albaadi baalkaan key kissey.

काल हाम घरां लामनियाँ की बात करण लागरे थे तो एक और म्हारी छोटी सी अल्बाद याद आगि | म्हारी अल्बादी तिकड़ी ( रविंदर,सुरेंदर,नरेंदर ) आये साल इस्से मौसम में हाम आपणा जेब खर्च काढ्या करदे | गामां के घन्खरे बालक आपणा जेब खर्च नु-ए काढ्या करदे | नरेंदर हर क: खेत के धोरअ क : गोहरी ( सोनीपत दिल्ली आले इहने गोंडा कह्या करें ,बड़ा लफंगा सा नाम लाग़े स ) जाया करदी | उह गोहारी में एक किल्ले में तीन मोड़ लाग़े थे | अर दोनु ओड ने घणी किक्कर होया करदी | जब गाड्डी लाण ( फसल का पूरा भाग ,पेड़ क साथ ) की भरी होड़ उन् किकरां क खस्स क जांदी तो गिंहूआँ की बाल /सिरसम की डाहली/चन्यां की टाट, उन् किक्क्रां में फंस कें पड़ जांदी | हाम तिनु जाणे रोज सांझ सी नु जा कें उन् ने कट्ठे कर लेन्दे | अर बाणियां क: बेच देंदे | रोज पांच दस रपिये बण जांदे | थोड़े दिनां में म्हारा लोभ बध गा | किस्से क: खेत मां तें ठा लें ,तो चोरी कुहावे ,अर जा थ्या जा तो बांगड़ लागें, अर बेजती हो वा न्यारी | तो यु एक बढ़िया तरिका था, इके थां काम बाण जांदा |पर म्हारे सबर ना था, हाम ने दिमागी गधे/घोड़े भजाए अक नु-ए घणी कमाई कुय्कर हो | हाम ने एक पलान बन्नाई अर किकरां के डाहले उन् के उप्पर चढ़-चढ़ कें, गोहरी कानी ओर मोस दोए | तीनु मोडां पे इब्ब गाड़ियां नु ये ढाहले कती खरोंच देंदे | म्हारी आमदनी तीन चार गुणा बध गी ,इमानदारी तें | हामने कई साल नु-ए गर्मियां के मिह्न्याँ में आइसक्रीम खाई , अर कदे- कदाऊ बांगड़ ( रोहतक का एक सनीमा हाल )में लुकमा एक आधी फिलम भी हो जांदी | इमानदार मासूम लूटेरे |
 
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म्हारी एक रिश्तेदारी स बिशान गाम में | उनके एक छोरा था भीरे (महाबीर सिंह,इब्ब ते मर लिया )| वो नेग में मेरा काका लागे था | उनके घरां में उसकी एक ताई ने वो आपनी छोरी का सिंधारा ( पहली बार छोरी की सुस्राड़ जो भेंट भेजी जा स उहने कह्या करें ) ले कें खंदा दिया | सिन्धारे में कई लत्ते -चावल अर ५ किलो घी भी था | यु ऊँ भी बदनाम सा-ए छोरा था ,फेर भी उह की ताई ने नु सोच कें अक छोरी का काम स करके-ए आवेगा और कोए था कोणी हाथ में लेवन जोगा | यु दो-तीन बे फोज पुलिस में लुवा लिया था उह के बाबू ने | उड़े तें भी रंगरुतां का सामान ठा कें भाज आया करदा | बिशान गाम की एक खासियत या थी अक उड़े कोए बेरोजगार नहीं रह्या करदा जा दशमी पास कर लेन्दा तो | आज काल का बेरा ना के हाल स | भीरे ताहि उह की ताई ने भाडा अर सिन्धारे का सामान दे दिया | उह ने रोहतक हो किं ने जाणा था | उह ने तो शहर में बेच के ने वो घी अर दुसरा सामान, अर कई दिना ताहि गाम में बड्या-ए कोणी | उह पर तें इस्सा विस्वास उठ्या अक उनके खुद के घरके भी उह ताहि आपनी सगी भाणा का भी सिन्दारा कोथली देवन खातर कती ना खान्दाया करदे | भाई रहग्या बस नाम का ,भरोसा उठग्या साबत गाम का |
 
म्हारे गाम में एक जोहड़ था "गिल्मेआली"| कोए पहलम म्हारे गाम में "गिलमा" नाम का बन्दा होगा जिह के नाम पे इह जोहड़ का नाम पड्या था |इब्ब तो वो मेरे ख्याल में आन्ट दिया | वो सडक के काट्ठे पे था अर इब्ब उह की थां किम्मे तो ताऊ देवीलाल पार्क में मिला दी अर किम्मे प्लाट काट दिए, जिनके उह जोहड़ में प्लाट आवें थे | उह जोहड़ की एक खासियत थी उह में तें घणी बांस आया करदी साबत साल | कारण यु था अक सारा गाम उह जोहड़ में पौड सडाया करदा |

