माहरा हरयाणा ( हरयाणवी कविताये, रचनाये,गीत 

rana1

Member
माहरा हरयाणा ( हरयाणवी कविताये, रचनाये,गीत 

में कोशिश करूँगा के आपको हरयाणवी भाषा म कुछ नया पढ़ने को मिले ..हो सकता ह कॉपी पेस्ट भी हो ..त उसके लिए पुचड वाले बाबा जी से आशिरवाद की कामना करता हूँ ..आप सभी भी अपना योगदान दे ....और हा लेखक का नाम अगर किसी सजन को पता हो त जरुर अवगत कराये ....

जाट करै ना दोस्ती, जाट करै ना प्यार
जो साचा इंसान हो, वो-ए इसका यार ।

चुगलखोर और दुतेड़े दुश्मन इनके खास
चाहे पायां पड़े रहो, कोन्यां आवैं रास
जाट मोहब्बत का भूखा, प्यारा दे सै मार -
जो साचा इंसान हो, वो-ए इसका यार ।

अपनी औरत को भाळै, पीटै बेशक रोझ
पर और कोए कुछ बोल दे, मिटा दे उसका खोज
इसकी नफरत और प्रेम का पावै कोन्या पार -
जो साचा इंसान हो, वो-ए इसका यार ।

मुंह की अपनी काढ दे, जै कोए आवै मदद करण
मरौड़ कसूती सै धिखे, जिब्बै दे दे जान
जी मैं आवै वो-ए करैगा, कोन्यां मानै हार -
जो साचा इंसान हो, वो-ए इसका यार ।

ऊपर तैं जणूं पाथर हो, भीतर जणूं गुलाब
एक मिनट में साळा कह दे, चाहे साहमी हो नवाब !
इसकी माया न्यारी सै, यो लाम्बी करै उडार -
जो साचा इंसान हो, वो-ए इसका यार ।

भेल्ली दे दे, ना दे गंडा, इसका इसा मिजान
रूस ग्या तै रूस ग्या, कोन्यां जा मुंह-काण
भगवानां नै मान ली, कई बै इस तैं हार
जो साचा इंसान हो, वो-ए इसका यार ।

 
होली सुसराड़ की

मैं गया सुसराड़
नया
कुर्ता गाड़
दाढ़ी
बनवाई बाल रंग्वाए
रेहड़ी
पर ते संतरे तुलवाए
हाथ
मैं दो किलो फ्रूट
मैं
हो रया सुटम सूट
फागन
का महिना था
...
आ रया पसीना था
पोहंच
गया गाम मैं
मीठे
मीठे घाम मैं
सुसराड़
का टोरा था
मैं
अकड में होरा था
साले
मिलगे घर के बाहर
बोले
आ रिश्तेदार आ रिश्तेदार
बस
मेरी खातिरदारी शुरू होगी
रात
ने खा पीके सोगया तडके मेरी बारी शुरू होगी
सोटे
ले ले शाहले आगी
मेरे
ते मिठाईया के पैसे मांगन लागी
दो
दो चार चार सबने लगाये
पैसे
भी दिए और सोटे भी खाए
साली
भी मेरी मुह ने फेर गी
गाढ़ा
रंग घोल के सर पे गेर गी
सारा
टोरा होगया था ढिल्ला ढिल्ला
गात
होगया लिल्ला लिल्ला गिल्ला गिल्ला
रहा
सहा टोरा साला ने मिटा दिया
भर
के कोली नाली में लिटा दिया
साँझ
ताहि देहि काली आँख लाल होगी
बन्दर
बरगी मेरी चाल होगी
बटेऊ
हाडे तो नु हे सोटे खावेगा
बता
फेर होली पे हाडे आवेगा
मैं
हाथ जोड़ बोल्या या गलती फेर नहीं दोहराऊंगा
होली
तो के मैं थारे दिवाली ने भी नहीं आउंगा
 
