Kuldip Nayyar's Article
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An article by famous Journalist Kuldip Nayyar has appeared today (15 Aug. 2007) in "Dainik Jagran" which gives an interesting reading. It is reproduced below (the link would not work properly).
शासकों ने किया शर्मसार (Kuldip Nayyar)
आजादी से लेकर अब तक की असफलताओं के लिए शासकों को दोष दे रहे हैं कुलदीप नैयर
15 अगस्त, 1947 की अर्धरात्रि की बेला में भारत ने स्वतंत्रता का दर्शन किया। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जिस संकल्प का उल्लेख किया था, वह था- निर्धनता, अज्ञानता, रोग तथा अवसर की असमानता का उन्मूलन। इससे पूर्व महात्मा गांधी ने हर आंख से आंसू पोंछने का वचन दिया था। इसके विपरीत स्वतंत्रता के साठ वर्ष बाद भी हम अपने लोगों को स्वच्छ पेयजल भी उपलब्ध नहीं करा पाए। आधिकारिक तौर पर यह स्वीकारोक्ति की जा चुकी है कि एक अरब की जनसंख्या में 26 करोड़ व्यक्ति दीन-हीन हैं और 39 करोड़ अशिक्षित हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल में भी निर्धनों की दीनदशा का निवारण नहीं हो सका। लोगों की परेशानियों में इसलिए और अधिक वृद्धि हुई है, क्योंकि विकास का पाश्चात्य मॉडल अपना लिया गया। क्या इसे विश्व बैंक की देन कहे? विकास दर प्रभावी हो सकती है, किंतु आम आदमी तो बहुत पिछड़ा और असहाय है। निम्न और उच्च वेतन में अंतर 1:15 होना चाहिए है। यह अब 1:500 से भी ज्यादा है। इस ढंग के विकास का निकृष्ट हिस्सा यह है कि हमारे समाज में सहानुभूति और चिंता का भी संकुचन हो गया है।
समाज में दूसरों का ध्यान रखने की सोच ही विदा हो गई है। उपेक्षित और पिछड़ों-बिछड़ों के दुखों और कष्टों के प्रति संवेदनशीलता विलुप्त हो गई है। बहुत समय नहीं हुआ जब लोग निर्धनों के बारे में सोचते थे, चर्चा करते थे। उनकी सोच और व्यवहार में करुणा का समावेश था। समाज विकास दर पर ही पूरा ध्यान केंद्रित कर रहा है। यहां तक कि उदार चिंतन भी उपयोगितावाद में उलझकर मृतप्राय हो गया है। जो कभी वाम के नाम से जाना जाता था वह आज सत्ता प्रतिष्ठान का हिस्सा हो गया है। उसकी क्रांति नियुक्तियों और तबादलों तक सीमित होकर रह गई है। दूसरी ओर, उद्यमशीलता के नाम पर वीभत्स उपभोग को तर्कसंगत ठहराया जा रहा है। निर्धनों में पहल का भाव नदारद है, इसीलिए वे पीड़ित है। मूल्यगत प्रणाली ही परिवर्तित हो गई है। व्यवहार में नैतिकता भी विलुप्त हो गई है। बड़े से आशय है- बड़ा भवन, बड़ा बांध और विपुल बैंक बैलेंस। सभी धन की परिक्रमा कर रहे हैं। सफलता का आकलन भी अब संपदा के आधार पर होने लगा है। इस दौड़ में जहां ध्येय ही माध्यम को सही ठहराता है, सामान्य जन कुचले जा रहे है। उद्धार की कोई आशा ही नहीं नजर आती। यह कैसे हो सकता है, जब अंधाधुंध निजीकरण कमजोर को व्यवस्था से ही बाहर कर रहा है। आने वाले दिनों में निर्ममता के और अधिक भयावह रूप लेने के आसार है।
सरकार विभिन्न क्षेत्रों से स्वयं को आंशिक तौर पर या पूर्णत: हटाती जा रही है। सत्य है कि इससे देनदारी में कमी आती है, किंतु उन लोगों की कार्य स्थितियों और अवस्था के बारे में कोई कैसे सोच सकेगा, जिन्हे भेड़ियों के समक्ष फेंक दिया गया है। उन्हे जो थोड़ा-बहुत वेतन मिलता है वह भी समय पर नहीं मिल पाता। ग्राम्य अंचलों में रहने वाले लोग सर्वाधिक पीड़ित हैं। उनके पास जमीन घटती जा रही है। उनका उत्पादन घटा है और उत्पाद का मूल्य भी। समर्थन मूल्य के कारण अब वे व्यावहारिक रूप से मुनाफा भी गंवा बैठे है। इसके बावजूद उनमें स्वाभिमान का ह्रास नहीं हो पाता। दुर्भाग्यपूर्ण है कि वे दिवालिया होकर लजाने के बजाय आत्महत्या करना बेहतर समझते हैं। विगत कुछ वर्षों में एक लाख किसान जान गंवा चुके है। कुछ लोग तर्क देते हैं कि यह तो विकास की प्रसव पीड़ा है, किंतु यह सब त्याग और पीड़ा आम आदमी की नियति ही क्यों हो? उन लोगों के बारे में क्या कहिएगा जो हर दौर में विलासिता का जीवन यापन करते रहे है।