एक मेरी काकी का भाई आग्या, गुलाब सिंह हुड्डा, धाम्मअड़ गाम का म्हारे घरां| वो मेरे-ए हाण का होगा बस १-२ साल बड्डा होगा | वो आंदा जब १०-१५ दिन रुक जाया करदा | हाण का था ज्यां तें हाम उहने मामा -मुमा ना कहया करदे | उह ने बेरा ना था , गिल्मे आली के बारे में | म्हारी गाल में एक चाक्की का पाट पड्या था | जब भी कोए घणे हांगे की बात करदा तो हाम कंदे अक भाई इन्ना हांगे आला स तो तू चाक्की का पाट ठा कें दिखा दे | वो चाक्की का पाट नोर्मल ना था | यु लगभग २ फीट उंचा अर चार फिट क्रोस सेक्सन में होगा | या चाक्की थी चुन्ना पिस्सन की , जो की बल्धां तें चाल्या करदी अर इह में चुन्ने के पाथर गेर कें चुन्ना बणाया करदे | या चाक्की म्हारी गाल में, म्हारा कोए दादा लाया था | उह ने मंगवाई थी कदे १००-१५० साल पहलम ,जब हेली चुन्ने में-ए चिंनी जाया करदी | अर उह चाक्की का एक-ए पाट पड्या था अर दुसरा बेरा नि कित चाल्या गया था | हाम उह पे बैठ के ने खेल्या करदे अर जा किस्से ने ना बता ले ना ,इतने बेरा कोणी पाट्टे अक यु चाक्की का पाट स | हाम उह ने भीम की चाक्की के नाम तें जान्या करदे |तो गुलाब सिंह ऊँ ते म्हारे जत्थे तें बड्डा था अर हाम ने किहे बात पे शरत ला ली अक जा तू इन्ना हांगे आला स तो तू चाक्की का पाट ठा कें दिखा दे | ऊँ ते बन्दा नु सोचे अक २०-२५ किल्लो भोझ होगा किम्मे ना लागे ठाण में | तो भाई गुलाब गेल्याँ शरत लाग गी अक जा उह पे चाक्की का पाट ना उट्ठया तो उह ने गिल्मे आली में नहाणा पडेगा( मन्ने एक कविता याद आगि गिल्मे आली पे बनाई होई वा पाछे लिखूंगा ) | उह ने सोची अक न्यू -ए कोए जोहड़ होगा | अर भाई हाम ने वा भीम की चाकी जिह पे बैठ के ने हम खेल्या करदे वा दिखाई अक ले भाई था इब्ब इह पाट ने तू | भाई देख के-ए गुलाब तो गिलगिला हो ग्या | अर शर्त हारने के कारण हाम उह ने लेगे गिल्मे आली पे | अर जब धोरे आके ने उहने आई बांस वो नाटग्या गिल्मे आली में बडअण तें | हाम घणे जाणे थे अर वो धिन्ग्ताने धका दिया | फेर हाम उह ने लयाए म्हारी गाल में किलकी मारदे | मेरी काकी ने आपने भाई की हालत देख कें ने गस ज्यूँ आगि | पर हाम सुधे बालक थे उह ने दुसरे जोहड़ में नुहा के ले आये | गिल्मी मामा |
 
hum bi jab chhote the to barish me jab nira e ghaas-foos ug yaave hai to unme ek isa paudha
rah hai
jo kapda ke chip ja hai hum us paudhe ke sire jo chipak jata hai ko todkarek dusre par chipka dete theha ha ha

पौद्धा रह्या करे अक जाम्या (उग्या ) करे | यो बालक तो कती सहरी पप्पू स |
hahahaha...... hihihiiiiii. hhahahaa maan gaye ravinder ji aap bhi kati kasoot so.. ya baat to chutkalle te bhi upper aali keh di..( sehri pappu hahahah..):rock
 
