Inspirational stories

एक मकड़ी थी. उसने आराम से रहने के लिए एक शानदार जाला बनाने का विचार किया और सोचा की इस जाले मे खूब कीड़ें, मक्खियाँ फसेंगी और मै उसे आहार बनाउंगी और मजे से रहूंगी . उसने कमरे के एक कोने को पसंद किया और वहाँ जाला बुनना शुरू किया. कुछ देर बाद आधा जाला बुन कर तैयार हो गया. यह देखकर वह मकड़ी काफी खुश हुई कि तभी अचानक उसकी नजर एक बिल्ली पर पड़ी जो उसे देखकर हँस रही थी.

मकड़ी को गुस्सा आ गया और वह बिल्ली से बोली , ” हँस क्यो रही हो?”

”हँसू नही तो क्या करू.” , बिल्ली ने जवाब दिया , ” यहाँ मक्खियाँ नही है ये जगह तो बिलकुल साफ सुथरी है, यहाँ कौन आयेगा तेरे जाले मे.”

ये बात मकड़ी के गले उतर गई. उसने अच्छी सलाह के लिये बिल्ली को धन्यवाद दिया और जाला अधूरा छोड़कर दूसरी जगह तलाश करने लगी. उसने ईधर ऊधर देखा. उसे एक खिड़की नजर आयी और फिर उसमे जाला बुनना शुरू किया कुछ देर तक वह जाला बुनती रही , तभी एक चिड़िया आयी और मकड़ी का मजाक उड़ाते हुए बोली , ” अरे मकड़ी , तू भी कितनी बेवकूफ है.”

“क्यो ?”, मकड़ी ने पूछा.

चिड़िया उसे समझाने लगी , ” अरे यहां तो खिड़की से तेज हवा आती है. यहा तो तू अपने जाले के साथ ही उड़ जायेगी.”

मकड़ी को चिड़िया की बात ठीक लगीँ और वह वहाँ भी जाला अधूरा बना छोड़कर सोचने लगी अब कहाँ जाला बनायाँ जाये. समय काफी बीत चूका था और अब उसे भूख भी लगने लगी थी .अब उसे एक आलमारी का खुला दरवाजा दिखा और उसने उसी मे अपना जाला बुनना शुरू किया. कुछ जाला बुना ही था तभी उसे एक काक्रोच नजर आया जो जाले को अचरज भरे नजरो से देख रहा था.

मकड़ी ने पूछा – ‘इस तरह क्यो देख रहे हो?’

काक्रोच बोला-,” अरे यहाँ कहाँ जाला बुनने चली आयी ये तो बेकार की आलमारी है. अभी ये यहाँ पड़ी है कुछ दिनों बाद इसे बेच दिया जायेगा और तुम्हारी सारी मेहनत बेकार चली जायेगी. यह सुन कर मकड़ी ने वहां से हट जाना ही बेहतर समझा .

बार-बार प्रयास करने से वह काफी थक चुकी थी और उसके अंदर जाला बुनने की ताकत ही नही बची थी. भूख की वजह से वह परेशान थी. उसे पछतावा हो रहा था कि अगर पहले ही जाला बुन लेती तो अच्छा रहता. पर अब वह कुछ नहीं कर सकती थी उसी हालत मे पड़ी रही.

जब मकड़ी को लगा कि अब कुछ नहीं हो सकता है तो उसने पास से गुजर रही चींटी से मदद करने का आग्रह किया .

चींटी बोली, ” मैं बहुत देर से तुम्हे देख रही थी , तुम बार- बार अपना काम शुरू करती और दूसरों के कहने पर उसे अधूरा छोड़ देती . और जो लोग ऐसा करते हैं , उनकी यही हालत होती है.” और ऐसा कहते हुए वह अपने रास्ते चली गई और मकड़ी पछताती हुई निढाल पड़ी रही.

दोस्तों , हमारी ज़िन्दगी मे भी कई बार कुछ ऐसा ही होता है. हम कोई काम start करते है. शुरू -शुरू मे तो हम उस काम के लिये बड़े उत्साहित रहते है पर लोगो के comments की वजह से उत्साह कम होने लगता है और हम अपना काम बीच मे ही छोड़ देते है और जब बाद मे पता चलता है कि हम अपने सफलता के कितने नजदीक थे तो बाद मे पछतावे के अलावा कुछ नही बचता.
 
एक लड़का था. उसकी माँ ने उसका विवाह कर दिया. लेकिन लड़का कुछ नहीं कमाता था. माँ जब भी उसको रोटी परोसती थी, तब वह कहती कि बेटा, ठंडी रोटी खा लो. लड़के की समझ में यह नहीं आया कि माँ ऐसा क्यों कहती है. फिर भी वह चुप रहा.

एक दिन उसकी माँ काम से बाहर गई तो जाते समय अपनी बहू को कह गई कि जब लड़का आए तो उसे रोटी परोस देना. रोटी परोसकर कह देना कि ठण्डी रोटी खा लो. उसने अपने पति से वैसा हीं कह दिया तो वह चिढ़ गया कि माँ तो कहती हीं है, यह भी कहना सीख गई. वह अपनी पत्नी से बोला कि बताओ, रोटी ठण्डी कैसे हुई ? रोटी भी गर्म है, दाल-साग भी गर्म हैं, फिर तू ठण्डी रोटी कैसे कहती है ? वह बोली कि यह तो माँ जाने. माँ ने मुझे ऐसा कहने के लिए कहा था, इसलिए मैंने कह दिया. वह बोला कि मैं रोटी नहीं खाऊंगा. माँ तो कहती ही थी, तू भी सीख गई.


