Sonia Gandhi...

पति की हत्या होने के पश्चात कोंग्रेस के वरिष्ट नेताओं ने सोनिया से पूछे बिना उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाये जाने की घोषणा कर दी परंतु सोनिया ने इसे स्वीकार नहीं किया और राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति अपनी घृणा और अविश्वास को इन शब्दों में व्यक्त किया कि मैं अपने बच्चों को भीख मांगते देख लूँगी, परंतु मैं राजनीति में कदम नहीं रखूँगी। काफ़ी समय तक राजनीति में कदम न रख कर उन्होंने अपने बेटे और बेटी का पालन पोषण करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया।
http://hi.wikipedia.org/wiki/सोनिया_गांधी

the lady ruling our nation is an Agent of KGB(national security agency of Russia)...
and the worst thing is many of Us are not able to know and understand the whole game planned by the KGB...

Hamara desh KGB key ishaaron par naach raha hai..aur Sonia auntie nacha rahi hai..aur hum khushi sey naach bhi rahey hain... :(
 
पति की हत्या होने के पश्चात कोंग्रेस के वरिष्ट नेताओं ने सोनिया से पूछे बिना उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाये जाने की घोषणा कर दी परंतु सोनिया ने इसे स्वीकार नहीं किया और राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति अपनी घृणा और अविश्वास को इन शब्दों में व्यक्त किया कि मैं अपने बच्चों को भीख मांगते देख लूँगी, परंतु मैं राजनीति में कदम नहीं रखूँगी। काफ़ी समय तक राजनीति में कदम न रख कर उन्होंने अपने बेटे और बेटी का पालन पोषण करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया।
http://hi.wikipedia.org/wiki/सोनिया_गांधी

I admire Sonia Gandhi for the courage she has shown in the face of all kinds of challenges she has faced in her political and personal life. Moreover, she keeps her health in such good shape!

Regards,

Urmila.
 
पति की हत्या होने के पश्चात कोंग्रेस के वरिष्ट नेताओं ने सोनिया से पूछे बिना उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाये जाने की घोषणा कर दी परंतु सोनिया ने इसे स्वीकार नहीं किया और राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति अपनी घृणा और अविश्वास को इन शब्दों में व्यक्त किया कि मैं अपने बच्चों को भीख मांगते देख लूँगी, परंतु मैं राजनीति में कदम नहीं रखूँगी। काफ़ी समय तक राजनीति में कदम न रख कर उन्होंने अपने बेटे और बेटी का पालन पोषण करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया।
http://hi.wikipedia.org/wiki/सोनिया_गांधी

पति की हत्या होने के पश्चात सोनिया को इटली चले जाना चाहिए था, पर गयी नहीं वो इसलिए कि उसको एक "five star' सुविधाओं में रहने की आदत हो गयी थी, और हमारे काले अंग्रेजों (कांग्रेस के नेताओं) ने देखा कि यदि सोनिया चली गयी तो कांग्रेस के इतने टुकड़े हो जायेंगे कि गिन भी नहीं पाएंगे और हमारी दुकान बंद हो जाएगी. सब काले अंग्रेज सोनिया के पैरों में नाक रगड़ - रगड़ कर भारत में रहने के लिए विवश कर दिया, और इस प्रकार भारत का सर्वनाश कर दिया. एक पुस्तक भी लिखी गयी है, "Red Saree ', हर भारतीय को इस पुस्तक का एक बार अवश्य अध्ययन करना चाहिए, इस पुस्तक को पढेंगे तो आँखे फटी की फटी रह जाएँगी.
 
पिछले तीन वर्ष में सोनिया की सरकारी ऐश का सुबूत

मित्रों सोनिया गाँधी के उपर सरकार ने पिछले तीन वर्ष में जितनी रकम उनकी निजी विदेश यात्राओं पर की है उतना खर्च तो प्रधानमंत्री ने भी नहीं किया है ..एक सूचना के अनुसार पिछले तीन वर्षों में सरकार ने लगभग एक हज़ार आठ सौ अस्सी करोड रूपये सोनिया के विदेश दौरे के उपर व्यय किये हैं ..कैग ने इस पर आपति भी व्यक्त की थी तो दो अधिकारियो का स्थानांतरण कर दिया गया .अब इस पर एक पत्रकार रमेश वर्मा ने सरकार से आर टी आई के तहत निम्न जानकारी मांगी है :-

१- सोनिया के उपर पिछले तीन वर्ष में कुल कितने रूपये सरकार ने उनकी विदेश यात्रा के लिए व्यय की है ?
२- क्या ये यात्रायें सरकारी थी ? - यदि सरकारी थी तो फिर उन यात्राओ से इस देश को क्या लाभ हुआ?
३- भारत के संविधान में सोनिया की हैसियत एक सांसद की है तो फिर उनको प्रोटोकॉल में एक राष्ट्राध्यक्ष का दर्जा कैसे मिला है ?
४- सोनिया गाँधी आठ बार अपनी बीमार माँ को देखने न्यूयॉर्क के एक अस्पताल में गयी जो कि उनकी एक निजी यात्रा थी फिर हर बार हिल्टन होटल में चार महंगे सुइट भारतीय दूतावास ने क्यों सरकारी पैसे से बुक करवाए?
५- इस देश के प्रोटोकॉल के अनुसार केवल प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ही विशेष विमान से अपने लाव लश्कर के साथ विदेश यात्रा कर सकते हैं तो फिर एक सांसद को विशेष सरकारी विमान लेकर विदेश यात्रा की अनुमति क्यों दी गयी?
६- सोनिया गाँधी ने पिछले तीन वर्ष में कितनी बार इटली और vatican की यात्रायें की है ?

