brahmtewatia
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आपकी उपरोक्त लेखनी से पूर्णत ज्ञात होता है की यह अर्ध सत्य नहीं, अपितु पूर्ण सत्य है. निस्संदेह व्यक्ति के जीर्णोद्धार की सारी सम्भावनाये तब तक समाप्त नहीं होती जब तक उसका अस्तित्व इस संसार में है.
प्रभु, कहाँ हैं आपके चरण
श्री श्री सुदीपाचार्य जी... आपको मेरा नतमस्तक प्रणाम !!!ब्रहम... आपकी निश्छल प्रशंसा के लिए में आपका आभारी हूँ, जैसे आपके लेखन से यह सपष्ट है की जीवन के सभी आयामों तथा पहलुओ का आनंद प्राप्त करने के लिए एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व का होना ही श्रेष्ठ है, मेरा ये कथन अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं होगा अगर में कहू " व्यक्ति के जिर्णोदार के सारी सम्भावनाये तब तक समाप्त नहीं होती जब तक उसका अस्तित्व इस संसार में है." जीवन के सभी पहलुओ का आनद उठाना ही जीवन को न सिर्फ प्रासंगिक बल्कि अर्थपूर्ण भी बनाता है शायद यही अर्ध सत्य है.
आपकी उपरोक्त लेखनी से पूर्णत ज्ञात होता है की यह अर्ध सत्य नहीं, अपितु पूर्ण सत्य है. निस्संदेह व्यक्ति के जीर्णोद्धार की सारी सम्भावनाये तब तक समाप्त नहीं होती जब तक उसका अस्तित्व इस संसार में है.
प्रभु, कहाँ हैं आपके चरण
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