माँ घर आई तो उसने बहू से पूछा कि क्या लड़के ने भोजन कर लिया ? वह बोली कि उन्होंने तो भोजन किया हीं नहीं, उल्टा नाराज हो गए. माँ ने लड़के से पूछा तो वह बोला कि माँ, तू रोजाना कहती थी कि ठण्डी रोटी खा लो और मैं सह लेता था, अब यह भी कहना सीख गई. रोटी तो गरम होती है, तू बता कि रोटी ठण्डी कैसे है ? माँ ने पूछा कि ठण्डी रोटी किसे कहते हैं ? लड़का बोला- सुबह की बनाई हुई रोटी शाम को ठण्डी होती है. ऐसे ही एक दिन की बनाई हुई रोटी दूसरे दिन ठण्डी होती है. बासी रोटी ठण्डी और ताजी रोटी गरम होती है. माँ ने कहा- बेटा, अब तू विचार करके देख. तेरे बाप की जो कमाई है, वह ठण्डी बासी रोटी है. गरम, ताजी रोटी तो तब होगी, जब तू खुद कमाकर लाएगा. लड़का समझ गया और माँ से बोला कि अब मैं खुद कमाऊँगा और गरम रोटी खाऊंगा.
 
[h=5] रावण यहीं से बना रहा था स्वर्ग की सीढ़ी, आज भी ‘राक्षसों’ का कब्जा

रांची। दुनिया को स्वर्ग और नरक के अस्तित्व पर विश्वास हो न हो, पर आज से करीब 18 लाख साल पहले त्रेतायुग में लंकाधिपति रावण ने धरती से स्वर्ग तक सीढ़ी बनाने का काम शुरू किया था। अगर सीढ़ी बनाने में राक्षसराज कामयाब हो जाता तो फिर स्वर्ग जाने के लिए अच्छे कर्मों और पुण्य-प्रताप की जरूरत नहीं पड़ती। बहरहाल, हम बात कर रहे हैं उस जगह की जहां से सोने की लंका के मालिक रावण ने इस कार्यकी शुरुआत की थी। भले ही यह कार्यबीच में ही रोक दिया गया हो, पर सीढ़ियां बनाने के लिए लगाए गए चट्टान आज भी उसकी गवाही दे रहे हैं।

झारखंड के घाटशिला जिले में स्थित गालूडीह से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ियों और जंगलों से घिरा एक गांव है दुआरसीनी। झारखंड के नरसिंहपुर से महज तीन किमी की दूरी पर बंगाल के पुरूलिया जिले में स्थित दुआरसीनी जाने के लिए बीहड़ जंगल से गुजरना पड़ता है।
पुराणों में भी दुआरसीनी का जिक्र है। माना जाता है कि त्रेता युग में रावण ने यहीं पर स्वर्ग जाने की सीढ़ी बनानी शुरू की थी। पहाड़ की ऊंची चोटी तक गई सीढ़ीनुमा चट्टानों को लोग उसी युग का बताते हैं। संभवत इसी कारण इसका नाम दुआरसीनी पड़ा।

जंगलों में शाम के समय अचानक अंधेरे को उतरते देखना काफी दिलचस्प लगता है। जंगलों से घिरे इस क्षेत्र में आदिवासी गांवों से आती ढोल-नगाड़ों की लयबद्ध ध्वनियां चांदनी रात में मदहोश कर देने वाली होती हैं। मंदिर के सामने वन विभाग द्वारा चट्टानों की लंबी सीढ़ी बनवाई गई है, जो पहाड़ तक जाती हैं। वहां बच्चों के लिए आकर्षक चिड्रेन पार्क है।

प्राचीन महाकाव्यों और पुराणों में वर्णित यह धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व का स्थान एक विख्यात पर्यटक स्थल के रूप में भी लंबे समय तक प्रसिद्ध रहा। लेकिन, आज यहां कोई नहीं आता। वजह है आज के रावणों यानि नक्सलियों का कब्जा। आज दुआरसीनी पर्यटक स्थल नक्सलियों के अघोषित कब्जे में है।

दुआरसीनी गांव ही नहीं आस-पास का पूरा जंगली इलाका, बस्तियों पर आज माओवादियों की तूती बोलती है। लाल आतंक के कारण यह सांस्कृतिक स्थल अब फिर से राक्षसराज रावण के क्रूर शासन की याद दिला रहा है।

रावण ने बताया था क्यों फेल हुआ प्रोजेक्ट : जब रावण राम के बाण से गिर गया तो राम स्वयं उसके पास शिक्षा लेने गए थे। इसी समय रावण ने टाइम मैनेजमेंट और पॉजीटिव थिंकिंग की शिक्षा देते हुए कहा था कि अच्छे काम को टालना नहीं चाहिए और बुरे काम को जितना हो सके टालना चाहिए। रावण ने स्वर्ग की सीढ़ी वाले प्रोजेक्ट के संदर्भ में राम से कहा था, “अच्छे कार्यों को कभी नहीं टालना चाहिए। हो सकता है कि टालने के कारण उन कार्यों को करने का कभी अवसर ही न आए। मैंने सोचा था कि नरक का मार्ग बंद करवा दूंगा, ताकि किसी को परलोक में दु:ख न भोगने पडे़। दूसरा काम समुद्र के खारे पानी को निकाल कर उसे दूध से भर देने का था। तीसरा काम धरती से स्वर्ग तक सीढ़ी बनाने का था, जिससे पापी-पुण्यात्मा सभी स्वर्ग तक पहुंच सकें।







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(fb)
 
[h=5]Read this before watching the video:-

The woman in the video found the lion, injured in the forest, on the verge of death. She took the lion home with her and nursed it back to health. Later, when the lion was better, she made arrangements with a zoo to take the lion. Some time passed before the woman had a chance to visit the zoo. This video was taken when she walked up to the lion's cage to see how he was doing. Watch the lion's reaction when he sees her !!



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जीवन का रहस्य...