मित्रों कई बार प्रयास करने के पश्चात भी जब सरकार की ओर से कोई उत्तर नहीं मिला तो थक हारकर केंद्रीय सूचना आयोग में अपील करनी पड़ी .केन्द्रीय सूचना आयोग प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय के गलत रवैये से हैरान हो गया .और उसने प्रधानमंत्री के उपर बहुत ही सख्त टिपण्णी की ..केन्द्रीय सूचना आयोग ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी दौरों पर उस पर खर्च हुए पैसे को सार्वजनिक करने को कहा है. सीआईसी ने प्रधानमंत्री कार्यालय को इसके निर्देश भी दिए हैं. हिसार के एक आरटीआई कार्यकर्ता रमेश वर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय से सोनिया गांधी के विदेशी दौरों, उन पर खर्च, विदेशी दौरों के उद्देश्य और दौरों से हुए लाभ के बारे में जानकारी मांगी है. 26 फरवरी 2010 को प्रधानमंत्री कार्यालय को वर्मा की याचिका मिली, जिसे पीएमओ ने 16 मार्च 2010 को विदेश मंत्रालय को भेज दिया. 26 मार्च 2010 को विदेश मंत्रालय ने याचिका को संसदीय कार्य मंत्रालय के पास भेज दिया. प्रधानमंत्री कार्यालय के इस ढ़ीले रवैए पर रोष जताते हुए मुख्य सूचना आयुक्त सत्येन्द्र मिश्रा ने निर्देश दिया कि भविष्य में याचिका को संबंधित मंत्रालय ही भेजा जाए. वर्मा ने पीएमओ के सीपीआईओ को याचिका दी थी. सीपीआईओ को यह याचिका संबंधित मंत्रालय को भेजनी चाहिए थी. आखिर सोनिया की विदेश यात्राओ में वो कौन सा राज छुपा है जो इस देश के " संत " प्रधानमंत्री इस देश की जनता को बताना नहीं चाहते ?
 
पिछले तीन वर्ष में सोनिया की सरकारी ऐश का सुबूत

मित्रों सोनिया गाँधी के उपर सरकार ने पिछले तीन वर्ष में जितनी रकम उनकी निजी विदेश यात्राओं पर की है उतना खर्च तो प्रधानमंत्री ने भी नहीं किया है ..एक सूचना के अनुसार पिछले तीन वर्षों में सरकार ने लगभग एक हज़ार आठ सौ अस्सी करोड रूपये सोनिया के विदेश दौरे के उपर व्यय किये हैं ..कैग ने इस पर आपति भी व्यक्त की थी तो दो अधिकारियो का स्थानांतरण कर दिया गया .अब इस पर एक पत्रकार रमेश वर्मा ने सरकार से आर टी आई के तहत निम्न जानकारी मांगी है :-

१- सोनिया के उपर पिछले तीन वर्ष में कुल कितने रूपये सरकार ने उनकी विदेश यात्रा के लिए व्यय की है ?
२- क्या ये यात्रायें सरकारी थी ? - यदि सरकारी थी तो फिर उन यात्राओ से इस देश को क्या लाभ हुआ?
३- भारत के संविधान में सोनिया की हैसियत एक सांसद की है तो फिर उनको प्रोटोकॉल में एक राष्ट्राध्यक्ष का दर्जा कैसे मिला है ?
४- सोनिया गाँधी आठ बार अपनी बीमार माँ को देखने न्यूयॉर्क के एक अस्पताल में गयी जो कि उनकी एक निजी यात्रा थी फिर हर बार हिल्टन होटल में चार महंगे सुइट भारतीय दूतावास ने क्यों सरकारी पैसे से बुक करवाए?
५- इस देश के प्रोटोकॉल के अनुसार केवल प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ही विशेष विमान से अपने लाव लश्कर के साथ विदेश यात्रा कर सकते हैं तो फिर एक सांसद को विशेष सरकारी विमान लेकर विदेश यात्रा की अनुमति क्यों दी गयी?
६- सोनिया गाँधी ने पिछले तीन वर्ष में कितनी बार इटली और vatican की यात्रायें की है ?

मित्रों कई बार प्रयास करने के पश्चात भी जब सरकार की ओर से कोई उत्तर नहीं मिला तो थक हारकर केंद्रीय सूचना आयोग में अपील करनी पड़ी .केन्द्रीय सूचना आयोग प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय के गलत रवैये से हैरान हो गया .और उसने प्रधानमंत्री के उपर बहुत ही सख्त टिपण्णी की ..केन्द्रीय सूचना आयोग ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी दौरों पर उस पर खर्च हुए पैसे को सार्वजनिक करने को कहा है. सीआईसी ने प्रधानमंत्री कार्यालय को इसके निर्देश भी दिए हैं. हिसार के एक आरटीआई कार्यकर्ता रमेश वर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय से सोनिया गांधी के विदेशी दौरों, उन पर खर्च, विदेशी दौरों के उद्देश्य और दौरों से हुए लाभ के बारे में जानकारी मांगी है. 26 फरवरी 2010 को प्रधानमंत्री कार्यालय को वर्मा की याचिका मिली, जिसे पीएमओ ने 16 मार्च 2010 को विदेश मंत्रालय को भेज दिया. 26 मार्च 2010 को विदेश मंत्रालय ने याचिका को संसदीय कार्य मंत्रालय के पास भेज दिया. प्रधानमंत्री कार्यालय के इस ढ़ीले रवैए पर रोष जताते हुए मुख्य सूचना आयुक्त सत्येन्द्र मिश्रा ने निर्देश दिया कि भविष्य में याचिका को संबंधित मंत्रालय ही भेजा जाए. वर्मा ने पीएमओ के सीपीआईओ को याचिका दी थी. सीपीआईओ को यह याचिका संबंधित मंत्रालय को भेजनी चाहिए थी. आखिर सोनिया की विदेश यात्राओ में वो कौन सा राज छुपा है जो इस देश के " संत " प्रधानमंत्री इस देश की जनता को बताना नहीं चाहते ?

these are some facts we should know .. but i don't think that we will ever be able to get the answers for these questions.
 
