जो लोग ये सोचते हैं कि चूंकि वे एक क्षेत्र में अच्छे हैं, इसलिए दूसरे क्षेत्र में भी अच्छे साबित होंगे, तो मेरे ख्याल से गलत सोचते हैं. पाकिस्तान का नामी क्रिकेटर रह चुका इमरान खान वहाँ की राजनीति में हरगिज़ सफल नहीं हुआ. भारत में अमिताभ बच्चन को भी राजनीति रास नहीं आई. भारत में राजनीति में भले ही कुछ फ़िल्मी कलाकार, खिलाड़ी, साधु-संत सांसद बनने में सफल हो गए हों, लेकिन ऐसे लोगों ने जब-जब अपनी पार्टी बनाई तो इनकी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर किसी ने नहीं पूछा. चाहे वो राज बब्बर की पार्टी जन मोर्चा हो या उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी.
बाबा रामदेव बहुत अच्छी बातें करता है, लेकिन राजनीति एक अलग किस्म का क्षेत्र है, जिसमें सफल होने के लिए उसे काफी संघर्ष करना पड़ सकता है. उसकी पार्टी का एजेंडा है स्विस बैंकों में जमा भारतीय काले धन को वापस लाना. सच्चाई ये है कि ऐसा करना बहुत मुश्किल है. अमेरिका एक ईसाई देश हैं और विश्व की एक महाशक्ति भी है, इस नाते यूरोपियन देश उसकी बात को मानते हैं. इसीलिए पिछले दिनों स्विस बैंकों ने अपने यहाँ जमा अमेरिकी काले धन की जानकारी को अमेरिकी सरकार से साझा करने की हामी भर दी थी. स्विस बैंक भारत के साथ ऐसा क्यों करेंगे भला? वे क्यों खुद को दिवालिया बनाएंगे? भारत स्विट्जरलैंड पर ऐसा करने के लिए किस प्रकार दबाव बना सकता है, ये समझ से बाहर है. अतः यह कहा जा सकता है कि बाबा रामदेव आम भारतीयों को एक सब्जबाग दिखा रहा है.
यदि बाबा रामदेव पहले कुछ भारतीयों के खातों का खुलासा कर सके और स्विस बैंकों से कुछ काला धन भारत लाकर दिखा सके तो फिर तो उसे भारतीय राजनीति में सफलता मिल सकती है, अन्यथा बिना कुछ करे वो भारतीय राजनीति में सफलता हासिल करने की सोच रहा है तो पता नहीं ऐसी बेवकूफी क्यों कर रहा है. बिना कुछ करके दिखाए ना तो दक्षिण भारत में, ना पश्चिम भारत में और ना ही पूर्वी भारत में उसे कोई ख़ास सफलता मिलने वाली है. ले-देकर उत्तर भारत बचता है तो यहाँ भी उसके लिए काम इतना आसान नहीं है. बिना कुछ करके दिखाए तो उसकी पार्टी खाता भी खोल सके तो उसके लिए बहुत बड़ी बात होगी. अतः बाबा रामदेव के लिए बेहतर होगा कि या तो वो पहले कुछ करके दिखाए, अन्यथा योग और जड़ी-बूटियों के चक्कर में ही पड़ा रहे, ज्यादा राजनीति में पाँव ना दे.