राजा सुषेण के मन में कुछ प्रश्न थे, जिनके उत्तर की तलाश में वह एक महात्मा के पास पहुंचे। महात्मा ने कहा, ‘अभी मेरे पास समय नहीं है। मुझे अपनी वाटिका बनानी है।’ राजा भी उनकी मदद करने में जुट गए। इतने में एक घायल आदमी भागता-भागता आया और गिरकर बेहोश हो गया। महात्मा जी ने उसके घाव पर औषधि लगाई। राजा भी उसकी सेवा में लग गए। जब वह आदमी होश में आया तो राजा को देखकर चौंक उठा। वह राजा से क्षमा मांगने लगा।

जब राजा ने इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि वह राजा को मारने के इरादे से निकला था, लेकिन सैनिकों ने उसके मंसूबों को भांप लिया और उस पर हमला कर दिया। वह किसी तरह जान बचाकर भागता हुआ इधर पहुंचा है। महात्मा जी के कहने पर राजा ने उसे क्षमा कर दिया। लेकिन तब राजा ने महात्मा से प्रश्न किया, ‘मेरे तीन प्रश्न हैं। सबसे उत्तम समय कौन-सा है, सबसे बढि़या काम कौन सा है और सबसे अच्छा व्यक्ति कौन है।’

महात्मा बोले, ‘हे राजन, इन तीनों प्रश्नों का उत्तर तो तुमने पा लिया है। फिर भी सुनो। सबसे उत्तम समय है वर्तमान। आज तुमने वर्तमान समय का सदुपयोग करते हुए मेरे काम में हाथ बंटाया और वापस जाने को टाला, जिससे तुम बच गए। अन्यथा वह व्यक्ति बाहर तुम्हारी जान ले सकता था। और जो सामने आ जाए, वही सबसे बढि़या काम है। आज तुम्हारे सामने बगीचे का कार्य आया और तुम उसमें लग गए। वर्तमान को संवार कर उसका सदुपयोग किया। इसी कर्म ने तुम्हें दुर्घटना से बचाया। और बढि़या व्यक्ति वह है, जो प्रत्यक्ष हो। उस आदमी के लिए अपने दिल में सद्भाव लाकर तुमने उसकी सेवा की, इससे उसका हृदय परिवर्तित हो गया और तुम्हारे प्रति उसका वैर भाव धुल गया। इस प्रकार तुम्हारे सामने आया व्यक्ति, शास्त्रानुकूल कार्य व वर्तमान समय उत्तम हैं।’

जीवन के इस रहस्य को जान कर राजा महात्मा के सामने नतमस्तक हो गए।
 
परमात्मा और किसान :-

एक बार एक किसान परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया ! कभी बाढ़ आ जाये, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले पड़ जाये! हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी ख़राब हो जाये! एक दिन बड़ा तंग आ कर उसने परमात्मा से कहा, देखिये प्रभु, आप परमात्मा हैं, लेकिन लगता है आपको खेती बाड़ी की ज्यादा जानकारी नहीं है, एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका दीजिये, जैसा मै चाहू वैसा मौसम हो, फिर आप देखना मै कैसे अन्न के भण्डार भर दूंगा! परमात्मा मुस्कुराये और कहा ठीक है, जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा, मै दखल नहीं करूँगा!

किसान ने गेहूं की फ़सल बोई, जब धूप चाही, तब धूप मिली, जब पानी तब पानी ! तेज धूप, ओले, बाढ़, आंधी तो उसने आने ही नहीं दी, समय के साथ फसल बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी, क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नहीं हुई थी ! किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को, कि फ़सल कैसे उगाई जाती हैं, बेकार ही इतने बरस हम किसानो को परेशान करते रहे.

फ़सल काटने का समय भी आया ,किसान बड़े गर्व से फ़सल काटने गया, लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा ,एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया! गेहूं की एक भी बाली के अन्दर गेहूं नहीं था, सारी बालियाँ अन्दर से खाली थी, बड़ा दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा, प्रभु ये क्या हुआ ?

तब परमात्मा बोले,” ये तो होना ही था, तुमने पौधों को संघर्ष का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया . ना तेज धूप में उनको तपने दिया , ना आंधी ओलों से जूझने दिया ,उनको किसी प्रकार की चुनौती का अहसास जरा भी नहीं होने दिया , इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए, जब आंधी आती है, तेज बारिश होती है ओले गिरते हैं तब पोधा अपने बल से ही खड़ा रहता है, वो अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इस संघर्ष से जो बल पैदा होता है वोही उसे शक्ति देता है ,उर्जा देता है, उसकी जीवटता को उभारता है.सोने को भी कुंदन बनने के लिए आग में तपने , हथौड़ी से पिटने,गलने जैसी चुनोतियो से गुजरना पड़ता है तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है,उसे अनमोल बनाती है !”

उसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो ,चुनौती ना हो तो आदमी खोखला ही रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण नहीं आ पाता ! ये चुनोतियाँ ही हैं जो आदमी रूपी तलवार को धार देती हैं, उसे सशक्त और प्रखर बनाती हैं, अगर प्रतिभाशाली बनना है तो चुनोतियाँ तो स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, अन्यथा हम खोखले ही रह जायेंगे. अगर जिंदगी में प्रखर बनना है, प्रतिभाशाली बनना है, तो संघर्ष और चुनोतियो का सामना तो करना ही पड़ेगा !
 
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**** चार प्रश्नों के उत्तर ****

एक बार एक राजा ने अपने मंत्री से कहा, 'मुझे इन चार प्रश्नों के उत्तर दो। जो यहां हो वहां नहीं, दूसरा- वहां हो यहां नहीं, तीसरा- जो यहां भी नहीं हो और वहां भी न हो, चौथा- जो यहां भी हो और वहां भी।'

मंत्री ने उत्तर देने के लिए दो दिन का समय माँगा दो दिनों के पश्चात वह चार व्यक्तियों को लेकर राज दरबार में उपस्थित हुआ और बोला, 'राजन! हमारे धर्मग्रंथों में अच्छे-बुरे कर्मों और उनके फलों के अनुसार स्वर्ग और नरक की अवधारणा प्रस्तुत की गई है। यह पहला व्यक्ति भ्रष्टाचारी है, यह गलत कार्य करके यद्यपि यहां तो सुखी और संपन्न दिखाई देता है, पर इसकी जगह वहां अर्थात स्वर्ग में नहीं होगी। दूसरा व्यक्ति सद- गृहस्थ है। यह यहां पूर्ण निष्ठा से रहते हुए कष्ट अवश्य भोग रहा है, पर इसकी जगह वहां स्वर्ग में अवश्य होगी। तीसरा व्यक्ति भिक्षुक है, यह पराश्रित है। यह न तो यहां सुखी है और न वहां सुखी रहेगा। यह चौथा व्यक्ति एक दानवीर सेठ है, जो अपने धन का सदुपयोग करते हुए दूसरों की भलाई भी कर रहा है और सुखी संपन्न है। अपने उदार व्यवहार के कारण यह यहां भी सुखी है और अच्छे कर्म करन से इसका स्थान वहां भी सुरक्षित है।

एक देश भक्त को सदैव तत्पर रहना चाहिए अपने देश की रक्षा के लिए.
 
