आस्था !!!!!! आजकल जाट कुछ ज्यादा ही आस्था रखने लग गए हैं नए नए देवी देवताओं में | मुझे ध्यान हैं आज से १५-२० साल पहले तक हमारे गाँव में एक किसे साधू संत की समाधी होती थी जिसको हम मुख्य तौर पर पूजते थे/हैं , जिसका नाम का मेला दंगल आदि आयोजित होते हैं | या फिर हर गाँव में एक शिवालय होता था जिसको जाट पूजते हैं | पर आजकल जैसा के समर ने बताया के धर्म आस्था के नाम का व्यापारीकरण हो गया हैं | हर गाँव जाट मंदिर बनाने लग गए हैं , जाट इस बात को नहीं समझ रहे के जिनकी बातों में आकर हम जिस मंदिर के लिए चंदा उगाहते हैं असल में हम धर्म नहीं एक पंडित को रोजगार दे रहे हैं जो उस मंदिर में बैठेगा और निरे ढोंग रचेगा | जाटों का मुख्यतया काम किसानी का या फौज में भर्ती हो कर देश सेवा करना होता था पर आजकल जाट व्यापार में भी जाने लगे हैं | यह दोनों काम देश सेवा के काम हैं , इस से बढ़कर कर और क्या भक्ति होगी ? पर पता नहीं फिर जाट क्यों इन आडम्बरों में फंस जाता हैं | खेती एक ऐसा काम हैं जिसमे किसान बेईमानी नहीं कर सकता क्योकि अगर वो सोचे की बीज कम डाल दू थोडा बचा लू तो इसमें उसी का नुक्सान , खाद कम डाले तो उसी का नुक्सान कहने का मतलब के खुद से दोखा करने वाली बात हैं , इसी तरह से एक फौजी अगर सरहद पर थोडी सी भी गलती करे तो उसे जान से हाथ दोना पड़ सकता हैं दोनों ही काम भक्ति वाले हैं इनसे बड़ा भक्त और कौन होगा | फिर भी ये भोले जाट इन ब्राहमणों की चिकनी चुपडी बातों में आ जाते हैं | एक बनिया ( आढ़ती ) जो किसान की पुण्ये कमाई खरीदता हैं उससे बेईमानी करता हैं , उसको ब्रह्मण डरा देते हैं के सेठ जी भगवान देख रहा हैं पाप होगा इस लिए थोडा पुन्य कमा ल्यो किसे गरीब ब्रह्मण को जिमा दयो | अब जाट उस बनिए की देखम देख ब्रह्मण ने जिमावेगा अक लालाजी करण लाग रहे स तो किम्मे न किम्मे पुन्य का काम होगा | न्यू नहीं बेरा अक यो तो डरता करे स बावला तू क्यों इसकी बात में आवे तू तो खुद एक देवता हैं इन सब का अन्दाता हैं तैने क्याका डर |
रही बात नवरात्रों की तो एक बात गौर करने लायक हैं आप लोगो ने कभी भी जाटों के गाँव में माता का मंदिर नहीं देखा होगा " सती" का छोड़ कर हर गाँव में सती की समाध तो पा जावेगी (जिस पर भारी काढे ता दाद खत्म हो जाया करे जैसी की आम आस्था हैं ) पर इन् काली , वैष्णो आदि माता का मंदिर नहीं मिलेगा | माता का मंदिर आप लोगो को हर राजपूत बिरादरी के गाँव में देखने को मिलेगा | जाट तो शिव का भक्त होता हैं | जाट बाबा ने पूज्या करे अर्र ठाकर माता न | जाखड़ साहब ने शेखावाटी का जिक्र किया जहाँ जाट भी माता की पूजा करते हैं उसका एक येही कारण रहा हैं के वहा के जाट राजपूत राजा के अधीन थे सो उनके रीति रिवाज अपनाना लाजमी हैं | राजपूत हमेशा ब्राह्मणों की सोच के आधार पर चलते थे इसलिए वो लोग ज्यादा अन्धविश्वासी हैं , माता के लिए किसी जीव की बलि देना आदि उनमे गर्व की बात मानी जाती हैं जबकि जाट हमेशा इस ब्राह्मणवाद के पाखंडो से दूर रहा हैं | जिन पाखंडो से हमारे पूर्वज दूर भागते थे उनको आज हम अपना रहे हैं | अगर यह आस्थाए इतनी अच्छी होती तो क्या हमारे पूर्वज नहीं अपना लेते इनको ? उनने के इन आस्थाओं का बारे में ज्ञान कोणी था अक उस वक़्त ये आस्था बनी कोणी थी ?
