जट्टू कवितायें ॥

सूरजकुंड मेला म्हं मजे कसूते आए

भीड कसूती चाला थी
घणी ए टंगरी माला थी
कोए बटुए बेजण आला था
कुर्सी मेज अर ताला था

हरियाणा के झबरू कुते भी ओडै पाए
सूरजकुंड मेला म्हं मजे कसूते आए

कोए कुलफी 50 रूपयां की बतारा था
कोए गोलगप्पे 30 के 6 खुवारा था
सारे कमाई पै चालरे थे
सब भीड म्हं भम्र पालरे थे
हामनै तो गोलगप्पे भी मेला त बाहर खाए
सूरजकुंड मेला म्हं मजे कसूते आए

छोरी घणी कसूती आरी थी
कोए पतली कोए भारी थी
भीड म्हं भीडके चालै थी
सीधी कबड्डी घालै थी
म्हारे सामी कई छोरिया नै टिसरट पै जहाज मंडवाए
सूरजकुंड मेला म्हं मजे कसूते आए

अंगेजां के जोडे भी कमाल थे
वे तो उपर तै नीचे तई लाल थे
हरियाणवी छोरां के तो बुरे हाल थे
बूढ नाचण म्हं आपणे सबतै टाल थे
संस्करिति के रूखालै हामनै आगै ए पाए
सूरजकुंड मेला म्हं मजे कसूते आए

हरियाणा का आदमी होगा ब्होत स्याणा
कई अंग्रेजा नै भी खाया देशी खाणा

हामनै तै आगलै साल भी ओडै सै पाणा
हरियाणवी छोरे तो हर किते छाए
सूरजकुंड मेला म्हं मजे कसूते आए

-----------बेरा कोणी ।
 
न्यारे-न्यारे स्वाद जगत मैं

न्यारे-न्यारे स्वाद जगत मैं, टोहवैं रंक और राजा
स्वाद का के बेरा भाईयो, कुणसी बात पै आज्या

रेल के मैं सोण का
पाँच रुपये खोण का
दारू पी के रोण का स्वाद न्यारा सै
टीले तैं नीचे भाज्जण का
ब्याहली रात नै जागण का
कात्तक में जाड़ा लागण का स्वाद न्यारा सै
खड़ी शिखर दुफ्फारी मैं जै काली घटा छाज्या
स्वाद का के बेरा भाईयो, कुणसी बात पै आज्या
मन्त्री के गेल्याँ यारी का
कंगले नै मोटर लारी का
अर आधी छुट्टी सारी का स्वाद न्यारा सै
खेत में रोटी खाण का
जोहड़ के म्हां न्हाण का
याणे बालक नै खिलाण का स्वाद न्यारा सै
बाट हो दूर की, अर धूरर की सवारी पाज्या
स्वाद का के बेरा भाईयो, कुणसी बात पै आज्या
गर्मियों में आम का
फागण की शाम का
मीठे-मीठे जुकाम का स्वाद के कहूँ
जाड़े मैं रजाई का
छोह मैं समाई का
बूढ़े की सगाई का स्वाद के कहूँ
झड़ के म्हाँ जै थानेदार रिपट कै पड़ज्या
स्वाद का के बेरा भाईयो, कुणसी बात पै आज्या

मौके पै कही गई बात का
माँ नैं बालक की लात का
मींह मैं टपकती छात का स्वाद के कहूँ
खाट पै तैं पड़ण का
सूते-सूते डरण का
तड़कै-ए होका भरण का स्वाद के कहूँ
स्वाद-स्वाद में सूल्फे का ऐबी किलो लाड्डू खाज्या
स्वाद का के बेरा भाईयो, कुणसी बात पै आज्या

ठॉडे गेल्याँ अकड़ण का
भॉज़ कै रेल पकड़ण का
कुण्डी मैं सोटा रगड़ण का स्वाद तो ले कै देख
होके मैं डीकड़े तोड़ण का
हारे मैं खिचड़ी रोड़ण का
भजा के टैक्टर मोड़ण का स्वाद तो ले कै देख
टैक्टर पै होती ढूका हो, बनड़ा लाग झटका पड़ज्या
स्वाद का के बेरा भाईयो, कुणसी बात पै आज्या
 
