जट्टू कवितायें ॥

Maraa Andi haryana
तुलसी की जगह मनी प्लांट ने ले ली।
चाची की जगह आंटी ने ले ली ।
पिताजी डेड हो गये।
भाई तो अब ब्रो हो गये।
बेचारी बहन भी अब सिस हो गयी।
दादी की लोरी तो अब
टाँय टाँय फिस्स हो गयी।
टी.वी. के सास बहू मे भी
अब साँप नेवले का रिश्ता है।
पता नही एकता कपूर
औरत है या फरिश्ता है।
जीती जागती माँ बच्चो के लिए
ममी हो गयी।
रोटी अब अच्छी कैसे लगे
MAGGI जो इतनी यम्मी हो गयी।
गाय का आशियाना अब
शहरो की सडको पर बचा है।
विदेशी कुत्तो ने लोगो के
कंधो पर बैठकर इतिहास रचा है ।


-------बेरा कोणी ।
 
छोटी छोटी बात पै बेशक कितनी ए लड़ाई हो सै
आदमी की सबसे बड़ी हिम्मत उसकी लुगाई हो सै

पत्थर की भी छाती चीर दे सच में तारे तोड़ ल्यावे
अगर मेहनतकश की सच्ची हौसला अफजाई हो सै

किसे की हाय लागै प्यार में तो सदा याद राखियो
नजर उतारण की खातिर बस नूण और राई हो सै

उस हरामी धन का के कमीनेपण तै कोए जोड़ ले
असली दौलत तो अपणे दस नूआं की कमाई हो सै

रिश्तेदारी हो या महोब्बत पल्ले गांठ मार लियो
सच्चाई की झूठ बोलण तै ना कदे भरपाई हो सै

अपनापण दिखावे तो बेटे तै भी बढके दिखा दे
कमीनेपण पै आवे तो खतरनाक जमाई हो सै

जब तक जिन्दा रहवैगी माँ बाप नै भूलती कोन्या
बेचैन झूठ कहवे सै लोग बेटी तो पराई हो सै

--बेचैन
 
धारा उपर तैर रहे हैं सब खादर के गाँव।

टूटे छप्पर छितरी छानें सब आँखों से ओझल
जहाँ झुग्गियों के कूबड़ थे अब जल, केवल जल
धँसी कगारें मुश्किल टिकने हिम्मत के भी पाँव।

छुटकी गोदी सिर पर गठरी सटा शाख से गात
साँपों के सँग रात कटेगी शायद ही हो प्रात
क्षीर-सिंधु में वास मिला है तारों की है छाँव।

मौसम की खबरें सुन लेंगे टी वी से कुछ लोग
आश्वासन का नेता जी भी चढ़ा गए हैं भोग
निविदा अख़बारों को दी है बन जाएगी नाव

घास-फूस का टप्पर शायद बन भी जाए और
किंतु कहाँ से लौटेंगे वे मरे, बहे जो ढोर
और कहाँ से दे पाएंगे वे साहुकार के दाँव

---------राजेंदर गौतम
 
"ना समझे वो भों कोए "

पहाड़ में आया सेलाब ,
करग्या घन्या ने बरबाद ,
पाणी ने मचाया रोला ,
गेल्याँ बहग्या भोला ॥


ना बच्या कोए मठ ,
ना बच्या कोए पंडा ,
बह्गे देवता अर भगवान् ,
परकरती ने मार्या डंडा ॥


पोंह्चे अफसर सरकारी ,
उन्न ने बताई लाचारी ,
घनिये हेल्पलाइन बनाई ,
पर किहे ने एक भी ना ठाई ॥


अफसर नेता होए राजी ,
सहायता राशी खाण के साझी ,
रोवें मगर मच्छ के आंसू ,
खावांगे धन मिल के धांसू ॥


माणस तू क्यूँ भकाया हांडे ,
जित धरम लुटेरे मौत बंडे ,
इब्ब तू क्यूँ ठाडू-ठाडू रोये ,
जो ना सम्झ्या ,वो भों-कोए .........
जो ना सम्झ्या ,वो भों-कोए .........

