Ohla

Firstly , ek bhai ne kaha ghunghat musalmano ko riwaj tha.... mere khayal se hindus ka bhi tha... but still the time has changed ... and we should change along with it.... but before adopting a new life style and leaving any old custom... firstly we should think about the advantages and disadvantages of new and old both and should adopt adequate things out of them... i would like my wife to follow this custom atleast whenever she is with my elder family members and relatives ... i think this way we can pay respect to our senior family members as they are accustomed to it.

@PANNU :- I have already bolded , just to show that it is my wish.... not a compulsion ...

@Fateh :- I have written the reason "our senior family members as they are accustomed to it."

mainn wahi karunga jisme main mere bade khush honge... unki khushi main hi meri khushi hai.... baki apni apni sooch... wahi karo jo man kare....

Brother, you are right in respecting the wishes of our elders/parents, certainly we all must do that. Secondly, we are not at all trying to stop any individual who is following certain thing in his/her life, but we are discussing here a practice followed by masses. Like your, my parents were also acustomed of this practice & we also followed Ohla but when I became head of the family, I gave moment order to this practice. Similarly, your parents are acustomed & probebly they must be liking the system & we donnot want you or any brother to go against the wishes of their parents/elders, but how about you? do you wish that your children/youngesters to follow this custom. Anyway dear brother I am very happy to know your views about your parents/elders, they are real God, I think, in a family where yongesters get love & elders get respect, the peace, prosparity & Haven is there. regards
 
ओल्हा काढना एक समय मैं औरतों की सुविधा के लिए शुरु हुआ था जो बाद में संस्कृति बन गया / /

भाई, जहाँ तक मेने बेर हे यु सुरु होया था इस्लाम / कुरान के परचार से. कुरान कहती हे औरतों को ढीले कपडे पहनने चाहिए और अपना फिगेर लको के रखना चाहिए. कारन के था की आदमियों की बुरी नज़र नहीं पड़ेगी. और जब बहार जाये तो पर्दा करना चाहिए ताकि लुचे लफंगों से बची रहे. या चीज़ हमने अपना ली और इसमें कोई बुराई नहीं स. और भी कई बातें आई हे इस्लाम से जैसे की भगवन एक ही हे और निराकार हे. परदा करने में कोई बुराई ना हे वैसे तो. पर आजकल धीरे धीरे या चीज़ कम होती जा रही हे और लुगाई घर की घर में परदा नहीं करती पर बहार गाल में जावे हे तो कर ले हे. मेने बहोत सी ऐसी लुगाई देखि हे जो चाहे कितना कह लो परदा ना हटावे कौनकी सुरु त योही सीखा हे.
तेरी बाकि बात टिक स के या कोई कुपर्था नहीं स यो एक रिवाज़, एक चलन, एक सोच हे जो धीरे धीरे बदलती जा रही हे. इसके लिए इतने घने प्रयास की आवश्यकता नहीं है
 
ओल्हे (घूंघट ) के फायदे भी हैं और नुकसान भी. पहले फायदे की बात कर लेते हैं फिर नुकसान की I