किते और ट्राई करले


क्यों चक्कर काटे सै जा किते और ट्राई करले

तेरी मेरी जोट नहीं मिलती


हाडे तेरी दाल नहीं गलती


मेरा बाबु नाटे सै जा किते और ट्राई करले


जमिदारे का काम से म्हारे खेत में जाना पडजागा


आवे पसीना देहि पे तेरा सारा मेकअप झडजागा


मेरी दादी नाटे से जा किते और ट्राई करले


क्यों चक्कर काटे सै जा किते और ट्राई करले


सर पे पल्ला करके चाल्ले बीर मेरे हरयाने मै


मेरा दादा ड़ोगा मारेगा तन्ने देख विदेशी बाने मै


क्यों इतनी पाटे से जा किते और ट्राई करले


क्यों चक्कर काटे सै जा किते और ट्राई करले


म्हारे घर मै साँझ सवेरे भजन आरती होवे सै


तेरी पार नहीं पड़नी तू आठ बजे तक सोवे सै


मेरी माँ भी नाटे सै जा किते और ट्राई करले


क्यों चक्कर काटे सै जा किते और ट्राई करले


बाबु मेरा छो आला उसका चाल्ले दाठोरा पान्ने मै


इन्द्रजीत ने सोच लिया से रहना देवरखाने मै


क्यों न्यारी पाटे से जा किते और ट्राई करले


क्यों चक्कर काटे सै जा किते और ट्राई करले
 
धुम्मा ठा दिया

ना पूछ तेरे प्यार नै किसाक धुम्मा ठा दिया
मेरा छह मिह्न्या में छह किलो वजन घटा दिया


शुक्र सै थोडा जिम ज्वाइन कर राख्या सै मैंने

तैंने खून फेर भी मेरा अच्छा अच्छा सूखा दिया


क्यूं फेर भी बात करण में तेरा जी नही करता

नोकिया तक का तेरे तै मोबाइल दुवा दिया


मैं इस्ते ज्यादा बता और के करू भागवान

कालीन की ज्यूं आगे तेरे कालजा बिछा दिया


इससे ज्यादा खराब माट्टी के होवेगी गुलाबो

तैने देशी छोरा एकदम सपरेटा बणा दिया
 
धुम्मा ठा दिया

ना पूछ तेरे प्यार नै किसाक धुम्मा ठा दिया
मेरा छह मिह्न्या में छह किलो वजन घटा दिया


शुक्र सै थोडा जिम ज्वाइन कर राख्या सै मैंने

तैंने खून फेर भी मेरा अच्छा अच्छा सूखा दिया


क्यूं फेर भी बात करण में तेरा जी नही करता

नोकिया तक का तेरे तै मोबाइल दुवा दिया


मैं इस्ते ज्यादा बता और के करू भागवान

कालीन की ज्यूं आगे तेरे कालजा बिछा दिया


इससे ज्यादा खराब माट्टी के होवेगी गुलाबो

तैने देशी छोरा एकदम सपरेटा बणा दिया

bhai tane to sahi me e धुम्मा ठा दिया ...
 
धुम्मा ठा दिया

ना पूछ तेरे प्यार नै किसाक धुम्मा ठा दिया
मेरा छह मिह्न्या में छह किलो वजन घटा दिया


शुक्र सै थोडा जिम ज्वाइन कर राख्या सै मैंने

तैंने खून फेर भी मेरा अच्छा अच्छा सूखा दिया


क्यूं फेर भी बात करण में तेरा जी नही करता

नोकिया तक का तेरे तै मोबाइल दुवा दिया


मैं इस्ते ज्यादा बता और के करू भागवान

कालीन की ज्यूं आगे तेरे कालजा बिछा दिया


इससे ज्यादा खराब माट्टी के होवेगी गुलाबो

तैने देशी छोरा एकदम सपरेटा बणा दिया


AAP ne bhi apnee kavitai kee dhum macha dee, Shabash, Lage raho.
 
.
The original author of poem at Post No. 1 is Dev Dahiya.

