Sanskrit – the Divine Language

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dndeswal

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देववाणी संस्कृत

संस्कृत भाषा के बारे में जितना लिखूं, उतना ही कम । मैं स्वयं भी यूनिवर्सिटी में संस्कृत पढ़ा हूं, हालांकि आजकल कुछ ‘आउट-आफ-टच’ हूँ । कालेज में एक वार्षिक पत्रिका निकलती थी, जिसके इंग्लिश सैक्शन का संपादक मैं रहा था । मेरे साथी चिढ़ाते थे - लते लतानि, संस्कृत ना आनी । मैं कह देता कि ना आनी तै ना सही, सुसरी अंग्रेजी तो साथ है ही । संस्कृत में आनर्स किया पर बेशक रोटी-रोजी तो अंग्रेजी के कारण ही चल रही है । फिर भी, पूरी तरह ‘आउट आफ टच’ होने का सवाल नहीं है, पढ़ता रहता हूं । जो आत्मिक शान्ति इसे पढ़कर मिलती है उसके सामने तो दुनिया के सारे सुख एक तरफ ।

हमने सभी ने वाल्मीकी रामायण का नाम सुना ही है, पढ़ी तो बहुत कम लोगों ने है । उसका एक अध्याय मेरे कोर्स में था । वाल्मीकी को ‘आदि कवि’ यूं ही नहीं कहा जाता, वे थे ही । ऐसा कहा जाता है कि सबसे पहली कविता की लाइन उनके मुंह से ही निकली थी । ऋषि वाल्मीकि नदी किनारे संघ्या में मग्न थे और फिर देखा कि दो क्रौंच पक्षी (बत्तखें) पानी में कलोल कर रहे हैं । इतने में एक शिकारी ने तीर चलाया और एक पक्षी को जा लगा - दूसरा विलाप करने लगा । ऋषि के मुंह से यह शाप-वाक्य निकला जिसे पहली कविता कहा जाता है :

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वतीशमा:।
यत्क्रौंचमिथुनं एकमवधी काममोहितम् ॥

- "हे निषाद (शिकारी), तुम्हें सौ वर्ष तक शान्ति न मिले क्योंकि तुमने क्रौंच के जोड़े में से एक पक्षी को मार दिया जो कि काम-क्रीडा कर रहे थे"।

ज्यादा समय नहीं हुआ - कुल एक हजार साल पहले की बात है । यूरोप के लोग जंगली थे, लोहे का भी ज्ञान न था उनको, और भारत में सोने-चांदी के भंडार थे । वे सर्दी में मरते रहते थे, महीनों तक नहा नहीं पाते थे, चमड़ी सफेद हो जाती थी और बदबू फैल जाती थी । इसी बदबू को दूर करने का नुस्खा निकाला - फूलों का इत्र (परफ्यूम) । हमारे यहां तो नहाने-धोने के साथ ही दिनचर्या शुरू होती है । दुनिया हैरान थी कि यह देश सोने की चिड़िया बना कैसे । उसके बाद हालात बदलते गए ।

भाषा का आविष्कार इतिहास की प्राचीनतम घटना है । मनुष्य की सामूहिकता के कारण बोली आई, लिखित भाषा बाद में । फिर सभ्यता आई । संस्कृत से ही संस्कृति बनी । जिस भाषा का संस्कार हो गया हो, उसे 'संस्कृत' कहते हैं । विदेशी लोग पहले भी भारत घूमने आते थे । संस्कृत का एक छोटा सा शब्द 'म्लेच्छ' ही उन पर भारी पड़ता था - इसका अर्थ है "मैल से लिपटे हुए" - हमारे पूर्वज विदेशियों को म्लेच्छ कहते थे । विदेशों में नहाने धोने का रिवाज पहले कम ही था, और वे थे ही मैले-कुचेले । हमारे रीत-रिवाज अब उन्होंने अपना लिये हैं और काफी सुधर गए हैं ।

अंग्रेजों ने आकर सबसे पहले हमारी भाषा और संस्कृति को खत्म करने का काम शुरू किया । शुरू-शुरू में कामयाबी नहीं मिली पर अब उसका असर हो रहा है । Lord Macaulay ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश पार्लियामेंट में अपने भाषण में कहा :

“I have travelled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is a beggar, who is a thief. Such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such calibre that I do not think that we would ever conquer this country unless we break the very backbone of this nation which is her spiritual and cultural heritage. Therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture. For, if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self-esteem, their native culture – and they will become what we want them – a truly dominated nation.”