Sonia Gandhi kee Kahani Subramaniam Swami kee Zubani

पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के सामने जब सोनिया गांधी ने सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत किया, तो वो असमंजस में थे. ये 17 मई 2004 का दिन था. तब इस मामले में कई संवैधानिक अड़चनें थीं और कलाम इस पर परामर्श लेना चाहते थे. मीडिया के तमाम हाइप के बावजूद वो तब सौ करोड़ से अधिक लोगों के इस देश की प्रधानमंत्री नहीं बन पाईं. मैं यही कहूंगा कि ये संयोग था कि हमारी राष्ट्रीयता की अस्मिता की तब रक्षा हुई और इस पर खरोंच लगने से बच गई. इसके पश्चात ये स्वर भी उठे कि भला किस तरह लोकतांत्रिक विधि से और संवैधानिक विधि से सोनिया गांधी को किसी सार्वजनिक पद से दूर रखा जा सकता है.

मेरा सोनिया गांधी से विरोध केवल इसलिए नहीं है कि वो इतालवी हैं और इटली में जन्मी हैं. किसी भी लोकतांत्रिक देश में, जिसमें इटली भी सम्मिलित है इस प्रकार का मुद्दा उठ ही नहीं पाता कि किसी विदेशी मूल के व्यक्ति को किस प्रकार से देश का प्रमुख होने से रोका जाये, क्योंकि वहां संविधान में पहले से ही इस बात की साफ-साफ व्यवस्था की जा चुकी है. उनके कानून में साफ लिखा है कि जिस व्यक्ति का यहां जन्म हुआ होगा वही यहां का प्रमुख बन सकता है. भारत में इस प्रकार का कोई कानून नहीं है परन्तु मेरी जानकारी के अनुसार राष्ट्रपति ने भारतीय सिटिजनशिप एक्ट (1855) के सेक्शन पांच के तहत काम किया. किसी विदेशी का भारतीय नागरिक के तौर पर रजिस्ट्रेशन करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय को भारतीय नागरिकता प्रदान करने के लिए वही स्थिति अपनानी चाहिए थी जो कि इटली में होती है. ऐसे में श्रीमती गांधी पर भी वह नियम लागू होना चाहिए था जो कि किसी भारतीय के इटली में नागरिकता प्राप्त करने के लिए होता है.

राष्ट्रपति ने 17 मई 2004 की दोपहर श्रीमती गांधी को सूचित किया यदि वह स्वयं अपनी सरकार बनाने पर जोर देंगी तो वह पहले एक बात को स्पष्ट करना चाहेंगे, जो सुप्रीम कोर्ट के रिफरेंस में होगा कि उनके प्रधानमंत्री बनने को लेकर विदेशी मूल के मामले पर चुनौती तो नहीं दी जा सकती है. राष्ट्रपति की ये रिपोर्ट एकदम सही थी. मैंने इस संबंध में दो दिन पहले ही अर्थात 15 मई 2004 को एक याचिका दायर कर रखी थी कि सोनिया गांधी की नागरिकता कंडीशनल है और इस स्थिति में वह प्रधानमंत्री नहीं बन सकतीं.

राष्ट्रपति ने मुझे 17 मई 2004 की दोपहर मिलने के लिए बुलाया. उसमें मुझसे राय मांगी गई. मैंने उनसे कहा कि मैं सुप्रीम कोर्ट में इस असंवैधानिक नियुक्ति का विरोध करूंगा, जैसा कि मैंने 2001 में भी किया था, जब जयललिता को तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी.

खैर हम अब सोनिया गांधी की ओर लौटते हैं और पहले ये जानते हैं कि सोनिया गांधी कौन हैं, उनसे, उनके परिवार और इटली के मित्रों से क्या खतरे हैं? बहुत कम लोग उनके अतीत के बारे में जानते हैं. उनका असली नाम एडविग एंतोनिययो अल्बिना मैनो है और जानेंगे उन झूठ बातों के बारे में जो सोनिया से जुड़ी हैं. कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि भारतीय लोग सोनिया के बारे में कुछ नहीं जानते और वो किन लोगों से सम्बन्ध रखती हैं? यहां तक भारत में जन्मे हुए नागरिक के बारे में भी कई बार हमें उसकी सही सही पृष्ठभूमि के बारे में ज्ञात नहीं हो पाता तो ऐसे में एक विदेशी के बारे में जानना जो बहुत छोटी सी जगह से सम्बन्ध रखता हो, वास्तव में बहुत कठिन है.

तीन झूठ:-


कांग्रेस पार्टी एवं स्वयं सोनिया गांधी अपनी पृष्ठभूमि के बारे में जो बताते हैं, वो तीन झूठों पर टिका हुआ है.

पहला ये है कि उनका असली नाम अंतोनिया है न कि सोनिया. ये बात इटली के राजदूत ने नई दिल्ली में 27 अप्रैल 1973 को लिखे अपने एक पत्र में स्पष्ट की थी. ये पत्र उन्होंने गृह मंत्रालय को लिखा था, जिसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया. सोनिया का वास्तविक नाम अंतोनिया ही है , जो उनके जन्म प्रमाण पत्र के अनुसार एकदम सही है. सोनिया ने इसी प्रकार अपने पिता का नाम स्टेफनो मैनो बताया था. वो दूसरे वर्ल्ड वार के समय रूस में युद्ध बंदी थे. स्टेफनो नाजी आर्मी के वालिंटियर सदस्य थे. बहुत ढेर सारे इतालवी फासिस्टों ने ऐसा ही किया था. सोनिया वास्तव में इतालवी नहीं अपितु रूसी नाम है. सोनिया के पिता रूसी जेलों में दो वर्ष व्यतीत करने के पश्चात रूस समर्थक हो गये थे. अमेरिकी सेनाओं ने इटली में सभी फासिस्टों की संपत्ति को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था.