रस बीन इश्क, इश्क बीन आशक
आशक बीन संसार नही
शर्म बीन लाज, लाज बीन बीन मतलब
मतलब बीन कोई यार नही

धन बीन दान, दान बीन दाता
दाता बीन जर सूना है
सत बीन मर्द, मर्द बीन तीरीया
तीरीया बीन घर सूना है
रण बीन शूरा, शूरे बीन तेगा
तेगे बीन घर सूना है
तप बीन कर्म, कर्म बीन कीसमत
कीसमत बीन नर सूना है
हठ बीन हार, हार बीन हाणी
हाणी बीन होशीयार नही .....शरम बीन लाज

शशी बीन रैन, रैन बीन तारे
तार्याँ बीन गगन सूना है
मोह बीन मेल, मेल बीन ममता
ममता बीन मन सूना है
हरे, गुल बीन बाग़, बीन बुलबुल
ये सब गुलशन सूना है
रंग बीन रूप, रूप बीन जोबन
जोबन बीन तन सूना है
हक़ बीन हुकम, हुकम बीन हाकम
हाकम बीन हकदार नही ...शरम बीन

मन बीन मेल, मेल बीन प्यारा
प्यारे बीन दो बात नही
जन बीन जार, जार बीन जारी
जारी बीन उत्पात नही
हे रे छल बीन दुवेष, दुवेष बीन कातल
कातल बीन कुल्घात नही
सजन बीन साजन, साजन बीन सजनी
सजनी रह एक साथ नही
दुःख बीन दर्द, दर्द बीन दुखीया
हे रे दुखीया बीन पुकार नही .. शरम

मोह बीन काम, काम बीन बीन क्रोध
क्रोध बीन अभीमान नही
गुण बीन कदर, कदर बीन शोभ्या
शोभ्या बीन सम्मान नही
भजन बीन भगत, भगत बीन भक्ती
भक्ती बिना कल्याण नही
शुर बीन साज, साज बीन गाणा
गाणे बीन तुक्दान नही
गुरु बीन ग्यान, ग्यान बिना मेहर्सींह
बद्द्यां का सत्कार नही ... शरम बीन
 
चाला पाट गया.बिघ्न माच गया.यो के देखा भाई
दिल्ली मेट्रो मे 3-4 छोरी जमा लांडी निकर पहर के आई
आया ताई आला दामन याद ,सूट-सलवार ते इन्ने ना भायी
साची ए म चाला पाट गया इब इन्ने जींस भी कोन्या रास आई
ओढ़नी होया करती शान पंजाब हो या हरियाणा
दिल्ली मे आके ते कसुता बदल गया इनका बाणा
यो साहारण इतना गाम्डू कोन्या
चाल रही स नॉएडा मे नौकरी,करी ४ साल चंडीगढ़ मे पढाई
देख्या कई तरह का फैशन मगर modernization के नाम पे
यो लत्ते घटाना इब ताईं इसके समझ मे कोन्या आई
"चुनरी जो सरके वो धीरे धीरे "--इन्ने सरकाने की स्पीड बढाई
चुन्नी तार के न कित्ते कुई मे फेंक बगाई
16 साल आले वर्जिन मोबाइल यूज़र्स भी जित वर्जिन रहे कोन्या,
Gf/Bf पालना बन गयी जित की शान
तन्ने क्यूँ जाट नाहर सिंह इस्सी दिल्ली के लिए ,
जान खपाना समझी अपनी शान
दिल्ली का के रोना रोना जब बदल गया म्हारा हरियाणा
कोणी दिखता खेत मे जोटा मारता जाट अर ना रहा दूध दही का खाना
होया करती जोरा जोरी फिल्मों मैं चने के खेत मे
म्हारे आले एक्सपेरिमेंट करन लाग रहे सें हर तरह के खेत मे
करके न उलटे काम इज्ज़त मिला राखी स इन्ने बालू आले रेत मैं
तगड़ा शरीर अर साफ़ दिल होया करता जाट की पहचान
दारु पीना अर छोरियां छेड़ना इब ते बन रही स इनकी शान
कह यो दहिया सोनीपत आला
दारु सिग्रेट मुंह के ना लगाई अर ना लगावेगा
यो देसी जाट छोरा
सारी उम्र दूध पिके मौज उड़ावेगा
कह सै लोग इस्से रोग काटन की होया करे स या उम्र जवानी
मगर इस्सी जवानी भगत सिंह अर दारा सिंह के क्यां ते ना आई
कर के न बड्डे काम इन्ने जवानी मे ही पूरे देश मे इज्ज़त कमाई
होवें स दोनों गंडासे तेज़,छोरियां का नशा दारु जितना तेज़ बताया
इस रोग से तो विस्वामित्र भी ना बच पाया
तन्ने बेरा ना हनुमान इस खातिर कौनसा चूरन खाया
दूध का धुला यो साहारण भी कोन्या
छोरियां ताकन मे पाछे यो भी कोन्या
मगर Gf का 0 टूटा कोन्या
अर या लागे से पक्की बात,
लक्ष्मण रेखा लांघे कोन्या
कह अमित दहिया भूले भगत सिंह तन्ने अर तेरी कुर्बानी न
शर्म आनी चाहिए म्हारे देश की जवानी न
तुझ जैसी सोच राखो करो बड्डे काम
छोरियों का मैल छोडो नशे भी हराम
तेरी फोटू ते कोन्या छपती नोटां पे
बांधे से यो साहारण पक्का पाला ,
अब से राखेगा ना मैल मन मे अर रहवेगा राम राम होंठा पे
राखेगा ना मैल मन मे अर रहवेगा राम राम होंठा पे
 