Though I hesitate doing copy-paste, here I remember my old thread named Jat Ramayan, from where I am pasting my own composition. It is not Haryanvi, but Hindi -



गुण गाओ भाई भोले जाटों के, इनका हृदय विशाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥ (टेक)

अन्नदाता सब इसको कहते पर मानते इसको पिछाड़ी
भेली दे दे पर गन्ना ना दे - देखो रे, कैसा है अनाड़ी
सब को रोटी कपड़ा देता तो खुद क्यों ना बना अगाड़ी ?
ये सरकार सबको भत्ता देती, क्यूं इसे ना मिलती दिहाड़ी ?

कब आयेंगे छोटूराम चरणसिंह करने इनको निहाल ?
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल ॥१॥

छोटूराम जी कहा करते थे - ए मेरे भोले किसान
सही जिन्दगी चाहता है तो बस कर ले ये दो काम
अपनी वाणी पर काबू कर के सुधार ले अपनी जुबान
और सीख ले कैसे होती है अपने दुश्मन की पहचान

फिर तू देश पर राज करेगा और रहेगा नहीं कंगाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल ॥२॥

चरणसिंह ने भी खूब समझाया कि काम नहीं कोई छोटा
एक खेती में मत पड़ा रह, कर ले कोई धंधा छोटा-मोटा
पढ़ने लिखने और काम-धंधे से भाग जायेगा तेरा टोटा
नहीं तो कोसता रह जायेगा - हाय, मेरा तो कर्म था खोटा

बैठ अकेले आत्म-मंथन कर, अपने दिल को ले खंगाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल ॥ ३॥

अब सुनो कहानी कैसे हैं ये अपने जाटलैंड के जाट
यू.पी. वाले कहते - हम सब के फूफा, हमारे निराले ठाठ
हरयाणा के बड़े चौधरी - बोले, भला ये भी हैं कोई जाट ?
यू.पी. का जाट, पत्थर का बाट, जितनी बै तोलो घाट-ही-घाट !

इस जाटलैंड में ज्ञानी बहुतेरे पर करते ओछे सवाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥४॥

राजस्थानियों की बड़ी-बड़ी मूंछें, सारे के सारे लंबू
ठाकुरों को बोले तुम हो "छतरी" और हम हैं "तंबू"
ठाकुर डर-डर कर यूं कहते हैं - हे मेरे शंकर-शंभू -
कोई जाट बने ना "सी-एम" - ये तो दे देंगे हमें बंबू !

भाई, मेल-जोल रख लो औरों से, नहीं तो रहोगे बेहाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥५॥

दिल्ली के जाट - समझते थे खुद को महरौली की लाट
जमीनें छिन गई, काम रहा ना, सब हो गया बाराह-बाट
मालिक बन गए 'रिफूजी' यहां के, देख लो उनके ठाठ-बाट
फिर भी नहीं समझे तुम - एक दूसरे की करो खड़ी खाट

संभल जाओ, अब भी वक्त है, नहीं तो रहोगे बेहाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥६॥

बेकार के धागे शुरू करते हो जिनका सिर ना पैर
किसी की बहू है गैर-जाटनी, तुम्हें क्यूं उससे बैर ?
आगे राज किस का आयेगा - टूट पड़ेगा क्या कहर ?
वर्तमान की चिन्ता कर लो, इसी में है तुम्हारी खैर

फिक्र करो क्यूं लूट रहे हैं हमको ये विदेशी दलाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥७॥

बहस करो उनके बारे में - जो सीमा की करें रखवाली
उनको होश नहीं - कैसे हैं उनके घरवाले और घरवाली
अपने सीनों पर गोली खाते - घर में फिर भी कंगाली
और ये सरकार विचार न करती - क्यूं है उनकी बदहाली ?

पढ-पढ कर ये धागे तुम्हारे मेरे दिल में उठें हिलाल ।
एक बार अपने दिल से पूछ लो - हो ना धरती के लाल ? ॥८॥
 
.
The original author of poem at Post No. 1 is Dev Dahiya.

Though I hesitate doing copy-paste, here I remember my old thread named Jat Ramayan, from where I am pasting my own composition. It is not Haryanvi, but Hindi -



गुण गाओ भाई भोले जाटों के, इनका हृदय विशाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥ (टेक)

अन्नदाता सब इसको कहते पर मानते इसको पिछाड़ी
भेली दे दे पर गन्ना ना दे - देखो रे, कैसा है अनाड़ी
सब को रोटी कपड़ा देता तो खुद क्यों ना बना अगाड़ी ?
ये सरकार सबको भत्ता देती, क्यूं इसे ना मिलती दिहाड़ी ?