एक धनवान व्यक्ति था. उसने समुद्र में अकेले घूमने के लिए एक नाव बनवाई. छुट्टी के दिन वह नाव लेकर समुद्र की सैर करने निकला.आधे समुद्र तक पहुँचा ही था कि अकस्मात एक प्रचंड तूफ़ान आया. उसकी नाव पूर्ण रूप से नष्ट हो गई किन्तु वह लाईफ जैकेट की सहायता से समुद्र में कूद गया. जब तुफान शांत हुआ तब वह तैरता-तैरता एक टापु पर पहुँचा किन्तु वहां कोई भी नही था. टापु के चारों ओर समुद्र के अतिरिक्त कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था.

उस व्यक्ति ने सोचा कि सम्पूर्ण जीवन में मैंने किसी का कभी भी बुरा नही किया तो मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?


उस को को लगा कि भगवान ने मृत्यु से बचाया है तो आगे का मार्ग भी भगवान ही बताएँगे। शनैः-शनैः वह वहाँ पर उगे झाड-पत्ते खाकर दिन
व्यतीत करने लगा. अब शनैः -शनैः उसकी श्रध्दा टूटने लगी, भगवान पर से उसका विश्वास उठ गया. उसको लगा कि इस जगत में भगवान हैं ही नहीं ! तदन्तर उसने सोचा कि अब सम्पूर्ण जीवन यहीं इस टापु पर व्यतीत करना है तो क्यों ना एक झोंपड़ी बना लूं.

फिर उसने झाड की डालियों और पत्तों से एक छोटी सी झोंपड़ी बनाई. उसको लगा कि हाश आज से झोंपड़ी में सोने को मिलेगा आज से बाहर नही सोना पडेगा.

रात हुई ही थी कि अचानक मौसम बदला मेघ गरजे, बिजलियाँ जोर जोर से चमकने लगी! तभी अचानक एक बिजली उस झोंपड़ी पर आ गिरी और झोंपड़ी धधकते हुए जलने लगी. यह देखकर वह व्यक्ति टूट गया एवं आकाश की ओर देखकर बोला आप भगवान नही, राक्षस हैं, आप में दया जैसा कुछ है ही नही आप बहुत क्रूर हैं. निराश होकर शीश पर हाथ रखकर रो रहा था.


अचानक एक नाव टापु के पास आई. नाव से उतरकर दो मनुष्य बाहर आये और बोले कि हम तुम्हें बचाने आये हैं, तुम्हारा जलता हुआ झौंपदा देखा तो लगा कि कोई उस टापु पर संकट में है। यदि तुम अपनी झोंपड़ी नही जलाते तो हमे पता नही चलता कि टापु पर कोई है!



उस व्यक्ति की आँखों से आंसू गिरने लगे. उसने भगवान से क्षमा माँगी और बोला कि मुझे ये ज्ञात नहीं था कि आपने मुझे बचाने के लिए मेरी झोंपड़ी जलाई थी !


 
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भगवान की सीख


एक भिखारी था| वह न ठीक से खाता था, न पीता था, जिसके कारण उसका वृद्ध शरीर सूखकर कांटा हो गया था| उसकी एक-एक हड्डी गिनी जा सकती थी| उसकी आंखों की ज्योति चली गई थी| उसे कोढ़ हो गया था| बेचारा मार्ग के एक ओर बैठकर गिड़गिड़ाते हुए भीख मांगा करता था| एक युवक उस मार्ग से नित्य निकलता था| भिखारी को देखकर उसे बड़ा बुरा लगता| उसका मन बहुत ही दुखी होता| वह सोचता, वह क्यों भीख मांगता है? जीने से उसे मोह क्यों है? भगवान उसे उठा क्यों नहीं लेते? एक दिन उससे न रहा गया| वह भिखारी के पास गया और बोला - "बाबा, तुम्हारी ऐसी हालत हो गई है फिर भी तुम जीना चाहते हो? तुम भीख मांगते हो, पर भगवान से यह प्रार्थना क्यों नहीं करते कि वह तुम्हें अपने पास बुला ले?"

भिखारी ने अपना मुख खोला - "भैया तुम जो कह रहे हो, वही बात मेरे मन में भी उठती है| मैं भगवान से बराबर प्रार्थना करता हूं, पर वह मेरी सुनता ही नहीं| संभवतः वह चाहता है कि मैं इस धरती पर रहूं, जिससे इस जगत के लोग मुझे देखें और समझें कि एक दिन मैं भी उनकी ही तरह था, किन्तु वह दिन भी आ सकता है, जबकि वे मेरी तरह हो सकते हैं| इसलिए किसी को घमंड नहीं करना चाहिए|"

लड़का भिखारी की ओर देखता रह गया| उसने जो कहा था, उसमें कटु सत्य समाया हुआ था| यह जीवन का एक कड़वा सत्य था, जिसे मानने वाले भगवान की सीख भी मानते हैं|


हमारे बुजुर्ग लोग भी कहते हैं कि अपने कर्म सही रखो, शेष भगवान पर छोड़ दो।
 
एक बार एक युवक अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने वाला था। उसकी बहुत दिनों से एक शोरूम में रखी स्पोर्टस कार लेने की इच्छा थी। उसने अपने पिता से कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने पर उपहार स्वरूप वह कार लेने की बात कही क्योंकि वह जानता था कि उसके पिता उसकी इच्छा पूरी करने में समर्थ हैं। कॉलेज के आखिरी दिन उसके पिता ने उसे अपने कमरे में बुलाया और कहा कि वे उसे बहुत प्यार करते हैं तथा उन्हें उस पर गर्व है। फिर उन्होंने उसे एक सुंदर कागज़ में लिपटा उपहार दिया ।