माँ री अपणे हाथ की रोटी खवाजा
पुराणी बात फेर याद दवाजा

पिज्जा, बरगर खा कै छक लिए
झूठे रिश्ते बणा कै अक लिए (gf)
ईब तै लौरी गा कै सुणाजा
माँ री अपणे हाथ की रोटी खवाजा

शहरी बण कै सब क्यम भूले
गामां के खेल, वो पिंग वो झूले
ईब तै आकै गूंद घलाजा

माँ री अपणे हाथ की रोटी खवाजा
पुराणी बात फेर याद दवाजा ..

-----------बेरा कोणी ।

 
क्यूं दीद्दे मटकावै सै.
उपरां-तली जलावै सै.

घर की रखले घर भीत्तर,
क्यूं इब ढोल बजावै सै.

बुड्ढे की इज्जत बी राख,
दो रोट्टी तो खावै सै.

छोड़ तिलक, साफा, माला,
तू किसनै बहकावै सै ?

चोक्खे बखत की चोक्खी याद,
बींद-बींद म्हं आवै सै.

छोड़ 'मौदगिल' बोल बड़े,
बुरा बखत भरमावै सै
 
कौण मरै श किसकी आई न्यू मर जाना खेल नहीं
या दुनिया प्यार भरी हाँडै पर प्यार निभाना खेल नहीं
और दुखां नै झेल कदे या चोट मीत की सही नहीं
पर फूल के पास लगे कांटे या बात किसे नै भी कही नहीं
प्यार मै चाहे कितने लुट ज्या कोई लेखा कोई बही नहीं
ये दास कबीरा के दोहे श सदा किसे की रही नहीं
या दुनिया काले नाग बराबर यो सांप खिलाना खेल नहीं
या दुनिया प्यार भरी हाँडै पर प्यार निभाना खेल नहीं

-----------बेरा कोणी ।
 
9 बेटे हो एक बाप कै
ना पेट भरण पावेगा
बीर मरद रह न्यारे न्यारे
इसा बखत आवेगा
घर घर मै पंच्याती हो ज्या
कुन किसने सिम्झावेगा
मनुष-मात्र का करम छोड़
निर्धन जोड्या चाहवेगा
बाँध रकम नै कर कै मर ज्या
इसा कलजुग आवेगा

धन के कारन धरम घटेगा
पाप की जीत रहवेगी
खान पान पहरान बदल ज्या
ना कुल की रीत रहवेगी
दो दो दिन की न्यारी हो ज्या
ना सच्ची प्रीत रहवेगी
बहन भाई के चलेंगे मुक़दमे
बिगड़ी रीत रहवेगी
बीर नौकरी करया करेंगी
फेर बी ना चले गुजारा