इससे पहले 1784 में वारेन हेस्टिंग्स के संरक्षण में कलकत्ता में एशियाटिक सोसाइटी स्थापित हो चुकी थी । उसके अध्यक्ष जोन्स ने लिखा था - There are obstacles in the way of spreading Christianity in India through Roman Church. To overcome these, we would have to adopt a three-tier approach - To destroy Indian religion, spoil and malign its ancient history and to reduce the high status of Sanskrit language".

...continued
 
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Sanskrit-II

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बाद में इस सोसाइटी ने एक संस्कृत के जर्मन विद्वान मैक्समूलर को ईस्ट इंडिया कंपनी में 1847 में नौकरी दिलवाई । मैक्समूलर के कुछ पत्रों का संग्रह प्रकाशित हुआ है, उनको पढ़ने से इस षड्यंत्र का पर्दाफाश होता है । 9 दिसंबर 1867 को उसने अपनी मां को लिखे एक पत्र में लिखा – “मुझे ईसाइयत को भारत में जल्दी से जल्दी पनपा देना है ताकि भारतीयों का धर्म सदा के लिए नष्ट हो जाये । हो सकता है कि मैं यह सब देखने के लिए जिन्दा नहीं रहूं पर मुझे आशा है कि वेदों का यह संस्करण जिसका मैं अनुवाद कर रहा हूं इससे हिन्दुओं की वेदों और अपने धर्म की जो श्रद्धा हजारों साल से है, उसे मैं उखाड़ने में सफल हो जाऊंगा और इससे मुझे अपार संतोष मिलेगा ।"

कलकत्ता के एक संस्कृत विद्वान तारानाथ को 1866 में दस हजार रुपये की रिश्वत दी गई - जो आज के अनुसार 20-25 लाख रुपये के बराबर है । तारानाथ ने ‘वाचस्पतयम’ नाम से संस्कृत का एक शब्दकोश (dictionary) लिखा जो मैक्समूलर के वेदों के अनुवाद के अर्थों से मेल खाता था। ‘गोघ्न’ का अर्थ लिखा ‘गऊहत्या’ और ‘अश्वमेध’ का अर्थ लिखा - घोड़े की बलि चढ़ाना । इस शब्दकोश ने देश के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान को ग्रसने का अपवित्र काम किया - यही सब कुछ अंग्रेज चाहते थे । मुसलमान हमलावर हमारा जो नुकसान सात सौ साल में भी न कर सके, वह अंग्रेजों ने सौ साल में ही कर दिया ।

पर एक चमत्कार जरूर हुआ । 1824 में स्वामी दयानन्द का जन्म हुआ और 1875 में उन्होंने आर्यसमाज की स्थापना की – 1883 में उनका देहान्त हुआ । स्वामीजी के कारण अंग्रेजों की चाल को जबरदस्त धक्का लगा । क्रिश्चियन स्कूलों का मुकाबला करने के लिए गुरुकुल खोले गए तथा डी-ए-वी स्कूल स्थापित हुए । स्वामी श्रद्धानन्द ने शुद्धि आंदोलन चलाया और कुछ मुसलमानों को फिर हिन्दूधर्म में दीक्षा दी । उन्होंने (स्वामी श्रद्धानन्द ने) ही गांधी जी को ‘महात्मा’ का खिताब दिया, पहले उनको ‘मिस्टर गांधी’ कहा जाता था । संस्कृत का गौरव फिर लौट आया । इतने थोड़े समय में स्वामीजी ने जो कुछ किया उसकी मिशाल मिलना मुश्किल है । स्वामी दयानन्द को मुसलमानों ने जहर दिया और श्रद्धानन्द को गोली मार दी । पर कारवां रुका नहीं । बाद में करनाल क्षेत्र में स्वामी रामेश्वरानन्द और झज्जर में स्वामी ओमानन्द ने इस काम को जारी रखा और संस्कृत को बचाने के लिए संघर्ष करते रहे ।

