Inspirational stories

एक नगर में एक शीशमहल था। महल की हरेक दीवार पर सैकड़ों शीशे जडे़ हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल में घुस गया। महल के भीतर उसे सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो नाराज और दुखी लग रहे थे। उन्हें देखकर वह उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डरकर वहां से भाग गया।

कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती। कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीशमहल पहुंचा। वह खुशमिजाज और जिंदादिल था। महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना। वहां फिर से आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।'

कथा समाप्त कर गुरु ने शिष्य से कहा, 'संसार भी ऐसा ही शीशमहल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं। जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता।'
 
बहुत समय पहले की बात है। आइसलैंड के उत्तरी छोर पर एक किसान रहता था। उसे अपने खेत में काम करने वालों की बड़ी आवश्यकता रहती थी किन्तु ऐसी खतरनाक जगह जहाँ आये दिन आंधी –तूफ़ान आते रहते हों, कोई काम करने को तैयार नहीं होता था।


किसान ने एक दिन शहर के समाचार-पत्र में विज्ञापन दिया कि उसे खेत में काम करने वाले एक मजदूर की आवश्यकता है। किसान से मिलने कई लोग आये परन्तु जो भी उस जगह के बारे में सुनता वो काम करने से मना कर देता। अंततः एक सामान्य कद का पतला -दुबला अधेड़ व्यक्ति किसान के पास पहुंचा।


किसान ने उससे पूछा , “ क्या तुम इन परिस्थितियों में काम कर सकते हो?”


“ ह्म्म्म , बस जब हवा चलती है तब मैं सोता हूँ।” व्यक्ति ने उत्तर दिया


किसान को उसका उत्तर थोडा विचित्र लगा पर चूँकि उसे कोई और काम करने वाला नहीं मिल रहा था इसलिए उसने व्यक्ति को काम पर रख लिया।


मजदूर परिश्रमी निकला, वह सुबह से शाम तक खेतों में कठोर परिश्रम करता, किसान भी उससे पर्याप्त संतुष्ट था। कुछ ही दिन व्यतीत हुए थे कि एक रात अचानक ही जोर-जोर से हवा बहने लगी, किसान अपने अनुभव से समझ गया कि अब तूफ़ान आने वाला है। वह शीघ्रता से उठा, हाथ में लालटेन ली और मजदूर के झौंपड़े की तरफ दौड़ा।


“शीघ्र उठो, देखते नहीं तूफ़ान आने वाला है, इससे पहले कि सबकुछ नष्ट हो जाए कटी फसलों को बाँध कर ढक दो और बाड़े के गेट को भी रस्सियों से कस दो।” किसान चीखा




मजदूर बड़े आराम से पलटा और बोला, “ नहीं महोदय मैंने आपसे पहले ही कहा था कि जब हवा चलती है तो मैं सोता हूँ।”


यह सुन किसान का क्रोध सातवें आकाश पर पहुँच गया। जी में आया कि उस मजदूर को गोली मार दे। पर अभी वो आने वाले तूफ़ान से चीजों को बचाने के लिए भागा।


किसान खेत में पहुंचा और उसकी आँखें आश्चर्य से खुली रह गयी। फसल की गांठें अच्छे से बंधी हुई थीं और तिरपाल से ढकी भी थी। उसके गाय -बैल सुरक्षित बंधे हुए थे और मुर्गियां भी अपने दडबों में थीं।बाड़े का दरवाज़ा भी मजबूती से बंधा हुआ था। सारी चीजें बिलकुल व्यवस्थित थी। हानि होने की कोई संभावना नहीं बची थी। किसान अब मजदूर की ये बात कि “ जब हवा चलती है तब मैं सोता हूँ ”समझ चुका था एवं अब वो भी चैन से सो सकता था।


मित्रों ! हमारे जीवन में भी कुछ ऐसे तूफ़ान आने तय हैं , आवश्यकता इस बात की है कि हम उस मजदूर की तरह पहले से तैयारी कर के रखें ताकि संकट त आने पर हम भी चैन से सो सकें। जैसे कि यदि कोई विद्यार्थी प्रारम्भ से पढ़ाई करे तो परीक्षा के समय वह आराम से रह सकता है। हर महीने बचत करने वाला व्यक्ति पैसे की आवश्यकता पड़ने पर निश्चिंत रह सकता है, इत्यादि।


तो चलिए हम भी कुछ ऐसा करें कि कह सकें – ”जब हवा चलती है तो मैं सोता हूँ।”






 
एक नाविक तीन साल से एक ही जहाज पर काम कर रहा था।एक दिन नाविक रात मेँ नशे मेँ धुत हो गया। ऐसा पहली बार हुआ था। कैप्टन नेँ इस घटना को रजिस्टर मेँ इस तरह दर्ज किया, ” नाविक आज रात नशे मेँ धुत था।”

