Inspirational stories

एक किसान था.

वह एक बड़े से खेत में खेती किया करता था.उस
खेत के बीचो-बीच पत्थर का एक हिस्सा ज़मीन से ऊपर
निकला हुआ था जिससे ठोकरखाकर वह कई बार गिर...
चुका था और ना जाने कितनी ही बार उससे टकराकर खेती के
औजार भी टूट चुके थे.
रोजाना की तरह आज भी वह सुबह-सुबह खेती करने पहुंचा पर
जो सालों से होता आ रहा था एक वही हुआ , एक बार फिर
किसान का हल पत्थर से टकराकर टूट गया.
किसान बिल्कुल क्रोधित हो उठा , और उसने मन हीमन
सोचा की आज जो भी हो जाए वह इस चट्टान को ज़मीन से
निकाल कर इस खेत के बाहर फ़ेंक देगा.
वह तुरंत भागा और गाँव से ४-५ लोगों को बुला लाया और
सभी को लेकर वह उस पत्त्थर के पास पहुंचा .
” मित्रों “, किसान बोला , ”ये देखो ज़मीन से निकले चट्टान के
इस हिस्से ने मेरा बहुत नुक्सान किया है, और आज हम
सभी को मिलकर इसे जड़ से निकालना है और खेत के बाहर फ़ेंक
देना है.”
और ऐसा कहते ही वह फावड़े से पत्थर के किनार वार करने लगा,
पर ये क्या ! अभी उसने एक-दो बार ही मारा था की पूरा-
का पूरा पत्थर ज़मीन से बाहर निकल आया. साथ खड़े लोग
भी अचरज में पड़ गए और उन्ही में से एक ने हँसते हुए पूछा ,”
क्योंभाई , तुम तो कहते थे कि तुम्हारे खेत के बीच में एक
बड़ी सी चट्टान दबी हुई है , पर ये तो एक मामूली सा पत्थर
निकला ??”
किसान भी आश्चर्य में पड़ गया सालों से जिसे वह एक भारी-
भरकम चट्टान समझ रहा था दरअसल वह बस एक
छोटा सा पत्थर था !! उसे पछतावा हुआ कि काश उसने पहले
ही इसे निकालने का प्रयास कियाहोता तो ना उसे इतना नुक्सान
उठाना पड़ता और नाही दोस्तों के सामने उसका मज़ाक
बनता Friends, इस किसान की तरह ही हम भी कई बार
ज़िन्दगी में आने वालीछोटी-छोटी बाधाओं को बहुत बड़ा समझ
लेते हैं और उनसे निपटने की बजाये तकलीफ उठाते रहते हैं.
ज़रुरत इस बात की है कि हम बिना समय गंवाएं उन मुसीबतों से
लडें , और जब हम ऐसा करेंगे तो कुछ ही समय में चट्टान
सी दिखने वाली समस्या एक छोटे से पत्थर के समान दिखने
लगेगी जिसे हम आसानीसे ठोकर मार कर आगे बढ़ सकते हैं.
 
एक दिन किसी निर्माण के दौरान भवन की छटी मंजिल से सुपर वाईजर ने नीचे कार्य करने वाले मजदूर को आवाज दी.
निर्माण कार्य की तेज आवाज के कारण नीचे काम करने वाला मजदूर कुछ समझ नहीं सका की उसका सुपरवाईजर उसे आवाज दे रहा है.
फिर
सुपरवाईजर ने उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए एक १० रु का नोट नीचे फैंका, जो ठीक मजदूर के सामने जा कर गिरा
मजदूर ने नोट उठाया और अपनी जेब मे रख लिया, और फिर अपने काम मे लग गया ....
अब उसका ध्यान खींचने के लिए सुपर वाईजर ने पुन: एक ५०० रु का नोट नीचे फैंका .
उस मजदूर ने फिर वही किया और नोट जेब मे रख कर अपने काम मे लग गया .
ये देख अब सुपर वाईजर ने एक छोटा सा पत्थर का टुकड़ा लिया और मजदूर के उपर फैंका जो सीधा मजदूर के सिर पर लगा. अब मजदूर ने ऊपर देखा और उसकी सुपर वाईजर से बात चालू हो गयी.

ये वैसा ही है जो हमारी जिन्दगी मे होता है.....
भगवान् हमसे संपर्क करना ,मिलना चाहता है, लेकिन हम दुनियादारी के कामो मे व्यस्त रहते है, अत: भगवान् को याद नहीं करते.
भगवान् हमें छोटी छोटी खुशियों के रूप मे उपहार देता रहता है, लेकिन हम उसे याद नहीं करते, और वो खुशियां और उपहार कहाँ से आये ये ना देखते हुए,उनका उपयोग कर लेते है, और भगवान् को याद नहीं करते.
भगवान् हमें और भी खुशियों रूपी उपहार भेजता है, लेकिन उसे भी हम हमारा भाग्य समझ कर रख लेते है, भगवान् का धन्यवाद नहीं करते ,उसे भूल जाते है.
तब भगवान् हम पर एक छोटा सा पत्थर फैंकते है , जिसे हम कठिनाई कहते है, और तुरंत उसके निराकरण के लिए भगवान् की और देखते है, याद करते है.
यही जिन्दगी मे हो रहा है.

यदि हम हमारी छोटी से छोटी ख़ुशी भी भगवान् के साथ उसका धन्यवाद देते हुए बाँटें, तो हमें भगवान् के द्वारा फैंके हुए पत्थर का इन्तजार ही नहीं करना पड़ेगा...!!!!!
 