कब आयेंगे छोटूराम चरणसिंह करने इनको निहाल ?
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल ॥१॥

छोटूराम जी कहा करते थे - ए मेरे भोले किसान
सही जिन्दगी चाहता है तो बस कर ले ये दो काम
अपनी वाणी पर काबू कर के सुधार ले अपनी जुबान
और सीख ले कैसे होती है अपने दुश्मन की पहचान

फिर तू देश पर राज करेगा और रहेगा नहीं कंगाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल ॥२॥

चरणसिंह ने भी खूब समझाया कि काम नहीं कोई छोटा
एक खेती में मत पड़ा रह, कर ले कोई धंधा छोटा-मोटा
पढ़ने लिखने और काम-धंधे से भाग जायेगा तेरा टोटा
नहीं तो कोसता रह जायेगा - हाय, मेरा तो कर्म था खोटा

बैठ अकेले आत्म-मंथन कर, अपने दिल को ले खंगाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल ॥ ३॥

अब सुनो कहानी कैसे हैं ये अपने जाटलैंड के जाट
यू.पी. वाले कहते - हम सब के फूफा, हमारे निराले ठाठ
हरयाणा के बड़े चौधरी - बोले, भला ये भी हैं कोई जाट ?
यू.पी. का जाट, पत्थर का बाट, जितनी बै तोलो घाट-ही-घाट !

इस जाटलैंड में ज्ञानी बहुतेरे पर करते ओछे सवाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥४॥

राजस्थानियों की बड़ी-बड़ी मूंछें, सारे के सारे लंबू
ठाकुरों को बोले तुम हो "छतरी" और हम हैं "तंबू"
ठाकुर डर-डर कर यूं कहते हैं - हे मेरे शंकर-शंभू -
कोई जाट बने ना "सी-एम" - ये तो दे देंगे हमें बंबू !

भाई, मेल-जोल रख लो औरों से, नहीं तो रहोगे बेहाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥५॥

दिल्ली के जाट - समझते थे खुद को महरौली की लाट
जमीनें छिन गई, काम रहा ना, सब हो गया बाराह-बाट
मालिक बन गए 'रिफूजी' यहां के, देख लो उनके ठाठ-बाट
फिर भी नहीं समझे तुम - एक दूसरे की करो खड़ी खाट

संभल जाओ, अब भी वक्त है, नहीं तो रहोगे बेहाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥६॥

बेकार के धागे शुरू करते हो जिनका सिर ना पैर
किसी की बहू है गैर-जाटनी, तुम्हें क्यूं उससे बैर ?
आगे राज किस का आयेगा - टूट पड़ेगा क्या कहर ?
वर्तमान की चिन्ता कर लो, इसी में है तुम्हारी खैर

फिक्र करो क्यूं लूट रहे हैं हमको ये विदेशी दलाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥७॥

बहस करो उनके बारे में - जो सीमा की करें रखवाली
उनको होश नहीं - कैसे हैं उनके घरवाले और घरवाली
अपने सीनों पर गोली खाते - घर में फिर भी कंगाली
और ये सरकार विचार न करती - क्यूं है उनकी बदहाली ?

पढ-पढ कर ये धागे तुम्हारे मेरे दिल में उठें हिलाल ।
एक बार अपने दिल से पूछ लो - हो ना धरती के लाल ? ॥८॥

bilkul sach baat ujagar ki h dnd sir aapne ...
 