जो ना सम्झ्या ,वो भों-कोए .........रवि "अतृप्त "
 
"जी फंस्ग्या "


भूंडी ढालाँ जी फंस्ग्या मेरा ,
थारे तें के बताऊँ ढब्बी ?
माड़ा हो ज्याँ ते मेरी माँ टोके ,
मोटा होऊं ते बहू ढब्बी ॥


------------भुंडी ढालाँ----------


घर में रहूँ ते कहवें घर घुशड ,
यार जीण दें ना मन्ने ढब्बी ,
बाहर हाँडूं ते घराली रुस्से ,
घणा हंडोर बतावे मन्ने ढब्बी ।।


------------भुंडी ढालाँ----------



घणा कमाऊं ते भाई हान्सें ,
धन की भूख बतावें ढब्बी ,
ताश खेलूँ ते बहु कोशे ,
करमहीन के ब्याही ढब्बी ।।


------------भुंडी ढालाँ----------



सुथरा पहरुं ते माच्णा बतावें ,
हाँस के जावें गाल की नार ढब्बी ,
थेगलिया पहरुं तें सुरड़ा कहवें ,
इब्ब क्यूकर पार पड़े ढब्बी ॥


------------भुंडी ढालाँ----------



उधार नाट जाऊं ते आपापोखी ,
खुज्या यारां का प्यार ढब्बी ,
दे दयूं ते मुंह फेर लिकड़ज्याँ ,
मुरख बतावे मेरी नार ढब्बी ॥


------------भुंडी ढालाँ----------



न्यारा होऊं ते बाबू रुस्से ,
घर का बंटा धार ढब्बी ,
माँह रहूँ ते भाई लूटें ,
लुगाई खावे खार ढब्बी ॥


------------भुंडी ढालाँ----------



मरण-जीण में जी फंश्ग्या ,
बड़ा ओखा स संसार ढब्बी ,
किते माँ का मोह बाँध ले ,
किते प्यारी का प्यार ढब्बी ॥


------------भुंडी ढालाँ----------



चौबारे में मन्ने भाभी बुलावे ,
आजा करले आँख चार ढब्बी ,
ना जाऊं ते मन्ने किन्नर बतावे ,
जाउं ते होज्या दुराचार ढब्बी ॥


भूंडी ढालाँ जी फंस्ग्या मेरा ,
थारे तें के बताऊँ ढब्बी ?------- रवि "अतृप्त"


 
"जी फंस्ग्या "


भूंडी ढालाँ जी फंस्ग्या मेरा ,
थारे तें के बताऊँ ढब्बी ?
माड़ा हो ज्याँ ते मेरी माँ टोके ,
मोटा होऊं ते बहू ढब्बी ॥


------------भुंडी ढालाँ----------


घर में रहूँ ते कहवें घर घुशड ,
यार जीण दें ना मन्ने ढब्बी ,
बाहर हाँडूं ते घराली रुस्से ,
घणा हंडोर बतावे मन्ने ढब्बी ।।


------------भुंडी ढालाँ----------



घणा कमाऊं ते भाई हान्सें ,
धन की भूख बतावें ढब्बी ,
ताश खेलूँ ते बहु कोशे ,
करमहीन के ब्याही ढब्बी ।।


------------भुंडी ढालाँ----------



सुथरा पहरुं ते माच्णा बतावें ,
हाँस के जावें गाल की नार ढब्बी ,
थेगलिया पहरुं तें सुरड़ा कहवें ,
इब्ब क्यूकर पार पड़े ढब्बी ॥


------------भुंडी ढालाँ----------



उधार नाट जाऊं ते आपापोखी ,
खुज्या यारां का प्यार ढब्बी ,
दे दयूं ते मुंह फेर लिकड़ज्याँ ,
मुरख बतावे मेरी नार ढब्बी ॥


------------भुंडी ढालाँ----------



न्यारा होऊं ते बाबू रुस्से ,
घर का बंटा धार ढब्बी ,
माँह रहूँ ते भाई लूटें ,
लुगाई खावे खार ढब्बी ॥


