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A B'ful lively inspiring poem by legend Gulzaar.

एक सुबह इक मोड़ पर - गुलज़ार

एक सुबह इक मोड़ पर
मैने कहा उसे रोक कर
हाथ बढ़ा ए ज़िंदगी
आँख मिला के बात कर

रोज़ तेरे जीने के लिये,
इक सुबह मुझे मिल जाती है
मुरझाती है कोई शाम अगर,
तो रात कोई खिल जाती है
मैं रोज़ सुबह तक आता हूं
और रोज़ शुरु करता हूं सफ़र

हाथ बढ़ा ए ज़िंदगी
आँख मिला के बात कर


तेरे हज़ारों चेहरों में
एक चेहरा है, मुझ से मिलता है
आँखो का रंग भी एक सा है
आवाज़ का अंग भी मिलता है
सच पूछो तो हम दो जुड़वां हैं
तू शाम मेरी, मैं तेरी सहर

हाथ बढ़ा ए ज़िंदगी
आँख मिला के बात कर

मैने कहा उसे रोक कर


Cheers
Jit
 
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डाइनिंग टेबल पर खाना देखकर बच्चा भड़का

फिर वही सब्जी,रोटी और दाल में तड़का....?
...
मैंने कहा था न कि मैं पिज्जा खाऊंगा

रोटी को बिलकुल हाथ नहीं लगाउंगा

बच्चे ने थाली उठाई और बाहर गिराई.......?

बाहर थे कुत्ता और आदमी

दोनों रोटी की तरफ लपके .......?

कुत्ता आदमी पर भोंका

आदमी ने रोटी में खुद को झोंका
और हाथों से दबाया
कुत्ता कुछ भी नहीं समझ पाया

उसने भी रोटी के दूसरी तरफ मुहं लगाया

दोनों भिड़े
जानवरों की तरह लड़े

एक तो था ही जानवर, दूसरा भी बन गया था जानवर.....

आदमी ज़मीन पर गिरा, कुत्ता उसके ऊपर चढ़ा
कुत्ता गुर्रा रहा था

और अब आदमी कुत्ता है या कुत्ता आदमी है कुछ भी नहीं समझ आ रहा था

नीचे पड़े आदमी का हाथ लहराया, हाथ में एक पत्थर आया

कुत्ता कांय-कांय करता भागा........

आदमी अब जैसे नींद से जागा

हुआ खड़ा और लड़खड़ाते कदमों से चल पड़ा.....

वह कराह रहा था रह-रह कर

हाथों से खून टपक रहा था बह-बह कर

आदमी एक झोंपड़ी पर पहुंचा.......

झोंपड़ी से एक बच्चा बाहर आया और ख़ुशी से चिल्लाया

आ जाओ, सब आ जाओ
बापू रोटी लाया, देखो बापू रोटी लाया, देखो बापू रोटी लाया........... ..
 
पुष्प की अभिलाषा
- माखनलाल चतुर्वेदी (Makhanlal Chaturvedi)

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ

चाह नहीं, प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ

चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरि, डाला जाऊँ

चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ

मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर देना तुम फेंक

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पर जावें वीर अनेक ।।

Join anti corruption movement and support them
​
 
A very touchy poem(at least for me).


माँ मेरे अकेलेपन के बारे में सोच रही है
पानी गिर नहीं रहा
पर गिर सकता है किसी भी समय
मुझे बाहर जाना है
और माँ चुप है कि मुझे बाहर जाना है

यह तय है
कि मैं बाहर जाउंगा तो माँ को भूल जाउंगा
जैसे मैं भूल जाऊँगा उसकी कटोरी
उसका गिलास
वह सफ़ेद साड़ी जिसमें काली किनारी है
मैं एकदम भूल जाऊँगा
जिसे इस समूची दुनिया में माँ
और सिर्फ मेरी माँ पहनती है

उसके बाद सर्दियाँ आ जायेंगी
और मैंने देखा है कि सर्दियाँ जब भी आती हैं
तो माँ थोड़ा और झुक जाती है
अपनी परछाई की तरफ
उन के बारे में उसके विचार
बहुत सख़्त है
मृत्यु के बारे में बेहद कोमल
पक्षियों के बारे में
वह कभी कुछ नहीं कहती
हालाँकि नींद में
वह खुद एक पक्षी की तरह लगती है

जब वह बहुत ज्यादा थक जाती है
तो उठा लेती है सुई और तागा
मैंने देखा है कि जब सब सो जाते हैं
तो सुई चलाने वाले उसके हाथ
देर रात तक
समय को धीरे-धीरे सिलते हैं
जैसे वह मेरा फ़टा हुआ कुर्ता हो

