Whom to Vote in the General Elections 2014

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मोदी हुए मुद्दीन, राजनाथ हुए रज्जुद्दीन और भाजपा हुई भाजुद्दीन:

क्योंकि बीजेपी का 2014 घोषणापत्र कहता है कि "बीजेपी सत्ता में आते ही मदरसों का आधुनिकीकरण करवाएगी|’’

क्योंकि मैं एक जाट हूँ और मेरे बुजुर्ग जो जाट-मुस्लिम एकता की सांझी विरासत मुझे दे गए थे, उसको सम्भाले और बनाये रखने का पैरोकार भी हूँ, इसलिए मेरे लिए तो यह सुखद बात है कि बीजेपी सत्ता में आई तो मुस्लिम मदरसों का आधुनिकीकरण करवाएगी|

लेकिन क्या होगा उस अमित शाह के मुज़फ्फरनगर में दिए, "बदला लेने" के ब्यान का?
क्या होगा वसुंधरा राजे के "खून-खराबे" वाले ब्यान का?

तो क्या यह सब सिर्फ जाटों की भावनाओं से खेलने के षड्यंत्र थे| मैं तो पहले ही ना कहता था कि हाथी के दांत खाने के और, और दिखाने के और| शुक्र है इलेक्शन से पहले ही कट्टरता, कटुता, हिन्दू और हिंदुत्ववाद का ढोल फट गया| हाय रे क्या भाजपा यह भी भूल गई कि जाट तुझसे जुड़ा ही इस मुद्दे पर है; मतलब सत्ता आने से पहले ही तथाकथित धार्मिक उन्माद में कट्टर हुए जाटों की भावनाओं का खुला मजाक, क्या जाट युवा सहन करेगा इसको?

नहीं अभी उम्मीद है, कट्टर हुआ जाट युवा संगीत सोम के पास जायेगा, राणा के पास जायेगा, हुक्म सिंह गुर्जर के पास जायेगा, वो हैं ना सुनने वाले| मतलब अभी कह सकते हैं कि उम्मीद बाकी है|

अब मेरे भाई उनके पास जायेंगे और उनसे पूछेंगे कि बताओ हम लोग रालोद या कांग्रेस से अलग कैसे बचे? और फिर हुक्म सिंह, अपने चिरपरिचित अंदाज में कहेगा कि यह जाटों का मामला है, मरो-कटो, मुझे क्या? याद है ना जाट युवा आपको, कुछ ऐसा ही ब्यान उसने कब दिया था?

अब कोई जाट भाई कट्टर और कट्टरता की बात तो करना ही मत और अगर बीजेपी को सपोर्ट कर रहा है तो मुस्लिमों को भी सबक सिखाने की बात भी मत करना|

कोई अजीतूद्दीन कह रहा था, तो कोई जंतयुद्दीन, अब बताओ भाजपा को क्या कहूं भाजपाद्दीन, भाजपुद्दीन, भाजुद्दीन, तिलकुद्दीन, तराजूद्दीन या फिर मोदी+द्दीन = मुद्दीन या मुदीन?

देखा! अरे मेरे भोले और कट्टरता की आंधी में भटके जाट युवाओ, यह देख लो ये हैं आपके कट्टरता के गुरु| जैसे उबलता पानी धरातल छूते ही वापिस समतल हो जाता है, हो गए सारे समतल| अरे इनकी खुद की जड़ें नहीं, तो आपको क्या कट्टरता सिखाएंगे|

घर वापसी में देरी नहीं हुई है अभी भी और ना ही सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसको भूला कहते|

पगड़ी संभाल जट्टा, दुश्मन पहचान जट्टा|

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मोदी हुए मुद्दीन, राजनाथ हुए रज्जुद्दीन और भाजपा हुई भाजुद्दीन:

क्योंकि बीजेपी का 2014 घोषणापत्र कहता है कि "बीजेपी सत्ता में आते ही मदरसों का आधुनिकीकरण करवाएगी|’’

क्योंकि मैं एक जाट हूँ और मेरे बुजुर्ग जो जाट-मुस्लिम एकता की सांझी विरासत मुझे दे गए थे, उसको सम्भाले और बनाये रखने का पैरोकार भी हूँ, इसलिए मेरे लिए तो यह सुखद बात है कि बीजेपी सत्ता में आई तो मुस्लिम मदरसों का आधुनिकीकरण करवाएगी|

लेकिन क्या होगा उस अमित शाह के मुज़फ्फरनगर में दिए, "बदला लेने" के ब्यान का?
क्या होगा वसुंधरा राजे के "खून-खराबे" वाले ब्यान का?

