Deshwal ji,
A very good post has been brought up by Rajpal ji wherein the message put across was to preserve the language. However people according to their convenience have conveniently twisted the message as 'Urdu is bad or Hindi is superior'. Above all, when they did not have any worthwhile comment to put forward they have resorted to personal comments. This shows how far any serious discussion can progress on any forum on Jatland these days!!!!
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हिन्दी (देवनागरी लिपि) में लिखना तो ठीक है। एक और तथ्य हमें ध्यान में रखना चाहिये कि जब किसी दूसरी भाषा के शब्द इतने ठूंस दिए जाएं (चाहे वे अपनी ही लिपि में लिख लो) तो भाषा दम तोड़ने लगती है। उसके मूल शब्द लुप्त होकर भुला दिए जाते हैं और शब्दावली से धीरे-धीरे गायब होने लगते हैं। कई बार हमे ऐसे लेख (देवनागरी - हिन्दी में) पढ़ने को मिलते हैं कि विश्वास ही नहीं होता कि यह हिन्दी है या उर्दू को ही देवनागरी में लिखा जा रहा है।
यही हाल आजकल हिन्दी के समाचारपत्रों का है जिनमें बेहद अंग्रेजी शब्द ढूंसे गए होते हैं। आज हिंदी के कुछ अख़बार अपने प्रसार-क्षेत्र को बढ़ाने की उतावली में, हिंदी के खामोश हत्यारे की भूमिका में उतर पड़े हैं। विसंगति यह है कि अन्य भारतीय भाषायें, विशेषतया हिन्दी उस 'भाषायी-साम्राज्यवाद' के निशाने पर है, जो हिंदी को हटाकर 'अंग्रेज़ी को भारत की पहली भाषा' बनाने का एक विराट कुचक्र चला रहा है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह है कि इसमें वह हिंदी के समाचारपत्रों का ही सहयोग ले रहा है।
अंग्रेज़ी के एक मनोभाषाविद ने हिंदी को हटाने की बहुत ही चालाक रणनीति सुझाई है और वह रणनीति पिछले दरवाज़े से हिंदी के अधिकांश अख़बारों में काम करने लगी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दलालों ने, समाचारपत्रों को यह स्वीकारने के लिए राज़ी कर लिया है कि इसकी `नागरी-लिपि` को बदल कर, 'रोमन' करने का अभियान छेड़ दीजिए और वे अब तन-मन और धन के साथ इस तरफ़ कूच कर रहे हैं। उन्होंने इस अभियान को अपना प्राथमिक लक्ष्य बना लिया है। क्योंकि इस देश में, बहुराष्ट्रीय-निगमों की महाविजय, सायबर युग में `रोमन-लिपि` की पीठ पर सवार होकर ही बहुत जल्दी संभव हो सकती है।
अंग्रेजों की बौद्धिक चालाकियों का बखान करते हुए एक लेखक ने लिखा था - ''अंग्रेज़ों की विशेषता ही यही होती है कि वे आपको बहुत अच्छी तरह से यह बात गले उतार सकते हैं कि आपके हित में आपका स्वयं का मरना बहुत ज़रूरी है। और, वे धीरे-धीरे आपको मौत की तरफ़ ढकेल देते हैं।'' ठीक इसी युक्ति से हिंदी के अख़बारों के पन्नों पर नई नस्ल के कुछ चिंतक, यही बता रहे हैं कि हिंदी का मरना, हिंदुस्तान के हित में बहुत ज़रूरी हो गया है। यह काम देश-सेवा समझकर जितना जल्दी हो सके करो, वर्ना, तुम्हारा देश सामाजिक-आर्थिक स्तर पर ऊपर उठ ही नहीं पाएगा। परिणाम स्वरूप, वे हिंदी को विदा कर देश को ऊपर उठाने के काम में जी-जान से जुट गए हैं।
ये मनोभाषाविद गुलाम मानसिकता के भारतीयों के मनोविज्ञान के अध्ययन के सहारे हिंदी की हत्या की अचूक युक्तियाँ भी बताते हैं, जिससे भाषा का बिना किसी हल्ला-गुल्ला किए 'सुगम संहार' किया जा सकता है ताकि भाषा का संहार होते ही, उस पर टिकी संस्कृति भी लगे हाथ निपट जाए।