म्हारे गाम में एक छोरा था उह का नाम काकडिया था (असली नाम तोह उह्का और किम्मे होगा ,बेरा कोणी | वो बाणिया का था | बाणीये डांगर कम्मे राख्या करें पर ये बाणीये कई मेंहस राख्या करदे | इब्ब इनके धरती तो थी कोणी ,ये न्यार- फूंश मोल का लिया करदे | एक बे इन् ने जुवार मोल ले ली किस्से की पर वो खेत दूर घणी था गाम तें ,अर साबत दिन की ड्यूटी इह काकडीये की थी डांगर सम्हालन की | वो इतनी दूर जांदा-जांदा हार जांदा | अक क्यूँ उह के कई गेडे खेत के हो जाया करदे | उह ने एक तरिका काढ्या उह ने म्हारे घरां में एक मेरे ताऊ का छोरा स जीतू ,उनकी जुवार गाम के धोरे-ए थी | वो सांझ सी के जांदा जब खेताँ में कोए नि होन्दा अर किल्ले के बीचाले तें रोज एक भरोटा जुवार का काट ल्यान्दा | मिहने सारे में उहने किला बीचाले तें खोखला कर दिया | एक दिन जीतू किस्से ताहि सांझ सी ने जुआर दीखान खातर गया खेत में , बेचन खातर , तो यु काकडिया भरोटा ले कें ने लिकड़ा | जीतू ने बुझी अक रे तू आड़े म्हारे खेत में के क्यूकर आया तो वो बोल्या अक काका में राह भूल ग्या था जयां तें आन बड्या आड़े | पर जब जीतू हांडया उड़े के तो राही पड रि एक कूने में के , अर उह के शक होगया अक किम्मे खटेबा स | जुकर जीतू खेत के बीचाले गया उह के तो सांप सा सूंघ ग्या ,जीतू भाज्या उड़े-ए तें खोंश्ड़े बग़ा कें ने ,अर बानियाँ का राह में-ए गेर कें ने तोड्या | फेर उन के घर्क्याँ पे उस बखत के भा तें बाध जुवार के पिस्से भी लिए | उह काकडीये पे एक जूमला भी बणाया था याद आग्या तो लिखूंगा | छोट्टा लालू यादव(न्यार चोर ) |
 
म्हारी गाल में मेरा एक ताऊ का छोरा था | ऊँ ते वो म्हारे तें घणा बड्डा था ,मेरे काका हर के हाण का | उह का नाम सत्ते था (सतबीर सिंह )| उह की एक भुंडी आदत थी | थी के पाछे जब वो पकड्या गया जब बेरा पाट्टया अक यु इह का काम था | वो आंदा -जांदा जब कोए नि होंदा तो घेर में बड के ने डांगरआँ के टाल्ली अर चोरासी (टाल्ली = एक घंटी ,चौरासी = बैल के गले में बंधा घुंघरुओं का पट्टा ) जो के पित्तल अर ताम्बे के होया करदे , खोल ले जांदा | कई बे उह पे शक भी होया पर वो कदे थाया कोणी | जब उह का बियाह होया जब उह की बहु ने उह की या बाण छुड़ाई | उह के कारण म्हारी सारी गाल ने टाल्ली अर चौरासी बांधने बंद कर दिए थे डांगरआँ के | उनका घर सड़क के साहर: था | एक बे एक ट्रक ने उनके घर में टक्कर मार दी | अर वा भींत ढह पड़ी | उह भींत में एक अलमारी थी वा सारी चोरे होड़ टाल्लीयाँ की अर घुंघरूआँ आले चौरासियाँ की भरी थी | वे सारे टाल्ली अर चौरासी खिंड गे | भीतर उनके बलध बंध रे थे ,होर तो किम्मे नुक्सान कोणी होया, बस भींत पड़ी थी | लोकां ने उनके बलध तो और किते बाँध दिए अर वे सारे पट्टे अर टाल्लीयाँ की दूकान सजा दी अक आपणे-आप्न्याँ ने पिछान ले जाओ | ऊँ तो जा कदे कोए दुर्घटना हो जांदी तो गाम की आदत थी अक ड्रेवर ने भुंडी ढाल तोड्या करदे | पर उह दिन डरेवर भी बच्गा पिटन तें अर लोगाँ का हान्स-हान्स के बुरा हाल होर्या था उनके सारे कुनबे का मुंह देखण जोगा था |उह दिन पाछे जब भी उनके बालकां गेल्याँ म्हारी लड़ाई हो जांदी तो हाम उन् ने "टाल्ली चोर" कह के ने चीडाया करदे |
 