नाविक नेँ यह बात पढ़ ली। नाविक जानता था कि इस एक वाक्य से उसकी नौकरी पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। इसलिए वह कैप्टन के पास गया, माफी मांगी और कैप्टन से कहा कि उसनेँ जो कुछ भी लिखा है, उसमेँ आप ये जोड़ दीजिये कि ऐसा तीन साल मेँ पहली बार हूआ है, क्योँकि पुरी सच्चाई यही है।

कैप्टन नेँ उसकी बात से साफ इंकार कर दिया और कहा,-” कि मैनेँ जो कुछ भी रजिस्टर मेँ दर्ज किया है. वही सच है।”
कुछ दिनों बाद नाविक की रजिस्टर भरनेँ की बारी आयी। उसनेँ रजिस्टर मेँ लिखा-” आज की रात कैप्टन नेँ शराब नहीँ पी है।” कैप्टन नेँ इसे पढ़ा और नाविक से कहा कि इस वाक्य को आप या तो बदल देँ अथवा पूरी बात लिखनेँ के लिए आगे कुछ और लिखेँ, क्योँकि जो लिखा गया था, उससे जाहिर होता था कि कैप्टन हर रोज रात को शराब पीता था। नाविक नेँ कैप्टन से कहा कि उसनेँ जो कुछ भी रजिस्टर मेँ लिखा है, वही सच है।

दोनोँ बातेँ सही हैँ, लेकिन दोनोँ से जो संदेश मिलता है, वह झूठ के सामान है।

मित्रों इस काहनी से हम दो बातें सीखने को मिलती है , पहली – हमें कभी इस तरह की बात नहीं करी चाहिए जो सही होते हुए भी गलत सन्देश दे और दूसरी किसी बात को सुनकर उस पर अपना विचार बनाने या प्रतिक्रिया देने से पहले एक बार सोच लेना चाहिए कि कहीं इस बात का कोई और पहलु तो नहीं है। संक्षेप में कहें तो हमे अर्धसत्य से बचना चाहिए।
 
A Nice story with a good moral. Please go through.

A kindergarten teacher decided to let her class play a game....

The teacher told each child in the class to bring along a plastic bag containing a few potatoes.

Each potato will be given a name of a person that the child hates.

So the number of potatoes that a child will put in his/her plastic bag will depend on the number of people he/she hates.

So when the day came, each child brought some potatoes with the name of the people he/she hated. Some had 2 potatoes; some 3 while some up to 5 potatoes. The teacher then told the children to carry with them the potatoes in the plastic bag wherever they go (even to the toilet) for 1 week.

Days after days passed by, and the children started to complain due to the unpleasant smell let out by the rotten potatoes. Besides, those having 5 potatoes also had to carry heavier bags. After 1 week, the children were relieved because the game had finally ended...
The teacher asked: "How did you feel while carrying the potatoes with you for 1 week?". The children let out their frustrations and started complaining of the trouble that they had to go through having to carry the heavy and smelly potatoes wherever they go.

Then the teacher told them the hidden meaning behind the game. The teacher said: "This is exactly the situation when you carry your hatred for somebody inside your heart. The stench of hatred will contaminate your heart and you will carry it with you wherever you go. If you cannot tolerate the smell of rotten potatoes for just 1 week, can you imagine what is it like to have the stench of hatred in your heart for your lifetime???"

Moral of the story:
Throw away any hatred for anyone from your heart so that you will not carry sins for a lifetime.
Forgiving others is the best attitude to take!

Love Everyone & Be Loved !
 
A Nice story with a good moral. Please go through.

A kindergarten teacher decided to let her class play a game....

The teacher told each child in the class to bring along a plastic bag containing a few potatoes.

Each potato will be given a name of a person that the child hates.

So the number of potatoes that a child will put in his/her plastic bag will depend on the number of people he/she hates.

So when the day came, each child brought some potatoes with the name of the people he/she hated. Some had 2 potatoes; some 3 while some up to 5 potatoes. The teacher then told the children to carry with them the potatoes in the plastic bag wherever they go (even to the toilet) for 1 week.

Days after days passed by, and the children started to complain due to the unpleasant smell let out by the rotten potatoes. Besides, those having 5 potatoes also had to carry heavier bags. After 1 week, the children were relieved because the game had finally ended...
The teacher asked: "How did you feel while carrying the potatoes with you for 1 week?". The children let out their frustrations and started complaining of the trouble that they had to go through having to carry the heavy and smelly potatoes wherever they go.

Then the teacher told them the hidden meaning behind the game. The teacher said: "This is exactly the situation when you carry your hatred for somebody inside your heart. The stench of hatred will contaminate your heart and you will carry it with you wherever you go. If you cannot tolerate the smell of rotten potatoes for just 1 week, can you imagine what is it like to have the stench of hatred in your heart for your lifetime???"

Moral of the story:
Throw away any hatred for anyone from your heart so that you will not carry sins for a lifetime.
Forgiving others is the best attitude to take!

Love Everyone & Be Loved !
Too good !!!!!
 
