katii theek..mharey gharan bi mummy har sir pe palla kar liya kartin...dada naat gey they olhey volhey ne..aarya samaj manane wale parivaro me to parda partha दशको se nahi hai
dhakosley
and right...aankha ki sharam hove hai
katii theek..mharey gharan bi mummy har sir pe palla kar liya kartin...dada naat gey they olhey volhey ne..aarya samaj manane wale parivaro me to parda partha दशको se nahi hai
Firstly , ek bhai ne kaha ghunghat musalmano ko riwaj tha.... mere khayal se hindus ka bhi tha... but still the time has changed ... and we should change along with it.... but before adopting a new life style and leaving any old custom... firstly we should think about the advantages and disadvantages of new and old both and should adopt adequate things out of them... i would like my wife to follow this custom atleast whenever she is with my elder family members and relatives ... i think this way we can pay respect to our senior family members as they are accustomed to it.
@PANNU :- I have already bolded , just to show that it is my wish.... not a compulsion ...
@Fateh :- I have written the reason "our senior family members as they are accustomed to it."
mainn wahi karunga jisme main mere bade khush honge... unki khushi main hi meri khushi hai.... baki apni apni sooch... wahi karo jo man kare....
ओल्हा काढना एक समय मैं औरतों की सुविधा के लिए शुरु हुआ था जो बाद में संस्कृति बन गया / /
ओल्हे (घूंघट ) के फायदे भी हैं और नुकसान भी. पहले फायदे की बात कर लेते हैं फिर नुकसान की I
फायदे :
१. बहू सुथरी हो तो ओपरी परायी आर मलंगा की नज़र तैं बची रह आर घनी सुथरी ना हो तो उसका अदब सा दबया रह घूंघट के suspence कै नीचै I
२. आँख मटक्के के चांस कम (क्योंकि आँख तैं आँख का संपर्क नहीं होता )
३. धूल-माटी आर धूप तैं बचाव और त्वचा की रक्षा - Fair & Lovely cream का खर्चा कम हो सकै सै I
४. नादानी मैं बहू तैं कोए इसा उसा काम काम होज्या तो बड़े बूध्याँ तैं आँख चुरान की जरूरत ना पड़ती I
५. चरित्र निर्माण और ब्रहम्चर्य पालन में भी थोडा सा सहयोग क्योंकि जब सौंदर्य का दीदार नहीं होगा तो जज्बात भी नहीं मचलंगे
नुकसान :
१. घूंघट एक तरह से बड़ों की नीयत के प्रति अविश्वाश प्रस्ताव से कम नहीं .
२. नारी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन और लिंग भेद का सूचक ( क्योंकि आदमी घूंघट क्यों नहीं ओढ़ते )
३. चुनरी या दुपट्टे का एक्स्ट्रा खर्च
४. काम करते वक्त असुविधा अगर बड़े बूढ़े आस पास हुक्का पीते पीते निहार रहे हों तो
५. बड़े बूढों के लिए अपनी और परायी बहू की पहचान मुश्किल
6. शायरों और कवियों को ग्रामीण हुस्न/ सौंदर्य पर आधारित शायरी या कविता लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिलेगी ( फेर ग्रामीण समाज इसा हो ज्यागा जैसे बिना फूल का गुलाब का पौधा जिस पे निरे कांटे रह ज्यांगे )
7. सफ़र में पत्नी/बहू के खो जाने का डर - खासकर नई नवेली (यह धारणा एक सच्चे किस्से पर आधारित है. मेरा एक सहपाठी एक बार एक बस अड्डे (busy transit point ) पर गलती से अपने नई नवेली पत्नी को पीछे छोड़ आया था क्योंकि वैसे ही कपड़ों और चुन्नी वाली एक और औरत को उसने अपनी घरवाली समझ लिया था. जब बस तैं उतर के वा दूसरी दिशा में चाली तो वो बोल्या कित जा सै, महारा घर तो दूसरी साइड मै सै, वा औरत न्यू बोली तेरा दिमाग खराब हो रह्या सै के.) यकीन कर लियो या बिलकुल १०० % सच्ची घटना सै. वो साथी जब भी कहीं मिलता बड़ी हंसी आ जाती I
फायदे नुकसान की गुणा घटा मैं खाप के धनी धोरियों पर ही छोड़ देता हूँ.
Bhai Tomar,
1. Kade kise granth me padya sa k ya Hindua ki b pratha thi ya manyata thi..!
2. Can u plz share some advantages and disadvantages of the same.
3. You would like your wife to follow this tradition,,..question is whether your wife likes it or not...??
Bhai tu to rahwe b Amrika me sa' ..koi amrican wife hogi to wa to jama b na kade...( PS : plz dont take on a serious note. )
4. Respect to dene wale k dil me ho sa'..Ohla is not a symbol of respect...plz read a few of the posts in the thread.
ओल्हे (घूंघट ) के फायदे भी हैं और नुकसान भी. पहले फायदे की बात कर लेते हैं फिर नुकसान की I
फायदे :
१. बहू सुथरी हो तो ओपरी परायी आर मलंगा की नज़र तैं बची रह आर घनी सुथरी ना हो तो उसका अदब सा दबया रह घूंघट के suspence कै नीचै I
२. आँख मटक्के के चांस कम (क्योंकि आँख तैं आँख का संपर्क नहीं होता )
३. धूल-माटी आर धूप तैं बचाव और त्वचा की रक्षा - Fair & Lovely cream का खर्चा कम हो सकै सै I
४. नादानी मैं बहू तैं कोए इसा उसा काम काम होज्या तो बड़े बूध्याँ तैं आँख चुरान की जरूरत ना पड़ती I
५. चरित्र निर्माण और ब्रहम्चर्य पालन में भी थोडा सा सहयोग क्योंकि जब सौंदर्य का दीदार नहीं होगा तो जज्बात भी नहीं मचलंगे
नुकसान :
१. घूंघट एक तरह से बड़ों की नीयत के प्रति अविश्वाश प्रस्ताव से कम नहीं .