आज एक अल्बाद और याद आगी जब एक पहेली लिखूं था | में ७-८ साल का था ,जब- सीक बालक अंटे (किते-किते इन् ने कंचे भी कह दिया करें ) भोत खेल्या करदे | मेरे धोरे ना तो पिस्से अर ना अंटे ,अर खेलण ने जी करे ,कबे-कबे किते कोए एक आध पड्या पा जांदा तो उह ने ठा लेंदे | पर कती पके होड़ खिलाड़ी पहलाड़ी -ए घाल में जीत लेंदे | गामां में एक पम्प बर्त्या करदे पीपे मां तें माट्टी का तेल काढअण खातर | म्हारा एक पम्प खराब होग्या ते मेरा काका रोहतक तें नया ले आया | पुराणा मन्ने ठा लिया खेलंना बाणान खातर | मन्ने जब हिला कें देखा तो बेरा पाट्टया ,अक उह में एक अंटा हो स | मन्ने वो काढ लिया | फेर मन में लोभ आग्या अक इह में स तो नए में भी होगा | मोका देख कें ने उह में तें भी काढ लिया, अंटा | फेर दो पड़ोसियां के मांग के लाया न्यू कह के ने अक म्हारा पम्प खराब होग्या ,मेरी दादी ने मंगाया स | अर उनके भी काढ लिए | अर उनके पम्प उलटे दे आया | अर उस्से दिन वे चारुं अंटे हार भी आया | कई दिनां पाछे म्हारी एक पड़ोसन आई जिह का पम्प में लाया था, पम्प ने ठाए अर मेरी दादी गेल लागी लड़ण, अक थारा पोता लाया था अर तमने खराब कर कें ने दे दिया | मेरी दादी बोली अक म्हारे ते नया स ,हाम क्यूँ मन्गावागे | म्हारा पोता क्यूँ ल्यावेगा थारा मांग के ने जब म्हारे रहया | जे तन्ने चाहिए तो तू म्हारा ले जा इब्ब काम चला ले | अर जब छोरा आज्या गा तो हाम बुझ के ने बतावांगे ,अक वो क्यूँ मांग के ने लाया था | फेर वा लुगाई जब म्हारा नया ले गी वो भी ना चल्या | अर उलटा-ए देवन आई ते मेरी दादी के शक होग्या उह ने देख्या अक दोनुआं के अंटे लिकड़ रे सें अर या रविंदर का नाम भी लेवे स | कोए मेरी-ए करी होड़ कुभध्ध स | मन्ने के बेरा था, अक अंटे की टेक्नोलोजी तें-ए यु पम्प चाले स | सांझ ताहि बेरा पाट गा अक चारुं पम्पां के अंटे मेरे काढ़े होड़ सें | फेर मेरे काका ने मेरे तीन-चार रहपटे धरे ताते-ताते | मासूम बालक |
 
म्हारी गाल में एक छोरी थी उह का नाम सान्सली काढ राख्या था (वा-ए जिह ने फाली मार के ने आपनी-ए जाली पाड़ ली थी अर फेर आपने बाबू धोरे निरी छिति थी ) उहने एक शरणारथन की दूकान पे घर का नाज गेरन की आदत थी | वा दूकान उन के घर तें ३०-४० मीटर दूर थी | एक दिन दोफारी में जब उनके घर पे कोए ना था तो उह ने एक बासन काढ लिया जिह में शक्कर घाल राखी थी | वो बासन उह पे उठ्या तो आथ ना ,वा उह ने गाल मां के घुरडा के ले जान लागी | हाम पुल तले खेलाँ थे (म्हारी गाल में पहलम एक पुल था गाल के दोनु ओड़ की दो हेलियाँ नु जोडन खातर बना राख्या था ) हाम ने वा देख ली अर म्हारे शक होग्या अक वा डरदी -डरदी नून-नून लाखांदी उह ने घुर्डावे स | हाम भाज कें गए अर उह की दादी (या वा-ए बुढ़िया थी जिह ने मेरे सर में भाठा मार्या था )ताहि बता दी अक थारी छोरी शक्कर बेचन जा स | उह की दादी भाजी आपनी लाट्ठी ठा कें ने अर गाल बकती ने वा लाट्ठी मारी उह के बागा के ने | सान्सली ते बच गी पर लाठी जा लागी बासन के | अर शक्कर खींड गी गाल में | सांझ के जब उह के बाबू (जिह का रह्डुआ जोहड़ में गेर के ने आये थे हाम ) वा छोरी ते छेती -ए अर आपनी मां ताहि भी गाल बकी | एक तीर में दो निशाने ,किः की लाइ आग ,दुश्मन क्या जाने |
 
एक मेरे भी पड़े पड़े क याद आगी ,,,एक बानिया था , था तो ओ दूसरे बगड का पर म्हारे बगड म दूकान कर रह्या था , सारे उनने रांघड़ का कह्या करदे अर घना कामचोर था ज्याते उनके घरक्या का भी उसते भरोसा उठ लिया था ,एक रात हामने एक चमार की उटनि खोल के उसकी दूकान की सांकल के बाँध दि ,,सबेरे सबेरे ओ आया दूकान खोलन खातर अर उटनि बंधी देख क उल्टा ए बोहड गया ,घरा जा के अपने बाबु त बोल्या ''अड् चाचा दूकान आगे कोए उटनि बांध गया चालिए''/ उसने पहल्या भी काम त बचन खातर बहाने बनाये थे ज्याते उसका बाबु बोल्या ''अड् उत् के साले झूठ बोले स'' त ओ बोल्या ''ना चाचा तेडी सु'' इब्ब इतनी हान म ओ चमार अपनी न खोल लेगया /अर दोनु बानिए आये /इब्ब उटनि नहीं दिखयी तो उसके बाबु न उसका ज्यो चाम् तार्या अर गल्लळ बोले ''अड् उत् झूठ बोले अड सु भी खावे'' ,,,,,,,,,,,,,,
 
