पश्चिमी उत्तर प्रदेश का विकास ना होने पर अजीत सिंह को कोसना कितना जायज?:
इसके लिए सबसे पहले इतिहास जानना जरूरी है: आपमें से जिसने भी वास्तविक हरियाणा का इतिहास जाना होगा या जानता होगा, वह भली-भांति जानता होगा कि सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से पहले आज का हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड, और उत्तरी राजस्थान का इलाका मिला के असली और वास्तविक हरियाणा हुआ करता था| कहीं बाबा शाहमल तोमर जी जैसे खापवीर, तो कहीं महाराजा नाहर सिंह जैसे जाट-नरेश तो कहीं गोहद-रोहतक-हिसार-अम्बाला-मेरठ की जनता सब कहीं आर्मी के विद्रोही नेतृत्व में तो कहीं खापों के नेतृत्व में तो कहीं हमारे राजाओं के नेतृत्व में सबने मिलके दिल्ली के चारों ओर ऐसा सुरक्षा कवच बनाया था कि अंग्रेजों को नानी याद आ गई थी दिल्ली में घुसते-घुसते|
कहते हैं यह नानी उनको इसलिए याद आई क्योंकि हरियाणा यानि खापलैंड के जाटों ने अंग्रेजों को इतिहास के सबसे कड़वे अनुभव करवाये| यह तो नेहरू के तिलकधारी दादा गंगाधर जैसे अंग्रेजों के चाटुकार नहीं होते तो राजा नाहर सिंह ने अंग्रेजों से संधि के जो सफ़ेद झंडे उठवा दिए थे वो उठे ही रहते और अंग्रेज शायद ही या कहो कि इतने सस्ते में तो दिल्ली पर कब्ज़ा नहीं कर पाते| खैर, विद्रोह दबाया गया और क्योंकि पूरे भारत में खापलैंड से ही उनको कड़ी चुनौती मिली तो अंग्रेजों ने भविष्य में खापलैंड यानि हरियाणा से कोई खतरा ना हो, इसलिए इसके चार टुकड़े कर दिए, एक आज का हरियाणा पंजाब में मिला दिया, दूसरा दक्षिणी हरियाणा राजस्थान में मिला दिया, तीसरी दिल्ली अपने पास रखी और चौथा आज का पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड उस वक्त के अवध में मिला दिया गया| कहते हैं कि यह बंटवारा इतना सख्त था कि अंग्रेजों ने एक बार को तो यमुना के दोनों ओर रिश्तों के होने तक पर भी प्रतिबंध लगा दिया था|
जब 1947 में देश की आज़ादी हुई तो उस वक्त इन चारों हिस्सों को फिर से एक करके, वही पुराने वाला हरियाणा वापिस एक करने की यमुना के दोनों ओर की जनता की मांग उठी, परन्तु यह कहानी सिरे न चढ़ सकी और हमारा वास्तविक हरियाणा आज चार से बढ़ के पांच हिस्सों में बिखरा पड़ा है|
1947 में इसको एक ना होने देने के आड़े आई, इलाहबाद के आगे के गंगा के घाटों के तिलकधारियों की दिल्ली पर पहुँच व् पकड़ बनाये रखने की मंशा, जो कि आज सत-प्रतिशत फलीभूत हो रही है| यह मांग बार-बार ना उठे, उसके लिए घाघ नेहरू ने जाटों की प्रसंशा में कह दिया कि दिल्ली के चारों ओर ऐसी कौम (यानि जाट) बसती है जो अगर चाहे तो रातों-रात में दिल्ली पर कब्ज़ा कर ले|" इसपे बदनसीबी यह हुई कि जाट मसीहा सर छोटूराम आज़ादी से दो साल पहले 1945 में चल बसे, वर्ना उनका तो मकसद ही जीवन का इस क्षेत्र को एक रखना था| और बड़े चौधरी यानि चरण सिंह जी उनको राष्ट्रीय स्तर के नेता बनते-बनते 1975-80 आ गया था|
और हम ठहरे भोले-भाले जाट, नेहरू के दो शब्दों में ऐसे आये कि वो कब 15 साल दिल्ली पर राज कर गया, किसी को पता ही नहीं लगा| इसलिए तो कहा जाता है कि जाट प्रसंशा का बड़ा भूखा होता है, और तिलकधारी और तराजूधारी बड़े अच्छे से जानते हैं कि कब जाट की प्रसंशा करनी है और कब इसकी पीठ में छुरा घोंपना है| जबकि असलियत यह है कि जाट की प्रसंशा करना ही उसकी पीठ में छुरा घोंपना है, जैसे कि आजकल तथाकथित कट्टर धर्मधारी, एक धर्म विशेष की एकता के नाम पर जाटों को उस धर्म का रक्षक बता के घोंप रहे हैं| और जो जाट इस मोहिनी जाल में फंसे हुए हैं, उनको इलेक्शन के बाद पता लगेगा कि जोनसे धर्म के तुम रक्षक बताये जा रहे थे, उसी धर्म के तुम कैसे इलेक्शन के बाद सबसे बड़े बोझ बताये जाओगे|
अब आता हूँ इस लेख के शीर्षक यानि चौधरी अजीत सिंह को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का विकास ना होने पर कोसना कितना जायज है:
जैसा कि इतिहास से आप जान ही गए होंगे कि हरियाणा को एक ना होने देने के पीछे असली दुश्मन कौन रहे हमारे| अब बात यहीं से जुड़ती है, कुछ इन तथ्यों में इस प्रकार:
1) उत्तर प्रदेश में कभी अजीत सिंह के नेतृत्व में कोई राज्य-सरकार ही नहीं बन पाई तो वह विकास के लिए ज्यादा कुछ क्या कर पाते?