ये एक सत्य घटना है. करीब सौ साल पहले एक समृद्ध आदमी ने जब सुबह का newspaper उठाया तो वो दंग रह गया. उसमे उसकी मृत्यु की खबर छपी हुई थी. पहले तो उसे यकीन नहीं हुआ, वो थोडा हडबडा सा गया. पर जब उसे एहसास हुआ की, अखबार वालो ने ग़लतफहमी के कारण किसी और की जगह उसकी मृत्यु की ख़बर छाप दी है तो उसे पहले थोडा गुस्सा आया. आखिर ऐसा भी भला कोई करता है?

फिर उसे थोड़ी हँसी आई, उन लोगों की मूर्खता पर जो इसे सच मान बैठे होंगे. पर फिर उसने स्तिथि पर विचार किया. उसने सोचा की, “जरा देखा तो जाए, की मेरे मरने पर क्या क्या छपा है.” वो बड़ा दुखी हुआ, जब पढ़ा की पूरे अख़बार में उसे ‘मौत का सौदागर’ और dynamite king’ से संबोधित किया गया है. दरअसल, इस व्यक्ति ने ‘dynamite’ का अविष्कार किया था. उन्होंने सोचा की क्या लोग मुझे मेरे मरने के बाद इस तरह याद करेंगे? की मैं मौत का सौदागर था? “नहीं ऐसा नहीं हो सकता”, उसने सोचा.

इस घटना के बाद उसने अपने जीवन को कुछ इस तरह बदल दिया की लोग उन्हें आज ‘मौत का सौदागर’ नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे विश्वसनीय सम्मान ‘Nobel Prize’ की वजह से जानते है. इस व्यक्ति का नाम Sir Alfred Nobel था, जिनकी याद में Nobel Prize दिया जाता है.

तो देखिये दोस्तों, उन्हें तो जीते जी इस बात का पता पड़ गया की लोग उनकी मौत पर क्या प्रतिक्रिया देंगे. और अखबार की एक गलती से उन्हें अपनी गलती का आभास हुआ. आज हम सभी उन्हें आदर से याद करते है.

हमे शायद दूसरा मौका न मिले, इसलिए चलिए यही कोशिश करते है, की जब भी हम जाए. तो लोग हमे याद करे की, “यार वो बंदा बहुत अच्छा था.”
 
एक लड़की कार चला रही थी और पास में उसके पिताजी बैठे थे.
राह में एक भयंकर तूफ़ान आया और लड़की ने पिता से पूछा -- अब हम क्या करें?
पिता ने जवाब दिया -- कार चलाते रहो.
तूफ़ान में कार चलाना बहुत ही मुश्किल हो रहा था और तूफ़ान और भयंकर
होता जा रहा था....
अब मैं क्या करू ? -- लड़की ने पुनः पूछा.
कार चलाते रहो. -- पिता ने पुनः कहा.
थोड़ा आगे जाने पर लड़की ने देखा की राह में कई वाहन तूफ़ान की वजह से रुके हुए थे. उसने फिर अपने पिता से कहा -- मुझे कार रोक देनी चाहिए.
मैं मुश्किल से देख पा रही हूँ. यह भयंकर है और प्रत्येक ने अपना वाहन रोक दिया है. उसके पिता ने फिर निर्देशित किया -- कार रोकना नहीं. बस चलाते रहो.
अब तूफ़ान ने बहुत ही भयंकर रूप धारण कर लिया था किन्तु लड़की ने कार
चलाना नहीं रोका और अचानक ही उसने देखा कि कुछ साफ़ दिखने लगा है. कुछ किलो मीटर आगे जाने के पश्चात लड़की ने देखा कि तूफ़ान थम गया और सूर्य निकल आया.
अब उसके पिता ने कहा -- अब तुम कार रोक सकती हो और बाहर आ सकती हो.
लड़की ने पूछा -- पर अब क्यों?
पिता ने कहा -- जब तुम बाहर आओगी तो देखोगी कि जो राह में रुक गए थे, वे
अभी भी तूफ़ान में फंसे हुए हैं. चूँकि तुमने कार चलाने के प्रयत्न नहीं छोड़ा, तुम तूफ़ान के बाहर हो.

मोरल:
यह किस्सा उन लोगों के लिए एक प्रमाण है जो कठिन समय से गुजर रहे हैं.
मजबूत से मजबूत इंसान भी प्रयास छोड़ देते हैं. किन्तु प्रयास कभी भी छोड़ना नहीं चाहिए. निश्चित ही जिन्दगी के कठिन समय गुजर जायेंगे और सुबह के सूर्य की भांति चमक आपके जीवन में पुनः आयेगी.
 