One day a farmer’s donkey fell down into a well. The animal cried piteously for hours as the farmer tried to figure out what to do
Finally he decided the animal was old and the well needed to be covered up anyway; it just wasn’t worth it to retrieve the donkey. He invited all his neighbors to come over and help him. They all grabbed a shovel and began to shovel dirt into the well.

At first, the donkey realized what was happening and cried horribly.

Then, to everyone’s amazement, he quieted down.

A few shovel loads later, the farmer finally looked down the well and was astonished at what he saw.

With every shovel of dirt that hit his back, the donkey was doing something amazing. He would shake it off and take a step up.
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As the farmer’s neighbors continued to shovel dirt on top of the animal, he would shake it off and take a step up. Pretty soon, everyone was amazed as the donkey stepped up over the edge of the well and trotted off!
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MORAL :

Life is going to shovel dirt on you, all kinds of dirt. The trick to getting out of the well is to shake it off and take a step up. Each of our troubles is a steppingstone. We can get out of the deepest wells just by not stopping, never giving up! Shake it off and take a step up.

Remember the five simple rules to be happy:


  • Free your heart from hatred - Forgive.
  • Free your mind from worries - Most never happens.
  • Live simply and appreciate what you have.
  • Give more.
  • Expect less from people but more from yourself.
 
बहुत पुरानी बात है एक राजा ने अपने मंत्री से
पूछा की चरित्र
बड़ा है या ज्ञान ।
उसने कहा की कुछ दिन बाद बताऊंगा अगले दिन वह
खजाने से...
चार असर्फी उठा लाया खजांची ने सोचा की आज
जल्दी में हैं
कल बता देंगे किस लिए ले गये हैं ।
इस प्रकार कई दिन तक ऐसा करने पर खजांची बहुत
परेशान
हो गया क्योंकि वो मंत्री बहुत ही ईमानदार
था तो खजांची समझ
ही नहीं पा रहा था कि क्या किया जाये ।अंत में उसने
निश्चय
किया की अब तो राजा को बता ही देना चाहिए ।
उसने राजा को बता दिया की मंत्री जी ऐसा कर रहें है।
रोज
असर्फी ले जाते हैं और कुछ भी नही बताते ।
राजा को गुस्सा आगया उसने मंत्री को बुलाया और
कहा कि तुम्हे
फांसी पर चढाया जायेगा ।तुम बताना चाहोगे की तुमने
ऐसा क्यों किया ।
मंत्री ने कहा महराज ये आपके सवाल का जबाब है
कल
जितना ज्ञान था आज भी मेरे पास उतना ही ज्ञान है
परन्तु इन
चार दिनों में मेरा चरित्र गिर गया है।
जिसके कारण मुझे फांसी पर चढाया जा रहा है ।
इसलिए ज्ञानी होना बड़ी बात नहीं हैं चरित्र वान
होना बड़ी बात
है ।
 
एक नगर में एक मशहूर
चित्रकार रहता था ।
चित्रकार ने एक बहुत सुन्दर तस्वीर बनाई और उसे नगर के चौराहे मे लगा दिया और नीचे लिख दिया कि जिस किसी को, जहाँ भी इसमें कमी नजर आये वह वहाँ निशान लगा दे ।
जब उसने शाम को तस्वीर देखी उसकी पूरी तस्वीर पर निशानों से ख़राब हो चुकी थी । यह देख वह बहुत दुखी हुआ। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे वह दुःखी बैठा हुआ था । तभी उसका एक मित्र वहाँ से गुजरा उसने उसके दुःखी होने का कारण पूछा तो उसने उसे पूरी घटना बताई । उसने कहा एक काम करो कल दूसरी तस्वीर बनाना और उस मे लिखना कि जिस किसी को इस तस्वीर मे जहाँ कहीं भी कोई कमी नजर आये उसे सही कर दे।उसने अगले दिन यही किया ।
शाम को जब उसने अपनी तस्वीर देखी तो उसने देखा की तस्वीर पर किसी ने कुछ नहीं किया ।...

वह संसार की रीति समझ गया।
"कमी निकालना,निंदा करना, बुराई करना आसान, लेकिन उन कमियों को दूर करना अत्यंत कठिन होता है"

This is life........
 
कम्बोडिया में जो भी राजा बनता उसको विष देकर मार देते। , दादाजी , पिताजी ,बड़े भाई , सभी इसी तरह मारे गए।सभी की ह्त्या हुई , राज परिवार का एक अंतिम बच्चा बचा।


राज्य के मंत्री जो राजभक्त थे गहरी चिंता में डूब गए।


दूर जंगल में एक महात्मा जी के पास गए और वस्तु स्थिति से अवगत कराया।


महात्मा जी ने कान में मन्त्र दिया। फिर क्या था पूरे राज्य में ढिंढोरा पीटा गया।


सुनो ... सुनो ... सुनो............... अब राजा की अकाल मृत्यु होने पर सारी सुविधा उनके साथ भेजी जायेगी।


दाढ़ी बनाने के लिए नाई, रसोईया, मुख्य सेवक, सेनापति सभी को साथ में स्वर्ग भेज दिया जाएगा।