उत्सुकता पूर्वक जब युवक ने उस कागज़ को खोला तो उसे उसमें एक आकर्षक जिल्द वाली ‘भगवद् गीता’ मिली जिस पर उसका नाम भी सुनहरे अक्षरों में लिखा था। यह देखकर वह युवक आग बबूला हो उठा और अपने पिता से बोला कि इतना पैसा होने पर भी उन्होंने उसे केवल एक ‘भगवद् गीता’ दी। यह कहकर वह गुस्से से गीता वहीं पटक कर घर छोड़कर निकल गया।


बहुत वर्ष बीत गए और वह युवक एक सफल व्यवसायी बन गया। उसके पास बहुत धन-दौलत और भरापूरा परिवार था। एक दिन उसने सोचा कि उसके पिता तो अब काफी वृद्ध हो गए होंगे। उसने अपने पिता से मिलने जाने का निश्चय किया क्योंकि उस दिन के बाद से वह उनसे मिलने कभी नहीं गया था। अभी वह अपने पिता से मिलने जाने की तैयारी कर ही रहा था कि अचानक उसे एक तार मिला जिसमें लिखा था कि उसके पिता की मृत्यु हो गई है और वे अपनी सारी संपत्ति उसके नाम कर गए हैं। उसे तुरंत वहाँ बुलाया गया था जिससे वह सारी संपत्ति संभाल सके।


वह उदासी और पश्चाताप की भावना से भरकर अपने पिता के घर पहुँचा। उसे अपने पिता की महत्वपूर्ण फाइलों में वह ‘भगवद् गीता’ भी मिली जिसे वह वर्षों पहले छोड़कर गया था। उसने भरी आँखों से उसके पन्ने पलटने शुरू किए। तभी उसमें से एक कार की चाबी नीचे गिरी जिसके साथ एक बिल भी था। उस बिल पर उसी शोरूम का नाम लिखा था जिसमें उसने वह स्पोर्टस कार पसंद की थी तथा उस पर उसके घर छोड़कर जाने से पिछले दिन की तिथि भी लिखी थी। उस बिल में लिखा था कि पूरा भुगतान कर दिया गया है।


कई बार हम भगवान की आशीषों और अपनी प्रार्थनाओं के उत्तरों को अनदेखा कर जाते हैं क्योंकि वे उस रूप में हमें प्राप्त नहीं होते जिस रूप में हम उनकी आशा करते हैं.
 
एक बार एक युवक अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने वाला था। उसकी बहुत दिनों से एक शोरूम में रखी स्पोर्टस कार लेने की इच्छा थी। उसने अपने पिता से कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने पर उपहार स्वरूप वह कार लेने की बात कही क्योंकि वह जानता था कि उसके पिता उसकी इच्छा पूरी करने में समर्थ हैं। कॉलेज के आखिरी दिन उसके पिता ने उसे अपने कमरे में बुलाया और कहा कि वे उसे बहुत प्यार करते हैं तथा उन्हें उस पर गर्व है। फिर उन्होंने उसे एक सुंदर कागज़ में लिपटा उपहार दिया ।


उत्सुकता पूर्वक जब युवक ने उस कागज़ को खोला तो उसे उसमें एक आकर्षक जिल्द वाली ‘भगवद् गीता’ मिली जिस पर उसका नाम भी सुनहरे अक्षरों में लिखा था। यह देखकर वह युवक आग बबूला हो उठा और अपने पिता से बोला कि इतना पैसा होने पर भी उन्होंने उसे केवल एक ‘भगवद् गीता’ दी। यह कहकर वह गुस्से से गीता वहीं पटक कर घर छोड़कर निकल गया।


बहुत वर्ष बीत गए और वह युवक एक सफल व्यवसायी बन गया। उसके पास बहुत धन-दौलत और भरापूरा परिवार था। एक दिन उसने सोचा कि उसके पिता तो अब काफी वृद्ध हो गए होंगे। उसने अपने पिता से मिलने जाने का निश्चय किया क्योंकि उस दिन के बाद से वह उनसे मिलने कभी नहीं गया था। अभी वह अपने पिता से मिलने जाने की तैयारी कर ही रहा था कि अचानक उसे एक तार मिला जिसमें लिखा था कि उसके पिता की मृत्यु हो गई है और वे अपनी सारी संपत्ति उसके नाम कर गए हैं। उसे तुरंत वहाँ बुलाया गया था जिससे वह सारी संपत्ति संभाल सके।


वह उदासी और पश्चाताप की भावना से भरकर अपने पिता के घर पहुँचा। उसे अपने पिता की महत्वपूर्ण फाइलों में वह ‘भगवद् गीता’ भी मिली जिसे वह वर्षों पहले छोड़कर गया था। उसने भरी आँखों से उसके पन्ने पलटने शुरू किए। तभी उसमें से एक कार की चाबी नीचे गिरी जिसके साथ एक बिल भी था। उस बिल पर उसी शोरूम का नाम लिखा था जिसमें उसने वह स्पोर्टस कार पसंद की थी तथा उस पर उसके घर छोड़कर जाने से पिछले दिन की तिथि भी लिखी थी। उस बिल में लिखा था कि पूरा भुगतान कर दिया गया है।


कई बार हम भगवान की आशीषों और अपनी प्रार्थनाओं के उत्तरों को अनदेखा कर जाते हैं क्योंकि वे उस रूप में हमें प्राप्त नहीं होते जिस रूप में हम उनकी आशा करते हैं.

Thanks for posting this excellent piece of literary writing. Hope that people will try to follow the message this inspirational story provides by means of Father-Son duo approach to events and opportunities of life.

Congrts. Keep posting such good stuff for our study.
 
