Shayri (Part 1)

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डरा-डरा सहमा-सहमा-सा रहता हूँ |
खुद से जुस्तज़ू में लगा रहता हूँ |

कोई हल हो बताना अकेले में,
भीड़ के इशारों में फँसा रहता हूँ |
 
यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे
में समझता था मेरे यार समझते हैं मुझे

मै तो यूं चुप हूँ के अंदर से बहुत खाली हूँ
देखने वाले पुरअसर समझदार समझते हैं मुझे

में तो बदलते हुए हालात में ढल जाता हूँ
और सब लोग अदाकार समझते हैं मुझे

वो जो उस पार हैं , उन के लिए इस पार हूँ में
वो जो इस पार हैं, उस पार समझते हैं मुझे

नायक लोगों में मुझे नायक गिना जाता है
और गुनाहगार , गुनाहगार समझते हैं मुझे ... !
 
सूखे होंटों पे ही होती हैं मीठी बातें
प्यास जब बुझ जाये तो लहजे बदल जाते हैं .....!!
 
Pyaar kyu tumse hame ho gaya
Socho maine kya paya kya kho gaya
Gujar rahi thi zindagi pahle bhi magar
Ab dil me khwahiso ka ambaar ho gaya
Aankho me har pal tumhare khawaab hai
Teri julfe sham hai tera chehara savera ho gaya
Log mujhko dety hai tane tumhare naam se
Kyu tera mera naam ab ek ho gaya
Ab is dil ki majburi kon samjhega benaam
Najro ki khata ka ye kya anjaam ho gaya.
 
दर्द की हर एक हद से अब गुजर गया हू में
फिर कभी न सिमटउंगा यु बिखर गया हू में

मौत बस नहीं आती रूह के निकलने से
साँस मुझमे बाकी है फिर भी मर गया हू में

जिंदगी में जितनी भी रौशनी थी उससे थी
मुस्तकिल अंधेरो में अब उतर गया हू में

बाम ओ दर भी उसके बाद हो गया हे यु खामोश
ओर दिल उलझता है जब भी घर गया हू में

उसका साथ जब तक था रंगी रंगी मौसम था
बस खिजा के मौसम में अब ठहर गया हू में
 
समय से चुरा के कुछ वक़्त...
चंद पल जिंदगी जीते हैं...
चलो दारु पीते हैं...
...

वो सपनो की चादर जो जिंदगी के थपेड़े खा कर फट चुकी है...
नशे में ही सही, उस चादर को सीते हैं...
चलो दारु पीते हैं...

वो सुनहरे पल अब न वापस आयँगे
जाने कब तक दिल को वो रुलायेंगे
अब तो हम उन्हें बस यादो में जीते है
चलो दारू पीते है
 
यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चन्द उम्मीदें,
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
 
Uljhi hui baat ko suljhane ki zid hai,
jo nahin kismat mein use paane ki zid hai,
is samandar mein tufan bahut hai,
isi ke saahil pe ghar banane ki zid hai...!!!
 
Alfaaz gira dete hain jazbaat ki qeemat,
jazbaat ko alfaazon me dhaala na karo...!!!
जज्बातों को आयाम नहीं अल्फाजों के बिना |
जज्बात "गूंगे का गुड"हो जायेंगे अल्फाजों के बिना ||
 
तुझे क्या खबर तेरी याद ने मुझे किस कदर सता दिया |
कभी अकेले में हंसा दिया ,कभी महफ़िल में रुला दिया ||
 
करो फिर से कोई वादा , कभी ना फिर बिछड़ने का
तुम्हें क्या फर्क पड़ता है बिछड़ने में , मुकरने में ..!!
 
में तो चीराग हूँ तेरे आशियाने का ,
एक दिन तो में बुझ जाउंगा ,
आज शिकायत हे तुझे ,मेरे उजाले से ,
कल अँधेरे में बहुत याद आउंगा ||
 
में अंधेरों को कोसने निकला था ,
पर उजालों ने मुझे समझा दिया ,
क्यूँ वक्त जाया करते हो कोसने में ,
और मेने एक और दीपक जला दिया ||

------रवि "अतृप्त "
 
Last edited:
क्या ग़म हे , क्या हे ख़ुशी , अब मालुम नहीं ,
वो अपना ही था,या था अजनबी ,अब मालूम नहीं ,
जिसके बिना एक पल नहीं गुज़रता था कभी ,
कैसे गुजरेगी ज़िन्दगी अब , मालूम नहीं ||

------रवि "अतृप्त "
 
[FONT=lucida grande, tahoma, verdana, arial, sans-serif]कहाँ से आ रही हैं सिसकियाँ अँधेरे में ,[/FONT]
[FONT=lucida grande, tahoma, verdana, arial, sans-serif]कोई मेरे जेसा ही तन्हाई का मारा होगा ,[/FONT]
[FONT=lucida grande, tahoma, verdana, arial, sans-serif]उजालों में तो सब मुखोटा लगा लेते हैं मुस्कुराने का ,[/FONT]
[FONT=lucida grande, tahoma, verdana, arial, sans-serif]ख्यालों से रूब रु होने का ,अन्धेरा उसका भी सहारा होगा ||[/FONT]
[FONT=lucida grande, tahoma, verdana, arial, sans-serif][FONT=lucida grande, tahoma, verdana, arial, sans-serif]
[/FONT]
------रवि "अतृप्त "
[/FONT]
 
मैं वो साफ ही न कह दूँ, जो है फर्क तुझमें, मुझमें,
तेरा दर्द दर्दे - तन्हा, मेरा गम, गमे - जमाना।
 
आप तो...मोहोब्बत कर के...बैठ गएं...
मुझे...बस मेरे खोएं हुए...दिल की तलाश हैं...
 
आम है यूँ तो मेरी बर्बादियों का वाकेआ,
वह तो कह दें कि कोई मर मिटा मेरे लिये।
 
हर खिजाँ के गुबार में हमने कारवाने - बहार देखा है,

कितने पशमीनापोश जिस्मों में रूह को तारतार देखा है।
 
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