वे कहते हैं कि हिंदी का हमेशा-हमेशा के लिए खात्मा करने के लिए आप अपनाइए 'प्रॉसेस ऑफ कॉण्ट्रा-ग्रेज्युअलिज़म`। अर्थात्, बाहर पता ही नहीं चले कि भाषा को 'सायास` बदला जा रहा है। बल्कि, 'बोलने वालों` को लगे कि यह तो भाषा में होने वाले परिवर्तन की एक ऐतिहासिक-प्रक्रिया है, जिसके तहत, हिंदी को हिंग्लिश होना ही है। और हिंदी के अधिकांश अख़बारों की भाषा में, यह परिवर्तन उसी प्रक्रिया के तहत जानबूझकर एक षडयंत्र के तहत किया जा रहा है।
वे कहते हैं कि इसका एक ही तरीक़ा है कि आप अपने अख़बार की भाषा में, हिंदी के रोज़मर्रा के मूल शब्दों को हटाकर, उनकी जगह अंग्रेज़ी के उन शब्दों को छापना शुरू कर दो, जो 'बोलचाल की भाषा' में 'शामिल-शब्दों` की श्रेणी (शेयर्ड-वकैब्युलरि) में आते हैं। जैसे कि रेल, पोस्ट-कार्ड, मोटर, टेलिविजन, कंप्यूटर, टेलीफोन, स्कूटर, बस, कार, हेलिकॉप्टर आदि-आदि।
इसके पश्चात धीरे-धीरे आप इस 'शेयर्ड वकैब्युलरि' में रोज़-रोज़ अंग्रेज़ी के नये शब्दों को शामिल करते जाइए और उसकी तादाद बढ़ा दीजिए। जैसे माता-पिता की जगह छापिए : 'पेरेंट्स'/छात्र-छात्राओं की जगह : 'स्टूडेंट्स' /विश्वविद्यालय की जगह : 'युनिवर्सिटी'/रविवार की जगह : 'संडे'/यातायात की जगह : 'ट्रेफिक' आदि-आदि। कुल मिलाकर अंतत: उनकी तादाद इतनी बढ़ा दीजिए कि मूल-भाषा (हिंदी) के केवल कारक भर रह जाएँ। क्योंकि कुल मिलाकर रोज़मर्रा के बोलचाल में बस हज़ार-डेढ़ हज़ार शब्द ही तो होते हैं और आपको सिर्फ़ हिंदी के इतने ही शब्दों को हटाकर अंग्रेज़ी के शब्दों की शुरुआत करनी है। यदि कोई इनको लेकर आपत्ति करे तो उनकी आपत्ति छीनने का एक ही तर्क है कि श्रीमान ये तो सब रोज़मर्रा के बोलचाल के ही शब्द हैं और हिंदी को समृद्ध करना है तो इन्हें स्वीकारना ही होगा। यहाँ अंग्रेजी का उदाहरण दीजिए कि देखिए अंग्रेज़ी के शब्दों में भी हिंदी के पचास शब्द ले लिए गए हैं, तो फिर हिंदी को अंग्रेज़ी के शब्दों से क्यों ऐतराज़ होना चाहिए। इसलिये आप ये शुद्धतावादी पंडिताऊ दृष्टि बदलिए। (वास्तव में देखा जाए तो अंग्रेज़ी में हिंदी के शब्द दाल में नमक के बराबर है, जबकि ये नमक में दाल मिला रहे हैं।)
भाषा को परिवर्तित करने का यह चरण, 'प्रोसेस ऑव डिसलोकेशन' कहा जाता है। यानी की 'हिंदी के रोज़मर्रा के मूल शब्दों को धीरे-धीरे बोलचाल के जीवन से उखाड़ते जाने का काम।' ऐसा करने से इसके बाद भाषा के भीतर धीरे-धीरे 'स्नोबॉल थियरी` काम करना शुरू कर देगी-अर्थात बर्फ़ के दो गोलों को एक दूसरे के निकट रख दीजिए, कुछ देर बाद वे एक दूसरे से घुलमिलकर इतने जुड़ जाएँगे कि उनको एक दूसरे से अलग करना संभव नहीं हो सकेगा। यह `सिद्धांतकी` (थियरी) भाषा में सफलता के साथ काम करेगी और अंग्रेज़ी के शब्द, हिंदी से इस क़दर जुड़ जाएँगे कि उनको अलग करना मुश्किल होगा।
इसके पश्चात शब्दों के बजाय पूरे के पूरे अंग्रेज़ी के वाक्यांश छापना शुरू कर दीजिए। अर्थात 'इनक्रीज़ द चंक ऑफ इंग्लिश फ्रेज़ेज़'। मसलन 'आऊट ऑफ रीच/बियाण्ड डाउट/नन अदर देन/एज एण्ड व्हेन रिक्वायर्ड`/ आदि आदि। कुछ समय के बाद लोग हिंदी के उन शब्दों को बोलना ही भूल जाएँगे। उदाहरण के लिए हिंदी में गिनती स्कूल में बंद किए जाने से हुआ यह है कि यदि आप बच्चे को कहें कि अड़सठ रुपये दे दो, तो वह अड़सठ का अर्थ ही नहीं समझ पाएगा, जब तक कि उसे अंग्रेज़ी में 'सिक्सटी एट' नहीं कहा जाएगा। इस रणनीति के तहत बनते भाषा रूप का उदाहरण हिंदी के एक अख़बार से उठाकर दे रहा हूँ -