सोनिया का ओरबासानो में जन्म नहीं हुआ, जैसा कि उनके बायोडाटा में घोषणा की गयी है. इस बायोडाटा को उन्होंने संसद में सासंद बनने के समय पर प्रस्तुत किया था, सत्य बात ये है कि उनका जन्म लुसियाना में हुआ. संभवतः वह इस स्थान को इसलिए छिपाने का प्रयास करती हैं जिससे कि उनके पिता के नाजी और मुसोलिनी संपर्कों का पता नहीं चल पाये और साथ ही ये भी उनके परिवार के संपर्क इटली के भूमिगत हो चुके नाजी फासिस्टों से युद्ध समाप्त होने तक बने रहे. लुसियाना नाजी फासिस्ट नेटवर्क का मुख्यालय था, ये इटली-स्विस सीमा पर था. इस अर्थ हीन झूठ का और कोई आशय नहीं हो सकता.

Contd.
 
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तीसरा सोनिया गांधी ने हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई कभी की ही नहीं, परन्तु रायबरेली से चुनाव लड़ने के समय उन्होंने अपने चुनाव नामांकन पत्र में उन्होंने ये असत्य हलफनामा दायर किया कि वो अंग्रेजी में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से डिप्लोमाधारी हैं. ये हलफनामा उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनावों के समय रायबरेली में रिटर्निंग ऑफिसर के सम्मुख प्रस्तुत किया था. इससे पहले 1989 में लोकसभा में अपने बायोग्राफिकल में भी उन्होंने अपने हस्ताक्षर के साथ यही बात लोकसभा के सचिवालय के सम्मुख भी प्रस्तुत की थी, जो कि दोषपूर्ण दावा था. तत्पश्चात लोकसभा स्पीकर को लिखे पत्र में उन्होंने इसे मानते हुए इसे टाइपिंग की त्रुटि बताया. सत्य बात ये है कि श्रीमती सोनिया गांधी ने कभी किसी कालेज में पढाई की ही नहीं. वह पढ़ाई के लिए गिवानो के कैथोलिक नन्स द्वारा संचालित स्कूल मारिया आसीलेट्रिस गईं, जो उनके कस्बे ओरबासानों से 15 किलोमीटर दूर था. उन दिनों निर्धनता के चलते इटली की लड़कियां इन मिशनरीज में जाती थीं और फिर किशोरवय में ब्रिटेन चली जाती जिससेवहां वो कोई छोटी-मोटी नौकरी कर सकें. मैनो उन दिनों निर्धन थे. सोनिया के पिता और माता की हैसियत अत्यंत मामूली थी और अब वो दो बिलियन पाउंड की अथाह संपत्ति के स्वामी हैं. इस प्रकार सोनिया ने लोकसभा में हलफनामे के माध्यम से दोषपूर्ण जानकारी देकर आपराधिक कार्य किया है, जिसके तहत न केवल उन पर अपराध का मुकदमा चलाया जा सकता है अपितु वो सांसद की सदस्यता से भी वंचित की जा सकती हैं. ये सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय की भावना का भी उल्लंघन है कि सभी प्रत्याशियों को हलफनामे के माध्यम से अपनी सही पढ़ाई-लिखाई से संबंधित योग्यता को प्रस्तुत करना आवश्यक है. इस प्रकार ये सोनिया गांधी के तीन झूठ हैं, जो उन्होंने छिपाने का प्रयास किया. कहीं ऐसा तो नहीं कि कतिपय कारणों से भारतीयों को मूर्ख बनाने के लिए उन्होंने ये सब किया. इन सबके पीछे उनके उद्देश्य कुछ अलग थे. अब हमें उनके बारे में और कुछ भी जानने की आवश्यकता है.

See Video : http://www.youtube.com/watch?v=SFMy44L9w28

सोनिया का भारत में पर्दार्पण :-

सोनिया गांधी ने इतनी इंग्लिश सीख ली थी कि वो कैम्ब्रिज टाउन के यूनिवर्सिटी रेस्टोरेंट में वैट्रेस बन गईं. वो राजीव गांधी से पहली बार तब मिलीं जब वो 1965 में रेस्टोरेंट में आये. राजीव यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट थे, परन्तु वो लंबे समय तक अपने पढ़ाई के साथ तालमेल नहीं बिठा पाये इसलिए उन्हें 1966 में लंदन भेज दिया गया, जहां उनका नामांकन इंपीरियल कालेज ऑफ इंजीनियरिंग में हुआ. सोनिया भी लंदन चली आईं. मेरी सूचना के अनुसार उन्हें लाहौर के एक व्यवसायी सलमान तासिर के आउटफिट में नौकरी मिल गई. तासीर की एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी का मुख्यालय दुबई में था परन्तु वो अपना अधिक समय लंदन में व्यतीत करता था. आईएसआई से जुडे होने के लिए उसकी ये प्रोफाइल आवश्यक थी.

स्वाभाविक तौर पर सोनिया इस नौकरी से इतना पैसा कमा लेती थीं कि राजीव को लोन फंड कर सकें. राजीव, मां इंदिरा गांधी द्वारा भारत से भेजे गये पैसों से कहीं अधिक पैसे व्यय कर देते थे. इंदिरा ने राजीव की इस आदत पर मेरे सामने भी 1965 में क्रोध प्रकट किया था जब मैं हार्वर्ड में इकोनामिक्स का प्रोफेसर था. श्रीमती इंदिरा गांधी ने मुझे ब्रेंनेडिस यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस में, जहां वो ठहरी थीं, व्यक्तिगत तौर पर चाय के लिए आमंत्रित किया. पीएन लेखी द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में प्रस्तुत किये गये राजीव के छोटे भाई संजय को लिखे गये पत्र में स्पष्ट रूप से संकेत दिया गया है कि वह वित्तीय रूप से सोनिया के बहुत ऋणी हो चुके थे और उन्होंने संजय से अनुरोध किया था, जो उन दिनों स्वयं ब्रिटेन में थे और बहुत पैसा उड़ा रहे थे और ऋण में आकंठ डूबे हुए थे.

