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खेती के खतरे
मैं सोच रहा हूं कि खेती जैसे उबाऊ (boring) मजमून पर लिखने से क्या फायदा? यहां तो सारे 'टैकनोक्रेट' शहरी जाट बैठे हैं जो राजनीति, टेकनोलाजी, क्रिकेट, 'क्रियेटिव मूवीज', 'melodrama' और दुनिया भर के अगड़े-झगड़े यहां पर 'डिस्कस' कर रहे हैं । पता नहीं कितने होंगे जिनको खेती के बारे में थोड़ी-बहुत दिलचस्पी होगी । हम सब का खेती से पुराना वास्ता रहा है, पर आजकल सब इससे दूर हटते जा रहे हैं । विदेशी investment की बातें हो रही हैं पर खेती में पूंजी कौन लगाना चाहता है - खेती तो हमेशा एक घाटे का सौदा रही है । टाटा ने एक नई, सस्ती कार तो बाजार में उतार दी पर कोई बड़ा औद्योगिक घराना खेती पर पूंजी नहीं लगाना चाहता । उपजाऊ जमीन पर वे कब्जा जरूर कर रहे हैं, खेती करने या करवाने के लिये नहीं, पर SEZ के नाम पर । हां, अमरीकन ढ़ंग की 'कारपोरेट खेती' की बात जरूर हो रही है जो भारत की स्थितियों के बिल्कुल अनुकूल नहीं । और ऊपर से WTO के माध्यम से हम पर दबाव पड़ रहा है कि कृषि उत्पादों के व्यापार को खुला रखो । विदेशी बीज हमारे यहां आने से कितनी खरपतवार दाखिल हो चुकी है, इसका जिक्र मैं अपने धागे "कांग्रेस-घास" में कर चुका हूं ।
पर खेती जरूरी है - वर्ना हमारा पेट कैसे भरेगा ? सत्तर के दशक में हरित क्रान्ति हुई और अनाज की पैदावार बढ़ी, गांव के मेहनती लोगों की वजह से देश अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हुआ । कुल उपज तो बढ़ी, पर यह बढ़ोतरी सिर्फ गेहूं, चावल, कपास और गन्ने तक सिमट कर रह गई । बाकी जिन्सों - दालों, तिलहन और बाजरा, जवार जैसे मोटे अनाजों की पैदावार होनी कम होती चली गई । जहां-जहां नहर का पानी पहुंचा, वहां चना और दूसरी दालों की पैदावार होनी बंद हो गई । आज हालत यह हो गई है कि दालें, जो आम आदमी की खुराक मानी जाती थी, विदेशों से मंगाई जा रही हैं और महंगाई की वजह से आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं । खाने के तेल भी बाहर से मंगवाए जा रहे हैं ।
एक किसान के पास खेती के सिवाय आमदनी का और कोई जरिया नहीं होता । फसल की पैदावार और अपनी आमदनी बढ़ाने के चक्कर में लाखों किसान मौत के जाल में फंस रहे हैं । कपास को देखो । पंजाब के किसान कई साल से कपास के तरह-तरह के हाईब्रिड बीज अपना रहे हैं, दुनियां भर की कीटनाशक दवाइयों का इस्तेमाल कर रहे हैं, फिर भी उनकी फसल गिरती जा रही है । कपास तो बरसात के मौसम की फसल है और उसमें पानी की जरूरत नहीं, पर आजकल के हाइब्रिड बीजों वाली नस्ल में ट्यूबवैल का पानी भी देना पड़ रहा है जिसके कारण धरती के जलस्रोत नीचे जा रहे हैं । यही हाल चावल की फसल का है । हरयाणा को ही देख लो, जहां के लोग चावल खाने के आदी नहीं हैं, फिर भी वहां बासमती चावल की फसल उगाई जा रही है ताकि उसे बेचकर कुछ आमदनी की जा सके । धान (चावल) एक बरसाती फसल