तो क्या यह सब सिर्फ जाटों की भावनाओं से खेलने के षड्यंत्र थे| मैं तो पहले ही ना कहता था कि हाथी के दांत खाने के और, और दिखाने के और| शुक्र है इलेक्शन से पहले ही कट्टरता, कटुता, हिन्दू और हिंदुत्ववाद का ढोल फट गया| हाय रे क्या भाजपा यह भी भूल गई कि जाट तुझसे जुड़ा ही इस मुद्दे पर है; मतलब सत्ता आने से पहले ही तथाकथित धार्मिक उन्माद में कट्टर हुए जाटों की भावनाओं का खुला मजाक, क्या जाट युवा सहन करेगा इसको?

नहीं अभी उम्मीद है, कट्टर हुआ जाट युवा संगीत सोम के पास जायेगा, राणा के पास जायेगा, हुक्म सिंह गुर्जर के पास जायेगा, वो हैं ना सुनने वाले| मतलब अभी कह सकते हैं कि उम्मीद बाकी है|

अब मेरे भाई उनके पास जायेंगे और उनसे पूछेंगे कि बताओ हम लोग रालोद या कांग्रेस से अलग कैसे बचे? और फिर हुक्म सिंह, अपने चिरपरिचित अंदाज में कहेगा कि यह जाटों का मामला है, मरो-कटो, मुझे क्या? याद है ना जाट युवा आपको, कुछ ऐसा ही ब्यान उसने कब दिया था?

अब कोई जाट भाई कट्टर और कट्टरता की बात तो करना ही मत और अगर बीजेपी को सपोर्ट कर रहा है तो मुस्लिमों को भी सबक सिखाने की बात भी मत करना|

कोई अजीतूद्दीन कह रहा था, तो कोई जंतयुद्दीन, अब बताओ भाजपा को क्या कहूं भाजपाद्दीन, भाजपुद्दीन, भाजुद्दीन, तिलकुद्दीन, तराजूद्दीन या फिर मोदी+द्दीन = मुद्दीन या मुदीन?

देखा! अरे मेरे भोले और कट्टरता की आंधी में भटके जाट युवाओ, यह देख लो ये हैं आपके कट्टरता के गुरु| जैसे उबलता पानी धरातल छूते ही वापिस समतल हो जाता है, हो गए सारे समतल| अरे इनकी खुद की जड़ें नहीं, तो आपको क्या कट्टरता सिखाएंगे|

घर वापसी में देरी नहीं हुई है अभी भी और ना ही सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसको भूला कहते|

पगड़ी संभाल जट्टा, दुश्मन पहचान जट्टा|
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Former socialist leader and Chief Minister of Haryana leaves Congress and joins B J P in Charkhi Dadri.​
 
Former socialist leader and Chief Minister of Haryana leaves Congress and joins B J P in Charkhi Dadri.[/LEFT]
First of all I want to ask him why he left INLD ?
Now Master Hukam Singh ji should have taken retirement from politics instead of joining BJP ..
This move won't help BJP ..
 
First of all I want to ask him why he left INLD ?
Now Master Hukam Singh ji should have taken retirement from politics instead of joining BJP ..
This move won't help BJP ..

Exact reason could be explained by him accurately but it seems he might have seen greener pastures there and on feeling disappointed moved to another party recently.

Time will tell whether it impacts or not the voting pattern in Dadri constituency and around where Phogat Jatss reside!
 
In politics, most of the leaders have their personal interests and agendas. So always they want to be in power. However they project themselves as they do all these for the people. But this is purely "avasarvadita" to protect own interests. A famous quote in politics "aaya ram and gaya ram"....

Exact reason could be explained by him accurately but it seems he might have seen greener pastures there and on feeling disappointed moved to another party recently.

Time will tell whether it impacts or not the voting pattern in Dadri constituency and around where Phogat Jatss reside!
 
आज कौम इस फिक्र में क्यों है कि यदि हम अपनी कौम के लिए संघर्ष करेंगे तो दूसरे लोग नाराज हो जायेंगे |
आज जाट अपने को जाट कहलाने में क्यूं हिचक रहा है ?

