अग्निकुल क्षत्रिय सिद्धांत का इतिहासकारों के पास कोई ठोस अभिलेख नहीं दिखता है. राजस्थान के दशरथ शर्मा इतिहासकार मानते हैं कि अभिलेखों के आधार पर परमार अग्निकुल क्षत्रिय हैं ऐसा वो एक शिलालेखीय अभिलेख के आधार पर कहते हैं. दशरथ शर्मा लिखते हैं कि असुरों का संहार करने के लिए वशिष्ठ ऋषि ने चार क्षत्रिय कुल उत्पन्न किये. अबुल फजल ने आईने अकबरी में इनकी उत्पति आबू पर्वत पर महाबाहू ऋषि द्वारा बौद्धों से तंग आने के कारण अग्नि कुंड से होना लिखा है. (सन्दर्भ आईने अकबरी वि.2, प.214 .) चौहानों के बारे में आबू पर्वत पर अचलेश्वर महादेव के मंदिर में संवत 1377 ई.1320 के देवड़ा लुम्भा के समय के लेख में लिखा है कि सूर्य और चन्द्रवंश के अस्त हो जाने पर जब संसार में उत्पात कायम हुआ तो वत्स ऋषि ने ध्यान योग लगाया तब उनके ध्यान में और चन्द्रमा के योग से एक पुरुष उत्पन्न हुआ.
अबू पर्वत पर जो क्षत्रिय माने गए उनमें से 80 प्रतिशत नागवंशी जाट थे. शेष अहीर, गुजर यादव आदि थे. उस समय राजपूत शब्द प्रचलन में नहीं हुआ था. वस्तुत नागवंशी जाट बौद्ध धर्म में थे. उनका हिन्दुकरण किया गया और नए क्षत्रिय वर्ग में विभाजन कर दिया गया. जो गोत्र जिस क्षत्रिय वंश में शामिल हुए उनका इतिहास वहीँ से माना गया. पहले का इतिहास शुन्यकरण कर दिया गया. भाट व्यवस्था कायम की गयी. भाट अपना इतिहास वहीँ से लिखना शुरू कर रहे हैं इसलिए उत्पति चौहान वंश से मान रहे हैं. इतिहास का जीरो लेवल आबू पर्वत कर दिया गया. इसी को अग्निकुल सिद्धांत कहा गया है.
अबू पर्वत पर जो क्षत्रिय माने गए उनमें से 80 प्रतिशत नागवंशी जाट थे. शेष अहीर, गुजर यादव आदि थे. उस समय राजपूत शब्द प्रचलन में नहीं हुआ था. वस्तुत नागवंशी जाट बौद्ध धर्म में थे. उनका हिन्दुकरण किया गया और नए क्षत्रिय वर्ग में विभाजन कर दिया गया. जो गोत्र जिस क्षत्रिय वंश में शामिल हुए उनका इतिहास वहीँ से माना गया. पहले का इतिहास शुन्यकरण कर दिया गया. भाट व्यवस्था कायम की गयी. भाट अपना इतिहास वहीँ से लिखना शुरू कर रहे हैं इसलिए उत्पति चौहान वंश से मान रहे हैं. इतिहास का जीरो लेवल आबू पर्वत कर दिया गया. इसी को अग्निकुल सिद्धांत कहा गया है.
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