संस्कृत पर हमला आज भी जारी है । इस समय मैं जेनेवा में बैठा हूं । WTO का मुख्यालय भी यहां है और ईसाई चर्च का भी (International Council of Churches). पश्चिमी देशों की कंपनियां चर्च को धन दे रही हैं ताकि भारत की संस्कृत या संस्कृति को मिटाया जा सके । काफी पैसा है कंपनियों के पास - थोड़ा धर्म-पुण्य में लग जायेगा तो क्या फर्क पड़ता है ? वैसे यूरोप का आम आदमी तो पढ़-लिख कर काफी समझदार हो गया है, पहले की तरह अंधविश्वासी नहीं रहा - चर्च में जाता नहीं और पोप के बहकावे में आकर उसे दान-दक्षिणा नहीं देता । इसलिए चर्च खतरे में है और उसने कंपनियों के आगे झोली फैलानी शुरु कर दी है और अपना रुख हमारी तरफ मोड़ दिया है । पहले मदर टेरेसा के मिशन को काफी पैसा दिया, उसे नोबेल पुरस्कार से भी नवाजा । यही काम दूसरी संस्थायें भी कर रही हैं पर उनका तो वे नाम भी नहीं लेते । आसाम, नागालैंड, मणिपुर आदि में तो चर्च को काफी कामयाबी मिली है, ऐसे ही चलता रहा तो वह इलाका भारत से अलग हो सकता है - आग तो सुलग ही रही है, ईसाई मिशनरियां उसे हवा दे रही हैं ।


...continued
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Sanskrit-III

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आज सभी भाषाओं की जननी दिव्य (divine) संस्कृत अपने ही देश में खतरे में है । पिछले दिनों उत्तरप्रदेश के राज्यपाल टी. वी. राजेश्वर राव ने वाराणसी में संस्कृत विश्वविद्यालय में ही उसकी आलोचना की । कहने लगे कि इससे आज के जमाने में रोटी रोजी नहीं मिलती, इसलिए इसको पढ़ने का कोई फायदा नहीं । छात्र भड़क गए और राव साहब को पुलिस ने बचाया । अगर हिन्दी और संस्कृत से रोटी-रोजी नहीं मिलती तो राज्य का कर्तव्य है कि इस दिशा में काम किया जाये । पर हो रहा है उल्टा । पहली क्लास से ही अंग्रेजी शुरू । स्कूल में हिन्दी बोलने पर बच्चों की पिटाई हो रही है । विदेशी कंपनियां कह रही हैं - तुम्हारी हिन्दी-संस्कृत बेकार हैं, न रोटी देती हैं और न रोजी । अंग्रेजी पढ़ो, उसी में सोचो । खेती करने और गाय-भैंस पालने में क्या रखा है ? हमारी कंपनियों में नौकरी करो, पैकेट बंद घी-दूध वालमार्ट से खरीद लो, घर में चूल्हा फूकने की बजाय मैकडानल्ड में पीजा-बर्गर खाओ ।

अंग्रेजों के राज्य में गोरे लोग हिन्दी या कोई दूसरी भाषा सीखते थे, अब वे क्यूं सीखें जब खुद तुमने ही उसे त्याग दिया है ? सुबह-सुबह टाई पहना कर बच्चों को कान्वेंट भेजा जाता है - बेशक हमारे देश की गर्म जलवायु में टाई की कोई जरूरत ही नहीं है । हरयाणा में ही कई प्राइवेट स्कूलों के मेन-गेट पर मैने क्रास का निशान देखा है, नाम भी ईसाइयों वाले - होली क्रास स्कूल, जीसस-मेरी कान्वेंट, सेक्रेड हार्ट स्कूल वगैरा-वगैरा ! मास्टरों से पूछा तो बोले अजी यह तो मालिक की मर्जी है - बिना ऐसे नाम रखे हमारे स्कूल में दाखिला कौन दिलायेगा ? सुबह-सुबह वहां “प्रेयर” होती है - Mary मेरी यशोमती मैया, Jesus मेरा कृष्ण-कन्हैया ! आधे ईसाई तो हमारे बच्चे हो ही चुके हैं। मेरे एक दोस्त अपने लड़के से घर में भी अंग्रेजी में बात करते हैं । मैने पूछा तो जवाब दिया कि ऐसा नहीं होगा तो यह आई-ए-एस कैसे बनेगा !

