क्या हमारी (जाटों की ) धार्मिक आस्थाएँ बदल रही हैं !
शनिवार को में जाटों की एक मीटिंग में शामिल हुआ था ! मीटिंग किसी सज्जन के घर थी! जाहिर है गृह स्वामी ने चाय नाश्ते का भी प्रबंध किया हुआ था ! मुझे छोड़ कर शायद ही किसी ने कुछ खाया होगा ! सभी का न खाने का कारन एक ही था, की भाई मैंने व्रत रखा हुआ है ! नवरात्रे चल रहे हैं ! में हैरान था कि, तकरीबन सारे मेम्बेर्स हरियाणा और उत्तरप्रदेश के अलग जिलों से थे और ज्यादातर पुरुष!
शाम को घर आने के बाद , करमवीर चहल जी का थ्रेड " नवरात्रों कि शुभकामनाएं " और दुसरे भाई ,बहनों के रेस्पोंस भी पढ़े !
तब मुझे लगा, में और मेरे जैसे कुछ ही लोग हैं जो इन चीजो पर विश्वास नहीं करते या नहीं मानते ! ८-९ साल पहले , भारत में रहते हुए मैंने कभी नहीं सुना था कि जाट भी इस तरह के झमेलों में पड़ चुके हैं! खाश कर पुरुष मेम्बेर्स के रेस्पोंस देख कर में सच में चोंक गया !
इसलिए ये प्रशन जाटलैंड मेम्बेर्स से कर रह हूँ , क्या हमारी धार्मिक आस्थाएँ बदल रही ? में समझता हूँ , जाटों का एक बड़ा वर्ग आर्यसमाज से प्रभावित रहा! कुछ जाट, दुसरे पंथो में भी विश्वाश करते रहे हैं !पर दुर्गा माता, नवरात्रे आदि के दोरान व्रत रखना इत्यादि बहुत खुछ नया है , खास कर जाटों के लिए ! आप सब क्या समझाते हैं कि क्या सच में ही हमारी धार्मिक आस्थाएँ बदल रही हैं ? क्या इसका जाट समाज के मूल सवरूप पर कोई असर पड़ेगा?
शनिवार को में जाटों की एक मीटिंग में शामिल हुआ था ! मीटिंग किसी सज्जन के घर थी! जाहिर है गृह स्वामी ने चाय नाश्ते का भी प्रबंध किया हुआ था ! मुझे छोड़ कर शायद ही किसी ने कुछ खाया होगा ! सभी का न खाने का कारन एक ही था, की भाई मैंने व्रत रखा हुआ है ! नवरात्रे चल रहे हैं ! में हैरान था कि, तकरीबन सारे मेम्बेर्स हरियाणा और उत्तरप्रदेश के अलग जिलों से थे और ज्यादातर पुरुष!
शाम को घर आने के बाद , करमवीर चहल जी का थ्रेड " नवरात्रों कि शुभकामनाएं " और दुसरे भाई ,बहनों के रेस्पोंस भी पढ़े !
तब मुझे लगा, में और मेरे जैसे कुछ ही लोग हैं जो इन चीजो पर विश्वास नहीं करते या नहीं मानते ! ८-९ साल पहले , भारत में रहते हुए मैंने कभी नहीं सुना था कि जाट भी इस तरह के झमेलों में पड़ चुके हैं! खाश कर पुरुष मेम्बेर्स के रेस्पोंस देख कर में सच में चोंक गया !
इसलिए ये प्रशन जाटलैंड मेम्बेर्स से कर रह हूँ , क्या हमारी धार्मिक आस्थाएँ बदल रही ? में समझता हूँ , जाटों का एक बड़ा वर्ग आर्यसमाज से प्रभावित रहा! कुछ जाट, दुसरे पंथो में भी विश्वाश करते रहे हैं !पर दुर्गा माता, नवरात्रे आदि के दोरान व्रत रखना इत्यादि बहुत खुछ नया है , खास कर जाटों के लिए ! आप सब क्या समझाते हैं कि क्या सच में ही हमारी धार्मिक आस्थाएँ बदल रही हैं ? क्या इसका जाट समाज के मूल सवरूप पर कोई असर पड़ेगा?