जवाहर लाल नेहरू का संकल्प मुठ्ठी भर लोगों की बेहतरी के लिए ही तो नहीं था। भारत को सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया के दौरान विंस्टन चर्चिल ने कहा था- सत्ता लफंगों, धूतरें और लुटेरों के हाथ में चली जाएगी। पानी की एक बोतल, रोटी का टुकड़ा तक भी कराधान से नही बच पाएगा। मात्र वायु ही नि:शुल्क रहेगी और इन लाखों भूखों का खून मिस्टर एटली के सिर पर होगा। ये घास फूस के इंसान है, कुछ वर्ष बाद उनका निशान भी नजर नहीं आ पाएगा। उनके ये शब्द एक परास्त साम्राज्यवादी का प्रलाप थे, जिसने लाभदायक साम्राज्य गंवाया था। फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं है कि दक्षिण-पूर्वी एशिया में नेताओं का स्तर गिरा है। वे छोटे लोग है, जो बड़े पदों पर आसीन हो गए है। वे जनहित को बढ़ावा देने के लिए सत्ता व अधिकार के आकांक्षी नहीं हैं अपितु अपने व्यक्तिगत अथवा दलीय परितोषण को सुरक्षित रखने के लिए सत्ता की कामना करते है।
विगत कुछ माह में मैंने सभी पड़ोसी देशों की यात्रा की है। मैंने उनमें स्थिरता का अभाव पाया है। स्वतंत्रता के छह दशक बीत जाने पर भी वे डांवाडोल हैं। उनकी बुनियादी पीड़ा की वजह यह है कि कानून का शासन विद्यमान नहीं है और पुलिस भी भ्रष्ट है। ज्यादातर देशों में अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं। क्षेत्र में सभी राष्ट्र लोकतंत्र का दम भरते है, पर उसके सार तत्व को गंवा बैठे हैं। उन्हें उद्धत राष्ट्रवाद पर ही गर्व है। इन देशों में जो बात साझा है वह है मानवाधिकारों का उल्लंघन और आलोचकों को दंडित करने के लिए कठोर कानून। लोगों के अधिकारों की रक्षा ही वह आधारशिला है जिस पर लोकतंत्र की अवधारणा टिकी है, किंतु अधिकार मात्र ही सापेक्ष अवधारणा होकर रह गया है। शासक आम जनता के दमन के लिए आतंक और तानाशाही का पर्याय बन चुकी पुलिस और नौकरशाही का इस्तेमाल करते है। ये वही लोग है जिनके सुधार का वचन जवाहर लाल नेहरू ने दिया था। सर्वाधिक परेशान करने वाली बात यह है कि ये देश हथियारों पर इतना व्यय कर रहे है, जितना यूरोपीय ताकतें कुल मिलाकर भी नहीं करतीं।
एक युद्धक विमान की कीमत में 1500 स्कूलों और 500 स्वास्थ्य केंद्रों का निर्माण हो सकता है। भारत लगभग 70 लड़ाकू जेट खरीद रहा है। अन्य हथियार इनके अलावा हैं। पाकिस्तान को भी एफ-16 विमान मिल चुके है। इनके अलावा उसकी एक लंबी सूची है जो अमरीका को उसने सौंपी है। श्रीलंका बड़ी तत्परता से चीन से छोटे और बड़े हथियार खरीद रहा है। निसंदेह दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों ने प्रगति की है। विकास का सिलसिला कुछ नीचे आया है, किंतु अधिक नहीं। भवन निर्माताओं और लालची भूस्वामियों को हमारे समग्र ग्राम्य अंचल में मनमानी करने की अनुमति सी दे दी गई है। आम लोगों ने शासकों को नहीं लजाया, बल्कि शासकों ने ही ऐसा किया है। वे अभी भी यह नहीं जानते कि शासन कैसे किया जाता है। कैसे पाक-साफ रहा जाता है और कैसे इस वचन को पूर्ण करना है कि राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद आर्थिक आजादी भी आएगी? वे तो घास-फूस के बोदे इंसान होकर रह गए है।
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