कु स्वाद लेरी सै

इन दिनां तू प्यार कम मेरे स्वाद ज्यादा लेरी सै

जाणग्या बस खाट खड़ी करण का इरादा लेरी सै


मेरे भीतर का शक तेरे त बार बार न्यू पूछे स

किसके साथ मेरा धुम्मा ठावण का वादा लेरी सै


अपणा कसूर सर पै मेरे जद चाहवे धर दे सै

मुस्कुराके बोलण का तू खूब ए फायदा लेरी सै


क्दे क्दे तो तू महबूबा त मेरी माँ बणज्या सै

समझ नही पा रहया सू यो के इरादा लेरी सै


सबके बसकी ना होवे सै किसे की याद में रोणा

जाणे सै छोरा तू आँख में जिसा कादा लेरी सै
 
छोरे की यारी देख

लाठ मार जुबान प ना जा तू इस छोरे की यारी देख,

खुड-खुड की के सोचे एब भर दूँगा प्यार की क्यारी देख,

कदे नूय नरा मोल्ड समझ क दोरे - दोरे हो जादी हो,

एक बार घर चाल ५२४५ की करवा दूँगा खूब सवारी देख,

रोज रिकमंड आर दुबले टोंड मिल्क की थेली पीन आली,

उड़े स निकडू दूध का मजा र देशी घी की तरकारी देख,


नुए ना सोचे के नुए सुखा गाल न छिड़ता हांडे सु,

७ लाख दे राखे स थोड़ी से दना म बन जाऊंगा पटवारी देख


यो त राणा सुवाद सुवाद म हरियाणवी बोला करे स,

अंग्रेजी भी खूब आवे स मेरी किताबा की भरी अलमारी देख,
 
छोरे की यारी देख

लाठ मार जुबान प ना जा तू इस छोरे की यारी देख,

खुड-खुड की के सोचे एब भर दूँगा प्यार की क्यारी देख,

कदे नूय नरा मोल्ड समझ क दोरे - दोरे हो जादी हो,

एक बार घर चाल ५२४५ की करवा दूँगा खूब सवारी देख,

रोज रिकमंड आर दुबले टोंड मिल्क की थेली पीन आली,

उड़े स निकडू दूध का मजा र देशी घी की तरकारी देख,


नुए ना सोचे के नुए सुखा गाल न छिड़ता हांडे सु,

७ लाख दे राखे स थोड़ी से दना म बन जाऊंगा पटवारी देख


यो त राणा सुवाद सुवाद म हरियाणवी बोला करे स,

अंग्रेजी भी खूब आवे स मेरी किताबा की भरी अलमारी देख,

Rhyme and rhythmic absence not acceptable in good poetry; so apply them here also. Best wishes.
 
Last edited:
छोरे की यारी देख

लाठ मार जुबान प ना जा तू इस छोरे की यारी देख,

खुड-खुड की के सोचे एब भर दूँगा प्यार की क्यारी देख,

कदे नूय नरा मोल्ड समझ क दोरे - दोरे हो जादी हो,

एक बार घर चाल ५२४५ की करवा दूँगा खूब सवारी देख,

रोज रिकमंड आर दुबले टोंड मिल्क की थेली पीन आली,

उड़े स निकडू दूध का मजा र देशी घी की तरकारी देख,


नुए ना सोचे के नुए सुखा गाल न छिड़ता हांडे सु,

७ लाख दे राखे स थोड़ी से दना म बन जाऊंगा पटवारी देख


यो त राणा सुवाद सुवाद म हरियाणवी बोला करे स,

अंग्रेजी भी खूब आवे स मेरी किताबा की भरी अलमारी देख,

Ranaji,

IS KAVITA MEIN TO HARYANAVI KA KACHUMAR HI NAIKAL DIYA; THORA DYAN SE LIKHOGE TO ACHHA LAGEGA.

HAIN LAGE RAHO, ACHHE BARE KAVI BANOGE, SHUBHASHIS!

