मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा
मैंने गरीबी को कभी महसूस भी नहीं किया
मैं गरीबी की परिभाषा से भी अनजान हूँ
पर देखा है कुछ नाशाद लोगों को राह चलते
अपनी समस्याओं को सुलझाते, उन्हीं में उलझते
और शायद जिन्दगी का ताना-बाना बुनते
वैसे मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा
देखा है मैंने झोपड़ी में रहने वाले उस बूढे को
जिसके पास तन और छत ढांकने कुछ भी नहीं है।
है, तो केवल एक झीनी सी धोती।
जिसे पह पहनता भी है, और ओढ़ता भी।
उसके झोपड़े में है,
एक चूल्हा, हांडी, लोटा, कनस्तर और चंद लकड़ियों के अलावा कुछ भी नहीं।
हाँ, मैंने झाककर तो देखा है, उसके झोपड़े में
पसीना और रोटी आज भी उसके लिए पूरक हैं
वैसे मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा
देखा है मैंने धंधे/ कोठे पर बैठी उस औरत को
जिसे कभी उसकी परम्परा/ कभी मजबूरी ने
इस नर्क में ढकेल दिया है।
देखा है मेसे सभ्य समाज के नकाबपोश चेहरों को
गिध्दों की तरह उसका बदन नोचते।
और उसे किसी बेजान प्राणी की तरह,
टकटकी लगाये शून्य में झांकते हुए।
मैंने देखा है उसे
तिल-तिल जीते हुये, रोज-रोज मरते हुये।
वैसे मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा
देखा है मैंने रेलवे स्टेशन पर घूमते मासूम को,
जिसे उसकी सौतेली मां और अपने ही बाप ने घर से निकाला है।
वो कभी गाड़ियों में भुट्टा बेचता है तो कभी झाड़ू लगाता है।
कभी-कभी मुसाफिरों के सामने हाथ फैलाये गिड़गिड़ाता भी है।
उसके अपने घर के नाम पर यही स्टेशन है,
और रिश्*तेदारों के नाम पर संग फिरते चंद मासूम।
मैंने देखा है उसे सांझ ढले, पेट से पांव लगाये भूखे सोते हुए,
देखा है मैंने पुलिस वालों को उससे पैसा छुड़ाते हुए।
वैसे मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा
देखा है मैंने गांव के उस किसान को
जिसकी जमीन तो बहुत है पर सींचने के लिए पानी नहीं है।
एक फसल लेता है और परती पड़ी रहती है जमीन,
10 बच्चे भी हैं, कहना था मनोरंजन का साधन नहीं था, इसलिए हो गये।
छोटा मां का दूध पीता है और बड़ी सयानी हो गई है,
कर्ज से बदन दुहरा हो चला है ओर घर में खाने के लाले पड़े हैं।
मैंने देखा है वहां जमींन फट गई है इस बार सूखा जो पड़ गया है।
वैसे मैंने कभी किसी गरीब को नहीं देखा
सुना है मैंने गरीबी कम हो रही है, सरकारी ऑंकडे भी यही कहते हैं
पर देखा है रोज किसी
झोंपड़ी के बूढ़े को भूखे सोते हुए
किसी की आबरू उतरते हुए
किसी किसान को आत्महत्या करते हुये
और सुना है
कल स्टेशन पर फिर आया है कोई नया मासूम