पिछले साठ बरसों से
एक सुई और तागे के बीच
दबी हुई है माँ
हालाँकि वह खुद एक करघा है
जिस पर साठ बरस बुने गये हैं
धीरे-धीरे तह पर तह
खूब मोटे और गझिन और खुरदुरे
साठ बरस
 
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।


- दुष्यन्त कुमार
 
हर पल हलचल, पल-पल हलचल

कहे ज़िन्दगी चल आगे चल,

चल आगे चल, चल आगे चल



सुबह हुई सूरज उग आया

नई उमंग तरंगें लाया

चारों तरफ उत्साह नया है

घोर अँधेरा अभी गया है

चिड़िया चहके गुलशन महके

कूंके कोयल यूँ रह रहके

मिल ही गया हो मेहनत का फल

हर पल हलचल पल-पल हलचल



हर पल जीवन का जीना है

ज़हर बना, अमृत पीना है

फूल-शूल की फ़िक्र भूलकर

हरेक जख्म दिल का सीना है

ज़ख़्म मिले जहाँ सिले भी हैं वहाँ

आज नहीं तो आयेगा वो कल

हर पल हलचल पल-पल हलचल



है तो सब-कुछ मगर नहीं कुछ

अगर नहीं संतोष कहीं है

स्वर्ग कही नहीं आसमान में

ढूँढो वो तो यही-कही है

मन खुश है तो तन भी है खुश

तन खुश पर काहे का अंकुश

अंकुश सदा ही बुरा न रहता

बुरे-भले की समझ वो कहता

इससे शिक्षा लेता तू चल

हर पल हलचल पल-पल हलचल



शुद्धि मन की, है सिद्धि तन की

अशोक ये सब से कहता है

तब तक शांति-समृद्धि न मिलती

जब तक मन मैला रहता है

जन सेवा भारी बलशाली

किन्तु सोच न हो छल वाली

छल से गल जाती है आत्मा

निश्छल चाल होए मतवाली

यही चाल देती सबको बल

हर पल हलचल पल-पल हलचल



कहे ज़िन्दगी, चल आगे चल,
चल आगे चल, चल आगे चल
हर पल हलचल पल-पल हलचल
 
कुछ मत पूंछो इस जीवन का, क्या-क्या रंग है हमने देखा

हो सकता है यह वही हो, कहें जिसे किस्मत का लेखा


चोर को खोर में लेटे देखा, शाह को टाट लपेटे देखा
सात साल के बच्चे को है, झुंटे बर्तन धोते देखा
कुछ मत पूंछो इस जीवन का................​


सास को बहू डराए देखा, बेटा नज़र चुराए देखा
मज़बूरी में गलत बहू की, सास बघारे शेखी देखा
कुछ मत पूंछो इस जीवन का.................​


गाँव को देखा नगर को देखा, लाचारी की डगर को देखा
ग़ुरबत में लड़की के बाप को घर-घर खाते ठोकर देखा

कुछ मत पूंछो इस जीवन का, क्या-क्या रंग है हमने देखा​
हो सकता है यह वही हो, कहें जिसे किस्मत का लेखा

धर्म के पावन मर्म को देखा, पांडाओं के कर्म को देखा

देवी चरणों में चढ़ा नारियल, दोबारा फिर बिकते देखा
कुछ मत पूंछो इस जीवन का.................​


इंसानों को बिकते देखा, यौवन को है सिसकते देखा
साठ साल के बुड्ढ़े को, रोमांस में खाते गोते देखा


कुछ मत पूंछो इस जीवन का, क्या-क्या रंग है हमने देखा
​
हो सकता है यह वही हो, कहें जिसे किस्मत का लेखा
 
मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा
मैंने गरीबी को कभी महसूस भी नहीं किया
मैं गरीबी की परिभाषा से भी अनजान हूँ
पर देखा है कुछ नाशाद लोगों को राह चलते
अपनी समस्याओं को सुलझाते, उन्हीं में उलझते
और शायद जिन्दगी का ताना-बाना बुनते
वैसे मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा

देखा है मैंने झोपड़ी में रहने वाले उस बूढे को
जिसके पास तन और छत ढांकने कुछ भी नहीं है।
है, तो केवल एक झीनी सी धोती।
जिसे पह पहनता भी है, और ओढ़ता भी।
उसके झोपड़े में है,
एक चूल्हा, हांडी, लोटा, कनस्तर और चंद लकड़ियों के अलावा कुछ भी नहीं।
हाँ, मैंने झाककर तो देखा है, उसके झोपड़े में
पसीना और रोटी आज भी उसके लिए पूरक हैं
वैसे मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा

देखा है मैंने धंधे/ कोठे पर बैठी उस औरत को
जिसे कभी उसकी परम्परा/ कभी मजबूरी ने
इस नर्क में ढकेल दिया है।
देखा है मेसे सभ्य समाज के नकाबपोश चेहरों को
गिध्दों की तरह उसका बदन नोचते।
और उसे किसी बेजान प्राणी की तरह,
टकटकी लगाये शून्य में झांकते हुए।
मैंने देखा है उसे
तिल-तिल जीते हुये, रोज-रोज मरते हुये।
वैसे मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा

देखा है मैंने रेलवे स्टेशन पर घूमते मासूम को,
जिसे उसकी सौतेली मां और अपने ही बाप ने घर से निकाला है।
वो कभी गाड़ियों में भुट्टा बेचता है तो कभी झाड़ू लगाता है।
कभी-कभी मुसाफिरों के सामने हाथ फैलाये गिड़गिड़ाता भी है।
उसके अपने घर के नाम पर यही स्टेशन है,
और रिश्*तेदारों के नाम पर संग फिरते चंद मासूम।
मैंने देखा है उसे सांझ ढले, पेट से पांव लगाये भूखे सोते हुए,
देखा है मैंने पुलिस वालों को उससे पैसा छुड़ाते हुए।
वैसे मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा

देखा है मैंने गांव के उस किसान को
जिसकी जमीन तो बहुत है पर सींचने के लिए पानी नहीं है।
एक फसल लेता है और परती पड़ी रहती है जमीन,
10 बच्चे भी हैं, कहना था मनोरंजन का साधन नहीं था, इसलिए हो गये।
छोटा मां का दूध पीता है और बड़ी सयानी हो गई है,
कर्ज से बदन दुहरा हो चला है ओर घर में खाने के लाले पड़े हैं।
मैंने देखा है वहां जमींन फट गई है इस बार सूखा जो पड़ गया है।
वैसे मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा

सुना है मैंने गरीबी कम हो रही है, सरकारी ऑंकडे भी यही कहते हैं
पर देखा है रोज किसी
झोंपड़ी के बूढ़े को भूखे सोते हुए
किसी की आबरू उतरते हुए
किसी किसान को आत्महत्या करते हुये
और सुना है
कल स्टेशन पर फिर आया है कोई नया मासूम
 
[h=1]कैलाश वाजपेयी[/h]
ऐसा कुछ भी नहीं जिंदगी में कि हर जानेवाली अर्थी पर रोया जाए |

काँटों बीच उगी डाली पर कल
जागी थी जो कोमल चिंगारी ,
वो कब उगी खिली कब मुरझाई
याद न ये रख पाई फुलवारी |
ओ समाधि पर धूप-धुआँ सुलगाने वाले सुन !
ऐसा कुछ भी नहीं रूपश्री में कि सारा युग खंडहरों में खोया जाए |

चाहे मन में हो या राहों में
हर अँधियारा भाई-भाई है ,
मंडप-मरघट जहाँ कहीं छायें
सब किरणों में सम गोराई है |
पर चन्दा को मन के दाग दिखाने वाले सुन !
ऐसा कुछ भी नहीं चाँदनी में कि जलता मस्तक शबनम से धोया जाये |

साँप नहीं मरता अपने विष से
फिर मन की पीड़ाओं का डर क्या ,
जब धरती पर ही सोना है तो
गाँव-नगर-घर-भीतर- बाहर क्या |
प्यार बिना दुनिया को नर्क बताने वाले सुन !
ऐसा कुछ भी नहीं बंधनों में कि सारी उम्र किसी का भी होया जाए |

सूरज की सोनिल शहतीरों ने
साथ दिया कब अन्धी आँखों का ,
जब अंगुलियाँ ही बेदम हों तो
दोष भला फिर क्या सूराखों का |
अपनी कमजोरी को किस्मत ठहराने वाले सुन !
ऐसा कुछ भी नहीं कल्पना में कि भूखे रहकर फूलों पर सोया जाए |
 
सौ बातों की एक बात है
​
रोज़ सवेरे रवि आता है
दुनिया को दिन दे जाता है
लेकिन जब तम इसे निगलता
होती जग में किसे विकलता
सुख के साथी तो अनगिन हैं
लेकिन दुःख के बहुत कठिन हैं


सौ बातो की एक बात है


अनगिन फूल नित्य खिलते हैं

हम इनसे हँस-हँस मिलते हैं
लेकिन जब ये मुरझाते हैं
तब हम इन तक कब जाते हैं
जब तक हममे साँस रहेगी
तब तक दुनिया पास रहेगी


सौ बातों की एक बात है


सुन्दरता पर सब मरते हैं

किन्तु असुंदर से डरते हैं
जग इन दोनों का उत्तर है
जीवन इस सबके ऊपर है
सबके जीवन में क्रंदन है
लेकिन अपना-अपना मन है


सौ बातो की एक बात है

--------- रमानाथ अवस्थी
 
exact to yaad nahi..shayad 10 ya 12 ki book mai padhi thi ye kavita(mene aahuti bankar dekha).truly a masterpiece.