JAI HIND
 
जेठ की दुपहरी

जेठ
की दुपहरी कसुता घाम था
पड़ा
चौबारे में कर रहा आराम थारेडिओ पे रागनी बजा रहा था
गेल
गेल खुद भी गा रहा था
बिजली चली गयी मेरा जी फुकग्या

छत
का पंखा लुढ़क लुढ़क के रुकग्या
फेर मेरे बीडी की याद आई
बण्डल
देखा तो वे भी टूटी हुयी पाई
दुखी
होगया था पड़ा पड़ा

फेर बीडी
लेन दुकान पे चाल पड़ा
गाल
कती सुनी पड़ी थी
किते ट्राली किते बुग्गी कड़ी थी

मैं अपनी मस्ती में जा रहा था


अर गुलाबो आली रागनी गा रहा था

पीछे ते किसे ने आवाज मारी

मन्ने देखा गोबर में हाथ सांधे
खड़ी थी दुलारी
मैं बोला हा बोल के काम से


नु
बोली हाडे आजा ने कितना कसुता घाम से
मैं
सर पे गेर रहा था तोलिया
व
अपने घेर में बडगी मैं भी पाछे पाछे हो लिया
मन्ने
कही इब तो बतादे

वा बोली मेरा
ओढना संघवा दे
मैं ओढना
संघवान लाग्या
अर
गलती ते मेरा हाथ उसके लाग्या
वा तो
रोण लाग्गी

इतने
में उसकी भाभी आगी
वे दोनु मेरे ते लड़न लाग्गी
मेरी
आंख आगे अँधेरी सी छागी

मैं बोला मन्ने
माफ़ कर दो
और
इस मामले ने हाडे ए साफ कर दो
वे बोली तेरा इलाज बंधवाना पड़ेगा
के तो
म्हारा काम कर ना तो तू पिटवाना पड़ेगा

मैं बोला
जो कहोगी वो करूँगा
कहो तो
थारा पानी भी भरूँगा
वे बोली ठीक से या बात किसे ते ना बताइए
और
यो गोबर पड़ा से सारे ने पाथ के जाइये

मैं
बाजु संघवा के लाग्या
दो
घंटे घाम में गोबर पाथा फेर लिकड़ के भाग्या
इब जब भी दुलारी दिखे से मैं रास्ता बदल जाऊ सु
कड़े
फेर वो हे काम बने पहला हे टल जाऊ सु
 
.
The original author of poem at Post No. 1 is Dev Dahiya.

Though I hesitate doing copy-paste, here I remember my old thread named Jat Ramayan, from where I am pasting my own composition. It is not Haryanvi, but Hindi -



गुण गाओ भाई भोले जाटों के, इनका हृदय विशाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥ (टेक)

अन्नदाता सब इसको कहते पर मानते इसको पिछाड़ी
भेली दे दे पर गन्ना ना दे - देखो रे, कैसा है अनाड़ी
सब को रोटी कपड़ा देता तो खुद क्यों ना बना अगाड़ी ?
ये सरकार सबको भत्ता देती, क्यूं इसे ना मिलती दिहाड़ी ?

कब आयेंगे छोटूराम चरणसिंह करने इनको निहाल ?
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल ॥१॥

छोटूराम जी कहा करते थे - ए मेरे भोले किसान
सही जिन्दगी चाहता है तो बस कर ले ये दो काम
अपनी वाणी पर काबू कर के सुधार ले अपनी जुबान
और सीख ले कैसे होती है अपने दुश्मन की पहचान

फिर तू देश पर राज करेगा और रहेगा नहीं कंगाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल ॥२॥

चरणसिंह ने भी खूब समझाया कि काम नहीं कोई छोटा
एक खेती में मत पड़ा रह, कर ले कोई धंधा छोटा-मोटा
पढ़ने लिखने और काम-धंधे से भाग जायेगा तेरा टोटा
नहीं तो कोसता रह जायेगा - हाय, मेरा तो कर्म था खोटा

बैठ अकेले आत्म-मंथन कर, अपने दिल को ले खंगाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल ॥ ३॥

अब सुनो कहानी कैसे हैं ये अपने जाटलैंड के जाट
यू.पी. वाले कहते - हम सब के फूफा, हमारे निराले ठाठ
हरयाणा के बड़े चौधरी - बोले, भला ये भी हैं कोई जाट ?
यू.पी. का जाट, पत्थर का बाट, जितनी बै तोलो घाट-ही-घाट !

