Reservation is our constitutional right

Status
Not open for further replies.
आरक्षण में जो लूट हो रही है उसमे अपनी हिस्सेदारी कर लो वरना जाट जाट कहते रह जाओगे और मजे और कोई ले रहा है
 
i dont think huda chotala wil ever get reservation to jats coz of their vote bank politics. they need backward votes.
 
Ek baar Rajya Sabha mein pes bill sthagit ho bhi jaye to bhi aisa bill aagle session mein jinda rahata hai.

I ment that since BC/OBC AND SUPPORT BY JATS, WILL NOT ALLOW THIS BILL THE SUCESS I feel political parties and specially the congress will not pass this bill but will keep the bill/hope alive till elections.
 
183346_269518346498877_1792402931_n.jpg
 
[TABLE="width: 552"]
[TR]
[TD]जाट आरक्षण संघर्ष समिति की कार्यकारिणी की बैठक 30 सितंबर को : सांगवान

भिवानी। अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के प्रदेशाध्यक्ष पूर्व कमांडेंट हवासिंह सांगवान ने बतलाया कि संघर्ष समिति की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक 30 सितंबर, वीरवार को सुबह 11 बजे जाट धर्मशाला, हिसार में होगी, जिसमें आरक्षण की प्रगति पर समीक्षा के अतिरिक्त 24 नवंबर, 2012 को चौ. छोटूराम की जयंती कहां मनाई जाए, इस पर भी फैसला लिया जाएगा। सांगवान ने कहा कि इस अवसर पर हरियाणा की सभी खापों को भी आमंत्रित किया जाएगा तथा इस शुभावसर को एक विशाल आयोजन के तौर पर मनाया जाएगा।
सांगवान ने यह भी कहा कि हरियाणा का जाट समाज बहुत धैर्य के साथ हरियाणा पिछड़ा आयोग की रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है और उन्हें पूरी आशा है कि आयोग जाट समाज के साथ पूरा- पूरा न्याय करके उनका 22 साल पुराना सवैंधानिक अधिकार दिलाकर जाट समाज के समानता के मौलिक अधिकार की रक्षा भी करेगा।
[/TD]
[/TR]
[/TABLE]
 