जाट आरक्षण के बाद तो कुछ जाट अपनी ही जाति से करने लग गए हैं |
 
Last edited:
मैं तो अपने जाट भाइयों को वोट देने से पहले एक ही सन्देश देना चाहूंगा -

मत लड़ो आपस में नहीं तो बिखर जाओगे ।

मौत आने से पहले ही खुद की नज़रों में मर जाओगे।।
हो जाट तो मिसाल बन कर उभरो दुनिया के लिए।
नहीं तो इतिहास के चंद पन्नों में सिमट जाओगे
जय जाट || जय जाट एकता
 
जाट का वोट जिधर भी पड़े, बस जाट चौधर को मजबूत करता चले:

1) आजकल तीन पार्टियां हैं खापलैंड पे जो या तो जाट नेताओं की सरपरस्ती में हैं या फिर जिनने जाट नेताओं को आगे बढ़ाया हुआ है| सरपरस्ती वाली हैं रालोद और इनैलो और कांग्रेस ने हुड्डा जी को आगे बढ़ा रखा है|

2) कौनसी पार्टी ने जाटों को मुख्यमंत्री चेहरा बनाया है यह भी याद रखें: जाट सरपरस्ती वाली इनैलो और रालोद को छोड़ दें तो आने वाले विधानसभा चुनावों में हुड्डा जी कांग्रेस का मुख्यमंत्री चेहरा हैं, जबकि बीजेपी तो हरियाणा में करती ही एंटी-जाट पॉलिटिक्स है तभी तो नॉन-जाट को मुख्यमंत्री चेहरा बनाया हुआ है और कैप्टैन अभिमन्यु और प्रदीप सांगवान जैसे जाट नेताओं की पूछ भी नहीं की हुई वहाँ|

और यू पी में भी सीटों के अनुपात से जाट कैंडिडेट्स को बीजेपी ने टिकेट नहीं दी, अब जैसे रालोद ने आठ खड़े किये यू पी में तो पहली तो बात रालोद खुद जाट सरपरस्ती की पार्टी, उसपे तीन यानि 38% टिकटें जाटों को दी, जबकि बीजेपी ने पूरे यू पी की तो छोडो, अगर अकेले हरित प्रदेश की 27 टिकटों की बातें करें तो 3-4 जाट को ही टिकेट दी हैं, यानि सिर्फ 9% (यानि जाटों के जनसँख्या के अनुपात में भी नहीं) और पूरे यू पी के अनुपात में देखूं तो 0.05% यानि सिर्फ आधा प्रतिशत। और अगर बीजेपी की सरकार बनी तो किसी जाट को मंत्रिपद देने का कोई भरोसा नहीं अभी तक, जबकि रालोद जिसके भी साथ रह के सरकार बनाएगी एक कैबिनेट बर्थ तो 100% पक्की|

3) संख्या के अनुपात में राष्ट्रीय पार्टियों में से सबसे ज्यादा जाटों को टिकटें कांग्रेस ने दी हैं खापलैंड पे, चाहे तो कोई भाई गिन ले बेशक से| और रालोद और कांग्रेस की सारी टिकेट मिला लो तो और भी ज्यादा| और रालोद और कांग्रेस के प्रयासों से जाट रिजर्वेशन मिलने से अधिकतर जाटों का वोट इनपे ही चढ़ रहा है|

4) जहाँ अकेला जाट कैंडिडेट खड़ा हो और जाट सरपरस्ती की पार्टी वहाँ ना हो तो फिर वो चाहे जिस पार्टी का हो वहाँ उसको जिताओ, जैसे कि संजीव बालियान मुज़फ्फरनगर में अकेले जाट हैं, और वहाँ जाट सरपरस्ती की पार्टी भी नहीं है तो संजीव बालियान को जिताओ|

5) जहां दो या तीन जाट खड़े हैं, जैसे कि बागपत, रोहतक, हिसार, सोनीपत यहाँ पहले नॉन-जाट किधर वोट डाल रहा है उसका रूख देखो, फिर तय करो कि दो-तीन जाटों में से कौनसा जाट जिताऊ है और कौनसा हराऊ| उदहारणत: बागपत में मुलायम और मायावती सबसे ज्यादा नॉन-जाट प्लस मुस्लिम वोट खींच सकते हैं, और मुस्लिम वोट तो रालोद और कांग्रेस भी खींचेगी, तो ऐसे में बचा बीजेपी वाला, वो और रालोद जाट वोट बंटवाएगा, परन्तु बीजेपी वाले को मुस्लिम वोट मिल नहीं रहा, तो वहाँ जितने की स्थिति में कौन, रालोद वाला तो अपना जाट वोट सिर्फ-और-सिर्फ जीत में डालना, हार में नहीं| वर्ना ऐसा ना हो कि दो जाटों के बीच से मुलायम या मायावती वाला बाजी मार ले जाए और जाट रहें फिर खड़े लखाते और हंसी पिटवाते|