पुराने ज़माने की बात है।
किसी गाँव में एक सेठ रहता था।
उसका नाम था नाथाराम रबारी सेठ ।
वो जब भी गाँव के बाज़ार से निकलता था तब लोग उसे
नमस्ते या सलाम करते थे , वो उसके जवाब में...
मुस्कुरा कर अपना सिर हिला देता था और बहुत धीरे
से बोलता था की
"घर जाकर बोल दूंगा"
एक बार किसी परिचित व्यक्ति ने सेठ को ये बोलते
हुवे सुन लिया।
तो उसने कुतूहल वश सेठ को पुछ लिया कि सेठजी आप
ऐसा क्यों बोलते हो की "घर जाकर बोल दूंगा"
तब सेठ ने उस व्यक्ति को कहा, में पहले धनवान
नहीं था उस समय लोग मुझे 'नाथू' कहकर बुलाते थे
और आज के समय में धनवान हु तो लोग मुझे
'नाथारामजी रबारी सेठ ' कहकर बुलाते है।
ये इज्जत मुझे नहीं धन को दे रहे है.
इस लिए में रोज़ घर जाकर तिज़ोरी खोल कर
लक्ष्मी जी (धन) को ये बता देता हु कि आज
तुमको कितने लोगो ने नमस्ते या सलाम किया।
इससे मेरे मन अभिमान
या गलतफहमी नहीं आती कि लोग मुझे मान या इज्जत
दे रहे है। ...
आज इज्जत सिर्फ पैसे की हैं इंसान की नहीं...
 
एक आदमी गुब्बारे बेच कर जीवन-यापन करता था. वह गाँव के आस-पास लगने वाली हाटों में
गुब्बारे वाला जाता और गुब्बारे बेचता |
बच्चों को लुभाने के लिए वह तरह-तरह के गुब्बारे रखता …लाल, पीले ,हरे, नीले…. और जब कभी उसे लगता की बिक्री कम हो रही है वह झट से एक गुब्बारा हवा में छोड़ देता, जिसे उड़ता देखकर बच्चे खुश हो जाते और गुब्बारे खरीदने के लिए पहुँच जाते|
इसी तरह तरह एक दिन वह हाट में गुब्बारे बेच रहा था और बिक्री बढाने के लिए बीच-बीच में गुब्बारे उड़ा रहा था| पास ही खड़ा एक छोटा बच्चा ये सब बड़ी जिज्ञासा के साथ देख रहा था | इस बार जैसे ही गुब्बारे वाले ने एक सफ़ेद गुब्बारा उड़ाया वह तुरंत उसके पास पहुंचा और मासूमियत से बोला, ” अगर आप ये काला वाला गुब्बारा छोड़ेंगे…तो क्या वो भी ऊपर जाएगा ?”
गुब्बारा वाले ने थोड़े अचरज के साथ उसे देखा और बोला, ” हाँ बिलकुल जाएगा, बेटे ! गुब्बारे का ऊपर जाना इस बात पर नहीं निर्भर करता है कि वो किस रंग का है बल्कि इसपर निर्भर करता है कि उसके अन्दर क्या है.”
ठीक इसी तरह हम इंसानों के लिए भी ये बात लागु होती है. कोई अपने जीवन में क्या प्राप्त करेगा, ये उसके बाहरी रंग-रूप पर नहीं निर्भर करता है , ये इस बात पर निर्भर करता है कि उसके अन्दर क्या है. अंतत: “हमारा रवैया हमारी ऊंचाई निश्चित करता है” |
 
यह किसकी कहानी है ?
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एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। अचानक उन्होंने सभी शिष्यों से एक सवाल पूछा। बताओ जब दो लोग एक दूसरे पर गुस्सा करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते क्यों हैं?


शिष्यों ने कुछ देर सोचा और एक ने उत्तर दिया : हम अपनी शांति खो चुके होते हैं इसलिए चिल्लाने लगते हैं।


संत ने मुस्कुराते हुए कहा : दोनों लोग एक दूसरे के काफी करीब होते हैं तो फिर धीरे-धीरे भी तो बात कर सकते हैं। आखिर वह चिल्लाते क्यों हैं?
कुछ और शिष्यों ने भी जवाब दिया लेकिन संत संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने खुद उत्तर देना शुरू किया। वह बोले : जब दो लोग एक दूसरे से नाराज होते हैं तो उनके दिलों में दूरियां बहुत बढ़ जाती हैं। जब दूरियां बढ़ जाएं तो आवाज को पहुंचाने के लिए उसका तेज होना जरूरी है। दूरियां जितनी ज्यादा होंगी उतनी तेज चिल्लाना पड़ेगा। दिलों की यह दूरियां ही दो गुस्साए लोगों को चिल्लाने पर मजबूर कर देती हैं। वह आगे बोले, जब दो लोगों में प्रेम होता है तो वह एक दूसरे से बड़े आराम से और धीरे-धीरे बात करते हैं। प्रेम दिलों को करीब लाता है और करीब तक आवाज पहुंचाने के लिए चिल्लाने की जरूरत नहीं। जब दो लोगों में प्रेम और भी प्रगाढ़ हो जाता है तो वह खुसफुसा कर भी एक दूसरे तक अपनी बात पहुंचा लेते हैं। इसके बाद प्रेम की एक अवस्था यह भी आती है कि खुसफुसाने की जरूरत भी नहीं पड़ती। एक दूसरे की आंख में देख कर ही समझ आ जाता है कि क्या कहा जा रहा है।