Last edited:
जाट आरक्षण मुद्दा समझने का है बहकने का नहीं


हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि हमारी मांग क्या है? यह हमारी केवल मांग ही नहीं, बल्कि सवैंधानिक अधिकार है। यह केवल सवैंधानिक अधिकार ही नहीं, हमारा समानता का मौलिक अधिकार भी है, क्योंकि जाटों को किसी राज्य में आरक्षण देकर या कहीं न देकर जाटों के समानता के मौलिक अधिकारों का हनन किया गया है। यह मामला स्पष्ट तौर पर सर्वोच्च न्यायालय जाने का है, लेकिन अभी वहां जाकर हम इस मांग को खटाई में नहीं डालना चाहते क्योंकि न्यायालय के मामले सालों साल चलते हैं। हमारी स्पष्ट मांग है कि पूरे भारत वर्ष के जाटों को बगैर किसी धर्म, पंथ या क्षेत्र का भेदभाव किए बिना समान रूप से जाट समाज को पिछड़ी जाति मान लिया जाए, जिस प्रकार हमारे समान किसान जातियां अहीर, गुज्जर व सैनी आदि जातियों को मंडल कमीशन के तहत माना है। समान का अर्थ है कि जिनके साथ हमारा सामाजिक तौर पर खाना-पीना, हुक्का पानी, व उठना-बैठना एक समान है। आरक्षण का नाम तो हमें मजबूरी में लेना पड़ रहा है क्योंकि मंडल कमीशन के समय जाटों ने अपने आपको पिछड़ा मानने से इंकार कर दिया था और कहा था कि ऐसा मानने पर उनका स्वाभिमान घट जाएगा(मंडल कमीशन रिपोर्ट पेज नंबर 294)। इसलिए जब हमने सन् 2008 में प्रचार शुरू किया तो केवल आरक्षण का नाम लिया ताकि जाट समाज कहीं विरोध न कर बैठे वर्ना आरक्षण तो हमारी मांग का एक छोटा सा हिस्सा है। जाट समाज को वैसी ही सुविधाएं चाहिएं जो पिछड़ी जातियों को दी जा रही हैं। लगता है, जाट समाज चौ. छोटूराम को भूल गया है, जिन्होंने संयुक्त पंजाब के सदन में तथा उसके बाहर सभी क्रषक जातियों को बार-बार पिछड़ा कहा लेकिन उनकी मृत्यु के पश्चात कुछ ऐसी विचारधारा फैलाई गई कि जाट तो आर्य हैं, इसीलिए सर्वश्रेष्ठ होने के कारण वह अपने आप को पिछड़ा कहलाने में तुच्छ हो जाएगा। यही मुख्य कारण था कि लगभग पांच साल के पश्चात व आंदोलन के होते हुए अभी तक जाट समाज अपने इस अधिकार के लिए पूर्ण रूप से खड़ा नहीं हो पाया है।
अभी कुछ जाट भाई यह कहते हैं कि हमें राज्य स्तर पर पहले आरक्षण मिलना चाहिए। इसमें दो प्रकार के जाट हैं। पहले, वे जिन्हें आरक्षण का पूरा ज्ञान नहीं, दूसरे वे हैं, जो राजनीति से प्रेरित हैं। हमें ज्ञात होना चाहिए कि दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, उत्तरांचल, बिहार और हिमाचल में जाटों को राज्य स्तर पर आरक्षण मिले 12 साल से भी अधिक हो गए हैं, लेकिन आज तक केंद्र स्तर पर क्यों नहीं? यदि हरियाणा के जाटों ने पहले राज्य स्तर की मांग की तो हमारा भी वही हाल होगा, जो उपरलिखित राज्यों में जाटों का हुआ है। आदरणीय मुख्यमंत्री चौ. भूपेंद्र सिंह हुड्डा, जो अभी तक हमारे लिए केंद्र में आरक्षण की पैरवी कर रहे हैं और यदि हमने दबाव डालकर उनसे पहले राज्य में आरक्षण लागू करवा भी लिया तो फिर वे हमारी केंद्र में किस आधार पर पैरवी करेंगे? वे कह देंगे कि जो उनके अधिकार में था, वह उन्होंने दे दिया। हमें याद रखना होगा कि केंद्र में पहले आरक्षण मिलने पर राज्य स्तर पर लागू होना अनिवार्य है क्योंकि पिछड़ी जाति के प्रमाण पत्र राज्य स्तर के एसडीएम व तहसीलदार जैसे अधिकारी ही बनाते हैं। दूसरा हमारे सामने मंडल कमीशन का उदाहरण है, जो केंद्र सरकार ने आयोग बिठाया था, लेकिन उसकी रिपोर्ट को केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में लागू करना पड़ा। इसके अतिरिक्त हमारे सामने राजस्थान के जाटों का उदाहरण स्पष्ट है, जिनको केंद्र में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की भाजपा की सरकार ने 27 अक्टूबर, 1999 को केंद्र स्तर पर जाटों को आरक्षण दिया, लेकिन राजस्थान में कांग्रेस की सरकार होते हुए भी 6 नवंबर, 1999 को अर्थात दस दिन के बाद लागू करना पड़ा। जो जाट पहले राज्य स्तर पर आरक्षण की मांग कर रहे हैं, वे या तो इस बारे में अंजान हैं या फिर किसी राजनीतिक पार्टी के इशारे पर हुड्डा सरकार पर दबाव डालकर पहले राज्य स्तर पर आरक्षण के बहाने उनका राजनीतिक समीकरण बिगाडऩे की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा और कुछ नहीं।
कुछ जाट भाई बार-बार यह कहते हैं कि आरक्षण को समाप्त कर दिया जाए। शायद वह जानते नहीं कि आरक्षण का प्रावधान भारतीय संविधान की धारा 15(4) तथा 16(4) में किया गया है, जिसको समाप्त करने के लिए संविधान में संशोधन आवश्यक है, जिसके लिए संसद का दो तिहाई बहुमत अर्थात 100 में से 66.4 सांसदों का समर्थन अनिवार्य है। जब पहले से ही 100 में से 50 सांसद आरक्षित जातियों से हैं तो फिर बहुमत कहां से आएगा? इसके अतिरिक्त हम यह क्यों नहीं देख रहे हैं कि नौकरियों के अतिरिक्त प्रमोशन में भी आरक्षण दिया जाने वाला है अर्थात आरक्षण घटने की बजाय बढ़ रहा है, फिर हमें बढ़ते हुए अधिकार में सम्मिलित होना चाहिए न कि घटती की ओर। इसलिए जाट समाज की सोच सकारात्मक हो, न कि नकारात्मक । इसलिए आरक्षण समाप्त करने का कोई मुद्दा नहीं है और इस मुद्दे पर चर्चा करके केवल अपनी ऊर्जा को बर्बाद करना है।