6) और अब बीजेपी के हिंदुत्व और कट्टर पक्ष में भी तब से कोई दम नहीं रहा, जब से इनका घोषणा-पत्र आया है| सुना है इस घोषणा पत्र से काफी जाट उल्टा हटा है बीजेपी से|

सौ का जोड़ यही है कि पार्टी कोई भी हो पर हर जाट का मकसद सिर्फ जाट चौधर को बढ़ाने का हो; हार में वोट डाल के खराब मत करना, नॉन-जाट और मुस्लिम का रूख किधर का है और इस रूख से कौनसे जाट कैंडिडेट को जीत मिल रही है उसी के पक्ष में वोट चढ़ाओ और दिल्ली में जाट चौधर को मजबूत बनाओ|

पगड़ी संभाल जट्टा, दुश्मन पहचान जट्टा|

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let everyone decide irrespective of ur guidelines.
Election commision of india has given this right to "every individual" else they wud have created just one single vote for entire jat clan n u wud hv decided about that one single heavy vote. u have tried to put is cleverly but ur luv for congres is visible in dis thred.

जाट का वोट जिधर भी पड़े, बस जाट चौधर को मजबूत करता चले:

1) आजकल तीन पार्टियां हैं खापलैंड पे जो या तो जाट नेताओं की सरपरस्ती में हैं या फिर जिनने जाट नेताओं को आगे बढ़ाया हुआ है| सरपरस्ती वाली हैं रालोद और इनैलो और कांग्रेस ने हुड्डा जी को आगे बढ़ा रखा है|

2) कौनसी पार्टी ने जाटों को मुख्यमंत्री चेहरा बनाया है यह भी याद रखें: जाट सरपरस्ती वाली इनैलो और रालोद को छोड़ दें तो आने वाले विधानसभा चुनावों में हुड्डा जी कांग्रेस का मुख्यमंत्री चेहरा हैं, जबकि बीजेपी तो हरियाणा में करती ही एंटी-जाट पॉलिटिक्स है तभी तो नॉन-जाट को मुख्यमंत्री चेहरा बनाया हुआ है और कैप्टैन अभिमन्यु और प्रदीप सांगवान जैसे जाट नेताओं की पूछ भी नहीं की हुई वहाँ|

और यू पी में भी सीटों के अनुपात से जाट कैंडिडेट्स को बीजेपी ने टिकेट नहीं दी, अब जैसे रालोद ने आठ खड़े किये यू पी में तो पहली तो बात रालोद खुद जाट सरपरस्ती की पार्टी, उसपे तीन यानि 38% टिकटें जाटों को दी, जबकि बीजेपी ने पूरे यू पी की तो छोडो, अगर अकेले हरित प्रदेश की 27 टिकटों की बातें करें तो 3-4 जाट को ही टिकेट दी हैं, यानि सिर्फ 9% (यानि जाटों के जनसँख्या के अनुपात में भी नहीं) और पूरे यू पी के अनुपात में देखूं तो 0.05% यानि सिर्फ आधा प्रतिशत। और अगर बीजेपी की सरकार बनी तो किसी जाट को मंत्रिपद देने का कोई भरोसा नहीं अभी तक, जबकि रालोद जिसके भी साथ रह के सरकार बनाएगी एक कैबिनेट बर्थ तो 100% पक्की|

3)
संख्या के अनुपात में राष्ट्रीय पार्टियों में से सबसे ज्यादा जाटों को टिकटें कांग्रेस ने दी हैं खापलैंड पे, चाहे तो कोई भाई गिन ले बेशक से| और रालोद और कांग्रेस की सारी टिकेट मिला लो तो और भी ज्यादा| और रालोद और कांग्रेस के प्रयासों से जाट रिजर्वेशन मिलने से अधिकतर जाटों का वोट इनपे ही चढ़ रहा है|

4) जहाँ अकेला जाट कैंडिडेट खड़ा हो और जाट सरपरस्ती की पार्टी वहाँ ना हो तो फिर वो चाहे जिस पार्टी का हो वहाँ उसको जिताओ, जैसे कि संजीव बालियान मुज़फ्फरनगर में अकेले जाट हैं, और वहाँ जाट सरपरस्ती की पार्टी भी नहीं है तो संजीव बालियान को जिताओ|