एक बे ओए बानिया म्हारे एक ढब्बी ताहि उधार देन ट नाट गया त ओ बोल्या कोए बात ना किराड तने फेर देखूंगा इब्ब उसने प्लान बनाया रात ने बानिए का समान काडन का /एक तार की कुण्डी बना के दुकान की एक झांकी ''जो टूट री थी'' उसमे के काडया त एक पिप्निया का लिफाफा आज्ञा /इब्ब बोल्ये इसका के करा त बगड के सारे घर जिनमे छोटे बालक थे उनके घर के आगे दो दो पीपनी धर के आगे/ अगले दिन सारे बगड म पि पि होरी, इससे बात पे उस बनिए की अर म्हारे टीम मेम्बर की लड़ाई होई थी /
 
पड़े-पड़े के क्यूँ याद आई खड़े-खड़े कोणी आ सकदी के, कुलदीप | बढ़िया कर्या | में ते एक्ला-ए लाग्र्या था इब्ब ताहि अर उतां ने ते में अल्बादी डिक्लेयर कर राख्या सुं | न्यू ना बेरा ओर भी राछ सें आड़े |ओर आन दे इसी -इसी भाई |
 
एक मेरे काका का छोरा स अशोक ,,उसने सारे सोकी कह्या करे ,बालकपन म घना अल्बादी होया करदा ,एक बे सारे कपास चुगन लागरे थे ,अर बालका ने साँझ न कपास चुगन के बदले म थोड़ी बहोत कपास मिल ज्याया करदी ,अर हाम उस ने बेच के चीज खा लिया करदे ,एक दिन सोकी न कपास थोड़ी मिली ,त सोकी न धोरे पड्या मेहस का चोथ कपास के बिच म लपेट लिया अर बानिये के तख्दुए म गेर दी कपास ,बानिया भी बोल्या ''सोकी कपास तो थोड़ी दिखे स , अर तोल घना ए स,बानिए न कपास ठा के देखी तो उसमे चोथ पड्या था , सोकी न भी भाजन म ए भलाई दिखी,,,,,,,फेर ओ बानिया फिरे उलाहना देंदा,,,,,,,,,,
 
रविन्द्र भाई जी सा आ गा. २ दिन लाग गे आप कि सारी अल्बाद पडन मै पर चुट्कला तै भी ज्यादा मज़ा आ गा. बहुत बडिया लिखे है भाई साहब और लिखन मै भी बहुत टैम लागा होगा पर शुरु करे पाच्छे बीच मै कती हटन न जी नी करदा. Good show and keep it up.
 
रविन्द्र भाई जी सा आ गा. २ दिन लाग गे आप कि सारी अल्बाद पडन मै पर चुट्कला तै भी ज्यादा मज़ा आ गा. बहुत बडिया लिखे है भाई साहब और लिखन मै भी बहुत टैम लागा होगा पर शुरु करे पाच्छे बीच मै कती हटन न जी नी करदा. Good show and keep it up.

धन्यवाद विजेंदर भाई | आप भी आण दयों अक आधी ,आपणी ना ते और किस्से की |
 
म्हारे घरां में एक मेरे ताऊ का छोरा स खजान सिंह(इब्ब बुड्ढ़े माणस ताहि भी छोरा लिखणी पड़े स )| उह ने सारी गाल "अते-हे" के नाम तें जाण्या करदी (यु अते-हे उह का तकिया कलाम था ) ,इब्ब ते घणा बुड्ढा हो लिया अर ऊँ वो मेरे बाबू तें भी उम्र में आठ दस साल बड्डा हो गा(यु उस सतबीर का भाई था बड्डा जो बल्धां अर गायां की घंटी अर चोरासी खोल्या करदा ) | जब हाम गर्मियां की छुटियाँ में डांगर चराण जाया करदे ,तो वो भी म्हारी गेल हो लेन्दा आपणे डांगरआँ नु ले के ने | म्हारे खेताँ में एक लेट थी ,ऊँ ते इब्बी से पर जब आछी बड्डी थी अर उह धोरे म्हारे कई घरां की ४-५ किल्ले जमीन पड़ता पड़ी थी इब्ब ते सारी में खेती हो स | हाम उह में डांगरआँ ने छोड़ दिया करदे | इह की एक भुंडी आदत थी , डांगर चरण लाग जांदे तो माडी सी वार पाछे ,किते हो रूंख तले लुक के ने सो जांदा | फेर जा उह के भी डांगर खेताँ में उजाड़ करें, तो हामने -ए मोड़ने पडदे ,ना ते उजाड़ का म्हारा-ए नाँ हो जांदा | उह ताहि कई बे कही , पर बड्डा था, ज्यां तें हाम कह के ने रह जांदे | एक दिन मन्ने वो ईंख में सोंदा पा गा | मन्ने उड़े कीकर की आछी लांबी-लांबी सुलाँ आले छड़े पड़े थे | उन् में तें १०-१२ डाली तोड़ी जिन्न में घिच्मा लांबी-लांबी सूल थी| अर वो एक पासू हो के ने सोवण लागर्य़ा था | मन्ने वे डाली उह के घेटी धोरे तें ले के ने अर पिंडियाँ ताहि बिछा दी | उह के डांगर ते हामने उन्ह के-ए ईंख में बाड़ दिए अक म्हारे ईंख में उजाड़ ना होवेगा ज्यां तें | अर हाम तीनु जणे( मेरे दुसरे दो ताऊआँ के छोरे जो स्कूल माँ तें उठ रे थे अर हमेशा कट्ठे डांगर चर्या करदे अर मेरे तें ४-५ साल बड्डे थे ) आपणे-आपणे डांगरआँ ने ले के ने गूच गे उड़े तें |