------------भुंडी ढालाँ----------



मरण-जीण में जी फंश्ग्या ,
बड़ा ओखा स संसार ढब्बी ,
किते माँ का मोह बाँध ले ,
किते प्यारी का प्यार ढब्बी ॥


------------भुंडी ढालाँ----------



चौबारे में मन्ने भाभी बुलावे ,
आजा करले आँख चार ढब्बी ,
ना जाऊं ते मन्ने किन्नर बतावे ,
जाउं ते होज्या दुराचार ढब्बी ॥


भूंडी ढालाँ जी फंस्ग्या मेरा ,
थारे तें के बताऊँ ढब्बी ?------- रवि "अतृप्त"



Kuchha to log kahenge, logon ka kaam hai kahana.
 
बड़े बहादुर पुत कमाऊ
होवे जाट मतवाले
सीधे साधे माणस हो सें
दिल के ना कती काले
कौण हो भाई थाम जाटां के
तोहमत लाणे आले

दूध घी और टिंडी चूरमे
म्हारी निशानी है
दुनिया कह नशे पते में
रुलगी म्हारी जवानी है
दारु फ़ीम और टिकयाँ के
इल्जाम लगावे सै
एक बारी मैं सोचु के
बिन बात लगावे सै
अपणा आपा झांकें कोनी
जाटां पे ऊँगली ठाणे आले

कौण हो भाई थाम जाटां के
तोहमत लाणे आले

----- Narpal Singh Chahal
 
जो शरीर नै तंग करै,
वो खाणा ठीक नही,
वेवक्त घरां गैर के,
जाणा ठीक नही !

जार की यारी ,
वेश्या का ठिकाणा ठीक
नही !
ख़ुशी के टेम पै,
मातम का गाणा ठीक नही !!
बीर नै ज्यादा ,
मुंह के लाणा ठीक नही !
बेटी हो घर की शोभा ,
घणा घुमाणा ठीक नही !!
पास के धन तै काम चालज्या,
तै कर्जा ठाना ठीक नही !
भाईचारे तै रहना चाहिए,
गाम मैं पाला ठीक नही !!
सुसराड जमाई .
बेटी कै बाप ,
और गाम मैं साला ठीक नही !
पछैत मैं बारना ,
घर बीच मैं नाला ठीक नही!!
ऐश करण नै ,
माल बिराना ठीक नही
'''' तहलान ''''कह तिल हो धोले रंग का ,
दाल मैं क़ाला ठीक नही !!
 
तड़कैहें वा सारे घर में झाड़ू लगाती होगी
फेर चूल्हे पै वा बूढे की चाय बनाती होगी !

खेत में जा-कै वा भरौटे नै सिर पै ल्याती होगी
और घर-पै आ-कै वा गंडासे में कटवाती होगी !

थोड़ी हाण पाछै पालणे में बाळक नै थपथपाती होगी
और उसनै सुला कै वा जोहड़ में भैंस न्हुवाती होगी !

भैंस नै घर ल्या कै सान्नी सपान्नी करवाती होगी
फेर सांझ होने पै वा उसकी धार बी कढवाती होगी !

रात नै दूध जमा कै बाळक गैल खाट मैं पड़ जाती होगी
थकी-हारी सोते-सोते ले सटरके, जणूं भैंस अरड़ाती होगी


--------बेरा कोणी ।
 
काली घटा उमड़ती आवे ,
दिन मैं होगी रात जणू
रूसी सजनी , भी साजन तैं ,
सोचे कर्लयुं बात जणू
बूँद पड़ी सारा चो धू गया ,
आज कसूता मी बरसय

गित्वादे में गोस्से भीजे ,
इंधन अल्ला न्यारा होगया
रोटी पौन , आग बाले न ,
चूले ऊपर खडा होगया
पानी देख पर भूख भाज रही ,
आज कसूता मी बरसया

पशु पखेरू नाच उठे सब ,
पानी अमृत सा लाग्या
जोहड़ के बीच तीरें बच्चे ,
भेसं के भी जी -सा आगया
कुए भर गे , पनघट सज गया
आज कसूता मी बरसया