5) जहां दो या तीन जाट खड़े हैं, जैसे कि बागपत, रोहतक, हिसार, सोनीपत यहाँ पहले नॉन-जाट किधर वोट डाल रहा है उसका रूख देखो, फिर तय करो कि दो-तीन जाटों में से कौनसा जाट जिताऊ है और कौनसा हराऊ| उदहारणत: बागपत में मुलायम और मायावती सबसे ज्यादा नॉन-जाट प्लस मुस्लिम वोट खींच सकते हैं, और मुस्लिम वोट तो रालोद और कांग्रेस भी खींचेगी, तो ऐसे में बचा बीजेपी वाला, वो और रालोद जाट वोट बंटवाएगा, परन्तु बीजेपी वाले को मुस्लिम वोट मिल नहीं रहा, तो वहाँ जितने की स्थिति में कौन, रालोद वाला तो अपना जाट वोट सिर्फ-और-सिर्फ जीत में डालना, हार में नहीं| वर्ना ऐसा ना हो कि दो जाटों के बीच से मुलायम या मायावती वाला बाजी मार ले जाए और जाट रहें फिर खड़े लखाते और हंसी पिटवाते|

6) और अब बीजेपी के हिंदुत्व और कट्टर पक्ष में भी तब से कोई दम नहीं रहा, जब से इनका घोषणा-पत्र आया है| सुना है इस घोषणा पत्र से काफी जाट उल्टा हटा है बीजेपी से|

सौ का जोड़ यही है कि पार्टी कोई भी हो पर हर जाट का मकसद सिर्फ जाट चौधर को बढ़ाने का हो; हार में वोट डाल के खराब मत करना, नॉन-जाट और मुस्लिम का रूख किधर का है और इस रूख से कौनसे जाट कैंडिडेट को जीत मिल रही है उसी के पक्ष में वोट चढ़ाओ और दिल्ली में जाट चौधर को मजबूत बनाओ|

पगड़ी संभाल जट्टा, दुश्मन पहचान जट्टा|

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Jats in Haryana are happy and safe under the hands of Congress from last 10 years.. Keep anti-incumbency factor aside

Our votes should split at most among 2 parties only i.e. Congress and INLD only
We don't want non-Jat based urban parties like BJP and HJC to flourish in Haryana ..
 
हुड्डा के गले फंसी हड्डी - मुझे लगभग तीन साल पुराना ये लेख पढ़ने को मिला ।
मोदी प्रेम में चूर मेरे जाट भाइयों ये लेख ध्यान से पढ़े ।
आखिर में हमे न केवल आरक्षण मिला बल्कि मिर्चपुर कांड में भी न्याय मिला । हमारे कुछ जाट भाई अभी भी दोषी ठहराए गए है ,मुझे उम्मीद है कि उन्हें भी जल्द इन्साफ मिलेगा ।