जब उह की नींद खुली अर मस्कोड़ा लिया ते सूल बैठ गी घचा-घच | वो भाज्या लाठी ले के ने इतने ते हाम जा लिए थे घणी दूर हाम दिखे कोणी उह ने | अर उह के डांगर उन्ने के ईंख में चरण लाग रे थे| उह की तो तले तें उप्पर ताहि जल गी कती| जब हाम गाम में पोंचे तो म्हारे घर आगे बालकां का अर लोग लुगाइयां का जमघट लाग्र्या | वो म्हारे तें पहलम पोंच गा था |,क्यूँ की हाम गोहरी-गोहरी डांगर लाया करदे, घणे डांगर होने के कारण , अर वो सीधा सड़क पर के हांक लाया आपन्या नु | मेरा तो उह दिन मूत लिकडन ने होग्या था ,मखा आज ते सारी गाल आगे ,मेरा बाबू मेरी रामलीला करेगा | पर मेरा बाबू दुसरे खेताँ जार्य़ा था | अर खजान आया गाल में के भुंडा रोला करदे ,बस नु कहवे "अते-ए घचा-ए-घाच्च,अते-ए घचा-ए-घाच्च,अते-ए घचा-ए-घाच्च,"| सब न्यू कहवे अक रे खजान के होया | खजान कहवे मेरे काका निराकार ने बुलाओ (मेरे बाबू का नाम निराकार सिंह स ) में ते आज फेसला कर के-ए रहूंगा | अत-ए कती-ए शर्म कोणी काल का रिंगटा अर इतनी हिम्मत ,अत-ए इब्ब कोणी खटावे | अत-ए बदला नि लिया ते में भी चतरू का नहीं (चतरू (चतर सिंह )उह के बाबू का नाम )| इतने में भी पोंच गा अर रोला सुन के मेरी माँ लिक्ड़ाई बाहर | मेरी माँ ओहले में के बोली ( मेरे घंखरे घरां के भाई मेरे बाबू तें भी बड्डी उम्र के थे ज्यां तें मेरी माँ उन् तें बोल्या ते करदी पर ओहला काढ के ने ) आरे खजान रविंदर का बाबू ते कोणी मेरे तें बता के बात होई | इब्ब उह ने बताई ते वो-ए फंश गा | मेरी माँ बोली अक तू सोया क्यूँ ,रविंदर आपणे डांगर हेरण जा स अक थारे | अर में पहलम बुझुंगी के होया था | मन्ने बताई अक यु लुक के सोया करे रोज हामने कोणी बेरा कित सोया करे | अर उड़े पड़ता में सारे छड़े पड़े-पड़े हंडे सें आंधी बाल में इह के सहारे जा लागे होंगे अर मेरा नाँ ले स | चाहे तिलोकी अर भुंड पे बुझ ले (त्रिलोक सिंह (तिलोकी )अर रामनिवास (भुंड ) मेरे ताऊ के दोनु सह्पाली छोरे )| वे भी नाट गे अक रविंदर ते म्हारे धोरे तें हटया भी कोणी , यु खाम खा झूठ बोले स | मेरी माँ बोली अक तू खाम खा बालक ने छितवान के चक्कर में ना रह्या कर जब देखे जब झूठी साची सिकायत ले के ने आ जा स | फेर गाल के बालक भी उह का मखोल करण लागे ,अत-ए घचा-ए-घच्च ,अत-ए घचा-ए-घच्च | जब जा के ने उड़े तें डिगा वो | अर में बच गा , चोखा उह दिन फोजी घरां ना था ,ना ते बिना बुझे अक गलती किः की ह ,समार देंदा , मन्ने | अर खजान गाल में के कहंदा जावे" अत-ए घच्चा -ए घच्च ,म्हारा-ए ईंख अर म्हारे-ए डांगर ,अत-ए घच्चा-ए -घच्च ,म्हारी-ए कीकर अर मेरी-ए कड़ अत-ए घच्चा-ए-घच्च " |
"अत-एए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए घच्चा-ए-घच्च " |
 
[FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]ऊँ ते म्हारी सारी अल्बाद ख़तम हो ली पर कदे -कदे कोए भूली भटकी याद आ जावे स | काल एक चुटकला पढूं था उह में दो बालक दो होका पिन्दे बुढयाँ नु देख के न्यू कहवें सें अक देख भाई म्हारी दो छुट्टी बेठी |तो एक और परस्तुति ल्यो :-[/FONT]
[FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]
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[FONT=Verdana, Arial, Tahoma, Calibri, Geneva, sans-serif]म्हारी गाल में एक चुगल खोर बुड्ढा था गोर्धन (गोवर्धन सिंह )(वो-ए जो महाळ धोरे खुवाया था डले मार के ने )| म्हारी तिकड़ी गाल माँ के जावण लाग री थी अर गोर्धन एक्ला खाट पे बेठा होका पीवण लागर्या था |अर आगे नु झुक ने के कारण उह की लंगड़ लिकड़ के ने खाट पे बिछ सी रही थी , उह की गेल ने | जब हाम उड़े के लिकड़े तो मन्ने वा देख ली | में सुरेंदर ताहि बोल्या अक सुरेंदर तेरे दादा धोरे तेरी कई बे इहने शिकात ला ली आज बदला लेवन का दिन स | मन्ने सुरेंदर समझा दिया अक के करणा स |में अर नरेंदर २०-२५ मीटर दूर जा के ने रोला मचान लागे अर धुल उड़ान लागे | गोर्धन का ध्यान म्हारे कानी चाला गया अर वो हामने धमकान लाग्या | इतने सुरेंदर भींत के साहरे-साहरे उह की गेल ने जा के अर खाट तले बड़ग्या अर उह की वा लाँगड़ बाही धोरे एक कटी होड़ जेवड़ी थी उह के बाँध दी अर फेर लिक्डाया उड़े तें | इतने गोर्धन के भी आछा छो उठ लिया था ,वो हामने भजान का मार्या होके नु एक ओड़ ने कर के ने ज्युकर उठया ,उह का मुंह के बल धडाका लाग्या अर खाट पलट के ने उह के उप्पर आण पड़ी | उह के होका अर चिलम सब गाल में खिंडे-खिंडे हंडे अर आपां ते जांदे रहे उथों |फेर बेरा नि वो किः ने ठाया | बेचारा गोर्धन ,बेसहारा गोर्धन |[/FONT]
 
फेर न्यू कहो हो रविंदर जी अक jl आले मन्ने अल्बदी कहवे सै ....!!!
 
म्हारे घरां में एक मेरे ताऊ का छोरा स खजान सिंह(इब्ब बुड्ढ़े माणस ताहि भी छोरा लिखणी पड़े स )| उह ने सारी गाल "अते-हे" के नाम तें जाण्या करदी (यु अते-हे उह का तकिया कलाम था ) ,इब्ब ते घणा बुड्ढा हो लिया अर ऊँ वो मेरे बाबू तें भी उम्र में आठ दस साल बड्डा हो गा(यु उस सतबीर का भाई था बड्डा जो बल्धां अर गायां की घंटी अर चोरासी खोल्या करदा ) | जब हाम गर्मियां की छुटियाँ में डांगर चराण जाया करदे ,तो वो भी म्हारी गेल हो लेन्दा आपणे डांगरआँ नु ले के ने | म्हारे खेताँ में एक लेट थी ,ऊँ ते इब्बी से पर जब आछी बड्डी थी अर उह धोरे म्हारे कई घरां की ४-५ किल्ले जमीन पड़ता पड़ी थी इब्ब ते सारी में खेती हो स | हाम उह में डांगरआँ ने छोड़ दिया करदे | इह की एक भुंडी आदत थी , डांगर चरण लाग जांदे तो माडी सी वार पाछे ,किते हो रूंख तले लुक के ने सो जांदा | फेर जा उह के भी डांगर खेताँ में उजाड़ करें, तो हामने -ए मोड़ने पडदे ,ना ते उजाड़ का म्हारा-ए नाँ हो जांदा | उह ताहि कई बे कही , पर बड्डा था, ज्यां तें हाम कह के ने रह जांदे | एक दिन मन्ने वो ईंख में सोंदा पा गा | मन्ने उड़े कीकर की आछी लांबी-लांबी सुलाँ आले छड़े पड़े थे | उन् में तें १०-१२ डाली तोड़ी जिन्न में घिच्मा लांबी-लांबी सूल थी| अर वो एक पासू हो के ने सोवण लागर्य़ा था | मन्ने वे डाली उह के घेटी धोरे तें ले के ने अर पिंडियाँ ताहि बिछा दी | उह के डांगर ते हामने उन्ह के-ए ईंख में बाड़ दिए अक म्हारे ईंख में उजाड़ ना होवेगा ज्यां तें | अर हाम तीनु जणे( मेरे दुसरे दो ताऊआँ के छोरे जो स्कूल माँ तें उठ रे थे अर हमेशा कट्ठे डांगर चर्या करदे अर मेरे तें ४-५ साल बड्डे थे ) आपणे-आपणे डांगरआँ ने ले के ने गूच गे उड़े तें |