शिष्यों की तरफ देखते हुए संत बोले : अब जब भी कभी बहस करें तो दिलों की दूरियों को न बढ़ने दें। शांत चित्त और धीमी आवाज में बात करें। ध्यान रखें कि कहीं दूरियां इतनी न बढ़े जाएं कि वापस आना ही मुमकिन न हो।
 
एक बेहद अच्छी कहानी
लेखक - श्री मान अशोक सेठि
किसी जंगल मे एक गर्भवती हिरणी थी जिसका प्रसव होने को ही था . उसने एक तेज धार वाली नदी के किनारे घनी झाड़ियों और घांस के पास एक जगह देखी जो उसे प्रसव हेतु सुरक्षित स्थान लगा.
अचानक उसे प्रसव पीड़ा शुरू होने लगी, लगभग उसी समय आसमान मे काले काले बादल छा गए और घनघोर बिजली कड़कने लगी जिससे जंगल मे आग भड़क उठी .
वो घबरा गयी उसने अपनी दायीं और देखा लेकिन ये क्या वहां एक बहेलिया उसकी और तीर का निशाना लगाये हुए था, उसकी बाईं और भी एक शेर उस पर घात लगाये हुए उसकी और बढ़ रहा था अब वो हिरणी क्या करे ?
वो तो प्रसव पीड़ा से गुजर रही है ,
अब क्या होगा?,
क्या वो सुरक्षित रह सकेगी?,
क्या वो अपने बच्चे को जन्म दे सकेगी ?,
क्या वो नवजात सुरक्षित रहेगा?,
या सब कुछ जंगल की आग मे जल जायेगा?,
अगर इनसे बच भी गयी तो क्या वो बहेलिये के तीर से बच पायेगी ?
या क्या वो उस खूंखार शेर के पंजों की मार से दर्दनाक मौत मारी जाएगी?
जो उसकी और बढ़ रहा है,
उसके एक और जंगल की आग, दूसरी और तेज धार वाली बहती नदी, और सामने उत्पन्न सभी संकट, अब वो क्या करे?
लेकिन फिर उसने अपना ध्यान अपने नव आगंतुक को जन्म देने की और केन्द्रित कर दिया .
फिर जो हुआ वो आश्चर्य जनक था .
कडकडाती बिजली की चमक से शिकारी की आँखों के सामने अँधेरा छा गया, और उसके हाथो से तीर चल गया और सीधे भूखे शेर को जा लगा . बादलो से तेज वर्षा होने लगी और जंगल की आग धीरे धीरे बुझ
गयी.
इसी बीच हिरणी ने एक स्वस्थ शावक को जन्म दिया .
ऐसा हमारी जिन्दगी मे भी होता है, जब हम चारो और से समस्याओं से घिर जाते है, नकारात्मक विचार हमारे दिमाग को जकड लेते है, कोई संभावना दिखाई नहीं देती , हमें कोई एक उपाय करना होता है.,
उस समय कुछ विचार बहुत ही नकारात्मक होते है, जो हमें चिंता ग्रस्त कर कुछ सोचने समझने लायक नहीं छोड़ते .
ऐसे मे हमें उस हिरणी से ये शिक्षा मिलती है की हमें अपनी प्राथमिकता की और देखना चाहिए, जिस प्रकार हिरणी ने सभी नकारात्मक परिस्तिथियाँ उत्पन्न होने पर भी अपनी प्राथमिकता "प्रसव "पर ध्यान केन्द्रित किया, जो उसकी पहली प्राथमिकता थी. बाकी तो मौत या जिन्दगी कुछ भी उसके हाथ मे था ही नहीं, और उसकी कोई भी क्रिया या प्रतिक्रिया उसकी और गर्भस्थ बच्चे की जान ले सकती थी
उसी प्रकार हमें भी अपनी प्राथमिकता की और ही ध्यान देना चाहिए .
हम अपने आप से सवाल करें,
हमारा उद्देश्य क्या है, हमारा फोकस क्या है ?,
हमारा विश्वास, हमारी आशा कहाँ है,
ऐसे ही मझधार मे फंसने पर हमें अपने इश्वर को याद करना चाहिए ,
उस पर विश्वास करना चाहिए जो की हमारे ह्रदय मे ही बसा हुआ है .
जो हमारा सच्चा रखवाला और साथी है.
 