कुछ हमारे जाट भाई आरक्षण के लिए आर्थिक आधार की बात करते हैं। हमें मालूम होना चाहिए कि संविधान की उपरोक्त धाराओं के अनुसार आरक्षण के लिए केवल दो ही शर्तें हैं। पहला सामाजिक पिछड़ापन और दूसरा शैक्षणिक पिछड़ापन। किसी भी समाज के उपरोक्त दोनों स्तर ऊपर उठाने के लिए आरक्षण अनिवार्य है ताकि उन समाजों का आर्थिक स्तर ऊपर उठ सके। आर्थिक स्तर ऊपर उठने से उन समाजों का सामाजिक और शैक्षणिक स्तर भी ऊपर उठना लाजमी है। इसलिए आरक्षण के लिए आर्थिक कोई आधार नहीं है बल्कि आर्थिक स्तर ऊंचा उठाना उद्देश्य है। इसके अतिरिक्त मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ लिखा है कि आरक्षण का आर्थिक आधार हो ही नहीं सकता क्योंकि किसी भी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति स्थायी नहीं होती, हर रोज बदलती रहती है। आज एक व्यक्ति धनी है तो कल वही व्यक्ति गरीब हो सकता है और गरीब व्यक्ति रातों-रात धनी हो सकता है और आज ऐसा बहुत तेजी से हो रहा है। इसलिए रोजाना न तो आरक्षण दिया जा सकता है और न ही हटाया जा सकता है। इसी कारण पहले पिछड़ा आयोग ने जो काका कालेलकर की अध्यक्षता में सन 1955 में केंद्र सरकार को रिपोर्ट सौंपी, वह संसद में पेश नहीं हो सकी। मान लो, किसी भी कारण आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू हो भी जाता है तो सबसे अधिक नुकसान ग्रामीण जाट किसान का होगा क्योंकि उसकी संपत्ति एकमात्र जमीन है, चाहे वह एक भी बीघा क्यों न हो। जिसका समुचित रिकार्ड अर्थात हिसाब-किताब सरकार के पटवारी व तहसीलदार के पास है, जिसे छिपाया नहीं जा सकता है। वहीं दूसरी ओर एक रेहड़ी लगाने वाले से लेकर कारखाना मालिक तक अपनी संपत्ति को छिपा सकता है। लेकिन किसान जाट नहीं। इसीलिए जाटों को इस आधार पर आरक्षण देने की बात आते ही दूसरे कहेंगे कि जाट की एक बीघा जमीन की कीमत एक करोड़ है, वह गरीब कैसे हुआ? ऐसा बीपीएल कार्ड बनने के समय ग्रामीण जाट के साथ हो चुका है और हो रहा है। हमारे एक जाट भाई नेता सीपीएस धर्मबीर सिंह जी की धर्मसेना भिवानी शहर की दीवारों पर लिख रही है कि आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए। इसी प्रकार कुछ दूसरे जाट नेता भी आर्थिक आधार की बात करते हैं। ये लोग सरेआम जाट समाज को गुमराह कर रहे हैं। समय आने पर जाटों को इनको कारगर जवाब देना चाहिए। इसलिए हमें आर्थिक आधार की बात से बिलकुल भी भ्रमित नहीं होना चाहिए।
कुछ दूसरे लोग यह कहकर जाटों को भ्रमित कर रहे हैं कि जाट तो क्षत्रिय हैं और हरियाणा में जाट मुख्यमंत्री है तो जाटों को आरक्षण कि क्या आवश्यकता है? ऐसे लोगों को कड़ाई से उत्तर देना होगा कि क्या क्षत्रियों को अपने बच्चों के लिए सुविधाएं नहीं चाहिएं, जो दूसरी पिछड़ी किसान जातियां उठा रही हैं। जाट मुख्यमंत्री होना कोई पाप नहीं है। सभी जगह पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों व जनजातियों के मुख्यमंत्री होते आ रहे हैं। इसके अतिरिक्त फिर भी कोई जाट भाई अपने आप को पिछड़ा कहलाने में शर्म महसूस करता है, तो उसे पिछड़ी जाति के प्रमाण-पत्र बनवाने की आवश्यकता नहीं और जब तक वह प्रमाण-पत्र नहीं बनवाएगा, उसकी गिनती सामान्य जाति अर्थात उच्च जातियों में होगी। इसीलिए जिस जाट भाई के स्वाभिमान को ठेस पहुंचती है तो वह सामान्य जाति अर्थात उच्च जाति में बना रहे। किसी को कोई ऐतराज नहीं। पिछड़ी जाति का प्रमाण पत्र एक हथियार के समान है। जब आवश्यकता हो, इसका इस्तेमाल करें, वर्ना अलमारी में संभालकर रखें, जिस प्रकार जरूरत पडऩे पर ही कौत (शास्त्र गृह) से हथियार निकाले जाते हैं। वैसे यह स्पष्ट हुआ है कि हम हरियाणा के जाट उत्तरप्रदेश व राजस्थान आदि के जाटों से पहले बहकने वाले हैं। इसका स्पष्ट कारण है कि हम हरियाणा के जाट में अपनी कौम के लिए चिंतन का अभाव है तथा दूसरे की बातों पर ज्यादा विश्वास करते हंै। परिणामस्वरूप दुश्प्रचार के शिकार हो जाते हैं। इसीलिए हम अपनी कौम के अधिकारों के लिए पूर्णतया सचेत नहीं हैं तथा लंबे संघर्ष में भी कम विश्वास करते हैं क्योकि हम चौ. छोटूराम को भूल चुके हैं।
याद रहे, कोई भी आंदोलन सच्ची निष्ठा और बुद्धिबल से समयानुसार नीति बनाकर चलाया जाता है। आंदोलन चलाना एक पतंग उड़ाने के समान है, जिसमें समय के अनुसार डोरी को खींचना तथा ढ़ीला करना पड़ता है। हमारे इस आंदोलन में देखा गया है कि शहरी जाटों, बुद्धिजीवी जाटों और धनी जाटों का बहुत ही कम योगदान है। शायद उन्होंने अपने आप को जाट समाज से ऊंचा मान लिया है। अभी कुछ चतुर जाट भाई आरक्षण का श्रेय लेने के लिए छटपटाने लगे हैं तथा एक से बढक़र एक सीमा बना रहे हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि निकट भविष्य में जाटों को आरक्षण मिलने वाला है। लेकिन याद रहे, आरक्षण का श्रेय देने वाले का होगा, लेने वाले का नहीं, क्योंकि देने वाला हमेशा श्रेष्ठ होता है, लेने वाला नहीं।
जय जाट।
 
अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के प्रदेशाध्यक्ष पूर्व कमांडेंट हवासिंह सांगवान ने पत्रकारों को बतलाया कि जब जाट समाज ने अपने सवैंधानिक अधिकार के लिए जाट आरक्षण आंदोलन चलाया और मजबूरन रेलों को रोकना पड़ा तो माननीय न्यायालयों ने सरकार के घाटों पर संज्ञान लेते हुए आपत्ति जताई कि इससे रेलवे को करोड़ों का नुकसान हुआ है। जबकि जाट समाज ने अपने इस सवैंधानिक अधिकार के लिए जब कोई और चारा नहीं मिला तो रेलें रोकनी पड़ी थीं। लेकिन अभी 20 सितंबर को राजनीतिक पार्टियों ने अपने राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए भारत बंद का आह्वान करके केंद्रीय खजाने को 132 अरब रूपए का चूना एक ही दिन में लगा दिया, जिसमें देश के 75 लाख ट्रक सडक़ों पर नहीं दौड़ पाए, पांच करोड़ व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहे जिसमें करोड़ों मजदूरों को अपनी रोजी-रोटी से महरूम रहना पड़ा तथा राज्य सरकारों को 300 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व से हाथ धोते हुए देश के करोड़ों नागरिकों को आवागमन में भारी कठिनाई उठानी पड़ी। सांगवान ने न्यायालयों से अपील की है कि जब इतने भारी नुकसान पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया है तो जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुए नुकसान पर कोई संज्ञान न लेकर जाट समाज के साथ न्याय किया जाए।
इस अवसर पर उनके साथ रघुबीर सिंह बूरा, कुलदीप फौगाट, संदीप सिंह, राजसिंह धनाना आदि उपस्थित थे।
 