है जो पहले बरसात के पानी से ही हो जाया करती थी । पर आजकल उसमें भी या तो नहर या फिर ट्यूबवैल का पानी दिया जा रहा है । जब बरसात के मौसम में ही जमीन का पानी निकाला जायेगा तो आगे क्या होगा ? और तो और, ईंख में भी बरसात के मौसम में सिंचाई की जा रही है । अब जनवरी का महीना है और गेहूं की बिजाई हो चुकी है । सर्दियों में गेहूं की फसल को कई बार पानी देना पड़ रहा है । इसीलिये जमीन का पानी बहुत नीचे सरक गया है और जमीन की ऊपरी सतह बालू रेत जैसी शक्ल अख्तियार कर रही है । अगर यही हालत रही तो आगे पेड़ भी सूख सकते हैं ।
अमरीकन विशेषज्ञों का कहना है कि एक किलोग्राम चीनी के बनने में सौ लीटर पानी का इस्तेमाल होता है - यह हिसाब शुरू से ईंख के खेत की सिंचाई और गन्ने की मिल में पानी के प्रयोग के कुल जोड़ पर आधारित है । अमरीका में ईंख खूब हो सकता है पर वहां की सरकार गन्ने की खेती को बढ़ावा नहीं देती, बाहर से चीनी मंगवाना बेहतर मानती है - सिर्फ इसलिये कि वहां के जल संसाधनों पर दबाव न पड़े । सयाने लोग हैं वे, हमारी तरह मूर्ख नहीं । सन् 1977 में जनता पार्टी सरकार के समय चीनी महंगी हो गई थी और किसानों को गन्ने का अच्छा मोल मिला । अगले साल उन्होंने इतना गन्ना बो दिया कि मिलों से संभालना मुश्किल हो गया । यू.पी. के किसान चौधरी चरणसिंह के पास गए (वे उस समय केन्द्र में गृहमंत्री थे) । चौधरी साहब ने अपनी टोपी उतार कर, सिर पर हाथ रख कर कहा - बस एक यह जगह बची हुई है, मेरे इस सिर पर भी ईंख बो दो !
पानी के ज्यादा इस्तेमाल का एक पहलू और भी है - यूरिया और दूसरी खादों का बेहद इस्तेमाल । पंजाब, हरयाणा और पश्चिम यू.पी. में एक खेत में जितना यूरिया दस साल पहले डाला जाता था, आज उससे दुगुना यूरिया डाला जा रहा है और इसीलिए सिंचाई भी ज्यादा करनी पड़ रही है । पंजाब में बहुत सी जगहों पर ज्यादा रासायनिक खाद और बेहद जहरीले कीटनाशकों के छिड़काव की वजह से यह जहर धरती के बहुत नीचे तक चला गया है और जमीन का पानी भी पीने लायक नहीं रहा । कुओं के पानी को पीकर गांवों के लोग भी कैंसर जैसी बीमारियों के चपेटे में आ रहे हैं और दुधारू पशुओं में नई-नई बीमारियां पनप रही हैं । तीस साल पहले के मुकाबले आज पंजाब के लोग कपास पर 20-25 तक स्प्रे कर रहे हैं पर कीड़ों की तायदाद बढ़ती जा रही है । जैसे DDT के ज्यादा छिड़काव से मच्छरों में प्रतिरोध-क्षमता (resistance) पैदा हुई है और अब उन पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है, यही हाल इन दवाइयों का है । पंजाब से तो ऐसी रिपोर्ट मिली है कि वहां कुछ जिलों में जन्मजात विकलांग बच्चों की दर बढ़ती जा रही है । आदमियों के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या तेजी से घटती जा रही है और महिलाओं में गर्भपात के मामलों की तायदाद भी बढ़ रही है । बस देखते जाओ, यही हालात रहे तो शायद किसी को परिवार-नियोजन करवाने की जरूरत ही न पड़े !