एक व्यक्ति ने छोटे स्तर से काम शुरू किया और अपनी कंपनी का टर्नओवर करोड़ों तक पहुंचा दिया।
यह सब
उसकी सच्चाई, ईमानदारी, लगन और मेहनत का प्रतिफल था। वृद्धावस्था में जब वह काम से रिटायर होना चाहता था, तब उसने अपनी कंपनी के ही ईमानदार अधिकारियों में से किसी को कंपनी प्रमुख बनाने का फैसला किया।
लेकिन कौन वास्तव में सच्चा और ईमानदार है, यह परीक्षा लेना बहुत जरूरी था।
एक दिन उसने सभी अधिकारियों को बुलाया और उन्हें कुछ बीज दिए - ये बीज घर ले जाओ, इन्हें गमले में बोकर खाद, पानी, रोशनी आदि देकर इनकी अच्छी तरह देखभाल करो।
एक महीने बाद जिसका पौधा सबसे अच्छा होगा, उसे ही कंपनी प्रमुख बनाया जाएगा। सभी लोग खुशी-खुशी बीज ले गए।
एक महीने बाद फैसले का दिन आया। सभी अधिकारी गमला
लेकर आए थे, उनके गमलों में पौधे लहरा रहे थे। लेकिन उनमें से एक अधिकारी सुरेश के गमले में पौधा नहीं था।
उसमें मि˜ी थी, खाद थी, लेकिन पौधा नदारद था। सारे अधिकारी उसका मजाक उड़ाने लगे। कंपनी प्रमुख ने सभी के गमले बारी-बारी से देखे। जब सुरेश की बारी आई, तो उसने बुझे मन से गमला आगे कर दिया और कहा, मैंने सारे यत्न किए, लेकिन पौधा नहीं उग सका।
अंत में कंपनी प्रमुख ने जब नए प्रमुख की घोषणा की तो सभी चौंक उठे, क्योंकि वह नाम सुरेश का था। कंपनी प्रमुख ने कहा, मैंने आप सब लोगों को जो बीज दिए थे, वे उबले हुए थे। यानी उनसे पौधा नहीं उग सकता था।
"सच्चाई और ईमानदारी की इस परीक्षा में सुरेश ने बाजी मार ली।
कथा मर्म : किसी को धोखा देकर आप भले ही कुछ हासिल कर लें, लेकिन अंतत: जीत सच्चाई और ईमानदारी की ही होती है..."
 
ये पोस्ट ना पढ़कर आपको जीवन भर
अफसोस रहेगा...

अमेरिका की बात हैं. एक युवक को व्यापार में
बहुत नुकसान
उठाना पड़ा. उसपर बहुत कर्ज चढ़ गया,
तमाम जमीन
जायदाद गिरवी रखना पड़ी . दोस्तों ने भी मुंह
फेर लिया,
जाहिर हैं वह बहुत हताश था. कही से कोई राह
नहीं सूझ
रही थी. आशा की कोई किरण दिखाई न
देती थी.
एक दिन वह एक park में
बैठा अपनी परिस्थितियो पर
चिंता कर रहा था.
तभी एक बुजुर्ग वहां पहुंचे. कपड़ो से और
चेहरे से वे
काफी अमीर लग रहे थे.
बुजुर्ग ने चिंता का कारण पूछा तो उसने
अपनी सारी कहानी बता दी.
बुजुर्ग बोले -” चिंता मत करो. मेरा नाम
John D.
Rockefeller है. मैं तुम्हे नहीं जानता,पर तुम
मुझे सच्चे और
ईमानदार लग रहे हो. इसलिए मैं तुम्हे दस
लाख डॉलर का कर्ज देने को तैयार हूँ.”
फिर जेब से checkbook निकाल कर उन्होंने
रकम
दर्ज
की और उस व्यक्ति को देते हुए बोले,
“नौजवान,
आज से ठीक
एक साल बाद हम ठीक इसी जगह मिलेंगे. तब
तुम
मेरा कर्ज
चुका देना.”
इतना कहकर वो चले गए. युवक shocked
था.
Rockefeller
तब america के सबसे अमीर व्यक्तियों में से
एक
थे. युवक
को तो भरोसा ही नहीं हो रहा था की उसकी लगभग
सारी मुश्किल हल हो गयी. उसके पैरो को पंख
लग
गये.
घर पहुंचकर वह अपने कर्जो का हिसाब लगाने
लगा.
बीसवी सदी की शुरुआत में 10 लाख डॉलर
बहुत
बड़ी धनराशि होती थी और आज भी है.
अचानक उसके मन में ख्याल आया. उसने
सोचा एक
अपरिचित
व्यक्ति ने मुझपे भरोसा किया, पर मैं खुद पर
भरोसा नहीं कर
रहा हूँ. यह ख्याल आते ही उसने चेक
को संभाल
कर रख
लिया. उसने निश्चय कर लिया की पहले वह
अपनी तरफ
से
पूरी कोशिश करेगा, पूरी मेहनत करेगा की इस
मुश्किल से
निकल जाए. उसके बाद भी अगर कोई चारा न
बचे
तो वो check use करेगा.
उस दिन के बाद युवक ने खुद को झोंक दिया.
बस एक
ही धुन
थी, किसी तरह सारे कर्ज चुकाकर
अपनी प्रतिष्ठा को फिर
से पाना हैं.
उसकी कोशिशे रंग लाने लगी. कारोबार उबरने
लगा,
कर्ज
चुकने लगा. साल भर बाद तो वो पहले से
भी अच्छी स्तिथि में
था.
निर्धारित दिन ठीक समय वह बगीचे में पहुँच
गया.
वह चेक लेकर Rockefeller की राह देख
रहा था की वे दूर से
आते दिखे. जब वे पास पहुंचे तो युवक ने
बड़ी श्रद्धा से
उनका अभिवादन किया.
उनकी ओर चेक बढाकर उसने कुछ कहने के
लिए
मुंह खोल
ही था की एक नर्स भागते हुए आई और
झपट्टा मरकर वृद्ध
को पकड़ लिया. युवक हैरान रह गया. नर्स
बोली, “यह
पागल
बार बार पागलखाने से भाग जाता हैं और
लोगो को जॉन डी .
Rockefeller के रूप में check
बाँटता फिरता हैं. ”
अब वह युवक पहले से भी ज्यादा हैरान रह
गया.
जिस check
के बल पर उसने
अपना पूरा डूबता कारोबार फिर से
खड़ा किया,वह
फर्जी था.
पर यह बात जरुर साबित हुई की वास्तविक
जीत हमारे
इरादे , हौंसले और प्रयास में ही होती हैं.
हम सभी यदि खुद पर विश्वास रखे
तो यक़ीनन
किसी भी असुविधा से, situation से निपट
सकते हैं!!
 