छत्रापन बी घट ज्यागा
औरतां का राज होगा
हिजड़े बनेगे मंत्री
नीचा के सर ताज होगा
अधरम तै चालेगी कचेहरी
अधरम बेअंदाज होगा
भाई तै भाई लड़ ज्यांगे
इसका कौन इलाज होगा
बीर उघडे सर हान्ड़ेगी
उडड कत्ती सत्यानाश होगा
 
रै ओ बीरेन्द्र, क्यूँ पॉकै सै धरमेन्दर

हर दम बीड़ी खींचे जा सै
ज़हर तैं तन नैं सींचे जा सै

घड़ी-घड़ी मैं तूँ खांसण लाग जा सै
कुछ कहैवें सैं तन्नै, तो हांसण लाग जा सै

दस जगहाँ तैं फूक लिया कुरता, इसमैं तैं राख झड़े जा सै
धोरै कोय बैठ ना सकदा, बांस तैं कुत्ता-सा सड़े जा सै

कितना साफ दिल का तू माणस, बीड़ियाँ नै कॉला कर दिया
तन्नै आपणै शरीर की गेल्यां, यू कूणसां चॉला कर दिया

किसा छैल था तूँ, इन बिड़ियाँ नै खा लिया
इब तो इसा लागै सै, अक तरा ओड़ आ लिया

मत पीवै रै तूं मर ज्यागा
बेरा ना किस-किस नैं बिरान कर ज्यागा

जै यू-ए हॉल रहया तो, तू खटेबा करवावैगा
दीख लिया ढंग, तू बारणै आगै दरी बिछवावैगा

तू छोड़ दे बीड़ी, ये सिर नै चकरावैं सैं
कैंसर कर दैं, टीबी कर दैं; फेफडाँ ने कमजोर बणावै सैं

बोल्या, बात तेरी ठीक सै, पर मैं कुणसा अकड़ रहया सूँ
सारै कहँ सैं छोड़ दे, बता मैं के बिजली का तार पकड़ रहया सूँ

मैं बोल्या, या सारी दुनिया तन्नै ठीक समझावै सै
यू बीड़ी का ज़हरी धूम्मा, सहज-सहज मौत की तरफ ले जावै सै

हांस कै बोल्या, बात तेरी सोलह आने, ना इसमै कोय रोल सै
सहज-सहज-ए ठीक सै, हामनै के मरण की तौल सै

मैं बोल्या, तू मर के देख ले, किसे का कुछ ना जाता
यारे-प्यारे, रिश्तेदार सबका सै ऊत खाता

किसनै फुरसत सै अक सोचै, तू यू के करग्या
बस एक बै कहैंगे – आच्छा होया, मरग्या

एक कहैगा, क्यूकर जाऊँ मेरी तो आज गेहूँ लिकड़णी सै
दूसरा कहेगा, बार होगी मन्नै तो रेल पकड़णी सै

कोय कहैगी, एकली क्यूकर जाऊँ मैं औरत की जात
राठी कहैगा, कोन्या जाऊँ क्यूं ना मानी मेरी बात

बस अपणी-अपणी डपली, अर आपणे-आपणे राग
किसकै फरक पड़ै सै, चाहे कितै लागी री हो आग

पर चाहे कोय टल ज्याओ पर वो क्यूकर टलैगी
कुछ ज़िन्दगी तो जरूर सै, जो इस आग मैं जलैगी

जिसनै मोड़ बांध के ल्याया था, वा-ए तेरी ब्याही
कुछ दिन तो टोहैवैगी कित गया, मेरी ननद का भाई

फेर माथे की सूनी माँग-सी, इसनै रॉही पा ज्यागी
घर-बाहर की तकरार सुण कै, वा पत्थर-सी हो ज्यागी

पौ की रात-सी लाम्बी ज़िन्दगी, उसकी क्यूकर कट ज्यागी
कोय भी ताना दे सके सै, कि निराभाग ख़सम नै खाग्यी

बस सुण कै नै वा आपणे गोड्या मै सिर दे लेगी
इन दुष्ट बीडियां की करतूत आपणे सिर पै ले लेगी