इस लेख में लिखी हुई कुछ बातें मुझे बहुत पसंद आयी ।

मिर्चपुर कांड पर फैसला आने वाला है. फैसला चाहे दलितों के पक्ष में जाए या जाटों के, हुड्डा की परेशानी कम होने वाली नहीं है.
मेवात जिले में 'जननी शिशु सुरक्षा योजना' के शुभारंभ के दौरान संप्रग अध्*यक्ष सोनिया गांधी से प्रदेश सरकार की प्रशंसा करवाकर मुख्*यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा भले ही अपनी पीठ थपथपा रहे हों, पर उनके चेहरे पर नजर आ रहीं चिंता की लकीरें साफ तौर पर इशारा कर रही हैं कि कोई चीज उन्हें लगातार परेशान कर रही है. ऐसा होना लाजिमी भी है. दरअसल, दलित उत्*पीडऩ का मामला रुक-रुक कर, पिछले छह साल से सत्ता सुख भोग रहे हुड्डा को नई परेशानी में डाल देता है. गोहाना दलित कांड में हुई फजीहत से मुक्ति मिले अभी कुछ ही माह बीते थे कि हुड्डा सरकार को हिसार जिले का मिर्चपुर दलित अग्निकांड परेशान करने लगा.
मिर्चपुर मामले की सुनवाई दिल्*ली में रोहिणी स्थित विशेष अदालत में अंतिम चरण में है. फैसला किसी के पक्ष में जाए, उसकी आंच हुड्डा सरकार तक पहुंचेगी. यही कारण है कि प्रदेश की कांग्रेस सरकार इस मामले में एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रख रही है. दूसरी तरफ, हुड्डा के विरोधी हैं, चाहे वे कांग्रेस के अंदर हों या बाहर, वे इस तीर को किसी भी कीमत पर खाली नहीं जाने देना चाहते. उनकी हर संभव कोशिश है कि इसी बहाने हुड्डा को कुर्सी से चलता कर दिया जाए.
दलित उत्*पीडऩ की बात की जाए तो मिर्चपुर घटना कोई पहली नहीं है. उससे पहले भी कई घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन 21 अप्रैल 2010 को जाटों और दलित परिवारों के बीच हुए संघर्ष के दौरान अग्नि की भेंट चढ़े ताराचंद और उसकी विकलांग बेटी सुमन ने तब से लेकर आज तक सरकार की नाक दम कर रखा है. घटना कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इसे शांत करने के लिए राज्य सरकार ने जितनी ताकत लगाई, मामला उसकी पहुंच से उतना ही दूर होता गया. कांग्रेस के युवराज राहुल ने घटना के तुरंत बाद यानी बीती 27 अप्रैल को हुड्डा सरकार को बिना विश्*वास में लिए, यहां तक कि प्रदेश के खुफिया तंत्र को ठेंगा दिखाते हुए, अपनी टीम के साथ घटना स्*थल का न केवल दौरा किया, बल्कि पीडि़त परिजनों से भी मिले और उनकी राय जानी. आहत राहुल ने हुड्डा सरकार की खिंचाई के साथ-साथ अपनी विस्*तृत रिपोर्ट भी सोनिया गांधी को दे डाली. हुड्डा सरकार का हाईकमान के साथ तनाव जगजाहिर है.
इसके बाद से ही प्रदेश में जाटों और दलितों के बीच चल रहा शीत युद्ध खत्*म होने का नाम नहीं ले रहा है. सरकार के लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा यह है कि अपने को जाट नेता कहने वाले हुड्डा मिर्चपुर कांड में फंसे 98 जाटों को सु*रक्षित कैसे निकलवा पाते हैं, क्*योंकि जाटों के खिलाफ निर्णय होते ही, जाट वोट बैंक एक बार फिर से पूर्व उपप्रधानमंत्री स्*वर्गीय देवीलाल के पुत्र एवं पूर्व मुख्*यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के पास खिसक सकता है.
अखिल भारतीय जाट आरक्षण समिति के आह्वान पर राज्य में हुए जाट आंदोलन के दौरान चौटाला की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के कार्यकर्ता खुला समर्थन देते हुए रेलवे ट्रैक पर दिखाई दिए थे. इनेलो के एक मात्र राज्यसभा सदस्य गैर जाट रणबीर गंगवा ने द संडे इंडियन से कहा, 'हुड्डा ने मिर्चपुर मामले में जाट और दलित दोनों के साथ विश्वासघात किया. राहुल यदि वास्तव में दलित हितों की रक्षा करना चाहते थे तो उन्होंने सरकार के खिलाफ कदम क्यों नहीं उठाया?'
दूसरी तरफ, मिर्चपुर कांड के बाद प्रदेश में अस्तित्व में आए गैर जाट संगठन के प्रदेश अध्यक्ष वेदपाल तंवर ने हुड्डा के साथ-साथ पूरे जाट समुदाय को आतंकवादी करार दिया. तंवर कहते हैं, 'प्रदेश में जाट समुदाय ने न केवल दलितों का, बल्कि अन्य बिरादरी के लोगों का जीना दूभर कर रखा है.'

गैर जाट होते हुए भी बारह साल तक प्रदेश की कमान संभालने वाले राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एवं हरियाणा जनहित कांग्रेस के संरक्षक भजनलाल का बीती तीन जून को निधन हो गया. उनके अंतिम संस्कार में जिस तरह छत्तीस बिरादरी की भीड़ जमा हुई, उससे हजकां को प्रदेश में एक बार फिर से आशा की नई किरण दिखाई देने लगी है. हालांकि यह तो वक्त ही बताएगा कि हजकां सुप्रीमो एवं भजनलाल के पुत्र कुलदीप इस सहनुभूति लहर को अपने पक्ष में बरकरार रखने में कहां तक सफल हो पाते हैं.