भाई वाह, हद हो गई । मैं इस बात के लिए बंगालियों और मद्रासियों की बहुत तारीफ करता हूं । वे अपने बच्चों को इंगलिश पढ़ाते हैं पर घर में हमेशा अपनी ही भाषा में बात करते हैं । यही बात गुजरातियों पर लागू होती है । अंग्रेज पहले मद्रास और कलकत्ता में ही आये थे पर वहां उनकी जड़ें इतनी नहीं जमी - हमारे जाटलैंड में तो वे बहुत बाद में आये । 1905 में बंगाल के दो टुकड़े करने की साजिश रची गई थी जिसे ‘बंगभंग’ कहते हैं, पर बंगालियों ने उसे कामयाब नहीं होने दिया । पर 1947 में अंग्रेजों की चाल कामयाब हो गई - आज बंगलादेश मौजूद है । कोई पूछो बंगालियों और मद्रासियों में आई-ए-एस ज्यादा निकले हैं या पंजाबियों और जाटों में ? वे तो अपनी भाषा से इतना प्यार करते हैं और तुम बच्चों को हिन्दी बोलने पर स्कूलों में उनकी पिटाई करवाते हो ।

कंप्यूटर का जमाना है - नई-नई खोजें हो रही हैं और साबित हो गया है कि कंप्यूटर प्रयोग के लिए संस्कृत से बढिया भाषा कोई नहीं - voice recognition में जितनी आसानी से कंप्यूटर संस्कृत को पहचानता है उतना दूसरी आवाज को नहीं । योगविद्या भारत से निकली, आज दुनियां फायदा उठा रही है । संस्कृत भी भारत की देन है - दुनिया इसका फायदा उठाने वाली है । कहीं ऐसा न हो कि बिल गेट इसका पेटेंट करवा ले और तुम हाथ मलते रह जाओ ।

लेख लंबा हो गया है, बस महाभारत के एक श्लोक के साथ समापन करता हूं -

न त्वहं कामये राज्यं, न मोक्षं न पुनर्भवम् ।
कामये दु:खतप्तानां प्राणिनामार्ति नाशनम् ॥

[ हे प्रभु, मैं अपने लिए कुछ नहीं चाहता - न मुझे राजपाट, न मोक्ष और न एक अच्छा पुनर्जन्म चाहिए । मेरी बस एक कामना है कि दुखों से पीड़ित प्राणियों के दुख-दर्द मिट जायें ]
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Very Nice Sir jee

Bhoot achaa likha hai apne sir jee sanskrit ke bare me, vastav me sanskrit ka gan hee aslee gyan hai. Hamari sare poorane granth sanskrit me hai or jo sanskrit jante hai we valmiki ramayan pad sakte hai or jo baat valmiki ramayan me hai vo kisi me nahi hai.

Parantoo sir jee aaj ham hindi bolte hooe hee sharmate hai sanskrit kee baat to bhoot door hai. Apnee Matr Bhasha jo apnane se log darte hai. Yaha Jatland par hee dekh lijiye har member english me hee bolna chahta hai chahe char line likhne ke liye dictionary bar bar dekheni pade.

netra.....
 
DND uncle aapne ek dum sahi likha hai....aajkal to sab angrej ho rakhe hein....hi! hello! dude! use karte hein ram ram, namaste bolte saram aati hai new generation ko! sab showoff mein vishwaas karne lag gaye hein....aapas mein bhi english mein baat karte hein!! this is really disappointing.....

Western countries India & Indian culture ke positivr traits ko apni lifestyle mein implement kar rehi hai aur India wale western culture ke negative traits and cheap showoff ko use karke proud feel kar rehi hai!!