एक काफिला सफ़र के दौरान अँधेरी सुरंग से गुजर रहा था । उनके पैरों में कंकरिया चुभी,
कुछ लोगों ने इस ख्याल से कि किसी और को ना चुभ जाये,
नेकी की खातिर उठाकर जेब में रख ली ।
कुछ ने ज्यादा उठाई कुछ ने कम ।
जब अँधेरी सुरंग से बाहर आये तो देखा वो हीरे थे ।
जिन्होंने कम उठाये वो पछताए कि ज्यादा क्यों नहीं उठाए ।
जिन्होंने नहीं उठाए वो और पछताए ।
दुनिया में जिन्दगी की मिसाल इस अँधेरी सुरंग जैसी है और नेकी यहाँ कंकरियों की मानिंद है ।
इस जिंदगी में जो नेकी की वो आखिर में हीरे की तरह कीमती होगी और इन्सान तरसेगा कि और ज्यादा क्यों ना की ।
 
पिता के मरने के बाद बेटा अपनी माँ को ओल्ड ऐज होम छोड़ के आया...
कुछ सालो बाद ओल्ड ऐज होम से फ़ोन आया : तुम्हारी माँ मरणासन्न है जल्दी आ जाओ !
बेटा माँ से मिलके भावुक हो गया, बोला : माँ बता मै क्या करू तेरे लिए
माँ ने कहा : बेटा इस कमरे में एक पंखा लगवा दे
बेटे ने कहा : इतने साल तो तुम बिना पंखे के रही अब जब मरने वाली हो तो पंखा लगाने के लिए क्यों कह रही हो ?
माँ ने कहा : बेटा मैंने तो किसी तरह गुजारा कर लिया लेकिन जब तेरा बेटा तुझे इस कमरे में भेजेगा तो तू बिना पंखे के रह नही पायेगा.
 
राई का पहाड़
एक राजकुमारी की आंख में कुछ समस्या हो गयी। यह समस्या थी तो मामूली सी, किन्तु चूँकि वह राजा कीबेटी थी और पहली बार उसे कुछ समस्या हुयी थी, अतः उसे हल्का सा आंख का दर्द भी बहुत नागवार गुज़ररहा था। और, वह हर समय कराहती और रोती रहती थी।
जब उसे कोई दवाई डालने को कहते, तो दवाई को फेंक देती और बार-बार आंख को छूती थी। इस प्रकार उसकी समस्या ठीक होने के स्थान पर बढ़ती गयी और राजा बहुत परेशान हो गया। राजा ने घोषणा करवा दी कि जो भी उसकी बेटी को, राजकुमारी को, ठीक कर देगा, उसे भारी ईनाम दिया जाएगा।
कुछ समय पश्चात् एक आदमी आया जिसने अपने आपको एक प्रसिद्द चिकित्सक बताया किन्तु वास्तविकता में वह डॉक्टर था ही नहीं।
उसने कहा कि वह निश्चित रूप से राजकुमारी को ठीक कर सकता था और इसलिए उसे राजकुमारी के कक्ष में उनका मुआइना करने भेज दिया गया।
राजकुमारी का चेक अप करने के पश्चात् वह व्यक्ति चौंका और बोला, " हे मेरे भगवान ! यह तो बड़े दुःख की बात है।" इस पर राजकुमारी बोली-- "डाक्टर साहब, क्या मैं ठीक हो जाऊंगी ? " " आपकी आंख में कोई खास समस्या तो है नहीं। वह तो ठीक हो जाएगी, किन्तु कुछ और बात है जो कि काफ़ी चिन्ताजनक है। " वह व्यक्ति बोला।
" ऐसी क्या बात है जो इतनी चिन्ताजनक है ? "
इस पर वह हिचकिचाते हुए बोला, " स्थिति सचमुच बहुत गंभीर है, राजकुमारी जी, और मुझे आपको इसके बारे में नहीं बताना चाहिए। "
राजकुमारी गिड़गिडाती रही पर उस व्यक्ति ने कुछ नहीं बताया। अंततः वह बोला कि महाराज यदि आज्ञा दे दें तो वह बता देगा कि क्या समस्या है।
जब महाराज आये तो भी उसने बताने में आनाकानी की किन्तु फ़िर महाराज ने आदेश दिया, " जो भी स्थिति हो, आप हमें स्पष्ट शब्दों में बताइए। " अन्ततः चिकित्सक बोला, " ऐसा है, महाराज ! कि आँखों का दर्द ठीक होने में तो कोई समस्या नहीं है। वह तो जल्दी ही ठीक हो जाएगा।
किन्तु गंभीर बात यह है कि राजकुमारी जी की जल्दी ही पूँछ निकलने लगेगी और वह पूँछ नौ मीटर लम्बी होगी। "
" जैसे ही राजकुमारी जी को आभास हो कि पूँछ निकलनी शुरू हो रही है, वे तुरंत बताएं तो मैं उसे बढ़ने से रोकने का पूरा प्रयास करूंगा। "
यह समाचार मिलते ही सब चिन्ताग्रस्त हो गए। और, राजकुमारी ने क्या किया ? वह बिस्तर पर लेट गयी और रात दिन उसका सारा ध्यान इस ओर लगा रहता था कि कहीं उसकी पूँछ तो नहीं निकल रही। और, इस कारण कुछ ही दिनों में उसकी आंख बिलकुल ठीक हो गयी।
इससे हमें यह स्पष्ट होता है कि किस प्रकार हम अपनी छोटी-छोटी समस्याओं पर अपना पूरा ध्यान लगाये रहते हैं और अपने लक्ष्यों की अवहेलना करते रहते हैं।।
वास्तविकता में हमें क्या करना चाहिए ? यदि हमारी कोई छोटी समस्या हो तो क्या उसकी अवहेलना करते रहना चाहिए ? नहीं ! हमें जीवन के हर क्षेत्र में अपने लक्ष्यों एवं समस्याओं को उनकी गंभीरता के अनुपात में समय देना चाहिए और छोटी-छोटी समस्याओं को राई का पहाड़ नहीं बना देना चाहिए
 