क:बे बखत बधवा लिया इब्ब ताहीं ? फेर कह देंगे दो मिहने और रूक जाओ |
 

Bhai Sangwan, as you said earlier that you are in touch with the govt and I believe you are following all moves/decisions in this regard but as per my latest info, that govts at both levels and the chalak and confused political party has decided to pay no attention to our demand, you may like to check please, regards
 
Just read on Facebook's official page of Akhil Bhartiya Jat Aarakshan Samiti: कांग्रेस को केंद्र में जाट आरक्षण की मांग को जल्द से जल्द मानना होगा वरना जाट दिल्ली के चारो और 100 फिट गहरी खाई खोद देंगे


A dream too far or a claim too tall?
 
No khai can be dugged without unity and whole world and specially the congressies know very well, unity cannot take place among jats
 
जाट दिल्ली के चारो और 100 फिट गहरी खाई खोद देंगे ...
कर भी देंगे भाई , दिल्ली आले नु कहा करे अक जाट सिरफिरे होया करे | जिस दिन सर फिर ज्यागा उस दिन यो काम भी होना से | तू मत चला जाईये दिल्ली , कद्दे कोए तन्ने खायी में धक्का मार के ऊपर ते माटी गेर दे तेरे पे | :livid:
 
मेरी चिंता मतना करा कर इतनी, मुझे तो हवाई जहाज़ ते उतरना है आर हवाई जहाज़ ते उड जाना है. अपनी राह देख के चलिए कद्दी हवाई अड्डे ते हरयाणा जाते हुए कद्दे रह मैं ढा पड़े इस खाई मैं आर फेर सिरफिरो ने गाली देता हुआ कह 'ओह ले ले की भाई'


कर भी देंगे भाई , दिल्ली आले नु कहा करे अक जाट सिरफिरे होया करे | जिस दिन सर फिर ज्यागा उस दिन यो काम भी होना से | तू मत चला जाईये दिल्ली , कद्दे कोए तन्ने खायी में धक्का मार के ऊपर ते माटी गेर दे तेरे पे | :livid:
 
मेरी चिंता मतना करा कर इतनी, मुझे तो हवाई जहाज़ ते उतरना है आर हवाई जहाज़ ते उड जाना है. अपनी राह देख के चलिए कद्दी हवाई अड्डे ते हरयाणा जाते हुए कद्दे रह मैं ढा पड़े इस खाई मैं आर फेर सिरफिरो ने गाली देता हुआ कह 'ओह ले ले की भाई'

पन्नू तो 'सिडनी तें दिल्ली' खचर-रेहड़ी में जाया करे .... हवाई जहाज का भाड़ा कोणी इस धोरे तेरे ढाल भाई........... छोटा मोटा माणस स यो...
 
सुल्यू ढाल पढ़ तो लेता अनिल जवाब देन ते पहले हिमायत लें के चक्कर मैं आँख वाला अँधा बने है भाई . ईब पढ़ ले "अपनी राह देख के चलिए कद्दी हवाई अड्डे ते हरयाणा जाते हुए कद्दे रह मैं ढा पड़े इस खाई मैं आर फेर सिरफिरो ने गाली देता हुआ कह 'ओह ले ले की भाई'"
पन्नू तो 'सिडनी तें दिल्ली' खचर-रेहड़ी में जाया करे .... हवाई जहाज का भाड़ा कोणी इस धोरे तेरे ढाल भाई........... छोटा मोटा माणस स यो...
 
Status
Not open for further replies.
Back
Top