Shayri (Part 1)

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आज फिर एक सिगरेट जला रहा हूँ
फिर एक तीली बुझा रहा हूँ
उसकी नज़र में ये एक गुनाह था
मैं तो बस उसके वादे भुला रहा हूँ
समझना मत इसे मेरी आदत
... मैं तो बस धुआं उड़ा रहा हूँ
ये उसकी यादों के सिलसिले हैं
मैं उसकी यादें जला रहा हूँ
मैं पी कर इतना बहक चूका हूँ
की गम के किस्से सुना रहा हूँ
अगर तुम्हे भी गम है तो मेरे पास आओ
मैं पी रहा हूँ और पिला रहा हूँ
हैं मेरी तो आँखें नम
मगर मैं सबको हँसा रहा हूँ
खो कर अपनी ज़िन्दगी में
अपने बे इन्तहा प्यार को भुला रहा हूँ
एक सिगरेट की शमा के बहाने मैं अपने आप को जला रहा हूँ
मैं आज फिर एक सिगरेट जला रहा
 
मैं कोई पत्थर नहीं इंसान हूँ

कैसे कह दूँ गम से घबराता नहीं !!!
 
आज कफ़न उठा कर आखरी बार दीदार कर लो मेरा

ए दिलबर

वो आँखें बंद होने जा रही है

जो रोज तेरा इन्तेज़ार किया करती थी !!!
 
अब तो घबरा के कहते हैं की मर जायेंगे !
मर के भी चैन न पाया तो किधर जायेगे ?
हम नहीं वो जो करें खून का दावा तुझसे
बल्कि पूछेगा खुदा भी तो मुकर जायेगे !! - ज़ौक
 
आज हम अपनी दुआवों का असर देखेंगे
तीरे नज़र देख लिए , जख्मे जिगर देखेंगे !
 
तुमने हर पल में पुकारा है मुझे.......
ये अगर भ्रम है तो भी प्यारा है मुझे......!!​
 
मेरी ज़िंदगानी को ख्वाबो से सजाया है तुमने
इश्क को अपने अंदाज से निभाया है तुमने॥​
 
फलक से जब सितारा जुदा होता है,
उसमे आसमां का भी कुछ इशारा होता है
करोगे किसी से सच्चे दिल से प्यार तो पता चलेगा
बिछडते वक्त क्या नजारा होता है
 
मुझपे तोहमत न रख मै शराबी नहीं ,
वो नज़र से पिलाए तो मैं क्या करूँ !! - जौक
 
तलाश-ए-ऐब मैं मेरी ज़ात को न कर दाग-दार

फक़त इतना ही कहदे तेरे काबिल नहीं हूँ मैं !!!
 
दोस्तों दौर सचमुच कलयुगी आ गया
मैं मुस्कुराया तो वो गाली सुना गया

बच्चे जवान बूढ़े सब पर शक करते है
हुस्नवालों को भ्रम का कीड़ा खा गया

शरीफों को लल्लू समझती है लडकियाँ
कल रात मुझे मेरा महबूब बता गया

देखा जब बिल्लियों को आपस में लड़ते
सच कहता हूँ मुझे तो चक्कर आ गया

पायजामा तक जिसे न पहनना आता था
पड़ा इश्क में तो कमबख्त जींस फसा गया

उसके पसीने में भी खुशबू आती है
पहचान बस बेचैन इतनी बता गया
 
जादू वादू टोना शोना जंतर मंतर लगाया जाता है
यूँ ही नहीं फसता कोई ,जाल तो बिछाया जाता है

मचल उठते है दिल गर पल्लू सरक जाये उनका
खुद नहीं सरकता ये पल्लू भी सरकाया जाता है

कुछ तो कारन है वो पंहुचा नहीं मंजिल तक
भटकता नहीं है मुसाफिर भटकाया जाता है

हर कोई निकलता है उनकी गली से लडखडाता सा
आँखों से ही सही यहाँ कुछ तो पिलाया जाता है

यहाँ इश्क भी करना तो जरा अदब से करना
वाफाओ का भी अब मजाक उड़ाया जाता है

दुनिया एक तिलिश्म है जहा सब भटकते है
कहानी परियो की सुना के बचपन को सुलाया जाता है

आँखे झुकी सी लब कांपते सबध टूटते से..
सायद ऐसे ही हाले दिल किसी को सुनाया जाता है

ऐसे ही नहीं बनती गजल कोई इन्द्रजीत
सीना फाड़ के सब्दो से सजाया जाता
 
सिपहसालारों के हाथों का 'माही' खंज़र काँप जाता है
सरपरस्तों की इक ललकार पे लश्कर काँप जाता है !
तुम्हें खौफ-ए-खुदा बिलकुल नहीं है आज के इन्सानों
अरे खुदा का खौफ तो वो है के पत्थर काँप जाता है !
गवाह रही है तारीखें खुद-ब-खुद बन जाते हैं रास्ते
... ... जिगर वालों के घोड़ों की टापों से समन्दर काँप जाता है !
हम शरीफ़ों की ख़ामोशी को बुझदिली न समझ इतराने वाले
हमारी एक तिरछी निगाह पे बड़े से बड़ा धुरंधर काँप जाता है
 
मुहब्बत मुझे तुम से नहीं तेरे किरदार से है 'ग़ालिब'

वरना हसीं लोग तो बाज़ार मैं आम मिला करते हैं !!!
 
