माँ को गले लगाते हो, कुछ पल मेरे भी पास रहो
’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो |
मैनेँ भी मन मे जज़्बातोँ के तूफान समेटे हैँ,
ज़ाहिर नही किया, न सोचो पापा के दिल मेँ प्यार न हो |
थी मेरी ये ज़िम्मेदारी घर मे कोई मायूस न हो
मैँ सारी तकलीफेँ झेलूँ और तुम सब महफूज़ रहो |
सारी खुशियाँ तुम्हेँ दे सकूँ, इस कोशिश मे लगा रहा,
मेरे बचपन मेँ थी जो कमियाँ, वो तुमको महसूस न हो |
हैँ समाज का नियम भी ऐसा पिता सदा गम्भीर रहे
मन मे भाव छुपे हो लाखोँ, आँखो से न नीर बहे |
करे बात भी रुखी-सूखी, बोले बस बोल हिदायत के,
दिल मे प्यार है माँ जैसा ही, किंतु अलग तस्वीर रहे |
भूली नही मुझे हैँ अब तक, तुतलाती मीठी बोली
पल-पल बढते हर पल मे, जो यादोँ की मिश्री घोली |
कन्धोँ पे वो बैठ के जलता रावण देख के खुश होना,
होली और दीवाली पर तुम बच्चोँ की अल्हड टोली |
माँ से हाथ-खर्च मांगना, मुझको देख सहम जाना
और जो डाँटू ज़रा कभी, तो भाव नयन मे थम जाना |
बढते कदम लडकपन को कुछ मेरे मन की आशंका,
पर विश्वास तुम्हारा देख मन का दूर वहम जाना |
कॉलेज के अंतिम उत्सव मेँ मेरा शामिल न हो पाना
ट्रेन हुई आँखो से ओझल, पर हाथ देर तक फहराना |
दूर गये तुम अब, तो इन यादोँ से दिल बहलाता हूँ,
तारीखेँ ही देखता हूँ बस, कब होगा अब घर आना |
अब के जब तुम घर आओगे, प्यार मेरा दिखलाऊंगा
माँ की तरह ही ममतामयी हूँ, तुमको ये बतलाऊंगा |
आकर फिर तुम चले गये, बस बात वही दो-चार हुई,
पिता का पद कुछ ऐसा ही हैँ फिर खुद को समझाऊंगा |