उन दिनों सोनिया के मित्रों में केवल राजीव गांधी ही नहीं थे अपितु माधवराव सिंधिया भी थे. सिंधिया और एक स्टीगलर नाम का जर्मन युवक भी सोनिया के अच्छे मित्रों में थे. माधवराव की सोनिया से मित्रता राजीव की सोनिया से शादी के बाद भी जारी रही. 1972 में माधवराव आईआईटी दिल्ली के मुख्य गेट के पास एक एक्सीडेंट के शिकार हुए और उसमें उन्हें बुरी तरह चोटें आईं, ये रात दो बजे की बात है, उसी समय आईआईटी का एक छात्र बाहर था. उसने उन्हें कार से निकाल कर ऑटोरिक्शा में बिठाया और साथ में घायल सोनिया को श्रीमती इंदिरा गांधी के आवास पर भेजा जबकि माधवराव सिंधिया का पैर टूट चुका था और उन्हें इलाज की आवश्यकता थी. दिल्ली पुलिस ने उन्हें हॉस्पिटल तक पहुंचाया. दिल्ली पुलिस वहां तब पहुंची जब सोनिया वहां से जा चुकी थीं. बाद के सालों में माधवराव सिंधिया व्यक्तिगत तौर पर सोनिया के बड़े आलोचक बन गये थे और उन्होंने अपने कुछ निकट मित्रों से अपनी आशंकाओं के बारे में भी बताया था. कितना दुर्भाग्य है कि वो 2001 में एक विमान दुर्घटना में मारे गये. मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी उसी विमान से जाने वाले थे परन्तु उन्हें अंतिम क्षणों में फ्लाइट से न जाने को कहा गया. वो परिस्थितियां भी विवादों से भरी हैं जब राजीव ने ओरबासानो के चर्च में सोनिया से विवाह रचाया था, परन्तु ये प्राइवेट बातें है, इसका विवरण देना ठीक नहीं होगा. इंदिरा गांधी आरंभ में इस विवाह के अत्यंत विरूद्ध थीं, उसके कुछ कारण भी थे जो उन्हें बताये जा चुके थे. वो इस विवाह को हिन्दू रीतिरिवाजों से दिल्ली में पंजीकृत कराने की सहमति तब दी जब सोवियत समर्थक टी एन कौल ने इसके लिए उन्हें कंविंस किया, उन्होंने इंदिरा जी से कहा था कि ये विवाह भारत-सोवियत दोस्ती के वृहद इंटरेस्ट में श्रेष्ठ कदम सिद्ध हो सकती है. कौल ने भी तभी ऐसा किया जब सोवियत संघ ने उनसे ऐसा करने को कहा.

सोनिया के केजीबी कनेक्शन:-


बताया जाता है कि सोनिया के पिता के सोवियत समर्थक होने के बाद से सोवियत संघ का संरक्षण सोनिया और उनके परिवार को मिलता रहा. जब एक प्रधानमंत्री का पुत्र लंदन में एक लड़की के साथ डेटिंग कर रहा था, केजीबी जो भारत और सोवियत रिश्तों की विशेष ध्यान रखती थी, ने अपनी दृष्टि इस पर लगा दी, ये स्वाभाविक भी था, तब उन्हें पता लगा कि ये तो स्टेफनो की पुत्री है, जो उनका इटली का पुराना विश्वस्त सूत्र है. इस प्रकार केजीबी ने इस विवाह को हरी झंडी दे दी. इससे ज्ञात होता है कि केजीबी श्रीमती इंदिरा गांधी के घर में कितने अंदर तक घुसा हुआ था.
राजीव और सोनिया के सम्बन्ध सोवियत संघ के हित में भी थे, इसलिए उन्होंने इस पर कार्य भी किया. राजीव के विवाह के पश्चात मैनो परिवार को सोवियत संबंधों से विशेष लाभ भी हुआ. भारत के साथ सभी प्रकार के सोवियत सौदों, जिसमें रक्षा सौदे भी सम्मिलित थे, से उन्हें घूस के रूप में मोटी रकम मिलती रही. एक प्रतिष्ठित स्विस मैगजीन स्विट्जर इलेस्ट्रेटेड के अनुसार राजीव गांधी के स्विस बैंक अकाउंट में दो बिलियन पाउंड जमा थे, जो बाद में सोनिया के नाम हो गये. डॉ. येवगेनी अलबैट (पीएचडी , हार्वर्ड) जाने माने रूसी स्कॉलर और जर्नलिस्ट हैं तथा वो अगस्त 1981 में राष्ट्रपति येल्तिसिन द्वारा बनाये गये केजीबी कमीशन के सद्स्यों में भी थीं. उन्होंने समस्त केजीबी की गोपनीय फाइलें देखीं, जिसमें सौदों से संबंधित फाइलें भी थीं. उन्होंने अपनी पुस्तक "द स्टेट विदइन स्टेट – केजीबी इन द सोवियत यूनियन" में उन्होंने इस प्रकार की गोपनीय बातों के रिफरेंस नंबर तक दे दिये हैं, जिसे किसी भी भारतीय सरकार द्वारा क्रेमलिन से औपचारिक अनुरोध पर देखा जा सकता है.
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रूसी सरकार की 1982 में अल्बैटस से मीडिया के सामने ये सब उजागर करने पर भिङत भी हुई. उनकी बातों की सत्यता की पुष्टि रूस के आधिकारिक प्रवक्ता ने भी की. (ये हिन्दू 1982 में प्रकाशित हुई थी). प्रवक्ता ने इन वित्तीय भुगतानों की पैरवी करते हुए कहा था कि सोवियत हितों की दृष्टि से ये आवश्यक थे. इन भुगतानों में कुछ भाग मैनो परिवार के पास गया, जिससे उन्होंने कांग्रेस पार्टी की चुनावों में भी फंडिंग की.