तब से लेकर आज तक किसी राजा की अकाल मृत्यु नहीं हुई वहाँ पर।
 
दो आदमी जंगल से जा रहे थे..
एक पुजारी और एक चोर..रास्ते में पुजारी की टांग में
जंगली काँटा चुभा..बहुत खून बहा और तेज दर्द होने लगा...
खैर, थोडा आगे चलने पर चोर को एक सोने
का सिक्का मिला..चोर बहुत खुश हुआ..ये
देखकर पुजारी का क्रोध फूट पडा..
उसने आसमान की ओर देखा और भगवान से पूछा
"हे भगवान, मैंने पूरी उमर आपकी देखभाल की
उसके बदले मुझे इतनी तकलीफ दी और इस
चोर ने कभी आपकी पूजा नही की, हमेशा दूसरो
को दुःख दिया और आपने उसे सोने का सिक्का दिया...ये अन्याय है...!
भगवान ने उत्तर दिया;
हे वत्स, तुम पिछले जन्म में बहुत क्रूर इनसान थे,
तुमने बहुत ईंसानो की जान ली..आज तुम्हारी एक
टांग पूरी तरह से कटनी थी लेकिन इस जन्म के
अच्छे कर्मो की वजह से तुम्हे सिर्फ़ एक काँटा चुभा..!
और वो चोर पिछले जन्म में एक भला इनसान था,
उसने गरीबों की सेवा की, भूखों को भोजन
कराया..उसे आज सोने के सिक्कों से भरा सन्दूक
मिलना था लेकिन
इस जन्म के कुकर्मो की वजह से उसे सिर्फ़ एक
सोने का सिक्का मिला..!
अब बताओ कि दुर्भाग्यशाली कौन...?
 
एक चोर अक्सर एक साधु के पास आता और उससे ईश्वर से साक्षात्कार का उपाय पूछा करता था। लेकिन साधु टाल देता था। वह बार-बार यही कहता कि वह इसके बारे में फिर कभी बताएगा। लेकिन चोर पर इसका असर नहीं पड़ता था। वह रोज पहुंच जाता। एक दिन चोर का आग्रह बहुत बढ़ गया। वह जमकर बैठ गया। उसने कहा कि वह बगैर उपाय जाने वहां से जाएगा ही नहीं। साधु ने चोर को दूसरे दिन सुबह आने को कहा। चोर ठीक समय पर आ गया ।

साधु ने कहा, ‘तुम्हें सिर पर कुछ पत्थर रखकर पहाड़ पर चढ़ना होगा। वहां पहुंचने पर ही ईश्वर के दर्शन की व्यवस्था की जाएगी।’ चोर के सिर पर पांच पत्थर लाद दिए गए और साधु ने उसे अपने पीछे-पीछे चले आने को कहा। इतना भार लेकर वह कुछ दूर ही चला तो उस बोझ से उसकी गर्दन दुखने लगी। उसने अपना कष्ट कहा तो साधु ने एक पत्थर फिंकवा दिया। थोड़ी देर चलने पर शेष भार भी कठिन प्रतीत हुआ तो चोर की प्रार्थना पर साधु ने दूसरा पत्थर भी फिंकवा दिया। यही क्रम आगे भी चला। ज्यों-ज्यों चढ़ाई बढ़ी, थोडे़ पत्थरों को ले चलना भी मुश्किल हो रहा था। चोर बार-बार अपनी थकान व्यक्त कर रहा था। अंत में सब पत्थर फेंक दिए गए और चोर सुगमतापूर्वक पर्वत पर चढ़ता हुआ ऊंचे शिखर पर जा पहुंचा ।

साधु ने कहा, ‘जब तक तुम्हारे सिर पर पत्थरों का बोझ रहा, तब तक पर्वत के ऊंचे शिखर पर तुम्हारा चढ़ सकना संभव नहीं हो सका। पर जैसे ही तुमने पत्थर फेंके वैसे ही चढ़ाई सरल हो गई। इसी तरह पापों का बोझ सिर पर लादकर कोई मनुष्य ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता।’ चोर ने साधु का आशय समझ लिया। उसने कहा, ‘आप ठीक कह रहे हैं। मैं ईश्वर को पाना तो चाहता था पर अपने बुरे कर्मों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था।’ उस दिन से चोर पूरी तरह बदल गया ।
 
बहुत वर्षों पश्चात दो मित्र मार्ग में मिले।
धनवान मित्र उसकी आलीशान गाड़ी पार्क की और निर्धन मित्र से बोला चल इस गार्डन में बैठकर बातें करते हैं। धनवान मित्र ने निर्धन मित्र से कहा -- तुझमें और मुझमें बहुत अन्तर है। हम दोनों साथ में पढ़े, साथ में बड़े हुए। मैं कहाँ पहुँच गया और तुम कहाँ रह गए?


चलते-चलते निर्धन मित्र अचानक रुक गया। धनवान मित्र ने निर्धन मित्र से पूछा क्या हुआ?


निर्धन मित्र ने कहा तुझे कुछ आवाज सुनाई दी?


धनवान मित्र पीछे मुड़ा और एक रुपये का सिक्का उठाकर बोला ये तो मेरी जेब से गिरे सिक्के की आवाज़ थी।


निर्धन मित्र एक काँटेदार छोटे से पौधे की तरफ गया जिसमें एक तितली अपने पँख फडफडा रही थी। निर्धन मित्र ने उस तितली को धीरे से बाहर निकाला और आकाश में स्वतंत्र कर दिया।


धनवान मित्र ने आतुरता से पुछा तुझे तितली की आवाज़ कैसे सुनाई दी?