फायदे :
१. बहू सुथरी हो तो ओपरी परायी आर मलंगा की नज़र तैं बची रह आर घनी सुथरी ना हो तो उसका अदब सा दबया रह घूंघट के suspence कै नीचै I
२. आँख मटक्के के चांस कम (क्योंकि आँख तैं आँख का संपर्क नहीं होता )
३. धूल-माटी आर धूप तैं बचाव और त्वचा की रक्षा - Fair & Lovely cream का खर्चा कम हो सकै सै I
४. नादानी मैं बहू तैं कोए इसा उसा काम काम होज्या तो बड़े बूध्याँ तैं आँख चुरान की जरूरत ना पड़ती I
५. चरित्र निर्माण और ब्रहम्चर्य पालन में भी थोडा सा सहयोग क्योंकि जब सौंदर्य का दीदार नहीं होगा तो जज्बात भी नहीं मचलंगे
नुकसान :
१. घूंघट एक तरह से बड़ों की नीयत के प्रति अविश्वाश प्रस्ताव से कम नहीं .
२. नारी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन और लिंग भेद का सूचक ( क्योंकि आदमी घूंघट क्यों नहीं ओढ़ते )
३. चुनरी या दुपट्टे का एक्स्ट्रा खर्च
४. काम करते वक्त असुविधा अगर बड़े बूढ़े आस पास हुक्का पीते पीते निहार रहे हों तो
५. बड़े बूढों के लिए अपनी और परायी बहू की पहचान मुश्किल
6. शायरों और कवियों को ग्रामीण हुस्न/ सौंदर्य पर आधारित शायरी या कविता लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिलेगी ( फेर ग्रामीण समाज इसा हो ज्यागा जैसे बिना फूल का गुलाब का पौधा जिस पे निरे कांटे रह ज्यांगे )
7. सफ़र में पत्नी/बहू के खो जाने का डर - खासकर नई नवेली (यह धारणा एक सच्चे किस्से पर आधारित है. मेरा एक सहपाठी एक बार एक बस अड्डे (busy transit point ) पर गलती से अपने नई नवेली पत्नी को पीछे छोड़ आया था क्योंकि वैसे ही कपड़ों और चुन्नी वाली एक और औरत को उसने अपनी घरवाली समझ लिया था. जब बस तैं उतर के वा दूसरी दिशा में चाली तो वो बोल्या कित जा सै, महारा घर तो दूसरी साइड मै सै, वा औरत न्यू बोली तेरा दिमाग खराब हो रह्या सै के.) यकीन कर लियो या बिलकुल १०० % सच्ची घटना सै. वो साथी जब भी कहीं मिलता बड़ी हंसी आ जाती I

फायदे नुकसान की गुणा घटा मैं खाप के धनी धोरियों पर ही छोड़ देता हूँ.
 
ओल्हे (घूंघट ) के फायदे भी हैं और नुकसान भी. पहले फायदे की बात कर लेते हैं फिर नुकसान की I

फायदे :
१. बहू सुथरी हो तो ओपरी परायी आर मलंगा की नज़र तैं बची रह आर घनी सुथरी ना हो तो उसका अदब सा दबया रह घूंघट के suspence कै नीचै I
२. आँख मटक्के के चांस कम (क्योंकि आँख तैं आँख का संपर्क नहीं होता )
३. धूल-माटी आर धूप तैं बचाव और त्वचा की रक्षा - Fair & Lovely cream का खर्चा कम हो सकै सै I
४. नादानी मैं बहू तैं कोए इसा उसा काम काम होज्या तो बड़े बूध्याँ तैं आँख चुरान की जरूरत ना पड़ती I
५. चरित्र निर्माण और ब्रहम्चर्य पालन में भी थोडा सा सहयोग क्योंकि जब सौंदर्य का दीदार नहीं होगा तो जज्बात भी नहीं मचलंगे
नुकसान :
१. घूंघट एक तरह से बड़ों की नीयत के प्रति अविश्वाश प्रस्ताव से कम नहीं .
२. नारी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन और लिंग भेद का सूचक ( क्योंकि आदमी घूंघट क्यों नहीं ओढ़ते )
३. चुनरी या दुपट्टे का एक्स्ट्रा खर्च
४. काम करते वक्त असुविधा अगर बड़े बूढ़े आस पास हुक्का पीते पीते निहार रहे हों तो
५. बड़े बूढों के लिए अपनी और परायी बहू की पहचान मुश्किल
6. शायरों और कवियों को ग्रामीण हुस्न/ सौंदर्य पर आधारित शायरी या कविता लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिलेगी ( फेर ग्रामीण समाज इसा हो ज्यागा जैसे बिना फूल का गुलाब का पौधा जिस पे निरे कांटे रह ज्यांगे )
7. सफ़र में पत्नी/बहू के खो जाने का डर - खासकर नई नवेली (यह धारणा एक सच्चे किस्से पर आधारित है. मेरा एक सहपाठी एक बार एक बस अड्डे (busy transit point ) पर गलती से अपने नई नवेली पत्नी को पीछे छोड़ आया था क्योंकि वैसे ही कपड़ों और चुन्नी वाली एक और औरत को उसने अपनी घरवाली समझ लिया था. जब बस तैं उतर के वा दूसरी दिशा में चाली तो वो बोल्या कित जा सै, महारा घर तो दूसरी साइड मै सै, वा औरत न्यू बोली तेरा दिमाग खराब हो रह्या सै के.) यकीन कर लियो या बिलकुल १०० % सच्ची घटना सै. वो साथी जब भी कहीं मिलता बड़ी हंसी आ जाती I