1981 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो परिस्थितियां श्रीमती सोनिया गांधी के लिए परिवर्तित हो गयी. उनका संरक्षक देश 16 देशों में विभाजित हो गया. अब रूस वित्तीय रूप से खोखला हो चुका था तथा अव्यवस्थाएं अलग थीं. इसलिए श्रीमती सोनिया गांधी ने अपनी निष्ठाएं बदल लीं और किसी और कम्युनिस्ट देश के निकट हो गईं, जो रूस का विरोधी है. रूस के वर्तमान प्रधानमंत्री व इससे पहले वहां के राष्ट्रपति रहे पुतिन एक जमाने में केजीबी के बड़े अधिकारी थे. जब डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो रूस ने अपने करियर डिप्लोमेट राजदूत को नई दिल्ली से वापस बुला लिया और तुरंत उसके पद पर नये राजदूत को नियुक्त किया, जो नई दिल्ली में 1960 के दशक में केजीबी का स्टेशन चीफ हुआ करता था.

इस मामले में डॉ. अल्बैट्स का रहस्योदघाटन समझ में आता है कि नया राजदूत सोनिया के केजीबी के संपर्कों के बारे में श्रेष्ठ रूप से जानता था. वो सोनिया से स्थानीय संपर्क का काम कर सकता था. नई सरकार सोनिया के इशारों पर ही चलती है और उनके माध्यम से आने वाली रूसी मांगों को अनदेखा भी नहीं कर सकती. क्या इससे ये नहीं लगता कि ये भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक भी हो सकता है?

वर्ष 2001 में मैंने दिल्ली में एक रिट याचिका दायर की, जिसमें केजीबी डाक्यूमेंट्स की फोटोकापियां भी थीं और इसमें मैंने सीबीआई जांच की मांग की थी परन्तु वाजपेयी सरकार ने इसे निरस्त कर दिया. इससे पहले सीबीआई विभाग को देखने वाली गृह राज्य मंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने मेरे 3 मार्च 2001 के पत्र पर सीबीआई जांच का आदेश भी दे दिया था परन्तु इस मामले पर सोनिया और उनकी पार्टी ने संसद की कार्यवाही रोक दी. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने वसुधरा की जांच के आदेश को निरस्त कर दिया. मई 2002 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक दिशा निर्देश issue किया कि वो रूस से पता करे कि सत्यता क्या है? रुसियों ने ऐसी किसी पूछताछ का कोई उत्तर नहीं दिया किन्तु प्रश्न ये है कि किसने सीबीआई को इस मामले पर एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया था? वाजपेयी सरकार ने, पर क्यों? इसकी भी एक कहानी है. अब सोनिया ड्राइविंग सीट पर हैं और सीबीआई की स्वायत्ता लगभग समाप्त सी हो चुकी है.

सोनिया और भारत के कानूनों का हनन :-

सोनिया के राजीव से विवाह के पश्चात वह और उनके इतालवी परिवार को उनके दोस्त और स्नैम प्रोगैती के नई दिल्ली स्थित प्रतिनिधि आटोवियो क्वात्रोची से सहायता मिली. देखते ही देखते मैनो परिवार इटली में निर्धनता से उठकर बिलियोनायर हो गया. ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं था जिसे छोड़ा गया. 19 नवंबर 1964 को नये सांसद के तौर पर मैंने प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी से संसद में पूछा क्या उनकी बहू पब्लिक सेक्टर की इंश्योरेंस के लिए इंश्योरेंस एजेंट का काम करती है (ओरिएंट फायर एंड इंश्योरेंस) और वो भी प्रधानमंत्री हाउस के पते पर और उसके माध्यम से अपने प्रभाव का प्रयोग करके पीएमओ के अधिकारियों का इंश्योरेंस करती हैं? जबकि वो अभी इतालवी नागरिक ही हैं (ये फेरा के उल्लंघन का मामला भी था). संसद में हंगामा हो गया. कुछ दिनों के पश्चात एक लिखित उत्तर में उन्होंने इसे स्वीकार किया और कहा हां ऐसा हुआ था और ऐसा गलती से हुआ था परन्तु अब सोनिया गांधी ने इंश्योरेंस कंपनी से त्यागपत्र दे दिया है.

जनवरी 1970 में श्रीमती इंदिरा गांधी पुनः सत्ता में लौटीं और सोनिया ने पहला काम किया और ये था स्वयं को वोटर लिस्ट में सम्मिलित कराने का. ये नियमों और कानूनों का सरासर उल्लंघन था. इस आधार पर उनका वीसा भी निरस्त किया जा सकता था तब तक वो इतालवी नागरिक के रूप में कागजों में दर्ज थीं. जब मीडिया ने इस पर हल्ला मचाया तो मुख्य निर्वाचक अधिकारी ने उनका नाम 1972 में डिलीट कर दिया. परन्तु जनवरी 1973 में उन्होंने फिर से स्वयं को एक वोटर के रूप में दर्ज कराया जबकि वो अभी भी विदेशी ही थीं और उन्होंने पहली बार भारतीय नागरिकता के लिए अप्रैल 1973 में आवेदन किया था.
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सोनिया गांधी आधुनिक रॉबर्ट क्लाइव :-

मोटे रूप में कहा जा सकता है कि सोनिया गांधी भारतीय कानूनों का सम्मान नहीं करतीं. यदि कभी उन्हें किसी मामले में दोषपूर्ण पाया गया अथवा कठघरे में खडा किया गया तो वो सदैव इटली भाग सकती हैं. पेरू में राष्ट्रपति फूजीमोरी जो स्वयं को पेरू में जन्मे हुए बताते थे, जब भ्रष्टाचार के मामले में फंसे और उन पर अभियोग चलने लगा तो वो जापान दौड़ गये और जापानी नागरिकता के लिए दावा पेश कर दिया. 1977 में जब जनता पार्टी ने चुनावों में कांग्रेस को पराजित कियाऔर नई सरकार बनाई तो सोनिया अपने दोनों बच्चों के साथ नई दिल्ली के इतालवी दूतावास में भाग गईं और वहीं छिपी रहीं यहां तक कि इस अवसर पर उन्होंने इंदिरा गांधी को भी उस समय छोड़ दिया. ये बात अब कोई नई नहीं है अपितु कई बार प्रकाशित भी हो चुकी है.