निर्धन मित्र ने नम्रता से कहा -- तुझमें और मुझ में यही अंतर है, तुझे "धन" की आवाज़ सुनाई दी और मुझे "मन" की आवाज़ सुनाई दी।
 
एक भिखारी भूख – प्यास से त्रस्त होकर आत्महत्या की योजना बना रहा था , तभी वहां से एक
नेत्रहीन महात्मा गुजरे | भिखारी ने उन्हें अपने मन की व्यथा सुनाई और कहा , ” मैं अपनी गरीबी से तंग आकर आत्महत्या करना चाहता हूँ |” उसकी बात सुन महात्मा हँसे और बोले , “ठीक है, आत्महत्या करो लेकिन पहले अपनी एक आंख मुझे दे दो | मैं तुम्हे एक हज़ार अशरफिया दूंगा | ” भिखारी चोंका | उसने कहा , “आप कैसी बात करते हैं | मैं आंख कैसे दे सकता हूँ |” महात्मा बोले, “आंख न सही , एक हाथ ही दे दो , मैं तुम्हे एक हज़ार अशरफिया दूंगा | ” भिखारी असमंजस में पड़ गया | महात्मा मुस्कराते हुए बोले, संसार में सबसे बड़ा धन निरोगी काया है | तुम्हारे हाथ-पाव ठीक है, शारीर स्वस्थ है, तुमसे बड़ा धनी और कौन हो सकता है | तुमसे गरीब तो में हूँ कि मेरी आँखें नहीं हैं मगर में तो कभी आत्महत्या के बारे में नहीं सोचता | भिखारी ने उनसे क्षमा मांगी और संकल्प किया कि वह कोई काम करके जीवन-यापन करेगा |
 
एक लड़की कार चला रही थी और
पास में उसके पिताजी बैठे थे.
राह में एक भयंकर तूफ़ान आया और
लड़की ने पिता से पूछा -- अब हम
क्या करें?...
पिता ने जवाब दिया -- कार
चलाते रहो.
तूफ़ान में कार चलाना बहुत
ही मुश्किल हो रहा था और तूफ़ान
और भयंकर
होता जा रहा था.
अब मैं क्या करू ? -- लड़की ने पुनः पूछा.
कार चलाते रहो. -- पिता ने
पुनः कहा.
थोड़ा आगे जाने पर लड़की ने
देखा की राह में कई वाहन तूफ़ान
की वजह से रुके हुए थे. उसने फिर अपने
पिता से कहा -- मुझे कार रोक
देनी चाहिए.
मैं मुश्किल से देख पा रही हूँ. यह भयंकर है
और प्रत्येक ने अपना वाहन रोक
दिया है.
उसके पिता ने फिर निर्देशित
किया -- कार रोकना नहीं. बस
चलाते रहो.
अब तूफ़ान ने बहुत ही भयंकर रूप धारण कर
लिया था किन्तु लड़की ने कार
चलाना नहीं रोका और अचानक
ही उसने देखा कि कुछ साफ़ दिखने
लगा. कुछ किलो मीटर आगे जाने के
पश्चात लड़की ने देखा कि तूफ़ान थम
गया और सूर्य निकल आया.
अब उसके पिता ने कहा -- अब तुम कार
रोक सकती हो और बाहर आ
सकती हो.
लड़की ने पूछा -- पर अब क्यों?
पिता ने कहा -- जब तुम बाहर
आओगी तो देखोगी कि जो राह में
रुक गए थे, वे
अभी भी तूफ़ान में फंसे हुए हैं. चूँकि तुमने
कार चलाने के प्रयत्न नहीं छोड़ा, तुम
तूफ़ान के बाहर हो.
यह किसा उन लोगों के लिए एक
प्रमाण है जो कठिन समय से गुजर रहे हैं.
मजबूत से मजबूत इंसान भी प्रयास छोड़
देते हैं.
किन्तु प्रयास
कभी भी छोड़ना नहीं चाहिए.
निश्चित ही जिन्दगी के कठिन समय
गुजर जायेंगे और सुबह के सूर्य
की भांति चमक आपके जीवन में
पुनः आयेगी..
 
(आदरणीय मित्रों ! मेरा निवेदन है कि जब आप के पास कुछ समय हो , तभी इस कथा का पठन करें। शीघ्रता में कथा के मर्म को नहीं समझा जा सकता है।)




मेरी माँ के केवल एक ही आँख थी और उनके साथ होने पर मुझे लज्जा का आभास होता था। उसके स्कूल आने पर सब मेरा बहुत मजाक उड़ाया करते थे।मैं चाहता था मेरी माँ इस जगत से गायब हो जाये। मैंने उनसे कहा, ' माँ तुम्हारी दूसरी आँख क्यों नहीं है? तुम्हारे कारण हर कोई मेरा उपहास उड़ाता है।


मैंने उसी क्षण निश्चित कर लिया कि बड़ा होकर सफल व्यक्ति बनूँगा ताकि मुझे अपनी एक आँख वाली माँ और इस निर्धनता से मुक्ति मिल जाये। उसके पश्चात मैंने बहुत परिश्रम किया तथा माँ को छोड़कर बड़े शहर आ गया। यूनिविर्सिटी की डिग्री ली, विवाह किया, अपना घर ख़रीदा, बच्चे हुए तथा मैं सफल व्यक्ति बन गया। मुझे अपना नया जीवन इसलिए भी पसंद था क्योंकि यहाँ माँ से जुडी कोई भी स्मृति नहीं थी।


मेरी प्रसन्नताएँ दिन-रात बड़ी हो रही थी, तभी अचानक मैंने कुछ ऐसा देखा जिसकी कल्पना भी नहीं की थी। सामने मेरी माँ खड़ी थी। आज भी अपनी एक आँख के साथ। मुझे लगा कि मेरा पूरा सँसार पुनः बिखर रहा है।