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खेती के खतरे
मैं सोच रहा हूं कि खेती जैसे उबाऊ (boring) मजमून पर लिखने से क्या फायदा? यहां तो सारे 'टैकनोक्रेट' शहरी जाट बैठे हैं जो राजनीति, टेकनोलाजी, क्रिकेट, 'क्रियेटिव मूवीज', 'melodrama' और दुनिया भर के अगड़े-झगड़े यहां पर 'डिस्कस' कर रहे हैं । पता नहीं कितने होंगे जिनको खेती के बारे में थोड़ी-बहुत दिलचस्पी होगी । हम सब का खेती से पुराना वास्ता रहा है, पर आजकल सब इससे दूर हटते जा रहे हैं । विदेशी investment की बातें हो रही हैं पर खेती में पूंजी कौन लगाना चाहता है - खेती तो हमेशा एक घाटे का सौदा रही है । टाटा ने एक नई, सस्ती कार तो बाजार में उतार दी पर कोई बड़ा औद्योगिक घराना खेती पर पूंजी नहीं लगाना चाहता । उपजाऊ जमीन पर वे कब्जा जरूर कर रहे हैं, खेती करने या करवाने के लिये नहीं, पर SEZ के नाम पर । हां, अमरीकन ढ़ंग की 'कारपोरेट खेती' की बात जरूर हो रही है जो भारत की स्थितियों के बिल्कुल अनुकूल नहीं । और ऊपर से WTO के माध्यम से हम पर दबाव पड़ रहा है कि कृषि उत्पादों के व्यापार को खुला रखो । विदेशी बीज हमारे यहां आने से कितनी खरपतवार दाखिल हो चुकी है, इसका जिक्र मैं अपने धागे "कांग्रेस-घास" में कर चुका हूं ।
पर खेती जरूरी है - वर्ना हमारा पेट कैसे भरेगा ? सत्तर के दशक में हरित क्रान्ति हुई और अनाज की पैदावार बढ़ी, गांव के मेहनती लोगों की वजह से देश अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हुआ । कुल उपज तो बढ़ी, पर यह बढ़ोतरी सिर्फ गेहूं, चावल, कपास और गन्ने तक सिमट कर रह गई । बाकी जिन्सों - दालों, तिलहन और बाजरा, जवार जैसे मोटे अनाजों की पैदावार होनी कम होती चली गई । जहां-जहां नहर का पानी पहुंचा, वहां चना और दूसरी दालों की पैदावार होनी बंद हो गई । आज हालत यह हो गई है कि दालें, जो आम आदमी की खुराक मानी जाती थी, विदेशों से मंगाई जा रही हैं और महंगाई की वजह से आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं । खाने के तेल भी बाहर से मंगवाए जा रहे हैं ।
एक किसान के पास खेती के सिवाय आमदनी का और कोई जरिया नहीं होता । फसल की पैदावार और अपनी आमदनी बढ़ाने के चक्कर में लाखों किसान मौत के जाल में फंस रहे हैं । कपास को देखो । पंजाब के किसान कई साल से कपास के तरह-तरह के हाईब्रिड बीज अपना रहे हैं, दुनियां भर की कीटनाशक दवाइयों का इस्तेमाल कर रहे हैं, फिर भी उनकी फसल गिरती जा रही है । कपास तो बरसात के मौसम की फसल है और उसमें पानी की जरूरत नहीं, पर आजकल के हाइब्रिड बीजों वाली नस्ल में ट्यूबवैल का पानी भी देना पड़ रहा है जिसके कारण धरती के जलस्रोत नीचे जा रहे हैं । यही हाल चावल की फसल का है । हरयाणा को ही देख लो, जहां के लोग चावल खाने के आदी नहीं हैं, फिर भी वहां बासमती चावल की फसल उगाई जा रही है ताकि उसे बेचकर कुछ आमदनी की जा सके । धान (चावल) एक बरसाती फसल है जो पहले बरसात के पानी से