[h=1]अज्ञेय[/h]मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,
मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने ?
काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,
मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने ?


मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले ?
मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले ?
मैं कब कहता हूँ विजय करूँ मेरा ऊँचा प्रासाद बने ?
या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने ?


पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे ?
नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे ?
मैं प्रस्तुत हूँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने-
फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने !


अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है-
क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसू की माला है ?
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है-
वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन कारी हाला है


मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया-
मैंने आहुति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है !
मैं कहता हूँ, मैं बढ़ता हूँ, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूँ
कुचला जाकर भी धूली-सा आंधी सा और उमड़ता हूँ


मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बने
इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने !
भव सारा तुझपर है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने-
तेरी पुकार सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने
 
बेहतरीन पंक्तियाँ
One really gem of a poem from Great Bachaan saab, that describes 'Real Love' & distinguish between Love & Infatuation in sucha simple n sweet manner!! Truly matchless poem that touches to the core of soul!! :):):)


आदर्श प्रेम - डॉ. हरिवंश राय बच्चन


प्यार किसी को करना लेकिन
कहकर उसे बताना क्या,
अपने को अर्पण करना पर
और को अपनाना क्या |


गुण का ग्राहक बनना लेकिन
गाकर उसे सुनाना क्या,
मन के कल्पित भावो से
औरों को भ्रम में लाना क्या |

ले लेना सुगंध सुमनों की
तोड़ उन्हें मुरझाना क्या,
प्रेम हार पहनना लेकिन
प्रेम पाश फैलाना क्या |

त्याग अंक में पले प्रेम शिशु
उनमे स्वार्थ बताना क्या,
देकर हृदय हृदय पाने की
आशा व्यर्थ लगाना क्या |

Rock on
Jit
 
One fine creation by great maestro Gulzar sa'ab .. Really hard to describe his imagination n' creativity but it simply touch deep inside and make you feel.



ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा - गुलज़ार

ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफिला साथ और सफ़र तन्हा

अपने साये से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे
रात काटे कोई किधर तन्हा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती नहीं बसर तन्हा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फिर न जाने गए किधर तन्हा

Cheers
Jit
 
Raamdhari Singh 'Dinkar'

सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं
बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत हूँ मैं
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं

समाना चाहता है, जो बीन उर में
विकल उस शुन्य की झनंकार हूँ मैं
भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं

जिसे निशि खोजती तारे जलाकर
उसीका कर रहा अभिसार हूँ मैं
जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं

कली की पंखुडीं पर ओस-कण में
रंगीले स्वपन का संसार हूँ मैं
मुझे क्या आज ही या कल झरुँ मैं
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं

मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से
लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं
रुंदन अनमोल धन कवि का, इसी से
पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं

मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी
समा जिस्में चुका सौ बार हूँ मैं

न देंखे विश्व, पर मुझको घृणा से
मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं
पुजारिन, धुलि से मुझको उठा ले
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं

सुनुँ क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा
स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं

दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा का
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं
सजग संसार, तू निज को सम्हाले
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं
 
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दो आवाज़ें ~ जावेद अख्तर

' दो आवाज़ें ' ~ जावेद अख्तर :


एक हमारी और इक उनकी मुल्क में हैं आवाज़ें दो
अब तुम पर है कौन सी तुम आवाज़ सुनो, तुम क्या मानो

हम कहते हैं जात धर्म से इन्सां की पहचान गलत
वो कहते हैं सारे इन्सां एक हैं ये एलान गलत

हम कहते हैं नफरत का जो हुक्म दे वो फर्मान गलत
वो कहते हैं ये मानो तो सारा हिन्दुस्तान गलत

हम कहते हैं भूल के नफ़रत, प्यार की कोई बात करो
वो कहते हैं खून खराबा होता है तो होने दो

हम कहते हैं इन्सानों में इन्सानों से प्यार रहे
वो कहते हैं हाथों में त्रिशुल रहे तलवार रहे

हम कहते हैं बेघर बेदर लोगों को आबाद करो
वो कहते हैं भुले बिसरे मन्दिर मस्ज़िद याद करो

एक हमारी और इक उनकी मुल्क में हैं आवाज़ें दो
अब तुम पर है कौन सी तुम आवाज़ सुनो, तुम क्या मानो
 
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