क्योंकि हम सब वर्षों की परतंत्रा के कारण स्वयम को हीन समझने लगे हैं | अंग्रेजों का शासन एवं उनकी शासन विधि जो की उन्होंने हमारे ऊपर थोपी गयी थी, हमने अक्षरसः स्वीकार कर ली है | हम आज भी उन्ही पुरानी नीतियों और परम्पराओं को जान बुझ कर ढ़ो रहे है, क्योंकि समाज में आज भी अंग्रेज़ी के वक्ताओं को उसी सम्मान से देखा जाता है जिस सम्मान से अंग्रेज़ प्रशासको को उनके चापलूस देखा करते थे | केवल हमारा राष्ट्र ही इस परम्परा का एक मात्र ज्वलंत उदाहरण है |
हमने कभी हमारी प्रशासकीय एवं न्यायिक शब्दावलियों के विकास एवं प्रयोग के लिए अथक प्रयत्न नही किए | कुछ जागरूक नागरिक अंग्रेज़ी भाषा को इसलिए अधिक उत्साहित करते हैं क्योंकि वे ये समझते है कि इसके माध्यम से शिक्षा एवं रोजगार के अवसर अधिक प्राप्त हो सकते है | किंतु यह एक मिथ्या ब्रह्म ही सिद्ध होता है, यह एक सत्य से परे की सोच है | चीन, जापान, रूस एवं फ्रांस आज भी अपनी मातृभाषाओं क्रमशः चीनी, जापानी, रूसी एवं फ्रांसीसी का प्रयोग करते हुए भी हम भारवासियों से बहुत आगे हैं | क्योंकि सफलता कि जनक भाषा नही वरन आत्म सम्मान एवं आत्म प्रयत्न से जन्म लेने वाला उत्साह एवं दृढ़ निश्चय है |
हमने स्वयं ने बहुत बार देखा होगा के जब रूसी राष्ट्राध्यक्ष हमारी संसद को स्वयम की मातृभाषा में संबोधित करते हैं तो हमें भी आत्मिक रूप से गौरव की अनुभूति होती है कि देखिये इनका अपने राष्ट्र एवं मातृभाषा के प्रति कितना समर्पण है | हमारे ह्रदय में भी उनसे प्रेरणा लेने कि उत्कंठा उत्पन्न होती है परन्तु यह क्षणिक आवेश ही बन कर रह जाती सी प्रतीत होती है | क्योंकि हमें हिन्दी भाषा को प्रोत्साहित करने वाला वातावरण पूर्ण रूप से प्राप्त |

जय हिंद ![/नही हो पता है | आइये हम सभी आज से हिन्दी को अपना उत्कृष्ट स्थान दिलाने के लिए प्रण करें जिससे कि हमें और हमारी भावी पीढी को आत्म गौरव की प्राप्ति होquote]
प्रिय मित्र .
मैं आपकी बात से सों फीसदी सहमत हू . आज लगभग पुलिश थानों में और
अदालतों में सारे काम हिन्दी + उर्दू में होते है . तो क्या वहा के काम नही हो रहे क्या .
पर सुप्रीम कोर्ट में काम अंग्रेजी में होता है . एसा इसलिए की अंग्रेजो के समय में
सुप्रीम कोर्ट के सारे न्याय धीश अंग्रेज ही होते थे . अभी कुछ समय पहले वहा भी
हिन्दी में काम करवाने के प्रयास हुए थे . पर न्याय धिशो ने यह कह कर हिन्दी को
लागु करने से मना कर दिया की हमें परेशानी होगी . तो क्या सुप्रीम कोर्ट के माननीय
न्याय धीश अमेरिका से आयात किए हुए है जो उनको परेशानी होगी . वहा के वकील
साहेबान भी भारतीय ही है . हिन्दी की कुछ माटी पलित तो दक्सिन भारतीयों ने भी कर राखी है .
रही कसर राज ठाकरे जैसे छुट भये नेता कर रहे है . काश सरदार पटेल कुछ समय और जीवित
रह जाते तो जैसे सभी रियासतों को मिलाकर एक भारत बना दिया था . उसी तरह सभी भाषाओ
को मिलाकर एक हिन्दी बना देते .
जय हिन्दी
जय हिंद