राजीव गांधी उन दिनों सरकारी कर्मचारी (इंडियन एयरलाइंस में पायलट) थे. परन्तु वो भी सोनिया के साथ इस विदेशी दूतावास में छिपने के लिए चले गये. ये था सोनिया का उन पर प्रभाव. राजीव १९७८ में सोनिया के प्रभाव से बाहर निकल चुके थे परन्तु जब तक वो स्थितियों को समझ पाते तब तक उनकी हत्या हो चुकी थी. जो लोग राजीव के निकट हैं, वो जानते हैं कि वो 1981 के चुनावों के पश्चात सोनिया को लेकर कोई सही कदम उठाने वाले थे. उन्होंने सभी प्रकार के वित्तीय घोटालों और १९७८ के चुनावों में पराजय के लिए सोनिया को उत्तरदायी माना था.

मैं तो ये भी मानता हूं कि सोनिया के निकटस्थ लोग राजीव से घृणा करते थे. इस बात का उत्तर है कि राजीव के हत्यारों के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट के मृत्युदंड के निर्णय पर मर्सी पीटिशन की अपील राष्ट्रपति से की गई. ऐसा उन्होंने इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह के लिए क्यों नहीं किया अथवा धनंजय चट्टोपाध्याय के लिए नहीं किया?

वो लोग जो भारत से प्यार नहीं करते वो ही भारत के खजाने को बाहर ले जाने का काम करते हैं, जैसा मुहम्मद गौरी, नादिर शाह और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव ने किया था. ये कोई सीक्रेट नहीं रह गया है. परन्तु सोनिया गांधी तो उससे भी आगे निकलती हुई लग रही हैं. वो भारतीय खजाने को जबरदस्त तरीके से लूटती हुई लग रही हैं. जब इंदिरा गांधी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो एक भी दिन ऐसा नहीं हुआ जब क्रेट के क्रेट बहुमूल्य सामानों को बिना कस्टम जांच के नई दिल्ली अथवा चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से रोम न भेजा गया हो. सामान ले जाने के लिए एयर इंडिया और अलीटालिया को चुना जाता था. इसमें एंटिक के सामान, बहुमूल्य मूर्तियां, शॉल्स, आभूषण, पेंटिंग्स, सिक्के और भी न जाने कितने ही बहुमूल्य सामान होते थे.

ये सामान इटली में सोनिया की बहन अनुष्का उर्फ अलेक्सांद्रो मैनो विंसी की रिवोल्टा की दुकान एटनिका और ओरबासानो की दुकान गणपति पर डिसप्ले किया जाता था. परन्तु यहां उनकी बिक्री अधिक नहीं थी इसलिए इसे लंदन भेजा जाने लगा और सोठेबी और क्रिस्टी के माध्यम से बेचा जाने लगा. इस कमाई का एक भाग राहुल गांधी के वेस्टमिनिंस्टर बैंक और हांगकांग एंड शंघाई बैंक की लंदन स्थित शाखाओं में भी जमा किया गया. किन्तु अधिकतर पैसा गांधी परिवार के लिए काइमन आइलैंड के बैंक आफ अमेरिका में है. राहुल जब हार्वर्ड में थे तो उनकी एक वर्ष की फीस बैंक आफ अमेरिका काइमन आइलैंड से ही दी जाती थी.

मैं वाजपेई सरकार को इस बारे में बार-बार बताता रहा पर उन्हें विश्वास में नहीं ले सका, तब मैंने दिल्ली हाईकोर्ट में एक पीआईएल दायर की. कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई को इंटरपोल और इटली सरकार की सहायता लेकर जांच करने को कहा. इंटरपोल ने इन दोनों दुकानों की एक पूरी रिपोर्ट तैयार करके सीबीआई को भी दी , जिसे कोर्ट ने सीबीआई से मुझे दिखाने को भी कहा , परन्तु सीबीआई ने ऐसा कभी नहीं किया. सीबीआई का झूठ तब भी अदालत में सबके सामने आ चुका था जब उसने अलेक्सांद्रो मैनो का नाम एक व्यक्ति का बताया और विया बेलिनी 14, ओरबासानो को एक गांव का नाम बताया था जबकि मैनो के निवास की स्ट्रीट का पता था. अलबत्ता सीबीआई के वकील द्वारा इस गलती के लिए अदालत के सामने खेद प्रकट करना था परन्तु उसे नई सरकार द्वारा एडिशिनल सॉलिसीटर जनरल के पद पर प्रोमोट कर दिया गया.

स्वामी ने सोनिया को लपेटा :-


जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने अब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जद में कांग्रेस व यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी ले आए हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि पौने दो लाख करोड के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में 60 हजार करोड रुपए घूस बांटी गई जिसमें चार लोग भागीदार थे. इस घूस में सोनिया गांधी की दो बहनों का भाग 30-30 प्रतिशत है. 10 जनपथ को घोटाले का केंद्र बिंदु बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री सब कुछ जानते हुए भी मूक दर्शक बने रहे.

स्पेक्ट्रम मामले पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई से पहले अपने घर विश्राम करने देहरादून पहुंचे स्वामी ने पत्रकार वार्ता के दौरान २जी मामले में कांग्रेस नेतृत्व पर कई आरोप लगा स्वामी ने दावा किया कि इस घोटाले में घूस के तौर पर वितरित किये गए 60 हजार करोड़ रुपये का दस प्रतिशत भाग पूर्व संचार मंत्री ए राजा को गया. 30 प्रतिशत भागीदारी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि को और 30-30 प्रतिशत भागीदारी सोनिया गांधी की दो बहनों नाडिया और अनुष्का को गया है. हालांकि इसके कोई दस्तावेजी प्रमाण उन्होंने उपलब्ध नहीं कराए. स्वामी ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि अमेरिका से स्पेक्ट्रम मामले में हुए लेनदेन का रिकार्ड भी मंगाया जाए. साथ ही उन्होंने पूर्व मंत्री ए राजा की सुरक्षा की मांग भी प्रधानमंत्री से की है. उनका कहना था कि ए राजा की सबसे अच्छी सुरक्षा तभी हो सकती है जब वो जेल में हों अथवा उन्हें हाउस अरेस्ट किया जाए।

