो फेर अपने को किसान क्यों कहलाते हो | हम सब यहाँ जाट बिरादरी से हैं और आपने को किसान कहते हैं जबकि मेरे ख्याल से यहाँ कोई भी अभी किसानी नहीं करता होगा , सिर्फ ज़मीन नाम होने से किसान नहीं होता | मैंने ९७ में पढाई छोड़ी थी , मेरे गाँव का एक लड़का आया बोल्या भाईसाब एक यूरिया कम्पनी ( उज्ज्वला यूरिया ) भिवानी में अपना डीलर बनावे स आप या एजेन्सी ले ल्यो आपकी अप्र्रोअच भी स | मैंने भी सोची अक ८०% लोग खेती करे स तो बिक्री तो अच्छी ही होगी मुनाफे का काम स यह बनिए भी मोटे दाम कमावे स किसान की फसल से | मैंने व एजेन्सी ले ली अपना जुगाड़ लगा के | इब मैं कदे गाम में रह्या कोणी था तो मैंने के बेरा हो था अक कुणसी फसल कद बोई जा स , उसमे DAP कद पड़े स UREA कद पड़े स | म जब फसल की कटाई का टेम आता तो यूरिया मंगाता , और फेर रही सही बात किसान न उधार दयों | मैंने न्यू ना बेरा था अक इसकी उधार न आया करे , ये बनिए तो अपनी आढ़त में पुरे कर ले स पैसे | उधार मांगन जाओ तो राम कान्या हाथ करके कह देंगे अक भाई यो बरसेगा जिबे तो दयांगे | घर के रोला करण लागे अक गाम में उधार पूरी ना करता , एक घर चला गया प्रेम नाम था उसका उसके दो कमरे एक में वे खुद रह और दुसरे में न्यार तुडा घेर राख्या , म देख के उल्टा हो लिया , वो बोल्या साब आला क्यूकर आया था बेरा उसने भी था , मखा काका न्यू अ मिलन आ गया था | उस दिन मैंने सही मायेने में किसान की हालात का बेरा पाट्या | असल में किसान का दर्द उसने ए बेरा हो स जो यो काम करता हो | नाम के आगे किसान लिखे त ना बेरा लागे | AC में बैठ के जेठ की दोह्पैरी का के बेरा लागे भाई |
सरकार किसानो के कर्जे मांफ करके वाह वाही लुट रही जबकि यह कोई समाधान नहीं हैं किसान की हालात का , असल में यह पता लगाना चाहिए की जो आदमी सोसाइटी से मात्र 10000 रूपये लोन लेता हैं और उस बेचारे किसान से वो भी नहीं भरा जाता इसके क्या करण हैं ? यह तो हैं नहीं के मांफ होने के बाद उसे दुबारा पैसे की जरुरत नहीं पड़ेगी | वो बिचारा किसान फेर कर्जा लेगा फेर वही सोसाइटी आले वही पुलिस |
एक लाला की दूकान गोदाम में कुछ उजाड़ हो जाओ उसे बिमा कम्पनी भुगतान करदेती हैं और इस बिचारे भोले किसान का कोण भुगतान करे ? इसकी तो सारी कमाई पुरे बाराह मॉस खुले आसमान के नीचे बिना ताले में रहती हैं | आढ़ती बोली लायेगा तो इसका माल बिकेगा , राम बरस गया तो मण्डी में पड़े माल की हानि का कोई जवाब दार नहीं , कोई बिमा नहीं | बिचारे किसान को अपनी फसल के उजाड़ की भुगतान के लिए रास्ते रोकने पड़ते हैं दरखत काटने पड़ते हैं DC को ज्ञापन देना पड़ता हैं , जब जा के आश्वासन मिलता हैं के गाम में पटवारी , गिरदावर आयेंगे फसल के नुक्सान का मुआयना करण | एक व्यापारी को आपने प्रोडक्ट के दाम तय करने का हक हैं किसान को नहीं | एक किसान के आलू की फसल से चिप्स बना कर एक व्यापारी लाखो कमाता हैं और किसान को बिचारे को पूरी दिहाडी भी नहीं मिलती |
देश का प्रधामंत्री एक लाला बिरादरी से संबध रखता हैं ना के किसान बिरादरी से | देश का माना हुआ अर्थ्शःस्त्री भी हैं , लोग गुणगान करते हैं के बहुत अच्छा अर्थशाष्त्री हैं | यह प्रचार व्यापारी कौम करती हैं क्योकि वो पहले इनकी सोचेगा बाद में किसान की और भोला किसान इन लालो की हाँ में हाँ मिलाता हैं | राहुल गाँधी कहता हैं के हम रुपया भेजते हैं तो वो 10 पैसे रह जाता हैं , जबकि इनके पिता जी कहते थे की 17 पैसे पहुचते हैं | कोई इनसे पूछे की आपकी तो सरकार भी रह ली आपने पता क्यों नहीं करवाया की इन बेचारे किसान के हक का 90 पैसे कोण खा जाता हैं | जबकि लोग इन्हें शाबाशी देते हैं की ईमानदार हैं | यह तो सबको पता हैं की पैसा खाया जाता हैं पर खाने वाला कोण हैं ? इसका पता लगाओ तो हैं शाबाशी वाला काम |
इस बेचारे किसान की हालात पर पंजाबी गायक बब्बू मान ने एक मर्म को छूने वाला गीत गाया हैं जो एक जाट किसान की वास्तविकता को दर्शाता हैं |
" जट्ट दी जूण बुरी "
http://www.youtube.com/watch?v=U1ZW5LU8--w&feature=related