मैंने उनसे पूछा, 'आप कौन हो? मैं आपको नहीं जानता। यहाँ आने का साहस कैसे हुआ आपका? तुरंत मेरे घर से बाहर निकल जाओ।'


और माँ ने उत्तर दिया, 'क्षमा करना, लगता है गलत पते पर आ गयी हूँ।' वो चली गयी और मैं यह सोचकर प्रसन्न हो गया कि उन्होंने मुझे पहचाना नहीं।


एक दिन स्कूल री-यूनियन की चिट्ठी मेरे घर पहुँची और मैं अपने पुराने नगर पहुँच गया। पता नहीं मन में क्या आया कि मैं अपने पुराने घर चला गया, वहां माँ जमीन पर मृत पड़ी थी, मेरी आँख से एक आंसू की बूँद तक नहीं गिरी, उनके हाथ में एक कागज़ का टुकड़ा था। वो मेरे नाम उनकी पहली और अंतिम चिट्ठी थी।


उन्होंने लिखा था:-


मेरे पुत्र !


मुझे लगता है मैंने अपना जीवन जी लिया है, मैं अब तुम्हारे घर कभी नहीं आऊँगी। पर क्या यह आशा करना कि तुम कभी-कभार मुझसे मिलने आ जाओ, गलत है ? मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है रे मेरे लाल।


मुझे क्षमा करना कि मेरी एक आँख के कारण तुम्हें पूरे जीवन शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। जब तुम छोटे थे,एक दुर्घटना में तुम्हारी एक आँख चली गयी थी, एक माँ के रूप में मैं यह नहीं देख सकती थी कि तुम एक आँख के साथ बड़े हो, इसीलिए मैंने अपनी एक आँख तुम्हे दे दी।


मुझे इस बात का गर्व था कि मेरा बेटा मेरी उस आँख की सहायता से पूरे सँसार के नए आयाम देख पा रहा है, मेरा तो पूरा जगत ही तुमसे है मेरे लाल।"




चिट्ठी पढ़ कर मेरा संसार बिखर गया, मैं वहीँ फर्श पर धम्म से बैठकर बिखर गया, अपनी प्यारी माँ लिए पहली बार फूट-फूट कर, दहाड़ें मार कर रोया जिसने अपना जीवन मेरे नाम कर दिया।




(साभार : True india)
 
एक नौजवान आदमी एक किसान की बेटी से शादी की इच्छा लेकर किसान के पास गया. किसान ने उसकी ओर देखा और कहा, " युवक, खेत में जाओ. मैं एक एक करके तीन बैल छोड़ने वाला हूँ. अगर तुम तीनों बैलों में से किसी भी एक की पूँछ पकड़ लो तो मैं अपनी बेटी की शादी तुमसे कर दूंगा."

नौजवान खेत में बैल की पूँछ पकड़ने की मुद्रा लेकर खडा हो गया. किसान ने खेत में स्थित घर का दरवाजा खोला और एक बहुत ही बड़ा और खतरनाक बैल उसमे से निकला. नौजवान ने ऐसा बैल पहले कभी नहीं देखा था. उससे डर कर नौजवान ने निर्णय लिया कि वह अगले बैल का इंतज़ार करेगा और वह एक तरफ हो गया जिससे बैल उसके पास से होकर निकल गया.

दरवाजा फिर खुला. आश्चर्यजनक रूप से इस बार पहले से भी बड़ा और भयंकर बैल निकला. नौजवान ने सोचा कि इससे तो पहला वाला बैल ठीक था. फिर उसने एक ओर होकर बैल को निकल जाने दिया....

दरवाजा तीसरी बार खुला. नौजवान के चहरे पर मुस्कान आ गई. इस बार एक छोटा और मरियल बैल निकला. जैसे ही बैल नौजवान के पास आने लगा, नौजवान ने उसकी पूँछ पकड़ने के लिए मुद्रा बना ली ताकि उसकी पूँछ सही समय पर पकड़ ले. पर उस बैल की पूँछ थी ही नहीं....................

Moral......जिन्दगी अवसरों से भरी हुई है. कुछ सरल हैं और कुछ कठिन. पर अगर एक बार अवसर गवां दिया तो फिर वह अवसर दुबारा नहीं मिलेगा. अतः हमेशा प्रथम अवसर को हासिल करने का ही प्रयास करना चाहिए.।।
 
युद्ध का समय था सभी सैनिक जोश से लड़ रहे थे तभी एक सैनिक के चेहरे पर संवेदना का भाव उतरा । उसने अपने सबसे अच्छे मित्र को गोली लगते हुए देखा । वो बंकर में बैठा उसको दूर से देख रहा था तत्काल ही उसने अपने शीर्ष अधिकारी से पूछा कि क्या वह अपने अपने मित्र को उठा कर ला सकता है । अधिकारी बोला अगर तुम चाहते हो तो जा सकते हो परन्तु मुझे नहीं लगता तुम्हारा वहाँ जाना ठीक है क्योकि इतनी भीषण गोलीबारी में अब तक तुम्हारा मित्र अवश्य मर चुका होगा और तुम अपनी जिंदगी भी गवा सकते हो । सैनिक ने अपने मित्र की देह को देखा और दौड़ पड़ा किसी भी प्रकार के कवच के बिना वो भीषण गोलीबारी के बीच से अपने मित्र को उठा लाया यह चमत्कार ही था कि वो सकुशल लौट आया था ।