पुरानी घटना है । किसी बालक के माता-पिता ने उसका नाम पापक (पापी) रख दिया। बालक बड़ा हुआ तो उसे यह नाम बहुत अप्रिय लगने लगा। उसने अपने आचार्य से प्रार्थना की,"भन्ते, मेरा नाम बदल दें। यह नाम बड़ा अप्रिय है, अशुभ और अमांगलिक है।"आचार्य ने उसे समझाया कि नाम तो केवल प्रज्ञप्ति के लिए, व्यवहार-जगत में पुकारने के लिए होता है। नाम बदलने से कोई अर्थ सिद्ध नहीं होगा। कोई पापक नाम रखकर भी सत्कर्मों से धार्मिक बन सकता है और धार्मिक नाम रहे तो भी दुष्कर्मों से कोई पानी बन सकता है। मुख्य बात तो कर्म की है। नाम बदलने से क्या होगा?

पर वह नहीं माना। आग्रह करता ही रहा, करता ही रहा। तब आचार्य ने कहा,"अर्थ-सिद्ध तो कर्म के सुधारने से होगा, परन्तु यदि तुम नाम भी सुधारना चाहता हो तो जाओ, गांव भर के लोगों को देखो और जिसका नाम तुझे मांगलिक लगे, वह मुझे बताओ। तुम्हारा नाम वैसा ही बदल दिया जायगा।"

पापक सुन्दर नामवालों की खोज में निकल पड़ा। घर से बाहर निकलते ही उसे शव-यात्रा के दर्शन हुए। पूछा,"कौन मर गया?"लोगों ने बताया"जीवक।"पापक सोचने लगा-नाम जीवक, पर मृत्यु का शिकार हो गया!

आगे बढ़ा तो देखा, किसी दीन-हीन गरीब दुखियारी स्त्री को मारपीट कर घर से, निकाला जा रहा है। पूछा,"कौन है यह?"उत्तर मिला,"धनपाली।"पापक सोचने लगा नाम धनपाली और पैसे-पैसे को मोहताज!

और आगे बढ़ा तो एक व्यक्ति को लोगों से मार्ग पूछते पाया। नाम पूछा तो पता चला-पंथक। पापक फिर सोच में पड़ गया-अरे, पंथक भी पंथ पूछते हैं? पंथ भूलते हैं?

पापक वापस लौट आया। अब नाम के प्रति उसका आकर्षक अथवा विर्कषण दूर हो चुका था। बात समझ में आ गई थी। क्या पड़ा है नाम में? जीवक भी मरते हैं, अ-जीवक भी, धनपाली भी दरिद्र होती है, अधनपाली भी, पंथक मार्ग भूलते हैं, अंपथक भी, जन्म का अंधा नाम नयनसुख, जन्म का दुखिया, नाम सदासुख! वास्तव में नाम की थोथी महत्ता निरर्थक ही है। रहे नाम पापक, मेरा क्या बिगड़ता है? मैं अपना कर्म सुधारुंगा। कर्म ही प्रमुख है, कर्म ही प्रधान है।
 
ह्रदयस्पर्श बात-
*

एक 8 वर्ष के एक लडके की माँ मर जाती है!

एक दिन एक व्यक्ति ने उस लडके से पूछा कि, बेटा, तुझे अपनी नई माँ और अपनी दिवंगतई माँ मेँ क्या अंतर लगता है?

तो वह लडका बोला : मेरी नई माँ सच्ची है और दिवंगत माँ झूठी थी!!

यह सुनकर वह व्यक्ति अचम्भे में पड गया।

फिर बोला : क्यों बेटा ! तुझे ऐसा क्यों लगता है? जिसने तुझे अपनी कोख से जन्म दिया वह झूठी और कल आई हुई माँ सच्ची क्यों लगती है?

तो लडका बोला : जब मैँ मस्ती करता था तब मेरी दिवंगत माँ कहती थी कि "यदि तुम इस प्रकार मस्ती करोगे तो तुझे खाना नही दूँगी।"


फिर भी मैँ बहुत मस्ती करता रहता था.


और मुझे पूरे गाँव में से ढूंढ कर घर लाती और अपने पास बिठाकर अपने हाथों से खाना खिलाती थी!!

और नई माँ कहती है कि "यदि तू मस्ती करेगा तो तुझे खाना नही दूँगी।



और सच में उसने मुझे तीन दिन से खाना नही दिया।
 
[h=5]एक बार एक लड़का अपने स्कूल की फीस भरने के लिए एक द्वार से दूसरे द्वार तक कुछ वस्तुएं करता था। एक दिन उसकी कोई वास्तु नहीं बिकी और उसे बड़े जोर से भूख भी लग रही थी। उसने निश्चय किया कि अब वह जिस भी द्वार पर जायेगा, उससे खाना मांग लेगा।

द्वार खटखटाते ही एक लड़की ने द्वार खोला, जिसे देखकर वह घबरा गया और बजाय खाने के उसने पानी का एक गिलास पानी माँगा। लड़की ने भांप लिया था कि वह भूखा है, इसलिए वह एक बड़ा गिलास दूध का ले आई. लड़के ने शनैः-शनैः दूध पी लिया। "कितने पैसे दूं?"लड़के ने पूछा। "पैसे किस बात के?" लड़की ने उत्तर में कहा."माँ ने मुझे सिखाया है कि जब भी किसी पर दया करो तो उसके पैसे नहीं लेने चाहिए।" तो फिर मैं आपको ह्रदय से धन्यवाद देता हूँ।"
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[/h][h=5]जैसे ही उस लड़के ने वह घर छोड़ा, उसे न केवल शारीरिक रूप से शक्ति मिल चुकी थी अपितु उसका भगवान और मानवता पर और भी विश्वास बढ़ गया था। वर्षों उपरान्त वह लड़की गंभीर रूप से बीमार पड़ गयी। लोकल डॉक्टर ने उसे नगर के बड़े अस्पताल में इलाज के लिए भेज दिया। विशेषज्ञ डॉक्टर होवार्ड केल्ली को मरीज देखने के लिए बुलाया गया। जैसे ही उसने लड़की के कस्बे का नाम सुना, उसकी आँखों में चमक आ गयी।[/h][h=5]
वह एकदम सीट से उठा और उस लड़की के कमरे में गया। उसने उस लड़की को देखा, एकदम पहचान लिया और निश्चय कर लिया कि वह उसके प्राण बचाने के लिए आकाश - पाताल एक कर देगा. उसका परिश्रम और लगन रंग लायी और उस लड़की के प्राण बच गए।

