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पकड़ दादा जी की अंगुली , किया हमने बचपन पार।
उलझ समझदारी के दामन में ,रह गया सब उधार ,रह गया सब उधार ॥
एक बात थी उनकी निराली ,नहीं रहते थे कभी ठाली,
बैलो संग जाते जब खेतो में , कहते लोग चला रे हाली...