जल्द ही डॉक्टर ने मित्र ही जांच की और कहा कि ये अब मर चुका है, उसके अधिकारी ने कहा "मैंने पहले ही कहा था कि इस कार्यवाही से कोई फर्क नहीं पड़ेगा देखो वो मर चुका होगा ।" सैनिक बोला "साहब मुझे मालूम था कि आप की बात सही है परन्तु इससे मुझे फर्क पड़ा है ? अधिकारी ने कहा "लेकिन तुम्हारा मित्र तो मर चुका है ।" हाँ श्रीमान ये अवश्य मर चुका है परन्तु जब मैं उसके पास पहुँचा था तब वो जिंदा था और उसने मुझसे कहा "मुझे पता था तुम जरुर आओगे. . . . . ." इसके बाद मेरा मित्र सुकून से मर गया . . . . . तो मित्रो कई बार जीवन में ऐसे कई अवसर आते है जब हमे ऐसे निर्णय लेने पड़ते है जिनका दूसरों के लिए कोई मूल्य होता ही नहीं है परन्तु अधिक महत्त्व इस बात का है कि वे निर्णय हमें महत्वपूर्ण लगते है अथवा नहीं . . . . . . . आप की संवेदनाओ के स्वर आप स्वयं सुन सकते है.
 
एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोजाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहां से गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए पकाती थी , वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी जिसे कोई भी ले सकता था . एक कुबड़ा व्यक्ति रोज उस रोटी को ले जाता और वजाय धन्यवाद देने के अपने रस्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बडबडाता "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा " दिन गुजर...ते गए और ये सिलसिला चलता रहा ,वो कुबड़ा रोज रोटी लेके जाता रहा और इन्ही शब्दों को बडबडाता "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा " वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी कि "कितना अजीब व्यक्ति है ,एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है और न जाने क्या क्या बडबडाता रहता है , मतलब क्या है इसका ". एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली "मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी ". और उसने क्या किया कि उसने उस रोटी में जहर मिला दीया जो वो रोज उसके लिए बनाती थी और जैसे ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने कि कोशिश कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह बोली " हे भगवन मैं ये क्या करने जा रही थी ?" और उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे कि आँच में जला दीया .एक ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी , हर रोज कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी लेके "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा " बडबडाता हुआ चला गया इस बात से बिलकुल बेखबर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है .
हर रोज जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी जो कि अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ था .महीनों से उसकी कोई खबर नहीं थी. शाम को उसके दरवाजे पर एक दस्तक होती है ,वह दरवाजा खोलती है और भोंचक्की रह जाती है , अपने bete को अपने सामने खड़ा देखती है.वह पतला और दुबला हो गया था. उसके कपडे फटे हुए थे और वह भूखा भी था ,भूख से वह कमजोर हो गया था. जैसे ही उसने अपनी माँ को देखा, उसने कहा, "माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ. जब मैं एक मील दूर है, मैं इतना भूखा था कि मैं गिर. मैं मर गया होता, लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था ,उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लीया,भूख के मरे मेरे प्राण निकल रहे थे मैंने उससे खाने को कुछ माँगा ,उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि "मैं हर रोज यही खाता हूँ लेकिन आज मुझसे ज्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो " . जैसे ही माँ ने उसकी बात सुनी माँ का चेहरा पिला पड़ गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाजे का सहारा लीया , उसके मस्तिष्क में वह बात घुमने लगी कि कैसे उसने सुबह रोटी में जहर मिलाया था.अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और अंजाम होता उसकी मौत और इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट हो चूका था "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा।

" निष्कर्ष "~हमेशा अच्छा करो और अच्छा करने से अपने आप को कभी मत रोको फिर चाहे उसके लिए उस समय आपकी सराहना या प्रशंसा हो या न हो .
 
राजा साहब जब गद्दी पर बैठे तो उन्हें राजा होने के साथ - साथ खजांची का काम भी देखना पड़ा। उनके यहाँ यह परंपरा चली आ रही थी कि राजा ही खजांची होगा। कुछ ही दिनों बाद राजा का कार्यभार संभालते - संभालते थक गए और अपने मंत्री से बोले, 'मंत्री जी, हमने तो ऐसा कहीं नहीं देखा कि राजा ही अपने राज्य के खजांची का कार्यभार संभाले आखिर हमारे यहाँ यह नियम क्यों है ?' इस पर मंत्री बोला 'महाराज आपके पिताश्री भी खजांची का कार्यभार स्वयं संभालते थे - इसका कारण यह है कि उनके समय में जो खजांची था उसने राजकोष से बहुत सा धन चुराया और जब उसकी चोरी का पता लगा तो वह मर गया इसलिए किसी को भी यह पता नहीं चला कि चोरी का वह धन कहाँ गया ? बस तभी से आपके पिताजी ने खजाना स्वयं संभालने की परंपरा शुरू दी ।'

अब राजा पुनः बोले 'हमारे राज्य में केवल चोर नहीं ईमानदार लोग भी तो होते होंगे, आप शीघ्र ही एक ईमानदार खजांची की नियुक्ति कराइए।' इस पर मंत्री बोला 'महाराज आपके आदेश का पालन किया जाएगा किंतु उसके लिए बाहर के किसी व्यक्ति को न रखकर दरबार में से ही किसी योग्य कर्मचारी को रख लिया जाए तो बेहतर है।' राजा को मंत्री का सुझाव ठीक लगा - पचीस दरबारियों ने खजांची के लिए आवेदन कर दिया।