फायदे नुकसान की गुणा घटा मैं खाप के धनी धोरियों पर ही छोड़ देता हूँ.


भाई साब,,कती मंथन कर दिया आपने तो ..!
baki पॉइंट नो.७ तो किसे गेल बी घट सके था 10 साल पहलाम ....
पर आजकल तो गाड़ियों का परचलन हो गया..सरे आपनी आपनी ने ए ले क आवे सें घरां..!!
 
Dear Brother VP Singh, well broughtout, this is the way toppic should be discussed, well done, thanks, regards
 
Bhai Tomar,
1. Kade kise granth me padya sa k ya Hindua ki b pratha thi ya manyata thi..!
2. Can u plz share some advantages and disadvantages of the same.
3. You would like your wife to follow this tradition,,..question is whether your wife likes it or not...??
Bhai tu to rahwe b Amrika me sa' ..koi amrican wife hogi to wa to jama b na kade...( PS : plz dont take on a serious note. )

4. Respect to dene wale k dil me ho sa'..Ohla is not a symbol of respect...plz read a few of the posts in the thread.

2nd question ka answer V.P singh ne diya hai ... ja padh le
 
ओल्हे (घूंघट ) के फायदे भी हैं और नुकसान भी. पहले फायदे की बात कर लेते हैं फिर नुकसान की I

फायदे :
१. बहू सुथरी हो तो ओपरी परायी आर मलंगा की नज़र तैं बची रह आर घनी सुथरी ना हो तो उसका अदब सा दबया रह घूंघट के suspence कै नीचै I
२. आँख मटक्के के चांस कम (क्योंकि आँख तैं आँख का संपर्क नहीं होता )
३. धूल-माटी आर धूप तैं बचाव और त्वचा की रक्षा - Fair & Lovely cream का खर्चा कम हो सकै सै I
४. नादानी मैं बहू तैं कोए इसा उसा काम काम होज्या तो बड़े बूध्याँ तैं आँख चुरान की जरूरत ना पड़ती I
५. चरित्र निर्माण और ब्रहम्चर्य पालन में भी थोडा सा सहयोग क्योंकि जब सौंदर्य का दीदार नहीं होगा तो जज्बात भी नहीं मचलंगे
नुकसान :
१. घूंघट एक तरह से बड़ों की नीयत के प्रति अविश्वाश प्रस्ताव से कम नहीं .
२. नारी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन और लिंग भेद का सूचक ( क्योंकि आदमी घूंघट क्यों नहीं ओढ़ते )
३. चुनरी या दुपट्टे का एक्स्ट्रा खर्च
४. काम करते वक्त असुविधा अगर बड़े बूढ़े आस पास हुक्का पीते पीते निहार रहे हों तो
५. बड़े बूढों के लिए अपनी और परायी बहू की पहचान मुश्किल
6. शायरों और कवियों को ग्रामीण हुस्न/ सौंदर्य पर आधारित शायरी या कविता लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिलेगी ( फेर ग्रामीण समाज इसा हो ज्यागा जैसे बिना फूल का गुलाब का पौधा जिस पे निरे कांटे रह ज्यांगे )
7. सफ़र में पत्नी/बहू के खो जाने का डर - खासकर नई नवेली (यह धारणा एक सच्चे किस्से पर आधारित है. मेरा एक सहपाठी एक बार एक बस अड्डे (busy transit point ) पर गलती से अपने नई नवेली पत्नी को पीछे छोड़ आया था क्योंकि वैसे ही कपड़ों और चुन्नी वाली एक और औरत को उसने अपनी घरवाली समझ लिया था. जब बस तैं उतर के वा दूसरी दिशा में चाली तो वो बोल्या कित जा सै, महारा घर तो दूसरी साइड मै सै, वा औरत न्यू बोली तेरा दिमाग खराब हो रह्या सै के.) यकीन कर लियो या बिलकुल १०० % सच्ची घटना सै. वो साथी जब भी कहीं मिलता बड़ी हंसी आ जाती I