Waise I believe Jats mein abhi bhi Indian culture bacha hai.....cuz they're downtoearth, desi and carry their pride Jatitude!!

baaki fellow Indians ko bera na akal kab aayegi....vo kehte hein na ki 100 mein se 100 beimaan fir bhi mera desh mahan!!

god save India!!


Rock on
Jit
 
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1824 में स्वामी दयानन्द का जन्म हुआ और 1875 में उन्होंने आर्यसमाज की स्थापना की – 1883 में उनका देहान्त हुआ । उन्होंने ही गांधी जी को ‘महात्मा’ का खिताब दिया, पहले उनको ‘मिस्टर गांधी’ कहा जाता था ।

Deshwal ji Namaskar ...

bahut aacha likhya aapne sanskrit er swami dayanand ji ke bare mein ... par ek sansya aaya mere man mein is uparlikhit baat ko padh ke ... ki dayanand ji ne kukar dharya Gandhi ka naam mahatma ... gandhi ne 1883 tahi te kime bhi na karya tha isa ek usne aadmi er wo bhi itna gyata ...itni badi upadhi de de ... law bhi 1890 ke aas paas poori kari er pher wo south africa gaya ... thoda prakash dalo iss pe ...
 
Deshwal ji Namaskar ...

bahut aacha likhya aapne sanskrit er swami dayanand ji ke bare mein ... par ek sansya aaya mere man mein is uparlikhit baat ko padh ke ... ki dayanand ji ne kukar dharya Gandhi ka naam mahatma ... gandhi ne 1883 tahi te kime bhi na karya tha isa ek usne aadmi er wo bhi itna gyata ...itni badi upadhi de de ... law bhi 1890 ke aas paas poori kari er pher wo south africa gaya ... thoda prakash dalo iss pe ...

धन्यवाद जीतू - आपने बीच वाला वाक्य अपने "quote" से हटा दिया है । गांधी जी को 'महात्मा' का दर्जा स्वामी दयानन्द ने नही, बल्कि स्वामी श्रद्धानन्द ने दिया था । मैने अब स्वामी श्रद्धानन्द के नाम को ब्रेकेट में लिख दिया है ।
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Sanskrit - Hindi Dictionary

DND ji,

Very Nice post.

Also I was looking for a Sanskrit - Hindi Dictionary.

Has someone got it in PDF format....or suggest me the name of good dictionary.

Many Thanks in advance,

Deepak
 
धन्यवाद जीतू - आपने बीच वाला वाक्य अपने "quote" से हटा दिया है । गांधी जी को 'महात्मा' का दर्जा स्वामी दयानन्द ने नही, बल्कि स्वामी श्रद्धानन्द ने दिया था । मैने अब स्वामी श्रद्धानन्द के नाम को ब्रेकेट में लिख दिया है ।
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dhokha lag gya tha deshwal ji ... dhanyavad sansya nivaran ke liye ...
 
संस्कृति और संस्कृत का नुकसान अंग्रेजों के जाने के बाद भी बदस्तूर जारी है । NCERT की किताबें स्कूलों में लगी हैं, उनमें पढ़ाया जा रहा है कि जाट लुटेरी कौम है, गुरू गोविंद सिंह भी एक लुटेरा था, अकबर महान था क्योंकि उसने हिन्दू युवतियों से शादी करके देश में एकता लाने का प्रयास किया । तिलक, लाजपत राय, अरविंद घोष उग्रवादी थे और भगत सिंह, सावरकर, हरदयाल, रामप्रसाद बिस्मिल, सुभाषचंद्र बोस और चन्द्रशेखर आजाद आतंकवादी थे । आर्य हमलावर थे, गाय का मांस भी खाते थे, वे भारत आकर बसे और 'द्रविड़' जाति को दक्षिण में धकेल दिया ! संस्कृत तो एक मृतभाषा (dead language) है, वेद जंगल में गाय चराने वाले गडरियों के गीत हैं । यही सब पढ़कर हमारे बच्चे संस्कृत और भारतीय संस्कृति से प्यार करेंगे या नफरत ? कभी-कभी तो ऐसे हालात बन जाते हैं कि जब माता-पिता बच्चों को यह बताते हैं कि उनको पढ़ाई जाने वाली बातें गलत हैं, तो वे लड़ने पर उतर आते हैं । पुराने साहित्य को विकृत किया गया और उससे नफरत करने की शिक्षा दी जा रही है - पढ़िये मेरा धागा -MANU – The Author of Human Code of Conduct.