--------बेरा कोणी ।
 
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या जट्टू कविता मन्ने बाप्पू आले दिन ( फादर्स डे ) लिखी थी , पर बखत कम होण के कारण छाप्पन्न कोणी पाया था , ते ल्यो आज पढो ।


मेरे बाप्पू या आया ,
टेलीबिजन ने बताया ,
अर अखबार आला भी चिल्लाया ,
देखो भाइओ देखो ,
बाप्पू आला दिन आया ॥


मन्ने भी घर आली ताहीं कुहाया ,
अर छोरा गाम-गुहांड हन्डाया ,
मंदिर गुरद्वारा भी दखवाया ,
पर बाप्पू कोणी पाया ,
आज मेरे बाप्पू याद आया ॥


मन्ने भी हद कर दी थी ,
भ्जाण खात्र ,उह की चिलम में ,
ठेकरी तले ,मिर्च धर दी थी ,
अर उहने खाँस-खाँस के ,
कालजा काढ बगाया ,
आज मेरे बाप्पू याद आया ॥


में उह्का तम्बाकू कुट्टण तें नाट्गा ,
अर उह की पिल्सण का पिसा भी चाटगा ,
जाड्डयाँ में भीतर सुवाण तें नाटगा ,
अर मूंज की खाट पे ,खरेड़े सुवाया ,
आज मेरे बाप्पू याद आया ॥


जब मेरी माँ मरगी थी ,
अर उहने चौकस करगी थी ,
अक तू इब्ब ना जा गा संग्वाया ,
हामने पूत काम्मल कोणी जाया ,
आज मेरे बाप्पू याद आया ॥


मेरी भी मत मरगी थी ,
नार काबू करगी थी ,
बारुं मीहने उह ताहीं ,
बाजरे का गास खुवाया ,
आज मेरे बाप्पू याद आया ॥


मेरा छोरा भाज्ज्या आया ,
दादा ते किथे भी कोणी पाया ,
पर एक शुभ समाचार ल्याया ,
अक परले गाम धोरे ,
एक बरध आशरम खुल्ल्या बताया ,
आज मेरे बाप्पू याद आया ॥ -----------रवि "अतृप्त "
 
या जट्टू कविता गर्मियां में लिखी थी पर इब्ब छाप्पन का बखत मिल्या , ते ल्यो पढो फेर ।


राताँ नींद कोणी आन्दी ,
सराणा ,ना पान्द सुहांदी ,
गरमी ने पाड दिया चाला ,
बिजळी भी कर री टाला ॥


राताँ नींद कोणी आन्दी ,
सराणा ,ना पान्द सुहांदी ।


बुड्ढा बाबू भी राताँ मुँह बावे ,
बाल्कां नु भी धोरे ना सुवावे ,
'वा 'छाताँ खाट हंडे सरकांदी ॥


राताँ नींद कोणी आन्दी ,
सराणा ,ना पान्द सुहांदी ।


छिक्मा पसीना आवे ,
माछर भी ना भाज्या थावे ,
याद आवें नेहरु गांधी ॥


राताँ नींद कोणी आन्दी ,
सराणा ,ना पान्द सुहांदी ।


नेता हामने भारमावें ,
आप ए सी में सो जावैं ,
जनता हंडे भक्भकान्दि ॥


राताँ नींद कोणी आन्दी ,
सराणा ,ना पान्द सुहांदी । ---------रवि "अतृप्त"
 
[h=5]भगवान ईशा प्यार किशे ने ना दे
माशूका दिखे माँ-बाप दिखाई न दे !

आते भांडे न्यारे धरवा दे घर के
आग लगाऊ इशी लुगाई किशे ने न दे !

के कसूर था उश छोरी का जो बाल के मार दी
दहेज के लालची-भूखा जमाई किशे ने ना दे !

गर्म खून से गात में जोश जवानी का
बोल ईशा ना बोले जख्मा की गहराई दिखाई ना दे !

