म्हारे घरां में एक मेरे ताऊ का छोरा स खजान सिंह(इब्ब बुड्ढ़े माणस ताहि भी छोरा लिखणी पड़े स )| उह ने सारी गाल "अते-हे" के नाम तें जाण्या करदी (यु अते-हे उह का तकिया कलाम था ) ,इब्ब ते घणा बुड्ढा हो लिया अर ऊँ वो मेरे बाबू तें भी उम्र में आठ दस साल बड्डा हो गा(यु उस सतबीर का भाई था बड्डा जो बल्धां अर गायां की घंटी अर चोरासी खोल्या करदा ) | जब हाम गर्मियां की छुटियाँ में डांगर चराण जाया करदे ,तो वो भी म्हारी गेल हो लेन्दा आपणे डांगरआँ नु ले के ने | म्हारे खेताँ में एक लेट थी ,ऊँ ते इब्बी से पर जब आछी बड्डी थी अर उह धोरे म्हारे कई घरां की ४-५ किल्ले जमीन पड़ता पड़ी थी इब्ब ते सारी में खेती हो स | हाम उह में डांगरआँ ने छोड़ दिया करदे | इह की एक भुंडी आदत थी , डांगर चरण लाग जांदे तो माडी सी वार पाछे ,किते हो रूंख तले लुक के ने सो जांदा | फेर जा उह के भी डांगर खेताँ में उजाड़ करें, तो हामने -ए मोड़ने पडदे ,ना ते उजाड़ का म्हारा-ए नाँ हो जांदा | उह ताहि कई बे कही , पर बड्डा था, ज्यां तें हाम कह के ने रह जांदे | एक दिन मन्ने वो ईंख में सोंदा पा गा | मन्ने उड़े कीकर की आछी लांबी-लांबी सुलाँ आले छड़े पड़े थे | उन् में तें १०-१२ डाली तोड़ी जिन्न में घिच्मा लांबी-लांबी सूल थी| अर वो एक पासू हो के ने सोवण लागर्य़ा था | मन्ने वे डाली उह के घेटी धोरे तें ले के ने अर पिंडियाँ ताहि बिछा दी | उह के डांगर ते हामने उन्ह के-ए ईंख में बाड़ दिए अक म्हारे ईंख में उजाड़ ना होवेगा ज्यां तें | अर हाम तीनु जणे( मेरे दुसरे दो ताऊआँ के छोरे जो स्कूल माँ तें उठ रे थे अर हमेशा कट्ठे डांगर चर्या करदे अर मेरे तें ४-५ साल बड्डे थे ) आपणे-आपणे डांगरआँ ने ले के ने गूच गे उड़े तें |
जब उह की नींद खुली अर मस्कोड़ा लिया ते सूल बैठ गी घचा-घच | वो भाज्या लाठी ले के ने इतने ते हाम जा लिए थे घणी दूर हाम दिखे कोणी उह ने | अर उह के डांगर उन्ने के ईंख में चरण लाग रे थे| उह की तो तले तें उप्पर ताहि जल गी कती| जब हाम गाम में पोंचे तो म्हारे घर आगे बालकां का अर लोग लुगाइयां का जमघट लाग्र्या | वो म्हारे तें पहलम पोंच गा था |,क्यूँ की हाम गोहरी-गोहरी डांगर लाया करदे, घणे डांगर होने के कारण , अर वो सीधा सड़क पर के हांक लाया आपन्या नु | मेरा तो उह दिन मूत लिकडन ने होग्या था ,मखा आज ते सारी गाल आगे ,मेरा बाबू मेरी रामलीला करेगा | पर मेरा बाबू दुसरे खेताँ जार्य़ा था | अर खजान आया गाल में के भुंडा रोला करदे ,बस नु कहवे "अते-ए घचा-ए-घाच्च,अते-ए घचा-ए-घाच्च,अते-ए घचा-ए-घाच्च,"| सब न्यू कहवे अक रे खजान के होया | खजान कहवे मेरे काका निराकार ने बुलाओ (मेरे बाबू का नाम निराकार सिंह स ) में ते आज फेसला कर के-ए रहूंगा | अत-ए कती-ए शर्म कोणी काल का रिंगटा अर इतनी हिम्मत ,अत-ए इब्ब कोणी खटावे | अत-ए बदला नि लिया ते में भी चतरू का नहीं (चतरू (चतर सिंह )उह के बाबू का नाम )| इतने में भी पोंच गा अर रोला सुन के मेरी माँ लिक्ड़ाई बाहर | मेरी माँ ओहले में के बोली ( मेरे घंखरे घरां के भाई मेरे बाबू तें भी बड्डी उम्र के थे ज्यां तें मेरी माँ उन् तें बोल्या ते करदी पर ओहला काढ के ने ) आरे खजान रविंदर का बाबू ते कोणी मेरे तें बता के बात होई | इब्ब उह ने बताई ते वो-ए फंश गा | मेरी माँ बोली अक तू सोया क्यूँ ,रविंदर आपणे डांगर हेरण जा स अक थारे | अर में पहलम बुझुंगी के होया था | मन्ने बताई अक यु लुक के सोया करे रोज हामने कोणी बेरा कित सोया करे | अर उड़े पड़ता में सारे छड़े पड़े-पड़े हंडे सें आंधी बाल में इह के सहारे जा लागे होंगे अर मेरा नाँ ले स | चाहे तिलोकी अर भुंड पे बुझ ले (त्रिलोक सिंह (तिलोकी )अर रामनिवास (भुंड ) मेरे ताऊ के दोनु सह्पाली छोरे )| वे भी नाट गे अक रविंदर ते म्हारे धोरे तें हटया भी कोणी , यु खाम खा झूठ बोले स | मेरी माँ बोली अक तू खाम खा बालक ने छितवान के चक्कर में ना रह्या कर जब देखे जब झूठी साची सिकायत ले के ने आ जा स | फेर गाल के बालक भी उह का मखोल करण लागे ,अत-ए घचा-ए-घच्च ,अत-ए घचा-ए-घच्च | जब जा के ने उड़े तें डिगा वो | अर में बच गा , चोखा उह दिन फोजी घरां ना था ,ना ते बिना बुझे अक गलती किः की ह ,समार देंदा , मन्ने | अर खजान गाल में के कहंदा जावे" अत-ए घच्चा -ए घच्च ,म्हारा-ए ईंख अर म्हारे-ए डांगर ,अत-ए घच्चा-ए -घच्च ,म्हारी-ए कीकर अर मेरी-ए कड़ अत-ए घच्चा-ए-घच्च " |
"अत-एए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए घच्चा-ए-घच्च " |