तेरा छोरा बुझैगा दादा तैं, मेरा बाबू कोड बै आवैगा?
बुढ़े बाप की खांसी मैं, वो भोला रल जावैगा

उठो-संभलो, भाइयो ! अपणी ज़िन्दगी नैं न्यू टॉलो ना
हरियाणा के छैल शरीराँ नैं, इस धुम्मे मैं गॉलो ना

रै के चॉला होगा, सारी जनता बिड़ियाँ पै जीण लागगी
इब तो न्यू सूणा सै, अक बुआ भी बीड़ी पीण लागगी

खत्म करो इस धूम्मे नैं, सुथरी ताज़ी हवा चलाओ
22, 27, पहलवान अर डमरू सारयां नै तोड़ बगाओ

फेर देखो, म्हारा हरियाणा एक नये शिखर पै हाँसैगा

अर फेर तो रात नै म्हारा बीरेन्द्र भी ना खाँसैगा

अर फेर तो रात नै म्हारा बीरेन्द्र भी ना खाँसैगा
 
:: असली हीरो ::
शहर में लॉग रहया मेलॉ,
लोगाँ का कट्ठा होरया रेला
मैं अर छोरा दोनूँ मिलकै
पहुँचगे उड़ै ले कै झोलॉ
छोरा बोल्या, बाबू मिजी ल्यूँगा
खावण ख़ातर चीजी ल्यूँगा
खूब खाया, फेर ध्यान घुमाया
एक आदमी गुड्डे बेचता पाया
छोरे नैं सिपाही का गुड्डा ठाया
दुकानदार भी था घणा हुमाया
बोल्या, यू चाबी का खिलौणा सै
खूब मजे का उसका बिछौणा सै
चाबी भरते ही बूट कै बूट मारैगा
इसा ज़ोर का सैलूट मारैगा
डण्डा घुमावैगा, लाग्या तो रूवावैगा
इसा खिलौणा और किते ना पावैगा
पीसे दे दो, पचास रुपये में आवैगा
मैं बोल्या, तू हामनैं के बहकावैगा
इन खिलौणां पै इतना क्यूँ इतरावै सै
पचास रुपये मैं तो असली का पुलिसिया आवै सै
सुण कै दुकानदार के तेवर चढ़गे
हाम दोनूं भी ऑगे बढ़गे
फेर छोरे नै एक पोस्टर नज़र आया
उसनै झट एक सवाल फरमाया
न्यूँ बोल्या, बाबू यू कुणसा हीरो सै
पोस्टर की कलर-स्कीम तो ज़ीरो सै==>
==> कुणसी फिल्म में आया
पिछाण ना पाऊँ, कै चालै से
म्हारे देश के हीरो तो मूछ मुण्डे सैं
यू तो मूच्छाँ ऑला हीरो सै
मैं बोल्या, बेटे यू असली हीरो सै
तेरा सलमान, शाहरूख इसके आगै ज़ीरो सै
इसनैं अंग्रेजाँ की ज़्यान का कट करया था
बम फोड़ कै असली का स्टंट भरया था
घर-बार, माँ-बाप नै भूला था
हंसते-हंसते फांसी पै झूला था
हीरोइन इसकी मौत थी
गुलामी इसकी सौत थी
जिसके दम पै अंग्रेज़ इस देश तैं बाहर सै
सच बताऊँ मेरे लाडले, यू भगत सिंह सरदार सै
छोरा बोल्या, समझग्या मैं, पर बात मैं कुछ रोल सै
क्यूँ बहकावै सै बाबू, यू तो बाबी दयोल सै
मैं आसमान कॉनी लख़ाया
भगतसिंह बादलाँ मैं नज़र आया
मैं रो पड़ा; बोल्या, सरदार म्हारै मैं खोट सै
आज फांसी के फन्दे तैं भी कसूती या चोट सै
आज दिन में पहली बार अपणे-आप में शर्माया
गलती मेरी सै; मन्नै, नई पीढ़ी ताँय तेरा बलिदान ना बताया
ज्यायें तैं तो आज या रोलँ सै
कि म्हारे हीरो भगत-सुखदेव नहीं,
बल्कि शाहरूख और दयोल सै