इस जाटलैंड में ज्ञानी बहुतेरे पर करते ओछे सवाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥४॥

राजस्थानियों की बड़ी-बड़ी मूंछें, सारे के सारे लंबू
ठाकुरों को बोले तुम हो "छतरी" और हम हैं "तंबू"
ठाकुर डर-डर कर यूं कहते हैं - हे मेरे शंकर-शंभू -
कोई जाट बने ना "सी-एम" - ये तो दे देंगे हमें बंबू !

भाई, मेल-जोल रख लो औरों से, नहीं तो रहोगे बेहाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥५॥

दिल्ली के जाट - समझते थे खुद को महरौली की लाट
जमीनें छिन गई, काम रहा ना, सब हो गया बाराह-बाट
मालिक बन गए 'रिफूजी' यहां के, देख लो उनके ठाठ-बाट
फिर भी नहीं समझे तुम - एक दूसरे की करो खड़ी खाट

संभल जाओ, अब भी वक्त है, नहीं तो रहोगे बेहाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥६॥

बेकार के धागे शुरू करते हो जिनका सिर ना पैर
किसी की बहू है गैर-जाटनी, तुम्हें क्यूं उससे बैर ?
आगे राज किस का आयेगा - टूट पड़ेगा क्या कहर ?
वर्तमान की चिन्ता कर लो, इसी में है तुम्हारी खैर

फिक्र करो क्यूं लूट रहे हैं हमको ये विदेशी दलाल ।
सच पूछो तो सही मायनों में ये हैं धरती के लाल॥७॥

बहस करो उनके बारे में - जो सीमा की करें रखवाली
उनको होश नहीं - कैसे हैं उनके घरवाले और घरवाली
अपने सीनों पर गोली खाते - घर में फिर भी कंगाली
और ये सरकार विचार न करती - क्यूं है उनकी बदहाली ?

पढ-पढ कर ये धागे तुम्हारे मेरे दिल में उठें हिलाल ।
एक बार अपने दिल से पूछ लो - हो ना धरती के लाल ? ॥८॥

Really, an eye opener; Call for all Jats to rise to the occasion and face the real world with open arms.
 
अंदाज़े हरियाणवी
ओरिजनल नही फोटो स्टेट दयूंगा

दिल कभी ले लिए सस्ते रेट दयूंगा


शाहजहाँ नै तो बस ताज ए दिया था

तू मर मेरे खातिर इंडिया गेट दयूंगा


शक नही करूंगा तेरी किसी बात पै

बेझिझक बोल झूठ सब लपेट दयूंगा


दो घड़ी तो बैठ तू मेरे पास कभी

बहम तेरे मैं सब के सब मेट दयूंगा


आवण दे इबके वेलेनटाइन डे गुलाबो
तैने गिफ्ट में हरियाणा स्टेट दयूंगा
 
अंदाज़े हरियाणवी
ओरिजनल नही फोटो स्टेट दयूंगा

दिल कभी ले लिए सस्ते रेट दयूंगा


शाहजहाँ नै तो बस ताज ए दिया था

तू मर मेरे खातिर इंडिया गेट दयूंगा


शक नही करूंगा तेरी किसी बात पै

बेझिझक बोल झूठ सब लपेट दयूंगा


दो घड़ी तो बैठ तू मेरे पास कभी

बहम तेरे मैं सब के सब मेट दयूंगा


आवण दे इबके वेलेनटाइन डे गुलाबो
तैने गिफ्ट में हरियाणा स्टेट दयूंगा

यो किस्सा ते इस्सा लगया जणू ....
दीपू ने स्वेता(दुसरे आली ) ते हरियाणा गिफ्ट दीया हो ....
पैर वा रोहतक डी- पार्क का जाम देख क अमरीका भाज गी हो .....
 