उनकी गली से गुजरे ज़माना हो गया ,
दिल की दीवारों पे टंगी है उनकी सूरत आज भी ,
कौन कहता है उनका ख्याल पुराना हो गया ,
बरकरार उन खिडकियों के पीछे वही बैचनी होगी ,
गैर के कदमो की आहट से भी उसको लगता होगा
सरे राहगुजर मेरा आना हो गया !
उनकी गली से गुजरे ज़माना हो गया ,
हाले दिल का इल्म तो उन्हें जब भी था ,
बेखबर से बन पूछते हैं राहगीरों से ,
उस अजनबी का कहाँ अब ठिकाना हो गया
 
जादू वादू टोना शोना जंतर मंतर लगाया जाता है
यूँ ही नहीं फसता कोई ,जाल तो बिछाया जाता है

मचल उठते है दिल गर पल्लू सरक जाये उनका
खुद नहीं सरकता ये पल्लू भी सरकाया जाता है

कुछ तो कारन है वो पंहुचा नहीं मंजिल तक
भटकता नहीं है मुसाफिर भटकाया जाता है

हर कोई निकलता है उनकी गली से लडखडाता सा
आँखों से ही सही यहाँ कुछ तो पिलाया जाता है

यहाँ इश्क भी करना तो जरा अदब से करना
वाफाओ का भी अब मजाक उड़ाया जाता है

दुनिया एक तिलिश्म है जहा सब भटकते है
कहानी परियो की सुना के बचपन को सुलाया जाता है

आँखे झुकी सी लब कांपते सबध टूटते से..
सायद ऐसे ही हाले दिल किसी को सुनाया जाता है

ऐसे ही नहीं बनती गजल कोई इन्द्रजीत
सीना फाड़ के सब्दो से सजाया जाता

नास ठा दिया राणा
बहुत खूब.......... लगे रहो..........
 
नास ठा दिया राणा
बहुत खूब.......... लगे रहो..........

हंसी ख़ुशी खेल तमाशे सादगी भोलापन छोड़ आया हूँ
मेरे गाँव में मैं अपना बचपन छोड़ आया हूँ

दिन रात ढोती है लाखो को, शहर की चमकती सड़के
मैं कच्ची गलियों में फिसलता मन छोड़ आया हूँ
...
एक मुद्दत हो गयी है किसी से गले मिले हुए
सब रिश्ते नाते परिवार संस्कार अपनापन छोड़ आया हूँ

तलवार का वार रखते है जुबान में शहर के कुछ लोग
इसलिए सादगी भरोसा और भोलापन छोड़ आया हूँ

दम कहीं निकले पर मिटटी मेरे गाँव की मिले ए रब
मेरे गाँव में अपने नाम का कफ़न छोड़ आया हूँ
 
हंसी ख़ुशी खेल तमाशे सादगी भोलापन छोड़ आया हूँ
मेरे गाँव में मैं अपना बचपन छोड़ आया हूँ

दिन रात ढोती है लाखो को, शहर की चमकती सड़के
मैं कच्ची गलियों में फिसलता मन छोड़ आया हूँ
...
एक मुद्दत हो गयी है किसी से गले मिले हुए
सब रिश्ते नाते परिवार संस्कार अपनापन छोड़ आया हूँ

तलवार का वार रखते है जुबान में शहर के कुछ लोग
इसलिए सादगी भरोसा और भोलापन छोड़ आया हूँ

दम कहीं निकले पर मिटटी मेरे गाँव की मिले ए रब
मेरे गाँव में अपने नाम का कफ़न छोड़ आया हूँ

Good satire on modern city life.
 
सर पे सिंदूर का “फैशन” नहीं है,
गले मे मंगलसूत्र का “टेंशन” नहीं है !
माथे पे बिंदी लगाना “आउटडेटेड” लगती है,
... तरह तरह की लिपस्टिक अब होंठो पे सजती है !

पर आज भी जब कोई भारतीय परिधान पहनती है,
सच बताऊं सभी की आँखे उस पे ही अटकती हैं !
सादगी, भोलापन और शर्म ही भारतीय स्त्री की पहचान है,
मत त्यागो इन्हें यही हमारे देश का स्वाभिमान है !
 
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