डॉक्टर ने अस्पताल के ऑफिस में जा कर उस लड़की के इलाज का बिल लिया। उस बिल के कोने में एक नोट लिखा और उसे उस लड़की के पास भिजवा दिया. लड़की बिल का लिफाफा देखकर घबरा गयी, उसे ज्ञात था कि वह बीमारी से तो वह बच गयी है परन्तु बिल की रकम अवश्य उसके प्राण ले लेगी. तथापि उसने धीरे से बिल खोला, रकम को देखा और फिर अचानक उसकी दृष्टि बिल के कौने में पेन से लिखे नोट पर गयी, जहाँ लिखा था,"एक गिलास दूध द्वारा इस बिल का भुगतान किया जा चुका है।" नीचे डॉक्टर होवार्ड केल्ली के हस्ताक्षर थे।
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[h=5]हर्ष और अचम्भे से लड़की के गालों पर आंसू टपक पड़े उसने ऊपर की ओर दोनों हाथ उठा कर कहा," हे भगवान! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !
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सफलता का रहस्य:-
एक बार एक युवक ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या है?


सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनारे मिलो। वो मिले, फिर सुकरात ने युवक से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा तथा जब आगे बढ़ते-बढ़ते जल गले तक पहुँच गया, तभी अकस्मात सुकरात ने उस लड़के का सिर पकड़ कर जल में डुबो दिया। लड़का बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा परन्तु सुकरात शक्तिशाली थे और उसे तब तक डुबोये रखा जब तक कि वो नीला नहीं पड़ने लगा।


फिर सुकरात ने उसका सिर जल से बाहर निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो कार्य उस लड़के ने सर्वप्रथम किया वो था हाँफते-हाँफते शीघ्रता से श्वांस लेना।

सुकरात ने पूछा ,” जब तुम वहाँ थे तो तुम सबसे अधिक क्या चाहते थे?”


लड़के ने उत्तर दिया-”श्वांस लेना।”


सुकरात ने कहा-”यही सफलता का रहस्य है। जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना कि तुम श्वांस लेना चाहते थे तो वो तुम्हे मिल जाएगी इसके अतिरिक्त और कोई रहस्य नहीं है।"
 
"एक वृद्धा बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी। चलते-चलते वह थक गई थी। तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख वृद्धा ने आवाज दी, ‘अरे बेटा, एक बात तो सुन।’ घुड़सवार रुक गया। उसने पूछा, ‘क्या बात है माई?’ वृद्धा ने कहा, ‘बेटा, मुझे उस सामने वाले गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं जाती। तू भी संभवतः उधर ही जा रहा है। यह गठरी घोड़े पर रख ले। मुझे चलने में सरलता हो जाएगी।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर हूं। गांव अभी बहुत दूर है। पता नहीं तू कब तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। वहां पहुंचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?’ यह कहकर वह चल पड़ा।

कुछ ही दूर जाने के पश्चात उसने अपने आप से कहा, ‘तू भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है, ठीक से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे ठीक से दिखाई भी देता हो अथवा नहीं। तुझे गठरी दे रही थी। संभव है उस गठरी में कोई मूल्यवान वस्तु हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता? चल वापस, गठरी ले ले। ‘

वह घूमकर वापस आ गया और वृद्धा से बोला, ‘माई, ला अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी प्रतीक्षा करूँगा।’ वृद्धा ने कहा, ‘न बेटा, अब तू जा, मुझे गठरी नहीं देनी।’ घुड़सवार ने कहा, ‘अभी तो तू कह रही थी कि ले चल। अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही। ऐसा क्यों? यह उलटी बात तुझे किसने समझाई है?’

वृद्धा मुस्कराकर बोली, ‘उसी ने समझाई है जिसने तुझे यह समझाया कि माई की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है वही मेरे भीतर भी बैठा है। तुझे उसने कहा कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी। सबके मन में बसने वाले भगवान को प्रणाम !!!"
 
एक जंगल में एक भयंकर सर्प रहता था। उसके
आतंक के कारण कोई वहां से नहीं जाता था। एक
दिन एक ऋषि उस मार्ग से विचरण कर रहे थे।
उनको देखकर सर्प लपका और काटना चाहा,
परन्तु ऋषि ने योग बल से उस पर विजय पा ली।
सर्प शरणागत होकर बोला - क्षमा करिए
ऋषिवर, मैं आपकी शरण में हूँ। ऋषि ने उसे
क्षमा कर दिया, और कहा कि आज से तुम
किसी को नहीं काटोगे। सर्प मान गया। ऋषि चले
गए। उनके जाने के पश्चात सर्प ने
लोगों को काटना बंद कर दिया। किसी को वह
नहीं काटता था और शनैः-शनैः जंगल
का मार्ग खुल गया। लोग आने-जाने लगे। सर्प
लोगों को देखकर मार्ग से हट जाता। चरवाहे
लड़के वहां आने लगे। वह सर्प को देखते
ही पत्थर मारने लगे। सर्प भागकर बिल में
चला जाता था। वह मार खाते-खाते दुर्बल तथा
घायल हो गया था। बहुत समय पश्चात मुनि उस
मार्ग से गुजरे। सर्प ने प्रणाम किया और
अपनी व्यथा बताई। मुनि बोले - मूर्ख मैंने काटने
से मना किया था, फुफकारने के लिए नहीं। मुनिवर
समझाकर चले गए। सर्प समझ गया। चरवाहे
लड़के पत्थर मारने वाले ही थे कि वह फुफकार
उठा। लड़के घबराकर भाग गए। तब से उसे
किसी ने पत्थर नहीं मारा।
मनुष्य को अकारण किसी पर आक्रमण
नहीं करना चाहिए, परन्तु इतना कायर
भी नहीं होना चाहिए कि कोई भी उस पर
आक्रमण करने का दुसाहस कर सके। इसलिए
अपना रोबीला अस्तित्व/व्यक्तित्व बनाये रखें, ताकि कोई
भी आपकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सके।
 
एक बार एक हंस और हंसिनी ठन्डे सुरम्य वातावरण से भटकते हुए उजड़े, वीरान और मरुस्थल प्रदेश में आ गये ! हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े प्रदेश में आ गये हैं? यहाँ न तो जल है न जंगल और न ही ठंडी वायु है ! यहाँ तो हमारा जीना कठिन है ! भटकते भटकते संध्या हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी प्रकार आज की रात व्यतीत कर लो, सुबह हम लोग लौट चलेंगे !

रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे उस पर एक उल्लू बैठा था। वह जोर से चिल्लाने लगा।
हंसिनी ने हंस से कहा - 'अरे यहाँ तो रात में भी सो नहीं सकते। ये उल्लू चिल्ला रहा है। हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी प्रकार रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यों है ?ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही। पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बात सुन रहा था। भोर हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई मेरे कारण आपको रात में कष्ट हुआ, मुझे क्षमा कर दो। हंस ने कहा,कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद !


यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा, पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो? हंस चौंका, उसने कहा, आपकी पत्नी? अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है, मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है !


उल्लू ने कहा, चुप करो, ये मेरी पत्नी है। दोनों के मध्य विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के पक्षी इकटठा हो गये। पंचायत बुलाई गयी। पंच लोग भी आ गये ! बोले, भाई किस बात का विवाद है ? पक्षियों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है !
लम्बी बैठक और पंचायत के पश्चात पञ्च लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी हो सकती है किन्तु ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे। हमें तो उल्लू के साथ ही रहना है। इसलिए निर्णय उल्लूके ही पक्ष में सुनाना है ! फिर पंचों ने अपना निर्णय सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों की जांच करने के पश्चात यह पंचायत इस परिणाम पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का आदेश दिया जाता है !


यह सुनते ही हंस आश्चर्यचकित रह गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने दोषपूर्ण निर्णय सुनाया। उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली ! रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - ऐ मित्र हंस, रुको ! हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ? पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब प्राण भी लोगे ?


उल्लू ने कहा, नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी ! परन्तु कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह स्थान उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है ! मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है । यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँपर ऐसे पञ्च रहते हैं जो उल्लुओं के पक्ष में निर्णय सुनाते हैं !


स्वाधीनता के पश्चात भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने ऐसे लोगों को सत्ता दी जिन्होंने सदैव अपना निर्णय उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है। इस देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी उत्तरदायी हैं।
 
[h=5]दर्पण

पुराने जमाने की बात है। एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विद्या पूरी होने के पश्चात शिष्य को विदा करते समय उन्होंने आशीर्वाद के रूप में उसे एक ऐसा दिव्य दर्पण भेंट किया, जिसमें व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी। शिष्य उस दिव्य दर्पण को पाकर प्रसन्न हो उठा। उसने परीक्षा लेने की शीघ्रता में दर्पण का मुंह सबसे पहले गुरुजी के सामने कर दिया। वह यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि गुरुजी के हृदय में मोह, अहंकार, क्रोध आदि दुर्गुण परिलक्षित हो रहे थे। इससे उसे बड़ा दुख हुआ। वह तो अपने गुरुजी को समस्त दुर्गुणों से रहित सत्पुरुष समझता था।

दर्पण लेकर वह गुरुकूल से रवाना हो गया। उसने अपने कई मित्रों तथा अन्य परिचितों के सामने दर्पण रखकर परीक्षा ली। सब के हृदय में कोई न कोई दुर्गुण अवश्य दिखाई दिया। और तो और अपने माता व पिता की भी वह दर्पण से परीक्षा करने से नहीं चूका। उनके हृदय में भी कोई न कोई दुर्गुण देखा, तो वह हतप्रभ हो उठा। एक दिन वह दर्पण लेकर पुनः गुरुकुल पहुंचा। उसने गुरुजी से विनम्रतापूर्वक कहा, ‘गुरुदेव, मैंने आपके दिए दर्पण की सहायता से देखा कि सबके हृदयों में नाना प्रकार के दोष हैं।’


तब गुरु जी ने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया।

शिष्य दंग रह गया। क्योंकि उसके मन के प्रत्येक कोने में राग,द्वेष, अहंकार, क्रोध जैसे दुर्गुण विद्यमान थे। गुरुजी बोले, ‘वत्स यह दर्पण मैंने तुम्हें अपने दुर्गुण देखकर जीवन में सुधार लाने के लिए दिया था दूसरों के दुर्गुण देखने के लिए नहीं। जितना समय तुमने दूसरों के दुर्गुण देखने में लगाया उतना समय यदि तुमने स्वयं को सुधारने में लगाया होता तो अब तक तुम्हारा व्यक्तित्व परिवर्तित हो चुका होता। मनुष्य की सबसे बड़ी दुर्बलता यही है कि वह दूसरों के दुर्गुण जानने में अधिक रुचि रखता है। वह स्वयं को सुधारने के बारे में नहीं सोचता। इस दर्पण की यही सीख है जो तुम नहीं समझ सके।’

शिक्षा - हमे दूसरों के दुर्गुण देखने से पहले स्वयं के दुर्गुण देखने चाहिए। स्वयं को सुधारने के बारे में सोचना चाहिए।
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अन्तर

एक योद्धा को अपनी एक विशेष तलवार और ढाल बहुत प्रिय लगती थी। उसने इस तलवार और ढाल से कई युद्ध जीते थे। एक युद्ध में वह तलवार टूट गयी। योद्धा ने उसे घर में लाकर रख दिया। ढाल भी पास में पड़ी हुई थी। तलवार ने कराहते हुए ढाल से कहा- " बहन ! मेरी कैसी दुर्दशा हो गयी है। एक तू है आज भी एक दम सही सलामत।"

ढाल ने कहा- " हम दोनों में एक अंतर जो है।"

तलवार ने पूछा - " हम एक ही लोहे से बनी हैं, फिर कैसा अन्तर ? "

" तू सदा किसी को मारने-काटने का काम करती रही है, जबकि मैं बचाने का."

जीवन की सीख :
मारने वाले से बचाने वाले का भविष्य अधिक सुरक्षित है।
 
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