भाजपा समाज कल्याण सेल के प्रदेश अध्यक्ष अरिंवद शर्मा हुड्डा सरकार की नीति को पूरी तरह से दोषपूर्ण बताते हैं. शर्मा कहते हैं, 'यदि सरकार जाटों और दलितों के बीच हुए विवाद को समय रहते हल कर लेती तो मिर्चपुर का स्वरूप यह नहीं होता. इसके विपरीत वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं पूर्व उपप्रधानमंत्री स्वर्गीय देवीलाल के बेटे रणजीत कहते हैं, 'हुड्डा जाटों के बीच तेजी से अपनी पकड़ बना रहे हैं. यही कारण है कि रोहतक और सोनीपत के जाटों का उन्हें पूरा समर्थन मिला है.'
रणजीत, भले ही कांग्रेस और हुड्डा के पक्ष में दावा करें, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि प्रदेश में जाट अलग-अलग भागों में बंटे हुए हैं. भिवानी के इलाके में अगर पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय बंसीलाल की पुत्रवधु एवं मंत्री किरण चौधरी का दबदबा कायम है तो कैथल में मंत्री रणदीप सुरजेवाला का, जींद क्षेत्र में पूर्व मंत्री एवं कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य प्रोफेसर विरेंद्र सिंह का और सिरसा में ताऊ देवीलाल के परिवार यानी पूर्व मुख्यमंत्री एवं इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला और उनके भाई और रणजीत सिंह का जो फिलहाल कांग्रेस में हैं.
हिसार जैसे जाटलैंड में भजनलाल के गढ़ को चुनौती देने के लिए, जाट हालांकि पूरी ताकत लगाए हुए हैं फिर भी जाट नेता के रूप में किसी की सर्वमान्य छवि नहीं बन पाई है. प्रदेश की 90 विधानसभा सीटों में से लगभग 30 पर किसी न किसी रूप में जाटों का नेतृत्व रहता है. इसके अलावादलित वर्ग से संबंधित सीटों पर भी जाटों का प्रभाव रहता है. यह बात कांग्रेस और इनेलो अच्छी तरह समझती हैं. तभी तो इन पार्टियों को जब भी मौका मिलता है, जाटों को अपनी तरफ करने का कोई मौका नहीं छोड़ती हैं.
हरियाणा के बारे में एक पुरानी कहावत है कि जाट समुदाय कुर्सी को लेकर इतना अधिक सजग रहता है कि उनके परिवार का एक सदस्य अगर ताऊ देवीलाल का कार्यकर्ता होता तो दूसरा बंसीलाल का. इसके पीछे एक मात्र कारण यही था कि गैर जाट के पास कुर्सी किसी भी कीमत पर न जाने दी जाए. यह बात अलग है कि भजनलाल ने अपनी राजनीतिक 'पीएचडी' के माध्यम से बारह साल तक प्रदेश की बागडोर संभाले रखी. इतना ही नहीं, अंतिम दिनों में भी वह हिसार यानी जाट बहुल क्षेत्र से सांसद बनने में कामयाब रहे.
मौजूदा विधानसभा में भले ही कांग्रेस ने बहुमत का आंकड़ा निर्दलीय विधायकों के सहारे पार किया हो, लेकिन पार्टी में जाट विधायकों की संख्या, इनेलो के एक दर्जन जाट विधायकों से कहीं अधिक है. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के दिग्ग्ज जाट नेताओं-पूर्व मंत्री प्रोफेसर वीरेंद्र सिंह, हरियाणा योजना आयोग के उपाध्यक्ष रणजीत सिंह, बंसीलाल के दूसरे पुत्र एवं भारतीय क्रिकेट कंटोल बोर्ड के पूर्व चेयरमैन रणबीर महेंद्रा सहित कई जाट नेताओं की हार के लिए पार्टी के कुछेक नेता हुड्डा को ही दोषी ठहरा रहे हैं. दूसरी ओर कांग्रेस के अंदर, समय-समय पर केंद्रीय मंत्री सुश्री शैलजा पर मिर्चपुर के दलितों को प्रश्रय देने का आरोप लगता रहा है.
इस मामले में सच्*चाई जो भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि कांग्रेस का दलित प्रेम हुड्डा सरकार के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है. सरकार के निर्देश पर हिसार जिला प्रशासन मिर्चपुर के दलितों के पुनर्वास पर करोड़ों रुपये खर्च कर चुका है. पीडि़त परिवार के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के अलावा नकद मुआवजा भी दिया जा चुका है, फिर भी मिर्चपुर की आग बुझने का नाम नहीं ले रही. रोहणी की विशेष अदालत में ताराचंद की पत्*नी कमला देवी और बेटा प्रदीप 98 आरोपियों के खिलाफ गवाही दे चुके हैं. ताराचंद का दूसरा बेटा अमर लाल और कर्ण सिंह, जिसकी शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई थी, वे भी बचाव पक्ष के गवाह बन चुके हैं.
हुड्डा सरकार ने पिछले दिनों प्रदेश और केंद्र में जाटों को आरक्षण देने की वकालत करने के लिए पिछड़ा आयोग का गठन भी कर दिया, लेकिन आयोग की कमान जाट नेता को नहीं सौंप पाई. ऐसे में यही लगता है कि मिर्चपुर मामले में फैसला चाहे जिसके पक्ष में आए, हुड्डा की परेशानी कम नहीं होने वाली.