--------जगबीर राठी
​
 
सच्ची बात
मन्ने पूछ्या बान्दर त,
क तेरे जी म आई

दिवाली प मिठाई छोड़,
तनने क्यों कुल्फी खाई

बान्दर बोल्या सुन जगबीर,
मैं करता नही ह्न्गाई

मावा सारा नकली स ,
इक कारन कुल्फी खाई

--------जगबीर राठी​
 
जीणा
पाणी के बार पै, लड़ै सांप के ज़हर-सा
घुप्प अन्धेरा, पौ का पॉला रात के आखरी पहर-सा
पायाँ मैं चुभती सूल-सा
बोदे डाहले की झूल-सा
याणे बालक की टोक-सा
घा कै चिपटी जोंक-सा
कुत्ते आले हाड्ड-सा
बांगर मैं आई बाढ़-सा
फसल उजड़ण की सोच-सा
घायल साँप की लोच-सा
थाम जग मैं टोहवोगे जिसा, पाओगे उसा
किते किसा, किते किसा
जिसा देखो सै, वो उसा

जीणा
किते किसा, किते किसा

--------जगबीर राठी​
 
तेरी झांकी के माहं गोल मारूं मैं बांठ गोफिया सण का
एक निशाना चुकण दयूं ना मैं छलिया बालकपण का
लांबे-लांबे केश तेरे जंणू छारहि घटा पटेरे पै
ढुंगे ऊपर चोटी काली जंणू लटकै नाग मंडेरे तै
घणी देर मैं नजर गयी तेरे चंदरमाँ से चेहरे पै
गया भूल पाछली बातां नै मैं इब सांग करूँगा तेरे पै
मैं ख़ास सपेरा तू नागण काली, तेरा जहर दीख रह्या सै फण का
एक निशाना चुकण दयूं ना मैं छलिया बालकपण का
बिन बालम के तेरे यौवन की रेह-रेह माटी होज्यागी
कितै डूबण की जानैगी तेरै गात उचाटी हो ज्यागी
कितै मरण की सोचैगी तेरी तबियत खाटी हो ज्यागी
मेरी गेल्याँ चाल देख मेरी राज्जी जाटी हो ज्यागी
हठ पकड़ कै बैठी सै रै जंणू शेर सै यो बब्बर का
एक निशाना चुकण दयूं ना मैं छलिया बालकपण का
दुनिया मैं लिया घूम मिली मनै इसी लुगाई कोन्या
इतनी सुथरी शान शिकल की कोए दी दिखाई कोन्या
खुनी खेल तेरे गारू मैं दर्द समाई कोन्या
कुंवारापण तेरा दिखै सै तू इब लग ब्याही कोन्या
हाली बिन समरै ना यो तेरा खेत पड़या सै रण का
एक निशाना चुकण दयूं ना मैं छलिया बालकपण का
छाती खिंचमां पेट सुकड़मां आँख मिरग की ढाल परी
नाक सुआसा मुहं बटुवा सा होठ पान तै बी लाल परी
लेरी रूप गजब का गोल, तू किसे माणस का काल परी
लख्मीचंद था न्यूं सोचैगी करकै दुनिया ख्याल परी
मेरा गाम सै सिरसा जाटी, मैं चेला मानसिंह बामण का
एक निशाना चुकण दयूं ना मैं छलिया बालकपण का
 
