ravinderjeet
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चोमासे सुरु होने के आसपास गंडयाँ में पोरी पड़नी सुरु हो जाया करें | एक बे मेरे दोस्त नरेंदर नु बोल्या अक म्हारे इंख में ४-५ पोरी पड़ रि सें गंडयाँ में, ( उनका ईंख आछा तगड़ा था ) एर दिन में तो म्हारे घर के खेताँ में रहवे सें एर साँझ सी ने मन्ने डर लागे स तम मेरी गेल चालो गंडे चुन्घन | तो में एर सुरेंदर भी हो लिए गंडे चुन्घन के मारे ऊ की गेल, डर तो हामने लाग्या-ए ना करदा | एर अन्धेरा होयें पाछे हाम रोज ८-१० गंडे रफ्डआंदे बांद्रआँ की ढाल | ८-१० दिन उड़े ईंख के बिचाले बड़ा खापरा बन गया ,खाली ठा का | एक दिन नरेंदर के बाबू ने कोठड़े पर तें देख लिया अक ईंख के बिचाले खाली कुकर दिखे स | दो तीन दिन ऊने नजर राखी एर हाम पकडे गए | नरेंदर का बाबू सीधा मानस था ,एर ऊ का छोरा खुद गंडे चुन्ह्गन में सामिल था, नु कर कें हाम पीटन तें बच गे | पर ऊ दिन पाछे हाम कई मिन्हा ताहि नरेंदर के बाबू ने देखते-ए लुक जाया करदे |