भगवान उण यार-गदारा ते बचा के राख
आंख्या आगे रहे जा पर दिखाई ना दे !
[/h]--------बेरा कोणी ।
 
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ravinder bhai check it
जो शरीर नै तंग करै,
वो खाणा ठीक नही,
वेवक्त घरां गैर के,
जाणा ठीक नही !

जार की यारी ,
वेश्या का ठिकाणा ठीक
नही !
ख़ुशी के टेम पै,
मातम का गाणा ठीक नही !!
बीर नै ज्यादा ,
मुंह के लाणा ठीक नही !
बेटी हो घर की शोभा ,
घणा घुमाणा ठीक नही !!
पास के धन तै काम चालज्या,
तै कर्जा ठाना ठीक नही !
भाईचारे तै रहना चाहिए,
गाम मैं पाला ठीक नही !!
सुसराड जमाई .
बेटी कै बाप ,
और गाम मैं साला ठीक नही !
पछैत मैं बारना ,
घर बीच मैं नाला ठीक नही!!
ऐश करण नै ,
माल बिराना ठीक नही
'''' तहलान ''''कह तिल हो धोले रंग का ,
दाल मैं क़ाला ठीक नही !!
or ha bhai ji main punjhd nhi laga rhya ya is tahlan ki sachhai apke samne la rha hu
 
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ravinder bhai check it

or ha bhai ji main punjhd nhi laga rhya ya is tahlan ki sachhai apke samne la rha hu

भाई सोमबीर , मन्ने कई फोरम म या बात लिख भी ली ,अक दुसरे की लिखि होड़ रचना आपने नाम तें ना छाप्पो ,जब बेरा पाटेगा ,ते वा बात भोत भुंडी होवेगी । ज्याँ तें जाटलैंड पे इह ताग्गे में छाप्पी होड़ कविता या ते उह वास्तविक रचनाकार के नाम तें छाप्पी जावें सें अर ना ते फेर "बेरा कोणी " के नाम तें । अर या भी कह राखी स अक जिह ने भी "बेरा कोणी " आली रचना के वास्तविक लेखक का बेरा हो ते बता दिओ । अर तन्ने भाई यु ठीक कर्या अक या बात बता दी ,इब्ब उह तह्ल्यान के नाम तें कोए भी रचना नि छाप्पी जावेगी । मेरी भी कई रचना मन्ने देखि अक लोग आपने नाम तें छाप्पन लाग रे सें ,आर वाहा,वाही लुटें सें ,फेर जिह थां भी पाई मन्ने ते लिख दिया अक ये चोरी की सें ।


विशेष :- उपरोक्त कविता के वास्तविक रचनाकार श्री सोमबीर सरोया को माना जाए ।
 
Last edited:
"इब्ब के होवेगा ? "


इब्ब उम्र देवे साथ ,
उलाद ना देवे हाथ ,
इब्ब के होवेगा ?
मेरे बटे ,एक्ला ,
बैठ कूण में रोवेगा ॥




दिन थे तेरे कमाण के ,
जिब्ब खेले तन्ने ताश ,
बाळक रहए ना धोरे ,
घर का सत्यानाश ,
इब्ब के होवेगा ?
मेरे बटे ,एक्ला ,
बैठ कूण में रोवेगा ॥


जब थी देहि बनाण की ,
तन्ने रचाए रास ,
ज़र लाया शरीर के ,
जीण की रही ना आस ,
इब्ब के होवेगा ?
मेरे बटे ,एक्ला ,
बैठ कूण में रोवेगा ॥


किल्ले धरे गहणे ,
प्यारी पे छुल्वाई घास ,
आप धोळ कपडिया ,
घ्र्क्याँ माँह तें आवे बाँस ,
इब्ब के होवेगा ?
मेरे बटे ,एक्ला ,
बैठ कूण में रोवेगा ॥ ---------रवि "अतृप्त"
 