असल में इतिहास वही लिखते हैं जो विजेता होते हैं । पहले मुसलमान यहां आये, कुछ राजाओं को हरा कर । उन्होंने अपने ढ़ंग से इतिहास लिखवाया । बाद में अंग्रेज आये, उन्होंने भी यही किया । जर्मन लोग भी इसी बात से दुखी हैं । दूसरे विश्व्युद्ध में जर्मनी की हार हुई और आज जो जर्मनी का इतिहास लिखा जा रहा है, उसमें इस बात पर ज्यादा ही जोर दिया जा रहा है कि नाजियों और हिटलर ने यहूदियों पर कितने जुल्म किये । यह सच जरूर है पर एक और सच भी जिसे अनदेखा किया जा रहा है । जर्मनी का सारा व्यापार यहूदियों के हाथों में था । पहले जैसे भारत में महाजन और सूदखोर आम किसान को लूटते थे, वैसे ही जर्मनी में यहूदी आम जनता को लूटते थे, उन्होंने कभी भी देश के हित को नहीं देखा, बस धन कमाना ही उनका उद्देश्य था, जैसा कि शेक्सपीयर ने अपने नाटक The Merchant of Venice में Shylock के बारे में लिखा है । एक गरीब घर का बच्चा हिटलर जब स्कूल में पढ़ता था तो यहूदी बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे, तभी हिटलर के मन में यहूदियों से नफरत हो गई । यह असलीयत दबा दी गई और हिटलर के अत्याचारों की कहानी खूब पढ़ाई जा रही है ।

विश्व के अनेक विद्वान संस्कृत के प्रति गहरी आस्था व्यक्त करते रहे हैं, सिर्फ इसलिए नहीं कि यह देववाणी कही जाती है, बल्कि इसलिए कि इसकी रचना पूरी तरह वैज्ञानिक है । पाणिनी की व्याकरण अब भी सर्वोत्तम मानी जाती है । गांधी जी ने अपने पुत्र हरिलाल गांधी को फ्रेंच की बजाय संस्कृत सीखने की सलाह दी थी । संस्कृत के थोड़े ज्ञान से ही व्यक्ति बुद्धिमान और विज्ञ हो जाता है तथा मांसाहार का त्याग करके शाकाहारी हो जाता है ।

...contd ..next post
 
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..contd from previous post

डा. पी.जी. सुब्बाराव ने Indian words in English" में ऐसे सैंकड़ों शब्दों की लिस्ट बनाई है जिनको अंग्रेजी ने अपनाया, जैसे दिव्यम् (Divine), नावी (Navy) काष्यू (cashew), सूप (soup) आदि । जाटलैंड के ही पेज हरयाणवी डिक्शनरी में ही मैने कुछ हरयाणवी शब्दों की व्याख्या की है जो कि संस्कृत से ही अपने असली रूप में आज भी मौजूद हैं । जैसे "समधी" शब्द संस्कृत का ही है । 'ताऊ' भी 'तात' का रूप है ।

सैम पित्रोदा और राजेश्वर राव जैसे लोगों के अनुसार अंग्रेजी रोजगार की भाषा है और संस्कृत-हिन्दी निकम्मी । कोई भाषा रोजगार नहीं देती - रोजगार देना राष्ट्र और राज्य का कर्तव्य है । हमारे संविधान में ही लिखा है कि हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना केन्द्र का दायित्व है । संस्कृत से शब्दों को चुनने का आदेश भी संविधान में दिया गया है । खुद नेहरू ने कहा था कि अंग्रेजी कितनी भी अच्छी हो पर हम उसे हमेशा अपनाये नहीं रख सकते क्यूंकि वह हमें अपनी गुलामी याद दिलाती रहेगी । पर हिन्दी आदि अपनाना तो दूर, उल्टे दफ्तरों में "हिन्दी सैक्शन" खोले गए हैं । खुद अपने ही देश में "हिन्दी सैक्शन" और "हिन्दी दिवस" ? भाई वाह ! क्या ब्रिटेन वाले कभी अपने यहां "इंगलिश सैक्शन" खोलेंगे ?