[h=5]धन जोड़ रहे मुख मोड़ रहे या मौज उडावे संसार,
जगत में बोहत दुखी ज़मींदार...
आधी रात पहर का तड़का देक्खे बाहर लिकड़ कै नै,
ढाई गज का पाट्या खंडवा ऊपर गोस्सा धर कै नै,
एक बाज्जू का कुड़ता पहरया ऊंची धोत्ती कर कै नै,
करे चलन की तियारी खेत में दोन्नु बैल पकड़ कै नै,,
ऊपर धुप पडे निच्चे धरती त्प्पे..
अर यो बीच में तपै ज़मींदार जगत में बोहत दुखी ज़मींदार...
दोहफारे की रोट्टी ले कै ज़मिदारनी आई ,
गंठा-रोट्टी ल्याई खेत में वा साग बनावन ना पाई,
अर ज़मींदार नै आपणे करम मैं वें ऐ सोचय कै खायी..
तारयाँ की छांह हाली आया ना नहाया ना खाया,
थोडी सी वार में जगा दिया वो सोवणबी ना पाया,
ठा कै कस्सी चाल्या खेत मैं नाक्का-बंधा लाया,
एक नाक्के मैं आप डेह पडया मरता हुआ जडाया,,
यें सरकारी- यें पटवारी सब सोवेंपैर पसार जगत मैं बोहत दुखी ज़मींदार...
करी लामणी पैर गेर लिया जेट्ठ-साढ़ के म्हीने मैं,
ज़मींदार का सारा कुणबा हो रहया दुखी पसीने मैं,
आंधी अर तूफ़ान आग्या बह्ग्यी रास्य जोहड़ के मेंह..
चार धडी भुरली के दाणे इईब रहे सेबाक्की,
लुहार बी न्यू कहां लाग गया जडी थी मन्नें दरांत्ति,
ग्गाड्डी ऊंघी जुआ बनाया कहन लाग्गया खात्ती,
चुहडी अर चमारी दोन्नु पैर लेवन नै आई सें,
इब भुरली के दाणे चुगरदे नै जाने यें भी लेग्ये खात्ती-लुहार..
जगत मैं बोहत तै घणा दुखी ज़मींदार...
[/h]
 
जिसमे स दम माहरी बोली सीख के दिखा दयो
अर सीख्या पाछे हरियाणवी त छीक क दिखा दयो
इस बोली के रंग कई स, कहन के इसके ढंग कई स
कम्बल के बाल न लफूसडा कह दयां,
जुत्या न हम खोसडा कह दयां
नुक्सान होवे तो याता कह दयां
... शादी-शुदा न ब्याहता कह दयां
सास न हम साहसु कह दयां
आच्छे मानस न धांसू कह दयां
अर ख़त न कह दयां, चिठ्ठी- चाठी,
धून का पक्का कुहावे ठाठी
माहरी बोली माहरी स, सब बोलिया त न्यारी स
सबका तोड़ मिल जावेगा,, सौ का जोड़ मिल जावेगा
पर माहरी बोली धाकड़ स, या तो सिक्या पापड़ स
कोए इस पापड़ सा सीक के दिखा दयो............ ..जिसमे स
दम............. ..
केले को हम केल्ला कह दयां,
मेले को हम मेल्ला कह दयां
छोरी न हम टिंगरी कह दयां
छेड़खानी न टिगली कह दयां
किते काम बिगड़े तो मठ मर ज्यां स
माहरी बोली त लठ गढ़ ज्या स
पैसे न हम पिस्सा कह दयां
आनंद न हम जीस्सा कह दयां
अर कह दयां बीडी-बाड़ी हम
दोस्त न कह दयां याडी हम
माहरी बोली माहरी स, सब बोलिया त न्यारी स
सबके बस की ना स या
कोरी धसकी ना स या
इसका व्याकरण टेढ़ा स
इसने समझनिया ढेठा स
इसके सारे बोल कोए लिख के दिखा दयो........जिसम े स
दम........
जो ना कतरावे डाकी कह दयां
खिड़की न हम ताकी कह दयां
टेढ़े न हम झोल कह दयां
थप्पड़ न हम धोल कह दयां
कालिये न हम भुंडा कह दयां
गंजे न हम रुंडा कह दयां
ह्म्भे माहरी हाँ होवे स
अह माहरी ना होवे स
महरा कहना माहरा स
कडवा पानी खारा स
माहरी धोती क भी लांगड होवे
लठ लेरे तो बांगड़ होवे
सबके बसकी ना स या
कोरी धसकी ना स या
कोए इसके आगे टिक के दिखा दयो......जिसमे स दम
माहरी बोली सीख के दिखा दयो....