देशवाल साहब ने जून साहब की किताब का हवाला दिया हैं , उसी तरह से प्रोफ़ेसर बी.स.ढिल्लों साहब ने अपनी किताब में जाट के धर्म के बारे में लिखा हैं "With respect to morality and crime in, Major Barstow's [5] words, "The mass of Jat Sikh population may fairly be said to be contented and law-abiding". According to my information this is also applicable to the other Jats as well. Generally, Hindu and Sikh Jats tend to continue to follow their ancient custom of worshipping their common ancestors. In the Punjabi language, it is called the "Jathera" worship. Usually, it is mandatory in rural areas for newly wed Jats to visit and worship the village "Jathera" shrine, erected in the fields, usually a day after their wedding day, with fanfare. Some of the remarks of Western writers regarding "Jathera" worship are as follows:
"Among Gujars (a people also related to the Jats) especially, tiny shrines to ancestors are common all over the fields, and among the Jats they are to be found in every village" (Captain A.H. Bingley [12], pp. 65).
"Once a year the Zamindar (it means landlord or Jat, for more information on this issue see Captain Falcon [6], page 27) will worship the "Jathera", or common ancestor of the clan, to whom a large shrine is erected in the neighbourhood of the village" (Major Barstow [5], page 89).
"The worship of the "Jathera" is universal among Jats. Small shrines to common clan ancestors "Jathera" will be found all over the fields" (Captain A.H. Bingley [8], page 60).
"In the Punjab these larger shrines are called "Jathera", or ancestor. The 15th of the month (in some areas of the rural Punjab it is called "Karsi") is sacred to the ancestors, cattle doing no work on that day" (Captain Falcon [6], pp. 55).
The Jats' forefathers, or their cousins in the ancient times in Central Asia and in the surrounding areas, also worshipped their ancestors.
Professor Bachrach [13] wrote, "they (Alani) worshipped or perhaps more exactly, venerated their ancestors". Furthermore, Talbot-Rice [4] on page 181 of his book said, "Among the various practices which the Slavs inherited from the Scythians, the most important consisted in the worship of their ancestors".
" हमारे इतिहासकारों ने इतने तर्क दिए हैं फिर भी पता नहीं हम जाट ये नई आस्थाए क्यों पाल रहे हैं | जाटों में तो धार्मिक कुरीतियों पर अनेक जुमले , लतीफे हैं | जैसा के एक कनागत पर एक लतीफा हैं , "एक पंडित जाट ने बोल्या के भाई तेरे पिताजी स्वर्ग में भूखे स , किसे ब्रह्मण ने गौ दान कर दे ब्रह्मण जब उसका दूध पिवेगा तो उनकी भूख मिट जावेगी , जाट ने अपनी गाये उस ब्रह्मण ताहि दे दी | बेचारे के पास एक ऐ गाये थी , उधर ब्रह्मण के बालक दूध पी के पलन लाग रे आडेन जाट आले सूख्दे जा | जाट के ध्यान में आ गई अक सुसरा पण्डा लूट गया | जाट एक दिन ताता चिमटा ले के पंडित धोरे गया , पंडित देख क बोल्या यो क जजमान | जाट बोल्या दादा मेरे बाबु के कुल्ले पर एक गुमडा हो ऱ्या था उसपर हाम ताता चिमटा लगा दिया करते अररर दर्द ख़त्म हो जाया करता | रात ने मेरा बाबु सपने में दिखा वो दर्द त दुखी हो ऱ्या था , तो दादा तेरे कुल्ले पर यो ताता चिमटा लाऊंगा मेरे बाबू का दर्द मिट जा गा | पंडित बोल्या मेरे लाये त तेरे बाबू का दर्द क्यूकर मिटेगा . जाट बोल्या तेरे दूध पिए त मेरे बाबु की भूख मिट सके स तो क दर्द कोणी मिटेगा | कहने का मतलब यह हैं के यह लतीफा ही नहीं सन्देश भी हैं ,| ना जाने इसे कितने लतीफे बन रहे स पर हम इनको हस्सी में ही लेते हैं इनके अंधर छिपे सन्देश को नहीं देखते | हस्सी हस्सी में भी जाट इन कुरीतियों के खिलाफ सन्देश देते रहते हैं |
हम चौ.छोटूराम ओहल्याण जिनको रहबर-ऐ-आज़म भी कहा जाता था | वो रहबर-ऐ-आज़म हमको जो राह दिखा क गया था उसको हम बिकुल भूल गए | चौ साहब की सबसे अहम् शिक्षा थी के " "हमे धार्मिक तौर पर कभी भी कट्टर व रुढिवादी नहीं होना चाहिए " | जबकि आज हो रहा उल्टा नए नए पंथ पनप रहे हैं , जाट नए धर्मो के प्रति कट्टर होते जा रहें हैं | चौ.साहब इस फलसफे के आधार पर सभी धर्म के जाटों को इकटठा करने में कामयाब हुए | इन आस्थाओं से बचो , इस माता के नाम पर गुलशन कुमार अरब पति बन गया | लोग यह नहीं समझ पाए के वो तो अपना व्यापार कर रहा था , आप क्यों खो रहे हो | दिमाग में फितूर बाड़ दिया के एक जूस की रेहड़ी वाले को वैष्णो माता ने अरबपति बना दिया | माता न कोणी बनाया ताहरे जिसे अंधविश्वासियों ने बना दिया उसको |