विजेताओं की भाषा भी उन जगहों पर फैल जाती है पर ज्यादा दिन तक टिकती नहीं है । फ्रैंच और पुर्तगाली अफ्रीका में फैली । दक्षिणी अफ्रीका के कुछ देशों में अंग्रेजी भी फैली । दक्षिण अमेरिका में स्पेनिश फैली । रूस में पहले फ्रैंच ही सरकारी भाषा (official language) थी, आज उसका नामोनिशान नहीं है । यहां तक कि ब्रिटेन में भी कोई पांच सौ साल पहले फ्रैंच में ही सरकारी काम होता था । पड़ौसी आयरलैंड में भी अंग्रेजी की जगह आयरिश भाषा अपनी जगह बना चुकी है । जिन जगहों पर स्थानीय भाषाई लोगों की तायदाद कम है वहां पर तो ये भाषायें चलती रह सकती हैं, पर बाकी जगह कमजोर पड़ती जा रही हैं । भारत में भी ऐसा ही होगा । हमारे यहां पहले फारसी खूब चली थी, पर आज उसका नामोनिशान नहीं है । बाद में उर्दू का भी यही हाल हुआ । इस बहम में मत रहो कि अंग्रेजी सदा चलती रहेगी । इसका भी बोरिया-बिस्तर बंधेगा, बेशक इसमें सौ साल और लग जायें । संस्कृत और दूसरी भारतीय भाषायें अपनी जड़ें और मजबूत करेंगी - आगे वाला समय इसका गवाह होगा ।
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Sir Chhotu Ram's love for Sanskrit

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In this thread of mine, I forgot to mention the fact that Sir Chhotu Ram was a great lover of Sanskrit, a fact unknown to most of us. In St. Stephens college, he studied Sanskrit, rather than English, the preferred subject of most fellow students from wealthy backgrounds. See Jatland Wiki page on Sir Chhotu Ram.
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आप जिये हज़ारो साल

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continued from previous post

न त्वहं कामये राज्यं, न मोक्षं न पुनर्भवम् ।
कामये दु:खतप्तानां प्राणिनामार्ति नाशनम् ॥

[ हे प्रभु, मैं अपने लिए कुछ नहीं चाहता - न मुझे राजपाट, न मोक्ष और न एक अच्छा पुनर्जन्म चाहिए । मेरी बस एक कामना है कि दुखों से पीड़ित प्राणियों के दुख-दर्द मिट जायें ]
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आप ने बहुत बडिया और उदाहरण दे कर लिखा है......आप तारिफ़े काबिल है । वाक्य ही संस्कृत भाषा के लिये जितना लिखो कम है जी।
आशा है आप आगे भी यू ही जाट लैंड को प्रकाश दिखाते रहेगें।
 
Are the Indo-european languages more advance or complex comparative whit other family languages? like sumerian,chinese,arab and any other?
I heard that vedic sanskrite is more flexible,while clasic sanskrite have perfect gramatical rules;the first artificial language.
 
Are the Indo-european languages more advance or complex comparative whit other family languages? like sumerian,chinese,arab and any other?
I heard that vedic sanskrite is more flexible,while clasic sanskrite have perfect gramatical rules;the first artificial language.

Hi Soka,

I dont know much about other languages but yes Vedic language or prakrit as it is sometimes called was very fluid. Grammar and structure was not there but none the less a beautiful language.

Vedas are not written in sanskrit but prakrit. Prakrit is a very natural language. It was widely spoken. Most languages have their roots in it.

Secondly Classic Sanskrit which you refer to came much later on. Word Sanskrit means cultured or refiined. It was perfected by scholars like panini and patanjali to name a few. They gave prakrit a structure and grammer.

