पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥
एक बात थी उनकी निराली ,नहीं रहते थे कभी ठाली,
बैलो संग जाते जब खेतो में , कहते लोग चला रे हाली ,
भैसों संग जब गोरे जाते ,बन जाते अल्हड़ पाली,
याद आती है जब उनकी ,भर आता है ह्रदय अपार ।
पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥
कभी खिलाते कभी पिलाते,हमारे संग घुल मिल जाते थे ,
कभी नहलाते कभी धुलाते , फिर कंधो पर घर ले जाते थे ,
साँझ ढले कहानी सुनते,फिर पैरो पर झुलाते थे ,
जिद्दी संग वो जिद्दी होकर, कड़ी लगाते थे फटकार।
पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥
आये गए की कदर करो, उनका था समझाना ,
पांच- चार बूढ़े दे किलकारी ,बैठक में था उनका कम्ठाना,
खाट- खटोली चा- पानी , और बैठक में बिस्तर लगवाना ,
आग तमाखू होका, सबकम रखते थे तैयार ।
पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥
रंग सावला लम्बी मूछे,बुढा था सफाई का ,
धोला कुरता धोली धोती ,धोला खंडका नील रंगाई का ,
हाथ में लाठी छोटी काठी ,दठोरा था कसाई का ,
म्हारी झोली सुख की भर के ,गए स्वर्ग सिधार ।
पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥
........................:rock..........................................
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