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(This post is in Devanagari script. If there is difficulty in reading the text, there is need to install ‘Mangal’ font)
देववाणी संस्कृत
संस्कृत भाषा के बारे में जितना लिखूं, उतना ही कम । मैं स्वयं भी यूनिवर्सिटी में संस्कृत पढ़ा हूं, हालांकि आजकल कुछ ‘आउट-आफ-टच’ हूँ । कालेज में एक वार्षिक पत्रिका निकलती थी, जिसके इंग्लिश सैक्शन का संपादक मैं रहा था । मेरे साथी चिढ़ाते थे - लते लतानि, संस्कृत ना आनी । मैं कह देता कि ना आनी तै ना सही, सुसरी अंग्रेजी तो साथ है ही । संस्कृत में आनर्स किया पर बेशक रोटी-रोजी तो अंग्रेजी के कारण ही चल रही है । फिर भी, पूरी तरह ‘आउट आफ टच’ होने का सवाल नहीं है, पढ़ता रहता हूं । जो आत्मिक शान्ति इसे पढ़कर मिलती है उसके सामने तो दुनिया के सारे सुख एक तरफ ।
हमने सभी ने वाल्मीकी रामायण का नाम सुना ही है, पढ़ी तो बहुत कम लोगों ने है । उसका एक अध्याय मेरे कोर्स में था । वाल्मीकी को ‘आदि कवि’ यूं ही नहीं कहा जाता, वे थे ही । ऐसा कहा जाता है कि सबसे पहली कविता की लाइन उनके मुंह से ही निकली थी । ऋषि वाल्मीकि नदी किनारे संघ्या में मग्न थे और फिर देखा कि दो क्रौंच पक्षी (बत्तखें) पानी में कलोल कर रहे हैं । इतने में एक शिकारी ने तीर चलाया और एक पक्षी को जा लगा - दूसरा विलाप करने लगा । ऋषि के मुंह से यह शाप-वाक्य निकला जिसे पहली कविता कहा जाता है :
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वतीशमा:।
यत्क्रौंचमिथुनं एकमवधी काममोहितम् ॥
- "हे निषाद (शिकारी), तुम्हें सौ वर्ष तक शान्ति न मिले क्योंकि तुमने क्रौंच के जोड़े में से एक पक्षी को मार दिया जो कि काम-क्रीडा कर रहे थे"।
ज्यादा समय नहीं हुआ - कुल एक हजार साल पहले की बात है । यूरोप के लोग जंगली थे, लोहे का भी ज्ञान न था उनको, और भारत में सोने-चांदी के भंडार थे । वे सर्दी में मरते रहते थे, महीनों तक नहा नहीं पाते थे, चमड़ी सफेद हो जाती थी और बदबू फैल जाती थी । इसी बदबू को दूर करने का नुस्खा निकाला - फूलों का इत्र (परफ्यूम) । हमारे यहां तो नहाने-धोने के साथ ही दिनचर्या शुरू होती है । दुनिया हैरान थी कि यह देश सोने की चिड़िया बना कैसे । उसके बाद हालात बदलते गए ।
भाषा का आविष्कार इतिहास की प्राचीनतम घटना है । मनुष्य की सामूहिकता के कारण बोली आई, लिखित भाषा बाद में । फिर सभ्यता आई । संस्कृत से ही संस्कृति बनी । जिस भाषा का संस्कार हो गया हो, उसे 'संस्कृत' कहते हैं । विदेशी लोग पहले भी भारत घूमने आते थे । संस्कृत का एक छोटा सा शब्द 'म्लेच्छ' ही उन पर भारी पड़ता था - इसका अर्थ है "मैल से लिपटे हुए" - हमारे पूर्वज विदेशियों को म्लेच्छ कहते थे । विदेशों में नहाने धोने का रिवाज पहले कम ही था, और वे थे ही मैले-कुचेले । हमारे रीत-रिवाज अब उन्होंने अपना लिये हैं और काफी सुधर गए हैं ।
अंग्रेजों ने आकर सबसे पहले हमारी भाषा और संस्कृति को खत्म करने का काम शुरू किया । शुरू-शुरू में कामयाबी नहीं मिली पर अब उसका असर हो रहा है । Lord Macaulay ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश पार्लियामेंट में अपने भाषण में कहा :
“I have travelled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is a beggar, who is a thief. Such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such calibre that I do not think that we would ever conquer this country unless we break the very backbone of this nation which is her spiritual and cultural heritage. Therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture. For, if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self-esteem, their native culture – and they will become what we want them – a truly dominated nation.”
इससे पहले 1784 में वारेन हेस्टिंग्स के संरक्षण में कलकत्ता में एशियाटिक सोसाइटी स्थापित हो चुकी थी । उसके अध्यक्ष जोन्स ने लिखा था - There are obstacles in the way of spreading Christianity in India through Roman Church. To overcome these, we would have to adopt a three-tier approach - To destroy Indian religion, spoil and malign its ancient history and to reduce the high status of Sanskrit language".