Due to politics and agendas by the some classes, sanskrit was encouraged and prakrit was given less importance.

Saying that Sanskrit is still a beautiful language.

I hope this helps.
 
Hi Soka,

I dont know much about other languages but yes Vedic language or prakrit as it is sometimes called was very fluid. Grammar and structure was not there but none the less a beautiful language.

Vedas are not written in language.

I hope this helps.
Intersting.Id heard just the opused,that sanskrite came first and prakrite after it.
Anyway ,i was curios if prakrite,sanskrite or other indo-european languages(like greek)was in any way superior to other languages in the world.
 
Though every people feel that their culture is superior to others. But here I'd say that really Indo-european culture is superior. When Jats attacked China for the first time, Chinese described them as Monstrous, tall people having the nose like the beak of the bird. For them short stature and flat nose was the sign of beauty. Similarly in Africa the sign of beauty for a lady was who is blackest and fat.

Chinese, Egyptian, Latin American civilizations developed independently. While China developed its own style of language or picto-graphic script. This looks difficult to we people here in India but psychology says that a child whether born in India or China learns both the languages and scripts with equal speed.

But even then coming above all of these, even if I'm neutral, then I'd advocate the supremacy of Eurasian languages over other languages of the world. And supremacy of Sanskrit over other Eurasian languages.

Vedas sanskrit is not the same as that of Panini or Patanjali. The local vernacular Indo-european dialects in India came to be made systematic by various grammarians. The meaning of Sanskrit itself is systematic. And truly its the most systematic language of the world. Computer professionals in USA once thought of using Sanskrit in computer programming. They were amazed to see the limit of perfection in it. Swami Omanand, one Arya Samaji saint, advocated its use in organic chemistry, where nomenclature of various compounds is a problem.

Vedas Sanskrit however is not Gadariyon ke Geet (shephards songs). In those days when writing was not there, the best way to remember some important couplets was through poems because it makes you easy to remember a few lines. The very essence and birth of poetry in the world is for this purpose only. And perhaps poetry and dialogs (dohe, chutakle etc) exist in Indo-European languages only. Out of four, one full Veda, Samveda is written for it that tells how to sing and compose the couplets of Vedas. In fact in Vedas Poet and Charioter etc. were no less than a Doctor, Warrior etc.

Though Budha/Jaina literature and Asokas pillar inscriptions are mostly written in Prakrat/Pali etc. but by that Sanskrit does not loose its importance. It rather enhances the position of Sanskrit because they were written for common non-specialist illiterate people. Sanskrit used to be the court language of many Magadhan and Central/South Indian Jat rulers like Gupta Jats, whose period is known as the golden period of Indian history.
 
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संस्कृत शिक्षक सम्मेलन

संस्कृत के बल पर भारत फ़िर बनेगा विशव गुरु...
http://ind.jagran.com/news/citynews.aspx?id=3507031

दयान्नद जी आप की आवाज को आवाज देना शुरु कर दिया है समाज ने भी.......
लगे रहो जी.....
 
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Yes, DND ji is taking a lot of pain.


Narwal ji aa turraah bandh ke tte aap kati turram khan lag ryhe so. is bholi Jat kaum nne bhi tte kuchh turrah bandhna sikhao. udde nne sindh me in Jattan nne pagdi bandhan ki agya koni thi. Aa ek Raja Dahir hoya karta udde nne, Sindh me jis ne Muhammad bin kasim ka Raj karwaya tha, 712 AD me. Aa Jattan nne aa thare aali pagdi koni bandhan diya karta. Udde nne Jattan nne Kutta lle ke challnna padta tha. Kuchh utthan karo ji inka.
 
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Intersting.Id heard just the opused,that sanskrite came first and prakrite after it.
Anyway ,i was curios if prakrite,sanskrite or other indo-european languages(like greek)was in any way superior to other languages in the world.

Sanskrit came later...And its not the question of superior or inferior, everything has its place, relevence and beauty.

Most of european languages except Nordic certainly have influence from Prakrit/Sanskrit. This cannot be denied.
 
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