"सलोमण" और किते नि कहंदे होंगे इह त्यौहार ने । पर जट्टां की बात न्यारी स । जट्टों का एक भोत बड्डा त्यौहार । ऊँ ते जट्टों के सारे त्यौहार परकृति तें सम्बन्ध राखें सें पर यु कति रिश्ते पे आधारित स । ऊँ तें भाम्नां ने इह खातर भी किहे देवी-देवता की कहानी घड राखी होगी ,पर हामने ना सुनी स । सभ ताहीं इह प्रगाढ़ संबंधों पे आधारित त्यौहार "सलोमण" की सुभकामनाएँ । एक छोटी सी रचना पर्स्तुत स :-


"सलोमण "


आया सलोमण का त्यौहार ,
पड़ें मिन्ह की फुहार ,
बेबे चाली बीरा के द्वार ,
भाई-भाण का यु प्यार ,
आया सलोमण का त्यौहार ॥


किते धानां की सें लार ,
खेताँ फेल्या हर्या -भर्या प्यार ,
किते डांगराँ की सें डार ,
सामण की फुहार ,
आया सलोमण का त्यौहार ॥


बेबे पोंहची ले के पोंहची ,
भाई स्वागत ने से तयार ,
भाई-भतीजे जुग-जुग जीवें ,
सदा सुखी रहवे परिवार ,
आया सलोमण का त्यौहार ॥


बीरा आपणा धरम निभाइये ,
भीड़ पड़ी में आइये ,
दुश्मन का जीणा करे दुशवार ,
यु भाई भाण का प्यार ,
आया सलोमण का त्यौहार ॥


बेबे ने तिलां का नि कति लोभ ,
बीरा का बन्या रहवे यु रोब ,
बीरा दोनु हाथ कमाइये ,
बीरा भीड़ पड़ी में आइये ,
बीरा भाई-भाण का प्यार ,
बीरा आया सलोमण का त्यौहार ॥ ---------रवि "अतृप्त"
 