2) आप सभी जाट बंधू जानते भी हो और पूरे देश में भी यह बात प्रचलित है कि कमाता तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश है पर उस कमाई पे पलता पूर्वी उत्तर प्रदेश भी है|
3) अब जैसे मैंने बताया कि गंगा के घाटों के तिलकधारियों व् तराजूधारियों का दिल्ली पे कब्ज़ा रहे इसलिए आजतक हरित प्रदेश नहीं बनने दिया इन्होनें और सारा पैसा सेण्टर से जो भी यू. पी. के नाम पर चलता है वह हरित प्रदेश में तो लगता ही नहीं कोई|
4) मायावती रही हो या मुलायम, दोनों जाट विरोधी हैं, तो स्टेट का पैसा/योजना हो या केंद्र से मिला हुआ, वो जाटबेल्ट में लगाएंगे क्यों?
5) अब जब तक राज्य में कोई जाट सरकार नहीं होगी, तब तक वो बागपत में पैसा लगाएगी क्यों? पिछले ढेड़ दशक से तो यहाँ कभी मुलायम तो कभी मायावती ही राज कर रहे हैं, वो अपनी दलित व् यादव राजनीति चमकाएं या बागपत व् जाटों को संभालें? इनसे पहले कुछ अर्से बीजेपी वाले भी मुख्यमंत्री रहे, तो वो जब आते हैं तो फिर वो तिलकधारी व् तराजूधारी राजनीती पे निकल लेते हैं तो बताओ ऐसे में जाटबेल्ट में विकास होगा भी तो कैसे?
जाट की इसी बदनसीबी पर तो कहा गया है कि "दो पाटन (एक पाट दलितों का व् दूसरा तिलकधारी और तराजूधारियों का) के बीच में साबुत बचा ना जाट"।
अब विकास चाहिए तो या तो आप जो भी मोदी-मोदी चिल्ला रहे हैं वो मोदी से हरित प्रदेश मांगो या फिर अजीत सिंह का साथ दो ताकि कम से कम और नहीं तो जाट रिजर्वेशन जैसे काम तो निकलते रहें कौम के और अजीत सिंह के हाथ मजबूत करके उन्हीं के जरिये उनपे और केंद्र सरकारों पे हरित प्रदेश के लिए आवाज तीव्र की जाए|
वर्ना आप लोग ही बता दो बीजेपी ने ना तो जाट किसान के लिए कोई वायदा किया है, ना हरित प्रदेश देने के वायदा किया है तो फिर इनके साथ क्या इन तिलकधारियों और तराजूधारियों को सिर्फ मुस्लिमों से बचाने हेतु लगे हुए हो? हाँ सही पकड़ा आप लोगों ने, ये तथाकथित कट्टरता वाले आप लोगों के साथ इसलिए नहीं आये हैं कि यह आपको अपने भाई मानते हैं, अपितु इसलिए आये हैं ताकि इनको कोई मुस्लिम पीटने आये तो जाट को ढाल बना के आगे अड़ा सकें और इस ढाल से ज्यादा पूछ भी नहीं है आपकी इनके यहाँ, यकीन नहीं होता हो तो इनकी सरकार बनने दो फिर देख लेना आप अगर मेरी बात को याद ना करो तो|
फिर भी मोदी का भूत ज्यादा ही पीछे पड़ा हुआ है तो कोई नी, कम से कम रालोद वालों की 8 सीटें छोड़ के बाकी 543-8=535 सीटें और भी हैं, वहाँ जितवा लो मोदी को, जितना जितवाना है| बाकी हरियाणा वाले जाट तो इतने बावले नहीं हो रहे मोदी के पीछे, आप पूर्वी हरियाणा (यानि हरित प्रदेश) के जाटों को ही पता नहीं कौन तिलकधारी घूंटी गिटका गया| खैर उतर जायेगी यह गिटकी हुई भी, जब यही मोदी की पार्टी वाले जो आपसे वोट लेने के लिए आज आपको कौम-धर्म का रक्षक बता रहे हैं, कल जब सरकार बनने पर यही आपको देश का सबसे बड़ा परजीवी यानि बोझ बताएँगे, तब उतर जायेगी|
जय दादा नगर खेड़ा - जय बाबा भूमिया - जय दादा बड़ा बीर - जय दादा बैय्या!
- पगड़ी संभाल जट्टा, दुश्मन पहचान जट्टा| - fbp11