२. नारी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन और लिंग भेद का सूचक ( क्योंकि आदमी घूंघट क्यों नहीं ओढ़ते )
३. चुनरी या दुपट्टे का एक्स्ट्रा खर्च
४. काम करते वक्त असुविधा अगर बड़े बूढ़े आस पास हुक्का पीते पीते निहार रहे हों तो
५. बड़े बूढों के लिए अपनी और परायी बहू की पहचान मुश्किल
6. शायरों और कवियों को ग्रामीण हुस्न/ सौंदर्य पर आधारित शायरी या कविता लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिलेगी ( फेर ग्रामीण समाज इसा हो ज्यागा जैसे बिना फूल का गुलाब का पौधा जिस पे निरे कांटे रह ज्यांगे )
7. सफ़र में पत्नी/बहू के खो जाने का डर - खासकर नई नवेली (यह धारणा एक सच्चे किस्से पर आधारित है. मेरा एक सहपाठी एक बार एक बस अड्डे (busy transit point ) पर गलती से अपने नई नवेली पत्नी को पीछे छोड़ आया था क्योंकि वैसे ही कपड़ों और चुन्नी वाली एक और औरत को उसने अपनी घरवाली समझ लिया था. जब बस तैं उतर के वा दूसरी दिशा में चाली तो वो बोल्या कित जा सै, महारा घर तो दूसरी साइड मै सै, वा औरत न्यू बोली तेरा दिमाग खराब हो रह्या सै के.) यकीन कर लियो या बिलकुल १०० % सच्ची घटना सै. वो साथी जब भी कहीं मिलता बड़ी हंसी आ जाती I
फायदे नुकसान की गुणा घटा मैं खाप के धनी धोरियों पर ही छोड़ देता हूँ
ओल्हे (घूंघट ) के फायदे भी हैं और नुकसान भी. पहले फायदे की बात कर लेते हैं फिर नुकसान की I
फायदे :
१. बहू सुथरी हो तो ओपरी परायी आर मलंगा की नज़र तैं बची रह आर घनी सुथरी ना हो तो उसका अदब सा दबया रह घूंघट के suspence कै नीचै I
२. आँख मटक्के के चांस कम (क्योंकि आँख तैं आँख का संपर्क नहीं होता )
३. धूल-माटी आर धूप तैं बचाव और त्वचा की रक्षा - Fair & Lovely cream का खर्चा कम हो सकै सै I
४. नादानी मैं बहू तैं कोए इसा उसा काम काम होज्या तो बड़े बूध्याँ तैं आँख चुरान की जरूरत ना पड़ती I
५. चरित्र निर्माण और ब्रहम्चर्य पालन में भी थोडा सा सहयोग क्योंकि जब सौंदर्य का दीदार नहीं होगा तो जज्बात भी नहीं मचलंगे
नुकसान :
१. घूंघट एक तरह से बड़ों की नीयत के प्रति अविश्वाश प्रस्ताव से कम नहीं .
२. नारी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन और लिंग भेद का सूचक ( क्योंकि आदमी घूंघट क्यों नहीं ओढ़ते )
३. चुनरी या दुपट्टे का एक्स्ट्रा खर्च
४. काम करते वक्त असुविधा अगर बड़े बूढ़े आस पास हुक्का पीते पीते निहार रहे हों तो
५. बड़े बूढों के लिए अपनी और परायी बहू की पहचान मुश्किल
6. शायरों और कवियों को ग्रामीण हुस्न/ सौंदर्य पर आधारित शायरी या कविता लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिलेगी ( फेर ग्रामीण समाज इसा हो ज्यागा जैसे बिना फूल का गुलाब का पौधा जिस पे निरे कांटे रह ज्यांगे )
7. सफ़र में पत्नी/बहू के खो जाने का डर - खासकर नई नवेली (यह धारणा एक सच्चे किस्से पर आधारित है. मेरा एक सहपाठी एक बार एक बस अड्डे (busy transit point ) पर गलती से अपने नई नवेली पत्नी को पीछे छोड़ आया था क्योंकि वैसे ही कपड़ों और चुन्नी वाली एक और औरत को उसने अपनी घरवाली समझ लिया था. जब बस तैं उतर के वा दूसरी दिशा में चाली तो वो बोल्या कित जा सै, महारा घर तो दूसरी साइड मै सै, वा औरत न्यू बोली तेरा दिमाग खराब हो रह्या सै के.) यकीन कर लियो या बिलकुल १०० % सच्ची घटना सै. वो साथी जब भी कहीं मिलता बड़ी हंसी आ जाती I
फायदे नुकसान की गुणा घटा मैं खाप के धनी धोरियों पर ही छोड़ देता हूँ.
2nd question ka answer V.P singh ne diya hai ... ja padh le
2nd question ka answer V.P singh ne diya hai ... ja padh le
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