राजा बोले 'हमारे यहां छब्बीस दरबारी हैं फिर एक दरबारी ने आवेदन क्यों नहीं किया ?' मंत्री बोला 'महाराज खजांची का वेतन दरबारी के वेतन से कम है इसलिए उसने आवेदन नहीं किया।' इस पर राजा ने कहा 'इसका अर्थ यह हुआ कि बाकी दरबारी जानते हैं कि खजांची बनने पर वे अनुचित फायदा उठाकर धनोपार्जन कर सकते हैं जबकि छब्बीसवें दरबारी के मन में ऐसा कुछ नहीं है क्योंकि वह ईमानदार है।' उन्होंने छब्बीसवें दरबारी को खजांची नियुक्त कर दिया - इस प्रकार राजा की कुशलता से एक ईमानदार खजांची राज्य को मिल गया . . . . . . मित्रो आज भी हम अपने आस पास ईमानदारी और वफादारी खोजते रहते है . . . . कल की पोस्ट में भी लोगो ने एक सच्चा मित्र प्राप्त न कर पाने का खेद जताया . . . . काश ! . . . . . . एक भाग्यवादी गड़े खजाने को प्राप्त करने का स्वप्न देखता है और एक कर्मवादी अपने कर्म से खजाना अर्जित करता है - भाग्य से कर्म का पलड़ा अधिक भारी है - तुलसीदास जी भी कहते है "सकल पदारथ है जगमाँही, कर्महीन नर पावत नाहीं।"

आप भी अपने कर्म को प्रबल कीजिये फिर देखिये लोगो की खोज आप पर आकर समाप्त होगी और सब कहेंगे कि "मित्र हो तो आप जैसा !
 
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एक बार की बात है किसी नगर में एक बहुत धनवान व्यक्ति रहता था। उसे एक विचित्र शौक था। वो अपने घर के भीतर बने एक बड़े से स्विमिंग पुल में बड़े-बड़े रेप्टाइल्स पाले हुए था। जिसमें एक से बढ़कर एक सांप, मगरमच्छ ,घड़ियाल आदि थे।


एक बार वो अपने घर पर एक पार्टी देता है। .बहुत से लोग उस पार्टी में आते हैं। खाने-पीने के पश्चात वो सभी अतिथियों को स्विमिंग पुल के पास ले जाता है और कहता है - ”मित्रों ! आप इस पुल को देख रहे हैं, इसमें एक से एक खतरनाक जीव हैं, यदि आपमें से कोई इसे तैर कर पार कर ले तो मैं उसे १ करोड़ रुपये अथवा अपनी पुत्री का हाथ दे दूँगा।”


सभी लोग पुल की तरफ देखते हैं पर किसी का भी साहस नहीं होता है कि उसे पार करे। तभी छपाक से आवाज होती है और एक लड़का उसमें कूद जाता है और मगरमच्छों , साँपों, इत्यादि से बचता हुआ पुल पार कर जाता है। सभी लोग उसकी इस बहादुरी को देख अचरज में पड़ जाते हैं। धनवान व्यक्ति को भी विश्वास नहीं होता है कि कोई ऐसा कर सकता है। इतने वर्षों में किसी ने पुल पार करना तो दूर उसका पानी छूने तक का साहस नहीं किया था। वो उस लड़के को बुलाता है " लड़के, आज तुमने बहुत ही साहसिक कार्य किया है, तुम सच- मुच बहादुर हो बताओ तुम कौन सा पुरस्कार चाहते हो? ”


अरे, पुरस्कार तो मैं लेता रहूँगा, पहले ये बताओ कि मुझे धक्का किसने दिया था?” लड़का बोला।


तो मित्रों ये एक छोटा सा जोक था। पर इसमें एक बहुत बड़ा सन्देश छुपा हुआ है – उस लड़के में तैर कर स्विमिंग पूल पार करने की योग्यता तो थी पर वो अपने आप नहीं कूदा, जब किसी ने धक्का दिया तो वो कूद गया और पार भी कर गया। यदि र कोई उसे धक्का नहीं देता तो वो कभी ना कूदने की सोचता और ना पुल पार कर पाता।, पर अब उसका जीवन सदैव के लिए बदल चुका था।


ऐसे ही हमारे भीतर कई टैलेंट छुपे होते हैं जब तक हमारे भीतर कॉन्फिडेंस और रिस्क उठाने का साहस नहीं होता तब तक हम लाइफ के ऐसे कई चैलेंजेज में कूदे बिना ही हार मान लेते हैं। हमें चाहिए कि हम अपनी योग्यता पर विश्वास करें और जीवन में मिले अवसरों का लाभ उठाएं।
 
एक पिता अपने बेटे के साथ पहाड़ों की सैर पर निकला। अचानक बेटा गिर गया। चोट लगने पर उसके मुंह से निकला , ' आह !!!'

तुरंत पहाड़ों में से कहीं - से आवाज आई - ' आह !!!'

बेटा अचरज में रह गया। उसने फौरन पूछा - तुम कौन हो ?...

सामने से वही सवाल आया , ' तुम कौन हो ?'

बेटा चिल्लाया , ' मैं तुम्हारी तारीफ करता हूं !'

पहाड़ों से जवाब आया , ' मैं तुम्हारी तारीफ करता हूं !'

अपनी बात की नकल करते देखकर बेटा गुस्से में चिल्लाया , ' डरपोक !'

जवाब मिला , ' डरपोक !'

उसने पिता की ओर देखा और पूछा , ' यह क्या हो रहा है ?'

पिता ने मुस्कुराते हुए कहा , ' बेटा , जरा ध्यान दो। '

इसके बाद पिता चिल्लाया , ' तुम चैंपियन हो !'

