Shayri (Part 1)

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~ अब और किस नशे पे हम ऐतबार करे साकी .........की आँखों से पिलाने वाले भी अब मिलावट करने करने लगे है ~
 
~ अब और किस नशे पे हम ऐतबार करे साकी .........की आँखों से पिलाने वाले भी अब मिलावट करने करने लगे है ~

ये पीने वाले भी अजीब होते है

जहाँ से दूर खुद के करीब होते है !
 
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अपनी तो ये आदत है

चुप रहते है या सच कहते है

शायद इसीलिए दुनिया वाले हम से खफा रहते है ............
 
मेरी बेजुबान आखों से गिरे चंद कतरे है

वो समझ सकें तो आंशु है ना समझे तो पानी है !
 

कभी कभी यूँ भी हमने अपने दिल को बहलाया है

जिन बातो को खुद ना समझ सके,ओरों को समझाया है !
 
धूप है छाओं है
जलते तेरे पाँव है
धारा के विपरीत
बहती तुम्हारी नाव है

जिसने भूख मिटाई
उसको कहते भगवान है
जिसने हमको अन्न दिया,
वो भारत का किसान है

कभी बाढ़ ने
कभी सूखे ने सताया है
खुद को भूखा रख कर
तुने हमें खिलाया है

हर पल तुम परिश्रम
करते हो ,
लाखों लोगो की भूख
तुम अपने पसीने से हरते हो
किसान फिर क्यों तुम
भूखे मरते हो

तुम्हारी मेहनत को
चूहे और नेता खा जाते हैं
भूखों को कुछ मिलता नहीं
अनाज खुले में सड़ जाते हैं
और मेरे देश के किसान
भूखे ही मर जाते हैं
 
Very nice Balraaj Ji...

धूप है छाओं है
जलते तेरे पाँव है
धारा के विपरीत
बहती तुम्हारी नाव है

जिसने भूख मिटाई
उसको कहते भगवान है
जिसने हमको अन्न दिया,
वो भारत का किसान है

कभी बाढ़ ने
कभी सूखे ने सताया है
खुद को भूखा रख कर
तुने हमें खिलाया है

हर पल तुम परिश्रम
करते हो ,
लाखों लोगो की भूख
तुम अपने पसीने से हरते हो
किसान फिर क्यों तुम
भूखे मरते हो

तुम्हारी मेहनत को
चूहे और नेता खा जाते हैं
भूखों को कुछ मिलता नहीं
अनाज खुले में सड़ जाते हैं
और मेरे देश के किसान
भूखे ही मर जाते हैं
 
Aao ek sazada karein
aalm-e-madh hoshi mein
Log kehtein hein ke
Dahiya ko khuda yaad nahin

Khud ko kho ke
uun ko pana hai
Uun ko pana koi
mazak nahin

Wo bhulaein ge kya
tujhe Dahiya
Bhul jana koi
mazak nahin

Jakham khanein ka
hosla hei kise
Jakham khana koi
mazak nahin

Aao ek sazda kare
aalm-e-madh hoshi mein
Log kehtein hai ke
DahiyaBadshah ko khuda yaad nahin
 
Last edited:

हमें खैरात में मिली ख़ुशी अच्छी नहीं लगती,

हम अपने ग़मों में भी रहते है, नवाबों की तरह....!
 
चाहा था हमने उनको ,उनकी इजाजत ले कर ,
वो चले गए , हमें सिर्फ भरोसा दे कर ||
 
जीकर बेवफाओं का था , रात सर _ए_महफ़िल ,,
झुका मेरा भी सर , जब मेरे यार का नाम आया |
 
Maine ek jhalak zindgi ko dekh
vo meri raah mei gunguna rahi thi
maine dhoondha use idhar udhar
vo aankh micholi kar muskura rahi thi....
Ek arse k baad aaya mujhe karar...​
Vo sehla kar mujhe sula rahi thi....
Hum dono kyun khafa hai ek dusre se...
Vo mujhe or mei use bta rhi thi.....
Maine pucha tune mujhe ye dard kyun diya....??????
Usne kaha mei zindgi hun, bas tujhe jeena sikha rahi thi.....!!!!!!!
​
 
भरोसा है खुदी पर, नाखुदा की इल्तिजा कैसी,
मेरी कश्ती ही साहिल है, मेरी कश्ती में साहिल है।
 
बैठे बिठाये हाले - दिले बाजार खुल गया
मैं आज उसके सामने बेकार खुल गया
मुश्किल काम था तेरे गम को समेटना
मैं खुद को बाँधने मैं कई बार खुल गया
 
मुद्तों के बाद उसको किसी के साथ खुश देखा तो एहसास हुआ
काश की उसको बहुत पहले ही छोड़ दिया होता ....
 
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हम कि मगलूब-ए-गुमाँ थे पहले
फिर वहीं हैं कि जहाँ थे पहले

ख़्वाहिशें झुर्रियाँ बन कर उभरीं
ज़ख़्म सीने में निहाँ थे पहले


अब तो हर बात पे रो देते हैं
वाक़िफ़-ए- सूद -ओ-ज़ियाँ थे पहले

दिल से जैसे कोई काँटा निकला
अश्क आँखों से रवाँ थे पहले

अब फक़त अंजुमन आराई हैं
ऐतबार-ए-दिल-ओ-जाँ थे पहले

दोश पे सर है कि है बर्फ जमी
हम तो शोलों की ज़ुबाँ थे पहले

अब तो हर ताज़ा सितम है तस्लीम
हादसे दिल पे गराँ थे पहले

मेरी हमज़ाद है तन्हाई मेरी
ऐसे रिश्ते भी कहाँ थे पहले..........

''किश्वर नाहिद''
 
बात का रूख बदल देते हो चेहरा देखकर
हम तो सीधी बात कहते है,खफा कोई भी हो
 
बहक कर बाग़-ऐ-जन्नत से चला आया था दुनिया में,
सुना है बाद महशर फिर उसी जन्नत की दावत है,
चला तो जाऊ जन्नत मे मगर यह सोच कर चुप हूँ,
मैं आदम-ज़ात हूँ मुझको बहक जाने की आदत है
 
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