...continued
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देववाणी संस्कृत
संस्कृत भाषा के बारे में जितना लिखूं, उतना ही कम । मैं स्वयं भी यूनिवर्सिटी में संस्कृत पढ़ा हूं, हालांकि आजकल कुछ ‘आउट-आफ-टच’ हूँ । कालेज में एक वार्षिक पत्रिका निकलती थी, जिसके इंग्लिश सैक्शन का संपादक मैं रहा था । मेरे साथी चिढ़ाते थे - लते लतानि, संस्कृत ना आनी । मैं कह देता कि ना आनी तै ना सही, सुसरी अंग्रेजी तो साथ है ही । संस्कृत में आनर्स किया पर बेशक रोटी-रोजी तो अंग्रेजी के कारण ही चल रही है । फिर भी, पूरी तरह ‘आउट आफ टच’ होने का सवाल नहीं है, पढ़ता रहता हूं । जो आत्मिक शान्ति इसे पढ़कर मिलती है उसके सामने तो दुनिया के सारे सुख एक तरफ ।
हमने सभी ने वाल्मीकी रामायण का नाम सुना ही है, पढ़ी तो बहुत कम लोगों ने है । उसका एक अध्याय मेरे कोर्स में था । वाल्मीकी को ‘आदि कवि’ यूं ही नहीं कहा जाता, वे थे ही । ऐसा कहा जाता है कि सबसे पहली कविता की लाइन उनके मुंह से ही निकली थी । ऋषि वाल्मीकि नदी किनारे संघ्या में मग्न थे और फिर देखा कि दो क्रौंच पक्षी (बत्तखें) पानी में कलोल कर रहे हैं । इतने में एक शिकारी ने तीर चलाया और एक पक्षी को जा लगा - दूसरा विलाप करने लगा । ऋषि के मुंह से यह शाप-वाक्य निकला जिसे पहली कविता कहा जाता है :
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वतीशमा:।
यत्क्रौंचमिथुनं एकमवधी काममोहितम् ॥
- "हे निषाद (शिकारी), तुम्हें सौ वर्ष तक शान्ति न मिले क्योंकि तुमने क्रौंच के जोड़े में से एक पक्षी को मार दिया जो कि काम-क्रीडा कर रहे थे"।
ज्यादा समय नहीं हुआ - कुल एक हजार साल पहले की बात है । यूरोप के लोग जंगली थे, लोहे का भी ज्ञान न था उनको, और भारत में सोने-चांदी के भंडार थे । वे सर्दी में मरते रहते थे, महीनों तक नहा नहीं पाते थे, चमड़ी सफेद हो जाती थी और बदबू फैल जाती थी । इसी बदबू को दूर करने का नुस्खा निकाला - फूलों का इत्र (परफ्यूम) । हमारे यहां तो नहाने-धोने के साथ ही दिनचर्या शुरू होती है । दुनिया हैरान थी कि यह देश सोने की चिड़िया बना कैसे । उसके बाद हालात बदलते गए ।
भाषा का आविष्कार इतिहास की प्राचीनतम घटना है । मनुष्य की सामूहिकता के कारण बोली आई, लिखित भाषा बाद में । फिर सभ्यता आई । संस्कृत से ही संस्कृति बनी । जिस भाषा का संस्कार हो गया हो, उसे 'संस्कृत' कहते हैं । विदेशी लोग पहले भी भारत घूमने आते थे । संस्कृत का एक छोटा सा शब्द 'म्लेच्छ' ही उन पर भारी पड़ता था - इसका अर्थ है "मैल से लिपटे हुए" - हमारे पूर्वज विदेशियों को म्लेच्छ कहते थे । विदेशों में नहाने धोने का रिवाज पहले कम ही था, और वे थे ही मैले-कुचेले । हमारे रीत-रिवाज अब उन्होंने अपना लिये हैं और काफी सुधर गए हैं ।
अंग्रेजों ने आकर सबसे पहले हमारी भाषा और संस्कृति को खत्म करने का काम शुरू किया । शुरू-शुरू में कामयाबी नहीं मिली पर अब उसका असर हो रहा है । Lord Macaulay ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश पार्लियामेंट में अपने भाषण में कहा :
“I have travelled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is a beggar, who is a thief. Such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such calibre that I do not think that we would ever conquer this country unless we break the very backbone of this nation which is her spiritual and cultural heritage. Therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture. For, if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self-esteem, their native culture – and they will become what we want them – a truly dominated nation.”
इससे पहले 1784 में वारेन हेस्टिंग्स के संरक्षण में कलकत्ता में एशियाटिक सोसाइटी स्थापित हो चुकी थी । उसके अध्यक्ष जोन्स ने लिखा था - There are obstacles in the way of spreading Christianity in India through Roman Church. To overcome these, we would have to adopt a three-tier approach - To destroy Indian religion, spoil and malign its ancient history and to reduce the high status of Sanskrit language".
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