एक दिन एक आदमी टैक्सी से एअरपोर्ट जा रहा था . टैक्सी वाला कुछ गुनगुनाते हुए बड़े इत्मीनान से गाड़ी चला रहा था कि अचानक एक दूसरी कार पार्किंग से निकल कर रोड पर आ गयी , टैक्सी वाले ने तेजी से ब्रेक लगायी , गाड़ी स्किड करने लगी और बस एक -आध इंच से सामने वाली कार से लड़ते -लड़ते बची .
आदमी ने सोचा कि टैक्सी वाला कार वाले को भला -बुरा कहेगा …लेकिन इसके उलट सामने वाला ही पीछे मुड़ कर उसे गलियां देने लगा . इसपर टैक्सी वाला नाराज़ होने की बजाये उसकी तरफ हाथ हिलाते हुए मुस्कुराने लगा , और धीरे -धीरे आगे बढ़ गया .
आदमी ने आश्चर्य से पूछा “ तुमने ऐसा क्यों किया ? गलती तो उस आदमी की थी ,उसकी वजह से तुम्हारी गाडी लड़ सकती थी और हम होस्पिटलाइज भी हो सकते थे .!”
“सर जी ”, टैक्सी वाला बोला , “ बहुत से लोग गार्बेज ट्रक की तरह होते हैं . वे बहुत सार गार्बेज उठाये हुए चलते हैं ,फ्रस्ट्रेटेड, हर किसी से नाराज़ और निराशा से भरे …जब गार्बेज बहुत ज्यादा हो जाता है तो वे अपना बोझ हल्का करने के लिए इसे दूसरों पर फेंकने का मौका खोजने लगते हैं , पर जब ऐसा कोई आदमी मुझे अपना शिकार बनाने की कोशिश करता हैं तो मैं बस यूँही मुस्कुरा के हाथ हिल कर उनसे दूरी बना लेता हूँ …किसी को भी उनका गार्बेज नहीं लेना चाहिए , अगर ले लिया तो शायद हम भी उन्ही की तरह उसे इधर उधर फेंकने में लग जायेंगे …घर में ,ऑफिस में सड़कों पर …और माहौल गन्दा कर देंगे , हमें इन गार्बेज ट्रक्स को अपना दिन खराब नहीं करने देना चाहिए . ज़िन्दगी बहुत छोटी है कि हम सुबह किसी अफ़सोस के साथ उठें , इसलिए … उनसे प्यार करो जो तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और जो नहीं करते उन्हें माफ़ कर दो .”
Friends, सोचने की बात है कि क्या हम intentionally garbage trucks को avoid करते हैं , या उससे भी बड़ी बात कि कहीं हम खुद गार्बेज ट्रक तो नहीं बन रहे ??? चलिए इस कहानी से सीख लेते हुए हम खुद गुस्सा करने से बचें और frustrated लोगों से उलझने की बजाये उन्हें माफ़ करना सीखें .
 
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