On the eve of voting day, I got remind of this poem with message:
"सियार-गिद्द मंडरा रहे":
सियार-गिद्द मंडरा रहे, सौहार्द की खाई बढ़ा रहे।
क्या जाट-मुस्लिम एकता के, फिर से दिन होंगे हरे?
कारोबार तुम्हारे उजड़ रहे, इनको क्या अड़चन रे,
दमालो वाली आग लगा वन में, दूर जा खड़े हुए।
ट्रेक्टर-ट्राले जले कहीं तो, कहीं स्वों के शव सड़े,
जितना तुम लड़ते रहे, इनके कारोबार बढ़ते रहे॥
MNCs के माल बिकेंगे, तुम्हारे चूल्हे-बर्तन बिकें रे|
क्या जाट-मुस्लिम एकता के, फिर से दिन होंगे हरे?
हिन्दू-हिंदुत्व के खेल में, मत उजाड़ो दिलों के मेले,
कट्टरता विनाश की राही, ये आडम्बर-पाखंडों के रेले।
फिर कोई आडवाणी ले मंदिर काख में, सजदे जिन्ना को करेगा,
जड़ नहीं इनकी अपनी, तुम्हारे जख्म क्या ख़ाक भरेगा?
भावनाओं पे मत चढना, ये भावनाओं को ही रोंदे रे|
क्या जाट-मुस्लिम एकता के, फिर से दिन होंगे हरे?
कहीं व्यापारी बैठ के हंस रहा, कहीं मीडिया ताने कस रहा|
पहले से ही दुश्मन थे ये, अब तो मौका स्वत: ही मिल गया।
हुआ सो हुआ, गुस्सा तुम्हारा था, पर सियार क्यूँ चढ़ने दिया,
मैदान छिड़ा असली जब, पदचाप भी ना जिसका दिखाई दिया|
रंग-रहबर सब उठा ले जायेंगे, खाल तुम्हारी बेचें रे|
क्या जाट-मुस्लिम एकता के, फिर से दिन होंगे हरे?
मुस्लिम हो-इंटरनेशनल हो, पर नेशनल तो फिर भी हो,
बहादुरशाह ने जो राह दिखाई थी, उससे क्यों विचलित हो?
छोटू-चरण-टिकैत के भाईचारे की लो से, प्रज्वलित तो हो?
गंगा-जमुना सी मिठास नहीं जग में, फिर क्यों उद्वेलित हो?
धुंए तुम्हारे चूल्हों के फिर, कब एक बादल बन बरसे रे?
क्या जाट-मुस्लिम एकता के, फिर से दिन होंगे हरे?
खेल भारी है तुम्हारे पर, सियार-गिद्द मंडरा रहे,
कमाई कैसे लूटें तुम्हारी, धर्म के ठेकेदार विचरा रहे।
मानसिक गुलामी घर करवाएं कैसे, इसके रस्ते बतिया रहे,
कट्टरता पे मत चलना कभी, बुजुर्ग तुम्हारे यही फरमाए रहे|
'फुल्ले भगत' टीस लग रही, क्या तेरे रहे राह रे|
क्या जाट-मुस्लिम एकता के, फिर से दिन होंगे हरे?
सियार-गिद्द मंडरा रहे, सौहार्द की खाई बढ़ा रहे।
क्या जाट-मुस्लिम एकता के, फिर से दिन होंगे हरे?
शब्दावली:
सियार-गिद्द: मुज़फ्फरनगर की पंचायतों के मंच से कट्टरता पे बोलने वाले
छोटू-चरण-टिकैत: रहबरे हिन्द सर छोटू राम, चौधरी चरण सिंह एवं बाबा महेन्द्र सिंह टिकैत
Writer: Phool Kumar Malik