Pakad dada ji ki anguli

ajit2009

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:cool:..................................................:cool:
पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥

एक बात थी उनकी निराली ,नहीं रहते थे कभी ठाली,
बैलो संग जाते जब खेतो में , कहते लोग चला रे हाली ,
भैसों संग जब गोरे जाते ,बन जाते अल्हड़ पाली,
याद आती है जब उनकी ,भर आता है ह्रदय अपार ।
पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥

कभी खिलाते कभी पिलाते,हमारे संग घुल मिल जाते थे ,
कभी नहलाते कभी धुलाते , फिर कंधो पर घर ले जाते थे ,
साँझ ढले कहानी सुनते,फिर पैरो पर झुलाते थे ,
जिद्दी संग वो जिद्दी होकर, कड़ी लगाते थे फटकार।
पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥


आये गए की कदर करो, उनका था समझाना ,
पांच- चार बूढ़े दे किलकारी ,बैठक में था उनका कम्ठाना,
खाट- खटोली चा- पानी , और बैठक में बिस्तर लगवाना ,
आग तमाखू होका, सबकम रखते थे तैयार ।
पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥


रंग सावला लम्बी मूछे,बुढा था सफाई का ,
धोला कुरता धोली धोती ,धोला खंडका नील रंगाई का ,
हाथ में लाठी छोटी काठी ,दठोरा था कसाई का ,
म्हारी झोली सुख की भर के ,गए स्वर्ग सिधार ।
पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥
........................:rock..........................................
 
Last edited:
ajit bhai bhoot-2 badhiyaa.saari kavitaa issi laagi jaanu to maery aapney baarey mey se.par sab ke dada nuey hoyaa krein.badhaai.:rock:rock:rock:rock
 
बहुत बहुत बढ़िया रचना..... सही कहा.... शायद सब के दादाजी ऐसे ही होते हैं......
 
class one !

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पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥

एक बात थी उनकी निराली ,नहीं रहते थे कभी ठाली,
बैलो संग जाते जब खेतो में , कहते लोग चला रे हाली ,
भैसों संग जब गोरे जाते ,बन जाते अल्हड़ पाली,
याद आती है जब उनकी ,भर आता है ह्रदय अपार ।
पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥

कभी खिलाते कभी पिलाते,हमारे संग घुल मिल जाते थे ,
कभी नहलाते कभी धुलाते , फिर कंधो पर घर ले जाते थे ,
साँझ ढले कहानी सुनते,फिर पैरो पर झुलाते थे ,
जिद्दी संग वो जिद्दी होकर, कड़ी लगाते थे फटकार।
पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥


आये गए की कदर करो, उनका था समझाना ,
पांच- चार बूढ़े दे किलकारी ,बैठक में था उनका कम्ठाना,
खाट- खटोली चा- पानी , और बैठक में बिस्तर लगवाना ,
आग तमाखू होका, सबकम रखते थे तैयार ।
पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥


रंग सावला लम्बी मूछे,बुढा था सफाई का ,
धोला कुरता धोली धोती ,धोला खंडका नील रंगाई का ,
हाथ में लाठी छोटी काठी ,दठोरा था कसाई का ,
म्हारी झोली सुख की भर के ,गए स्वर्ग सिधार ।
पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥
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Class one poem likhhi hai bhai dalal saab ! maan gye ! no. 1 ki rachna hai jmaa !
 
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