'युनिवर्सिटी के वाइस चांसलर को स्टूडेंट्स ने अपने पेरेंट्स के साथ राइटिंग में कम्प्लेंट की है कि मार्कशीट्स के डिले होने से उनके दूसरे इन्स्टीट्यूट्स में एडमिशंस में चांसेस निकाले जाएँगे।'
इस तरह की भाषा को लगातार पाँच-दस वर्ष तक प्रिंट-माध्यम से पढ़ते रहने के बाद जो नई पीढ़ी इस क़िस्म के अख़बार पठन-पाठन के कारण बनेगी, उसकी यह स्थिति होगी कि उसे कहा जाय कि वह हिंदी में बोले तो वह गूँगा हो जाएगा। उनकी इस युक्ति को वे कहते हैं 'इल्यूज़न ऑफ स्मूथ ट्रांजिशन'। अर्थात हिंदी की जगह अंग्रेज़ी को निर्विघ्न ढंग से स्थापित करने का सफल छद्म।
हिंदी को इसी तरीक़े से हिंदी के अख़बारों में 'हिंग्लिश` बनाया जा रहा है। समझ के अभाव में अधिकांश हिंदी भाषी लोग और विद्वान भी लोग इस सारे सुनियोजित एजेंडे को भाषा के 'परिवर्तन की ऐतिहासिक प्रक्रिया' ही मानने लगे हैं और हिंदी में इस तरह की व्याख्या किए जाने का काम होने लगा है। लोग बाक़ायदा अपनी गर्वीली मुद्रा में वे बताते हैं जैसे कि वे अपनी एक गहरी सार्वभौम-प्रज्ञा के सहारे ही वे इस सचाई को सामने रख रहे हों कि हिंदी को हिंग्लिश बनना अनिवार्य है।
एक भली-चंगी भाषा से, उसके रोज़मर्रा के साँस लेते शब्दों को हटाने और उसके व्याकरण को छीन कर उसे 'बोली' में बदल दिए जाने की 'क्रियोल' कहते हैं। अर्थात हिंदी को 'हिंग्लिश' बनाना, एक तरह का उसका चुपचाप किया जा रहा 'क्रियोलीकरण' है। और 'कांट्रा-ग्रेजुअलिज्म' के हथकंडों से बाद में उसे 'डि-क्रियोल' किया जाएगा। अर्थात विस्थापित करने वाली भाषा (अंग्रेज़ी) को मूल भाषा (हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं) की जगह आरोपित करना।
भाषा की हत्या के एक योजनाकार ने अगले और अंतिम चरण को कहा है कि अब इसके बाद आता है 'फायनल असाल्ट ऑन हिंदी'। बनाम हिंदी को अखब़ार में 'नागरी-लिपि' के बजाय 'रोमन-लिपि' में छापने की शुरुआत करना। अर्थात हिंदी पर 'अंतिम प्राणघातक प्रहार'। बस हिंदी की हो गई अंत्येष्टि। चूँकि हिंदी को रोमन में लिख-पढ़कर बड़ी होने वाली पीढ़ी में देवनागरी में लिखी हिंदी और छपी पुस्तकें नितांत अपठनीय हो जाएगी। इसे ही कहते हैं 'भाषा को बोली' में बदलना बनाम उसका 'क्रियोलीकरण करना'। अर्थात किसी भाषा से उसके व्याकरण और रोज़मर्रा की शब्दावली को छीन लिया जाना। और बाद में इसके 'रोमन` में छापकर, उसे 'डि-क्रियोल' करना। या उसे उसकी मूल लिपि बदलकर रोमन में छापना। अब यह काम भारत में होने लगा है, जिसकी शुरुआत कोकणी को रोमनलिपि में लिखे जाने के निर्णय से शुरू हो चुका है। इसी युक्ति से गुयाना में, जहाँ 43 प्रतिशत लोग हिंदी बोलते थे, वहाँ हिंदी को इसी तरह से 'डि-क्रियोल' कर दिया गया और अब वहाँ देवनागरी की जगह रोमन-लिपि को चला दिया गया है, जिसके कारण हिंदी की सैकड़ों किताबें नितांत अपठनीय होने जा रही है। यही काम त्रिनिदाद में इसी षड्यंत्र के ज़रिए किया गया है।
यदि ताजमहल या लाल किले जैसी राष्ट्रीय धरोहर की एक भी ईंट या दीवार तोड़ने पर अपराध कायम होता है, तो भाषाएँ भी इस राष्ट्र की धरोहर है और उन्हें नष्ट करना भी अपराध की ही श्रेणी में आता है। आप एक 'राष्ट्रीय-अपराध' कर रहे हैं और निवेदन है कि आप इसे अविलंब रोकिए। अपनी मातृभाषा की रक्षा के लिए इतनी हिम्मत तो जुटायें।