Jatland Ke Kware Bhaiya Khatir (Sunil Nain)

Aaj Ka Behya

आच्छा समय गया पर दिल मं असर उ
'की परछाइयाँ का
घणा नहीं पर ज़िकर करूँ दो चार रसम मनभाईयां का


पहल्यां देखैं
, फेर पक्की, फेर गोद भरण नै जावैं सै
देखैं बाट पडोसी कित वो खूग्या दौर सगाईयाँ का


बान बैठ बनवाड़े खाते मटना रगड़ न्हवाया करती

इब डेंट-पेंट कर नक्शा बदलैं
'पार्लर' ब्याहले भाईयाँ का

ब्याह तै पहल्यां बीस रोज
, ज्यब गीत लुगाई गाया करती
इब कार्ड पै छपता डीजे संग
'लेड़ीज संगीत' लुगाइयां का

ब्याह मं म्हिन्या पहल्यां आकै बुआ-बहाण रंग लाया करती

इब होटल म्हां तै मुड़ ज्यां पैर पडे ना घर माँ-जाईयाँ का


इब छोरे के ब्याह मं भी घलता कन्यादान
'रिशैपशन' पै
लाडडू ज्यब दिखण दें सै ज्यब आले नेग बधाईयाँ का


लोटा लेकै गरम दूध का बहू चौबारे जाया करती

इब अगले दिन जां शिमला सर पै क़र्ज़ खड्या हलवाईयां का


सात जनम के बंधन मं बंध धरम की डगर चल्या करते

इब कर कै शक लें जूत बजा फेर चालै दौर गव्हाईयां का


पैसा-मस्ती-मौज सोच या खागी सब संस्कारां नै

आछा-भला बखत था म्हारी दादी
, माँ और ताइयां का
 
धूमा ठा दिया ....... दुलारी ने ...


जेठ की दुपहरी

जेठ
की दुपहरी कसुता घाम था
पड़ा
चौबारे में कर रहा आराम थारेडिओ पे रागनी बजा रहा था
गेल
गेल खुद भी गा रहा था
बिजली चली गयी मेरा जी फुकग्या

छत
का पंखा लुढ़क लुढ़क के रुकग्या
फेर मेरे बीडी की याद आई
बण्डल
देखा तो वे भी टूटी हुयी पाई
दुखी
होगया था पड़ा पड़ा

फेर बीडी
लेन दुकान पे चाल पड़ा
गाल
कती सुनी पड़ी थी
किते ट्राली किते बुग्गी कड़ी थी

मैं अपनी मस्ती में जा रहा था


अर गुलाबो आली रागनी गा रहा था

पीछे ते किसे ने आवाज मारी

मन्ने देखा गोबर में हाथ सांधे
खड़ी थी दुलारी
मैं बोला हा बोल के काम से


नु
बोली हाडे आजा ने कितना कसुता घाम से
मैं
सर पे गेर रहा था तोलिया
व
अपने घेर में बडगी मैं भी पाछे पाछे हो लिया
मन्ने
कही इब तो बतादे

वा बोली मेरा
ओढना संघवा दे
मैं ओढना
संघवान लाग्या
अर
गलती ते मेरा हाथ उसके लाग्या
वा तो
रोण लाग्गी

इतने
में उसकी भाभी आगी
वे दोनु मेरे ते लड़न लाग्गी
मेरी
आंख आगे अँधेरी सी छागी

मैं बोला मन्ने
माफ़ कर दो
और
इस मामले ने हाडे ए साफ कर दो
वे बोली तेरा इलाज बंधवाना पड़ेगा
के तो
म्हारा काम कर ना तो तू पिटवाना पड़ेगा

मैं बोला
जो कहोगी वो करूँगा
कहो तो
थारा पानी भी भरूँगा
वे बोली ठीक से या बात किसे ते ना बताइए
और
यो गोबर पड़ा से सारे ने पाथ के जाइये

मैं
बाजु संघवा के लाग्या
दो
घंटे घाम में गोबर पाथा फेर लिकड़ के भाग्या
इब जब भी दुलारी दिखे से मैं रास्ता बदल जाऊ सु
कड़े
फेर वो हे काम बने पहला हे टल जाऊ सु
 
यो किस्सा ते इस्सा लगया जणू ....
दीपू ने स्वेता(दुसरे आली ) ते हरियाणा गिफ्ट दीया हो ....
पैर वा रोहतक डी- पार्क का जाम देख क अमरीका भाज गी हो .....

हा हा हा हा हा हा..... के बेरा और कोए रोल्ला हो दीपू गेल ...... समझ ते तू गया इ होगा भाई.......
 
Back
Top