http://www.thesundayindian.com/hi/story/juridiction-come-on-mirchpur-accident/2/4191/
http://www.ndtv.com/article/india/j...in-mirchpur-violence-block-rail-traffic-79600
http://www.ndtv.com/article/india/m...n-life-imprisonment-145468?h_related_also_see

http://dainiktribuneonline.com/2011/03/मुख्यमंत्री-के-इशारे-पर-फ/

http://www.punjabkesari.in/news/article-231729
 
Jatland ki website hai to yahaan Jats ki hi baat karunga brother, aapko all communities ki baat karni hai to kisi all community platform par aa jaayen!


let everyone decide irrespective of ur guidelines.
Election commision of india has given this right to "every individual" else they wud have created just one single vote for entire jat clan n u wud hv decided about that one single heavy vote. u have tried to put is cleverly but ur luv for congres is visible in dis thred.
 
Jats in Haryana are happy and safe under the hands of Congress from last 10 years.. Keep anti-incumbency factor aside

Our votes should split at most among 2 parties only i.e. Congress and INLD only
We don't want non-Jat based urban parties like BJP and HJC to flourish in Haryana ..

Government records on Crime rate show increasing trend over the previous crime rate during the last decade or so.

What reasons do you visualise for anti-incumbency if the Congress Government has done good for all regions of Haryana.
 
Jatland ki website hai to yahaan Jats ki hi baat karunga brother, aapko all communities ki baat karni hai to kisi all community platform par aa jaayen!

If I have understood the meaning of his post he has challenged your views on the Congress and advocated freedom of voting right !

Kindly read his post once again to comprehend its meaning please.
 
हुड्डा के गले फंसी हड्डी - मुझे लगभग तीन साल पुराना ये लेख पढ़ने को मिला ।
मोदी प्रेम में चूर मेरे जाट भाइयों ये लेख ध्यान से पढ़े ।
आखिर में हमे न केवल आरक्षण मिला बल्कि मिर्चपुर कांड में भी न्याय मिला । हमारे कुछ जाट भाई अभी भी दोषी ठहराए गए है ,मुझे उम्मीद है कि उन्हें भी जल्द इन्साफ मिलेगा ।

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http://www.thesundayindian.com/hi/story/juridiction-come-on-mirchpur-accident/2/4191/
http://www.ndtv.com/article/india/j...in-mirchpur-violence-block-rail-traffic-79600
http://www.ndtv.com/article/india/m...n-life-imprisonment-145468?h_related_also_see

http://dainiktribuneonline.com/2011/03/मुख्यमंत्री-के-इशारे-पर-फ/

http://www.punjabkesari.in/news/article-231729


Both the issues raised by you in support of your post:

Jat Reservation case and Mirchpur case are sub judice at the present juncture and no one can predict their fate !
 
Government records on Crime rate show increasing trend over the previous crime rate during the last decade or so.

What reasons do you visualise for anti-incumbency if the Congress Government has done good for all regions of Haryana.
At least,Crime rate during Hooda Government is less than that of Choutala Government .. Particularly Jats were so unhappy with Choutala Government that they voted out him with large margin despite knowing that Congress was fighting under leadership of Bhajanlal .. Only 1 Jat MLA out of 9 MLAs in INLD tally during 2005 ..

Anti-incumbency has different meaning for different persons .. Its meaning is "Satta Virodhi Rujhan".

Though there is no strong anti-incumbency wave against Haryana Government but it is facing anti-incumbency wave of UPA government.
Some people get unhappy with Government policies and vote against them .
Some People get bored with one government and want new faces to lead government .

e.g. Jats of Jind district are unhappy with poor conditions of roads ..They want Birender Singh or Choutala to become CM.. This is anti-incumbency for them.

Thus,anti-incumbency is feeling of Change in the mind of voters .
They feel that "Chahe kitna bhi vikas kar diya ho,chahe Jat aarakshan mil gya ho ,, par hume to badlav chahiye .. "
 
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