स्वामी ने राजा की सुरक्षा को लेकर लिखी चिठ्ठी के उत्तर में प्रधानमंत्री की ओर से आए पत्र को भी सार्वजनिक किया. इस पत्र में कहा गया है कि ए राजा को उचच स्तरीय सुरक्षा दी जा रही है और स्पेक्ट्रम डील के बैंक रिकॉर्ड की जानकारी के लिए अमेरिका सरकार से कहा जा रहा है. ए राजा की चिंता का कारण पूछे जाने पर स्वामी ने कहा कि इस महाघोटाले की सारी जानकारी राजा के पास है. इस मामले में अरब देशों के अंडरवर्ल्ड के लोग भी सम्मिलित हैं. राजा की हत्या कर वे सबूत मिटाना चाहेंगे. उन्होंने भ्रष्टाचार के विरूद्ध बाबा रामदेव की मुहिम में सहयोग करने पर भी स्वयं को तैयार बताया.
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स्वामी रामदेव का अनशन टूटने के पश्चात सुब्रनियम स्वामी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिसे किसी भी चेनल ने नहीं दिखाया परन्तु स्टार चेनल ने इसको दिखाया उसके तुरंत पश्चात इस वीडीयो को 'यू ट्यूब' से हटा दिया गया क्यों ? किसी और चेनल ने इस वीडियो को क्यों नहीं दिखाया?वास्तव में ये सब स्विस बैंक गये थे 8 जून से 15 जून तक ये सब अपने पैसे निकालकर इटली मे डाल कर आ गये उस समय 'शेयर मार्किट' का हाल और स्विस बैंक मे से 15 लाख करोड़ का निकल जाना अपने आप मे एक सत्य है सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी-वढेरा एवं उसके पति श्री वढेरा की नामी-बेनामी संपत्ति की पूरी जांच आवश्यक है. यह जांच किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी के माध्यम से ही कराया जाना चाहिए, क्योंकि सरकारी जांच एजेंसियां सोनिया गांधी के इशारे पर ही काम किया करती हैं. यह और बात है कि २ जी महा-घोटाले की जांच हो रही है, परन्तु यह विपक्ष के दबाव और सर्वोच्च अदालत के आदेश पर की जा रही है. बहरहाल, सोनिया परिवार की संपत्ति की जांच के लिए विपक्ष को जोरदार मांग करनी चाहिए. अब तक विपक्ष ने यह मांग क्यों नहीं की? यह आश्चर्य की बात है. सोनिया के इटली के सभी सम्बन्धियों की संपत्ति की भी जांच होनी चाहिए. पिछले कुछ वर्षों में सोनिया के इटली के सम्बन्धियों की संपत्ति में कितनी वृद्धि हुई है तथा किन स्रोतों से हुई है, यह जानना भारत की आम जनता के लिए बहुत आवश्यक है. Rudresh @smartrudra के अनुसार ""Aga Khan had sold islands off Sardinia in Italy to Sonia's sisters -worth $10b for $4b. make swamy tweets trends." अर्थात सोनिया की बहन को आगा खान ने १० बिलियन डॉलर के द्वीप महज ४ बिलियन डॉलर में दे दिये. यह किसके इशारे पर हुआ? इसकी भी जांच होनी चाहिए !
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सोनिया गांधी की छवि लोगों में समझदार, निष्कपट और पद का मोह नहीं रखने वाली महिला की बने, इसके लिए पिछले कुछ वर्षों से कांग्रेस ने यह राजनीति बना रखी है कि जो बातें वह स्वयं नहीं कहना चाहती, उन्हें अपने पट्टों के जरिए कहलवा दिया जाए. इसमें विशेष रूप से यह ध्यान रखा जाता है कि इन बातों पर कोई टिप्पणी नहीं की जाए जब तक कोई सार्थक रणनीति तैयार नहीं हो जाए. इसके पश्चात वे मीडिया के सामने इस बात को जोर-शोर से प्रसारित करती है कि उसने इन नेताओं की जीभ पर नियंत्रण रखने की चेतावनी दी है एवं दूसरे ही दिन समाचार पत्रों में यही 'Head Line' बनती है. इससे ऐसा लगता है मानो सोनिया के अतिरिक्त सारे नेता घास खाते हों और उनके पास अक्ल नाम की कोई वस्तु नहीं है.

मीडिया में प्रकाशित दिग्विजय के आज के बयानों से इसका सुलभ ही अंदाजा लग रहा है, क्योंकि जैसे ही यह ज्ञात हुआ कि सोनिया गांधी वापस आ रही है, दिग्विजय ने अपनी वफादारी दिखाने के लिए न केवल बाबा रामदेव अपितु अन्ना के विरुद्ध भी ऊटपटांग बकवास करना प्रारंभ कर दिया है. अब जब सोनिया लौटेगी (मेरी तो हार्दिक इच्छा है कि ना ही लौटे, जहाँ है वहीँ रहे.) तो फिर मीडिया के सामने वही बातें दोहराई जाएंगी. यदि विश्वास ना हो तो बस उसके लौटने की प्रतीक्षा कर लें.
 
भाई दीपक सीधी सी बात सै छोरी सुथरी घणी थी उस टेम मैं, छोरे कै पसंद आगी आर दोनों प्रेम जाल मैं फंस गे फेर ब्याह होग्या. Rest is history.

सिंह साहब या सुथरी भी तो कोन्या फेर भी क्यूँ डूब्या ।
 
सिंह साहब या सुथरी भी तो कोन्या फेर भी क्यूँ डूब्या ।
" किसी ने कहा मजनू से की तेरी लैला काली , मजनू ने कहा की तेरी अंख न देखण वाली "
वेद बी चिट्टे ते कुरान बी चिट्टी विच स्याही रखती काली ,
गुलाम फरीदा जिथे अंख लगी ओथे फिर क्या गोरी ते क्या काली "
 
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