---------बेरा कोणी ।
 
ला लिया ac इब चुबारे में ,
सुखा नहीं पसीना कड़े जमिन्दारे में
खूड बेच के ला लिया ac चुबारे में

कोठी ले ली , कार कढा ली
तार पजामा , जींस चढ़ा ली
इसा फुल्या जणू भरगी हवा गुभारे में
खुड बेच के ला लिया ac चुबारे में

खेत बिकगे इब रोड पे जावे ,
भेस रही न इब झोड़ पे क्यों जावे ,
इब होवन लागया सारा काम इशारे में
खुड बेच के ला लिया ac चुबारे में

बाथरूम में बडके नहावे
माटी ते इब नाक चढ़ावे
आवन लागी बदबू इब गाम के नज़ारे
ते
खुड बेच के ला लिया ac चुबारे में

माँ जीसी धरती ने बेच के
चाले से इब उप्पर देख के
गाम कहवे से इब होगी मरोड़ धारे में
खुड बेच के ला लिया ac चुबारे मै

---------बेरा कोणी ।
 
बिना आग ना उठै धूमा, न्यू कहगे ज्ञानी ध्यानी,
फंस छोरी के प्रेमजाल में कर ग्यामाणस नादानीi
यो नशा हुश्न का बोतल जितना, आशिक का मन डोळ्या,
कामाग्नी के बाण नुकीले, पत्थर साकालजा छोल्याi
घर में सुथरी नार, यो पापी मन डटताकोन्या,
भंवरा बण के रस पीवण तैं माणस पाछे हटते कोन्याi
बड़े बड़े सन्यासी डिग ज्यां जब जोबन ले अंगडाई,
विस्वामित्र भी भोगी होग्या जब मेनका नै करी तुड़ाई....!!!!

---------बेरा कोणी ।
 
जेठ की धूप में बल बल के
रंग म्हारा पक्का हो लिया ...
तू छोड़ दे बीबा खेडा जाट का ,
तेरे चक्कर मेंबेरा न कितना का फजीता हो लिया...
8-10 बीघे रह री सै बस धरती मेरे नाम पे बाकी
सब बैंक आला के हवाले हो लिया ..
तू बड़े बाप की बेटी सै गरीबी का तन्ने के बेरा ,
टोह ले कोई और बेली क्यूंकि.....
जाट की रात का न सै कोई सवेरा ।

---------बेरा कोणी ।
 
पँजाब आली छोरी की,
जीदँ मैँ बणजारी की ,
अरै मिलै तनखा फरी की,
बात ई न्यारी हो सै............ .
.
सोनीपत के पहलवान की,फतेहाबाद के बेवङे जाट की ...
अरै मेवाती कटटर मुसलमान की........बात ई न्यारी सै..
.
भिवानी के शेर बॉक्सर की,
सहवाग गजेँ के सिक्सर की
,अरै जाट अनाङी अफसर की.,,
बात ई न्यारी सै............

टोहाना के धान की,,
फतेहाबाद के किसान की,
अरै पचाँयीतिया के फरमान की,,
बात ई न्यारी सै...........

म्हारे हरियाणे के छोराँ शरारत की,
म्हारी छोरीयाँ की शरफात की,
अरै बिना बात लेणी आफत की,
बात ई न्यारी सै..........

लास्सी पी के खेत कमावाँ की,
दुध घी खुब खावाँ की,
अरै देश खातर मर जावाँ की,
बात ई न्यारी सै,

बहुआँ के काम की,,,
हाजिर जवाबी छेल हरियाणे की,
कदे खाणी ना रोटी हराम की,,
बात ई न्यारी सै.......

चौक मै हुक्के की घुँट की,
बिङी की आखरी घुँट की,
अरै ब्या मै छोरीयाँ के सुट की ,,,
बात ई न्यारी सै.........

सौवाँ खातर खाटाँ की,
हरियाणे आलाँ के ढाठाँ की,
अरै उनके महाँ बी जाटाँ की,
बात ई न्यारी स
 
माणस सुन्ना परिवार बिना |
नार सुन्नी भरतार बिना |
बाबा सुन्ना प्रचार बिना |
डाक्टर सुन्ना बीमार बिना |
बाणिया सुन्ना व्यापारबिना |
भामण सुन्ना त्यौहार बिना |
फौजी सुन्ना हथियार बिना |
नेता सुन्ना भ्रष्टाचार बिना |
 
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