जब उह की नींद खुली अर मस्कोड़ा लिया ते सूल बैठ गी घचा-घच | वो भाज्या लाठी ले के ने इतने ते हाम जा लिए थे घणी दूर हाम दिखे कोणी उह ने | अर उह के डांगर उन्ने के ईंख में चरण लाग रे थे| उह की तो तले तें उप्पर ताहि जल गी कती| जब हाम गाम में पोंचे तो म्हारे घर आगे बालकां का अर लोग लुगाइयां का जमघट लाग्र्या | वो म्हारे तें पहलम पोंच गा था |,क्यूँ की हाम गोहरी-गोहरी डांगर लाया करदे, घणे डांगर होने के कारण , अर वो सीधा सड़क पर के हांक लाया आपन्या नु | मेरा तो उह दिन मूत लिकडन ने होग्या था ,मखा आज ते सारी गाल आगे ,मेरा बाबू मेरी रामलीला करेगा | पर मेरा बाबू दुसरे खेताँ जार्य़ा था | अर खजान आया गाल में के भुंडा रोला करदे ,बस नु कहवे "अते-ए घचा-ए-घाच्च,अते-ए घचा-ए-घाच्च,अते-ए घचा-ए-घाच्च,"| सब न्यू कहवे अक रे खजान के होया | खजान कहवे मेरे काका निराकार ने बुलाओ (मेरे बाबू का नाम निराकार सिंह स ) में ते आज फेसला कर के-ए रहूंगा | अत-ए कती-ए शर्म कोणी काल का रिंगटा अर इतनी हिम्मत ,अत-ए इब्ब कोणी खटावे | अत-ए बदला नि लिया ते में भी चतरू का नहीं (चतरू (चतर सिंह )उह के बाबू का नाम )| इतने में भी पोंच गा अर रोला सुन के मेरी माँ लिक्ड़ाई बाहर | मेरी माँ ओहले में के बोली ( मेरे घंखरे घरां के भाई मेरे बाबू तें भी बड्डी उम्र के थे ज्यां तें मेरी माँ उन् तें बोल्या ते करदी पर ओहला काढ के ने ) आरे खजान रविंदर का बाबू ते कोणी मेरे तें बता के बात होई | इब्ब उह ने बताई ते वो-ए फंश गा | मेरी माँ बोली अक तू सोया क्यूँ ,रविंदर आपणे डांगर हेरण जा स अक थारे | अर में पहलम बुझुंगी के होया था | मन्ने बताई अक यु लुक के सोया करे रोज हामने कोणी बेरा कित सोया करे | अर उड़े पड़ता में सारे छड़े पड़े-पड़े हंडे सें आंधी बाल में इह के सहारे जा लागे होंगे अर मेरा नाँ ले स | चाहे तिलोकी अर भुंड पे बुझ ले (त्रिलोक सिंह (तिलोकी )अर रामनिवास (भुंड ) मेरे ताऊ के दोनु सह्पाली छोरे )| वे भी नाट गे अक रविंदर ते म्हारे धोरे तें हटया भी कोणी , यु खाम खा झूठ बोले स | मेरी माँ बोली अक तू खाम खा बालक ने छितवान के चक्कर में ना रह्या कर जब देखे जब झूठी साची सिकायत ले के ने आ जा स | फेर गाल के बालक भी उह का मखोल करण लागे ,अत-ए घचा-ए-घच्च ,अत-ए घचा-ए-घच्च | जब जा के ने उड़े तें डिगा वो | अर में बच गा , चोखा उह दिन फोजी घरां ना था ,ना ते बिना बुझे अक गलती किः की ह ,समार देंदा , मन्ने | अर खजान गाल में के कहंदा जावे" अत-ए घच्चा -ए घच्च ,म्हारा-ए ईंख अर म्हारे-ए डांगर ,अत-ए घच्चा-ए -घच्च ,म्हारी-ए कीकर अर मेरी-ए कड़ अत-ए घच्चा-ए-घच्च " |
"अत-एए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए घच्चा-ए-घच्च " |


hahahahahahahahhaha maja aagya ravinderjeet ji, maan gye aap bi kasute ae albadhi the
 
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hahahahahahahahhaha maja aagya ravinderjeet ji, maan gye aap bi kasute ae albadhi the

सुदेश जी ,जो कसुत हों सें ,वे-ए अल्बाद हों सें ,जो सूत आजाँ वे के अल्बाद कही जाँ गी |
 
फेर न्यू कहो हो रविंदर जी अक jl आले मन्ने अल्बदी कहवे सै ....!!!


हाँ भाई कह ल्यो | इब्ब सुधे माणस नु कोए किम्मे भी कह ले | गरीब की जोरू सब की भाभी |
 
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