जवाब मिला , ' तुम चैंपियन हो !'

बेटे को हैरानी हुई लेकिन वह कुछ समझ नहीं सका।

इस पर पिता ने उसे समझाया , ' लोग इसे गूंज ( इको ) कहते हैं , लेकिन वास्तव में यह जिंदगी है। '

यह आपको हर चीज़ वापस लौटाती है , जो आप कहते हैं या करते हैं। हमारी जिंदगी हमारे कामों का ही प्रतिबिंब है। अगर आप दुनिया में ज्यादा प्यार पाना चाहते हैं तो अपने दिल में ज्यादा प्यार पैदा करें। अगर अपनी टीम में ज्यादा काबिलियत चाहते हैं तो अपनी काबिलियत को बढ़ाएं। यह संबंध जिंदगी के हर पहलू , हर चीज में नजर आता है।
 
किसी गाँव मे एक साधु रहा करता था,

वो जब भी नाचता तो बारिश होती थी। अतः गाव के लोगों को जब

भी बारिश की जरूरत होती थी, तो वे लोग साधु के पास जाते और उनसे अनुरोध करते की वे नाचे, और जब वो नाचने लगता तो बारिश ज़रूर होती।...

कुछ दिनों बाद चार लड़के शहर से गाँव में घूमने आये, जब उन्हें यह बात मालूम हुई की किसी साधू के नाचने से बारिश होती है तो उन्हें यकीन नहीं हुआ।

शहरी पढाई लिखाई के घमंड में उन्होंने गाँव वालों को चुनौती दे दी कि हम भी नाचेंगे तो बारिश होगी और अगर हमारे नाचने से नहीं हुई तो उस साधु के नाचने से भी नहीं होगी।

फिर क्या था अगले दिन सुबह-सुबह ही गाँव वाले उन लड़कों को लेकर साधु की कुटिया पर पहुंचे।

साधु को सारी बात बताई गयी, फिर लड़कों ने नाचना शुरू किया, आधे घंटे बीते और पहला लड़का थक कर बैठ गया पर बादल नहीं दिखे, कुछ देर में दूसरे ने भी यही किया और एक घंटा बीतते-बीतते बाकी दोनों लड़के भी थक कर बैठ गए, पर बारिश नहीं हुई।

अब साधु की बारी थी, उसने नाचना शुरू किया, एक घंटा बीता, बारिश नहीं हुई, साधु नाचता रहा …

दो घंटा बीता बारिश नहीं हुई….

पर साधु तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था, धीरे-धीरे शाम ढलने लगी कि तभी बादलों की गड़गडाहत सुनाई दी और ज़ोरों की बारिश होने लगी।

लड़के दंग रह गए
और तुरंत साधु से क्षमा मांगी और पूछा- ”बाबा भला ऐसा क्यों हुआ कि हमारे नाचने से बारिश नहीं हुई और आपके नाचने से हो गयी?”

साधु ने उत्तर दिया – ”जब मैं नाचता हूँ तो दो बातों का ध्यान रखता हूँ, पहली बात मैं ये सोचता हूँ कि अगर मैं नाचूँगा तो बारिश को होना ही पड़ेगा और दूसरी ये कि मैं तब तक नाचूँगा जब तक कि बारिश न हो जाये।”

सफलता पाने वालों में यही गुण विद्यमान होता है, वो जिस चीज को करते हैं उसमे उन्हें सफल होने का पूरा विश्वास होता है और वे तब तक उस चीज को करते हैं जब तक कि उसमे सफल ना हो जाएं।

इसलिए यदि हमें सफलता हांसिल करनी है तो उस साधु की तरह ही अपने ऊपर पूरा विश्वास होना चाहिए।

“विश्वास जीवन की शक्ति है, इसका अभाव अज्ञान है और जीवन में वे ही विजयी हो सकते है, जिन्हें विश्वास है कि वे विजयी होंगे.........
 
एक बार एक नवयुवक किसी संत के पास पहुंचा .और बोला “ महात्मा जी , मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूँ , कृपया इस कठिनाई से निकलने का उपाय बताएं।


संत बोले- “ पानी के गिलास में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पीयो। ”


युवक ने ऐसा ही किया . “ इसका स्वाद कैसा लगा ?” संत ने पुछा।


“बहुत ही खराब, एकदम खारा।” युवक थूकते हुए बोला।


संत मुस्कुराते हुए बोले , “एक बार पुनः अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक ले लो और मेरे पीछे -पीछे आओ।“


दोनों शनैः-शनैः आगे बढ़ने लगे और थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील के सामने रुक गए। “


चलो अब इस नमक को पानी में डाल दो।” संत ने निर्देश दिया। युवक ने ऐसा ही किया।
"अब इस झील का पानी पियो।” संत बोले।
युवक पानी पीने लगा। एक बार पुनः संत ने पूछा- “ बताओ इसका स्वाद कैसा है? क्या अभी भी तुम्हे ये खारा लग रहा है ?”


नहीं, ये तो मीठा है, बहुत अच्छा है। ” युवक बोला।


संत युवक के बगल में बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले - “ जीवन के दुःख बिलकुल नमक की तरह हैं; न इससे कम ना अधिक। जीवन में दुःख की मात्र वही रहती है, बिलकुल वही परन्तु हम कितने दुःख का स्वाद लेते हैं ये इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं? इसलिए जब तुम दुखी हो तो केवल इतना कर सकते हो कि स्वयं को बड़ा कर लो। गिलास मत बने रहो झील बन जाओ।"
 
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