ही हो जाया करती थी । पर आजकल उसमें भी या तो नहर या फिर ट्यूबवैल का पानी दिया जा रहा है । जब बरसात के मौसम में ही जमीन का पानी निकाला जायेगा तो आगे क्या होगा ? और तो और, ईंख में भी बरसात के मौसम में सिंचाई की जा रही है । अब जनवरी का महीना है और गेहूं की बिजाई हो चुकी है । सर्दियों में गेहूं की फसल को कई बार पानी देना पड़ रहा है । इसीलिये जमीन का पानी बहुत नीचे सरक गया है और जमीन की ऊपरी सतह बालू रेत जैसी शक्ल अख्तियार कर रही है । अगर यही हालत रही तो आगे पेड़ भी सूख सकते हैं ।
अमरीकन विशेषज्ञों का कहना है कि एक किलोग्राम चीनी के बनने में सौ लीटर पानी का इस्तेमाल होता है - यह हिसाब शुरू से ईंख के खेत की सिंचाई और गन्ने की मिल में पानी के प्रयोग के कुल जोड़ पर आधारित है । अमरीका में ईंख खूब हो सकता है पर वहां की सरकार गन्ने की खेती को बढ़ावा नहीं देती, बाहर से चीनी मंगवाना बेहतर मानती है - सिर्फ इसलिये कि वहां के जल संसाधनों पर दबाव न पड़े । सयाने लोग हैं वे, हमारी तरह मूर्ख नहीं । सन् 1977 में जनता पार्टी सरकार के समय चीनी महंगी हो गई थी और किसानों को गन्ने का अच्छा मोल मिला । अगले साल उन्होंने इतना गन्ना बो दिया कि मिलों से संभालना मुश्किल हो गया । यू.पी. के किसान चौधरी चरणसिंह के पास गए (वे उस समय केन्द्र में गृहमंत्री थे) । चौधरी साहब ने अपनी टोपी उतार कर, सिर पर हाथ रख कर कहा - बस एक यह जगह बची हुई है, मेरे इस सिर पर भी ईंख बो दो !
पानी के ज्यादा इस्तेमाल का एक पहलू और भी है - यूरिया और दूसरी खादों का बेहद इस्तेमाल । पंजाब, हरयाणा और पश्चिम यू.पी. में एक खेत में जितना यूरिया दस साल पहले डाला जाता था, आज उससे दुगुना यूरिया डाला जा रहा है और इसीलिए सिंचाई भी ज्यादा करनी पड़ रही है । पंजाब में बहुत सी जगहों पर ज्यादा रासायनिक खाद और बेहद जहरीले कीटनाशकों के छिड़काव की वजह से यह जहर धरती के बहुत नीचे तक चला गया है और जमीन का पानी भी पीने लायक नहीं रहा । कुओं के पानी को पीकर गांवों के लोग भी कैंसर जैसी बीमारियों के चपेटे में आ रहे हैं और दुधारू पशुओं में नई-नई बीमारियां पनप रही हैं । तीस साल पहले के मुकाबले आज पंजाब के लोग कपास पर 20-25 तक स्प्रे कर रहे हैं पर कीड़ों की तायदाद बढ़ती जा रही है । जैसे DDT के ज्यादा छिड़काव से मच्छरों में प्रतिरोध-क्षमता (resistance) पैदा हुई है और अब उन पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है, यही हाल इन दवाइयों का है । पंजाब से तो ऐसी रिपोर्ट मिली है कि वहां कुछ जिलों में जन्मजात विकलांग बच्चों की दर बढ़ती जा रही है । आदमियों के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या तेजी से घटती जा रही है और महिलाओं में गर्भपात के मामलों की तायदाद भी बढ़ रही है । बस देखते जाओ, यही हालात रहे तो शायद किसी को परिवार-नियोजन करवाने की जरूरत ही न पड़े !
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