फायदे नुकसान की गुणा घटा मैं खाप के धनी धोरियों पर ही छोड़ देता हूँ


Hahahahahahahahaha...VP Sir.. Very good sense of humor!!

Aur bilkul sach hai :D :D .. I agree with ever single point :D
 
ओल्हे (घूंघट ) के फायदे भी हैं और नुकसान भी. पहले फायदे की बात कर लेते हैं फिर नुकसान की I

फायदे :
१. बहू सुथरी हो तो ओपरी परायी आर मलंगा की नज़र तैं बची रह आर घनी सुथरी ना हो तो उसका अदब सा दबया रह घूंघट के suspence कै नीचै I
२. आँख मटक्के के चांस कम (क्योंकि आँख तैं आँख का संपर्क नहीं होता )
३. धूल-माटी आर धूप तैं बचाव और त्वचा की रक्षा - Fair & Lovely cream का खर्चा कम हो सकै सै I
४. नादानी मैं बहू तैं कोए इसा उसा काम काम होज्या तो बड़े बूध्याँ तैं आँख चुरान की जरूरत ना पड़ती I
५. चरित्र निर्माण और ब्रहम्चर्य पालन में भी थोडा सा सहयोग क्योंकि जब सौंदर्य का दीदार नहीं होगा तो जज्बात भी नहीं मचलंगे
नुकसान :
१. घूंघट एक तरह से बड़ों की नीयत के प्रति अविश्वाश प्रस्ताव से कम नहीं .
२. नारी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन और लिंग भेद का सूचक ( क्योंकि आदमी घूंघट क्यों नहीं ओढ़ते )
३. चुनरी या दुपट्टे का एक्स्ट्रा खर्च
४. काम करते वक्त असुविधा अगर बड़े बूढ़े आस पास हुक्का पीते पीते निहार रहे हों तो
५. बड़े बूढों के लिए अपनी और परायी बहू की पहचान मुश्किल
6. शायरों और कवियों को ग्रामीण हुस्न/ सौंदर्य पर आधारित शायरी या कविता लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिलेगी ( फेर ग्रामीण समाज इसा हो ज्यागा जैसे बिना फूल का गुलाब का पौधा जिस पे निरे कांटे रह ज्यांगे )
7. सफ़र में पत्नी/बहू के खो जाने का डर - खासकर नई नवेली (यह धारणा एक सच्चे किस्से पर आधारित है. मेरा एक सहपाठी एक बार एक बस अड्डे (busy transit point ) पर गलती से अपने नई नवेली पत्नी को पीछे छोड़ आया था क्योंकि वैसे ही कपड़ों और चुन्नी वाली एक और औरत को उसने अपनी घरवाली समझ लिया था. जब बस तैं उतर के वा दूसरी दिशा में चाली तो वो बोल्या कित जा सै, महारा घर तो दूसरी साइड मै सै, वा औरत न्यू बोली तेरा दिमाग खराब हो रह्या सै के.) यकीन कर लियो या बिलकुल १०० % सच्ची घटना सै. वो साथी जब भी कहीं मिलता बड़ी हंसी आ जाती I

फायदे नुकसान की गुणा घटा मैं खाप के धनी धोरियों पर ही छोड़ देता हूँ.

bhai kati sahi detail likh di thamne ...

Waise shayari wala point dekha jaye to.. sahi kaha.. tabhi to gaon me saayar kam hi reh gaye hai ;)

Aur jo hai wo kavi hai, wo bhi VEER-RAS ke .. :P

Chahe fayad ho nuksaan, aaj ke saamaj me parda to nahi hona chahiye...
 
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