ज़मींदारां के बालक रोड़वेज
की बसां नै तोड़ दिये
कुछ लटकग्ये, कुछ चढ़ग्ये, कुछ राह मैं
छोड़ दिये
नहा-धो कै तैयार होए, पट्ठयां पै तेल
ला लिया
नये बूट अर नया कुरता, सारा फ़ैशन
सजा लिया
कंघा ल्याया, बटुआ ल्याया, गेल्यां एक
फूल ल्याया
अड्डै पैआके न्यूं बोल्या, ओहले किताब
तो भूल आया
किसे के लाम्बे, किसे के छोट्टे पट्ठे
अड्डै पै आ कै होग्ये सारे लड़धू कट्ठे
महर्षि दयानन्द की ज्ञान-भूमि पै,
किसे ताले भेडण लागग्ये
गाम की इज्ज़त पै मरण आले, गाम
की छोरियाँ नै छेडण लागग्ये
जब एक भूण्डै चुटकलै पै, सबनै
मारी ठाड्डी किलकारी
नाई कै हाथ तै छूट्या उस्तरा,
मिस्त्री के हाथ तै छूट्टी आरी
इतणै मैं एक ताज़ी बस आई
पर सवारियां कानी ना लखाई
ड्राईवर भी झूमता-
सा किसा मजा लेग्या
एक न्यू बोल्या, मेरी सासू
का भज्या लेग्या
फेर बालकां की टोली हरकत मैं आई
दुकान पर तैं कुल्हाड़ी ठा ल्याई
अड्डै पै खड़ये सारे पेड़ सहमग्ये
पत्ते झूमैं थे जो हवा मैं, सारे थमग्ये
पर पेड़ कुछ कह सै ना,
किसी या लाचारी सै
कॉल एक कीकर कट्यी थी, आज
शीशम की बारी सै
पर शीशम नै चुपचाप जख़्म तन पै
खा लिया
उसका एक डॉहला गाबरूआं नै सड़क पै
ढ़ा लिया
इतणे मैं एक टुट्यी-सी बस आई
डाहलै पै आकै रूकगी, पार ना बसाई
मार किलकी भाजे सूरमाँ, बस
की धड़कै नाड़ी थी
इस ढ़ाल चढ़े उसपै, जाणो कारगिल
की पहाड़ी थी
कोय आगे कै, होय पाछे कै, बस के भीतर
धंसग्ये
कोय-कोय लटकग्या खिड़की मैं, कुछ
शीशयाँ मैं फंसग्ये
दम लिकडै हवा ना आवै, फेर
भी बीड़ी सहारैं थे
एक दूसरे की माट्टी पिट्टण नै,
जोर तैं किलकी मारैं थे
उनकी एक हरकत पै, एक
रिटायर्ड मास्टर बिरचग्या
आपणै जीवन का सारा ज्ञान, उन
मूढ़ाँ पै खरचग्या
बोल्या, रै मूरखो ! थारै तैं देस नै कोय आस
नहीं
कित की बी॰ ए॰ करोगे, किताब
तक थारै पास नहीं
ल्या इब पूछ ल्यूं सवाल, एक
बी ना बता पाओगे
सूझैगा कुछ नहीं, धून्ध मैं गधे
की ढ़ाल लखावोगे
एक बोल्या, रै बावले मास्टर, तेरी क्यूँ
मति भाज़ री सै
पढ़ाई की नही, न्यूँ पूछ आज
कुणसी फिल्म लाग री सै
उनकी या बात बुढ़यां कै पसन्द ना आई
पुराणी पीढ़ी नै नई पीढ़ी तैं नाक
चढ़ाई
बस कै टायर पै बैठा एक आदमी, ना सोवै
ना जागै था
बाल उलझे आँख कोई-सी, पर पढ़या-
लिख्या जागै था
बोल्या आकै, मास्टर जी क्यूं सिर खपाओ
सो
इन पागलाँ तैं तुम खामखा बतलाओ सो
क्यूँ मास्टर जी इतणा नान्हा छाणो सो
पहल्यां न्यू बताओ मन्नै पिछाणो सो
जिसका दम भरण लागरे, मैं थारा ओए
विश्वास सूँ
कलास मैं हरदम फर्स्ट आया करता, मैं
ओए सुभाष सूँ
इन मस्त मौलयां गेल्या क्यूं रॉयड़ बंधाओ
सो
ल्याओ मैं बताऊगाँ के के पूछणा चाहवो सो
मैं बता दयूँगा, क्यूं धरती-सूरज के
चक्कर काटै सै
मींह बरसे पाछै इन्द्रधनुष क्यूं सात
रंग छांटै सै
बता दयूँगा, क्यूँ मरे पाछै ये जीव सड़ैं सैं
न्यूटन कहग्या वा भी जाणूं, क्यू चीज़
धरती पै पड़ै सैं
सारी बात अंग्रेंजी की कह दयूं
मन्नै राम की सूँ
I know Hamlet’s dilemma – What to
do or not to do
मान ज्यागां आपनै, आज फेर वो-ए
विश्वास जगा दो
एम॰ए॰ फर्स्ट क्लास सूँ, कोय छोटी-
सी नौकरी दुआ दो
मास्टर का मुँह बाया-का-
बाया रहग्या
आख्याँ के मैं नीर आया-का-आया रहग्या
हांस कै बोल्या, न्यूं ना करो मास्टर जी,
मैं खूब मौज़ उड़ाऊँ सूँ
पी॰एच॰डी॰ करकै आपणी धरती पै,
दब्ब कै ट्रैक्टर चलाऊँ सूँ
नौकरी कै चक्कर मैं पड़कै, क्यूँ
दर-दर मैं हाँडूंगा
बेटा सूं किसान का, मैं भूख्या नै
रोटी बाँडूंगा
म्हारी धरती सह री सै कष्ट घोर
चालो-रै-चालो, एकबै खेतां की ओर
सन्देस सबकै नाम करग्या
हांसता-हांसता ओ उतरग्या
फेर किसै
नौकरी की खुलैंगी भरती
पर धरती-पुतरो भूल ना जाणा
मेरे देस की धरती सोना उगले
उगले हीरे-मोती, मेरे देस
की धरती
मेरे देस की धरती

--------बेरा कोणी ।
 
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