Shayri (Continued)

Charagh bujhtey rahey aur khuwab jaltey rahey


Ajab tarz ka mausam mere watan mein raha...

Beautiful. Its always the second line which gives the real punch to the "sher". let me borrow the first line and make another attempt;

Charagh bujhte rahe aur khwab jalte rahey
Sisak sisak ke zindgi ke sans chalte rahe
mujhe tadafta hua chor ke chale jane wale,
mere gham na kum hue, bas din dhalte rahe

RK^2
 
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"अब मिलेंगे उसे तो खूब रुलाएंगे ‘फ़राज’
सुना है उन्हें रोते हुए लिपट जाने की आदत है"
 
चाँद के साए बालिश्तो से नापने है
चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में।

हम भी गुनगुना चाहते थे गीत तुम्हारा,
पर देर क्यों लगादी तुमने गाने मैं


दिल पे दस्तक देने ये कौन आयाहै
किसकी आहट सुनता हूँ वीराने में।

जाने किस का जिक्र है इस अफसाने में
दर्द मजे लेता है जो दोहराने में |
 
Last edited:
Jee karta hai mar jaun doob kar, chullu bhar paani me
Hoga ahsaan agar paani se bhar lao tum upnee chullu

RK^2
 
..

खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में,
एक पुराना खत खोला अनजाने में ..
 
डरता हु कहने सै कि पसंद हो तुम मुजको .......,
मेरी ज़िन्दगी बदल देगा तेरा इंकार भी और इकरार भी ....!
 
.

सामने आये मेरे, देखा मुझे, बात भी की
मुस्कराए भी, पुरानी किसी पहचान की ख़ातिर
कल का अख़बार था, बस देख लिया, रख भी दिया
- गुलज़ार
 
.

तू खूबियाँ मुझ में तलाश ना कर,
तू भी शामिल है मेरी कमियों में !


 
तुझे शिकायत है के मुझे बदल दिया है वक़्त ने |
कभी खुद से भी तो सवाल कर के तू वही है या नहीं ||
 
डरता हु कहने सै कि पसंद हो तुम मुजको .......,
मेरी ज़िन्दगी बदल देगा तेरा इंकार भी और इकरार भी ....!
Inkar pe sambhal pana muskil hai thoda,
par ikrar pe jan nikal hi jayegi......
 
मेरी तकलीफे बढती है तेरे दीदार से,
तुझे देख के जीने की आदत भी नहीं जाती !!
 
Hanste dekha hai unhe, muddaton ke baad
ai chaand unhe jaakar, eid mubaq kehna

RK^2
 
Last edited:
"किस किस अदा से तूने, जलवा दिखा के मारा
आज़ाद हो चुके थे, बन्दा बना के मारा

पहले बना के पुतला, पुतले में जान डाली
फिर उसको ख़ुद, मौत की सूरत में आ के मारा

आँखों में तेरी ज़ालिम, छुरियाँ छुपी हुई हैं
देखा जिधर को तूने, पलकें उठा के मारा

ग़ुंचों में आ के महका, बुलबुल में जा के चहका
इस को हँसा के मारा, उसको रुला के मारा"
 
कृष्ण बिहारी "नूर" की कुछ पंक्तियाँ पेशे ख़िदमत हैं:


"बस उसकी मांग में सिंदूर भर के लौट आए
हमारा अगले जनम का चुनाव ऐसा था

फिर उसके बाद झुके तो झुके ख़ुदा की तरफ़
तुम्हारी सिम्त हमारा झुकाव ऐसा था
सिम्त = ओर, तरफ


ज़बां से कुछ न कहूंगा, ग़ज़ल ये हाज़िर है
दिमाग़ में कई दिन से तनाव ऐसा था

फ़रेब दे ही गया ‘नूर’ उस नज़र का ख़ुलूस
ख़ुलूस = प्यार, वात्सल्य
फ़रेब खा ही गया मैं, सुभाव ऐसा था"
 
My take on Modi

Zamane ne Modi ke chehre pe itnee siyaahi lagyee ki
Mujhe to Modi ke chehre me Krishna nazar aane laga

RK^2
 
Last edited:
सुना है आपकी मुस्कान पर हर कोई मरता है !
ज़रा समय निकल कर आइये ,
एक चूहा मरवाना है !!
 
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