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कौन नहीं जानता कि भारतेन्द्र महाराजा जवाहरसिंह ही एकमात्र ऐसे हिन्दू नरेश थे जिन्होंने हिन्दू जाति के मुसलमानों द्वारा नष्ट किये हुए गौरव की रक्षा करके हमारी मान मर्यादा को सुरक्षित किया था । इतिहास-वेत्ता और इतिहास-प्रेमी पाठकों से यह बात छिपी हुई नहीं है कि महमूद गजनवी, चंगेज खाँ, तैमूरलंग, औरंगजेब आदि मुगल आक्रान्ताओं, लुटेरों और बादशाहों ने हिन्दुओं के अनेक मन्दिरों को तोड़ा, मूर्तियों को खण्डित किया, मंदिरों में शंख, घड़ियाल व घण्टों का बजाना बंद कर के उनमें आरती होने तक को बंद करा दिया था । अनेक हिन्दुओं को बलात् मुसलमान बना लिया था । यहां तक कि हिन्दुओं की बहिन-बेटियों को छीनकर मुसलमान बना लिया था । यदि इन अत्याचारों का बदला किसी ने लिया तो सच्चे वीर क्षत्रिय महाराजा जवाहरसिंह ने । उन्होंने आगरा आदि नगरों में अपने राज्य बल से मुल्लाओं को प्रातः-सायं बांग देने से रोक दिया था । आगरा की जामा मस्जिद में बाजार लगवा दिया था परन्तु उसे तुड़वाया नहीं । इससे उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया था । अन्यथा वे चाहते तो क्षण भर में नष्ट भ्रष्ट करा देते और उसका चिन्ह तक मिटा देते । देहली से लौटते हुए उन्होंने सैंकड़ों नव-मुस्लिमों को जाट बना लिया था, जो आज भी हिन्दू जाति का गौरव बढ़ा रहे हैं । वही एक ऐसे प्रातः स्मरणीय हिन्दू नरेश हुए हैं जिन्होंने सच्चे अर्थों में हिन्दुत्व की रक्षा की तथा अकबर के सिंहासन पर बैठकर आगरे में शासन किया ।
१८०५ में भरतपुर के दुर्ग पर जब अंग्रेजों ने आक्रमण किया तो महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों के जिस तरह दांत खट्टे किये वह तो इतिहास की अद्वितीय गाथा बन गया है । और उसी समय से यह कहावत प्रसिद्ध हो गई है कि - आठ फिरंगी, नौ गोरे, लड़ें जाट के दो छोहरे । कविवर वियोगी हरि ने भी अपनी वीर सतसईं में लिखा है "एही भरतपुर को दुग्ग है, जहं जट्टन के छोहरे .....दिये अंग्रेज सुभट्ट पछारी ।"
मातृभूमि के पैरों में से दासता की बेड़ियाँ उतरवाने के लिए, उसकी स्वतन्त्रता प्राप्ति के हित जो अंग्रेजों के विरुद्ध १८५७ का युद्ध लड़ा गया, उसमें सबसे बढ़-चढ़ कर भाग अहीरों और जाटों ने लिया जिसका फल इन्हें अंग्रेजों के राज्य में बहुत बुरे तरह भोगना पड़ा और इन्हें अनेक राज्यों में विभक्त कर दिया गया ।
१०२ वर्ष पूर्व जीन्द राज्य के प्रसिद्ध गाँव लजवाना में भूरा अन्द निघांईया दो जाट चौधरी बसते थे । मजदा और दुर्गा के बहकाने से महाराजा जीन्द ने उन पर आक्रमण कर दिया । यह युद्ध छः महीने तक चला । भूरा और निघांईया की मदद चारों ओर की जटैत करती थी जो समय के अनुसार घटती, बढ़ती रहती थी । धन, जन की कभी कमी न रहती थी । भूरा और निघांईया अपने मातहत काम करने वालों को आठ रुपये महीना देते थे । तोपची को सोलह रुपये महीना । सात सौ हेड़ी उनकी फौज में तोपची का काम करते थे । गोला, बारूद, रसद उन्हें रिठाना, फड़वाल और खुडाली (किला जफरगढ़) के ठिकानों से पहुंचती थी । खुडाली में तो पुराने घरों में अब तक शोरा, गन्धक, पुरानी बन्दूक, गंडासे आदि बड़ी तादाद में खुदाई पर निकल आते हैं । इस युद्ध में पटियाला, नाभा, जीन्द आदि राज्यों की बीस हजार से अधिक फौज काम आई थी । अंग्रेजी फौज ने आकर बड़ी कठिनाई से लजवाना को फतह किया था । आज भी पटियाला के देहात में बहनें यह गीत बड़े दर्द के साथ गाती हैं कि -
"लजवाने, तेरा नाश जाइयो, तैने बड़े पूत खपाये"
हरयाणा के स्वाभिमानी पुरुष अंग्रेजी राज्य की स्थापना के कितने विरुद्ध थे, यह उपर्युक्त घटना से अच्छी तरह ज्ञात हो जाता है । अन्त में भूरा और निघांईया पकड़े गये तथा उन्हें कालवा (जीन्द राज्य का प्रसिद्ध गांव) में फांसी पर लटका दिया गया । फांसी गांव के बाहर वृक्षों पर दी गई तथा सारे इलाके के लोगों को बुलाकर, जिससे अंग्रेज की दहशत सब पर छा जावे और कोई भी ब्रिटिश प्रभु के खिलाफ सिर न उठ सके ।
सन् १८०९ में जब कर्नल वारिन पलटन लेकर भिवानी फतह के लिए गये, उस समय उसके चारों ओर बसने वाले जाटों, राजपूतों, ब्राह्मणों और वैश्यों ने डटकर लोहा लिया था । और तो और, जिन वैश्यों की व्यापारी कहकर उपेक्षा की जाती है, उनके अगुआ ला० नन्दराम अपने चार बेटों के साथ युद्ध में काम आये । कोसली के प्रसिद्ध पंडित तुलसीराम जी अपने भाई तोताराम के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में जूझे थे । १८०२ में जार्ज थामस ने पहले पहल हरयाणा की भूमि पर कब्जा किया । उसने बेरी, झज्जर तथा महम अपने अधीन किये, तथा सारे पंजाब पर कब्जा करने का विचार करने लगा । उसकी सफलता का कारण था तत्कालीन राजाओं व नवाबों का आपसी विग्रह । परन्तु हरयाणा वाले जल्दी ही संभल गये और उन्होंने बापू जी सिंधिया तथा भरतपुर के जाट नरेश महाराजा रणजीतसिंह की अध्यक्षता में युद्ध करके जार्ज थाम्स को इस प्रदेश पर से भगा दिया था । बाद में ईस्ट इंडिया कम्पनी की शासन सत्ता छा गई और यहाँ के निवासी सन् ५७ तक अन्दर ही अन्दर अंग्रेज के विरुद्ध धधकते रहे । १८५७ के स्वातन्त्र्य युद्ध में हरयाणे के राजाओं, नवाबों, सैनिकों और जन साधारण ने जो महत्त्वपूर्ण भाग लिया है, वह अलग ही लेख (लेख नहीं, पुस्तक) का विषय है । इस में कोई सन्देह नहीं कि हरयाणा के वीर पुत्रों (सभी जातियों) ने जो भाग आजादी की लड़ाई में लिया उसका उल्लेख बहुत कम हुआ है । रामपुरा, रिवाड़ी, फर्रुखनगर, बहादुरगढ़, झज्जर, बल्लभगढ़, नसीरपुर (नारनौल), श्यामड़ी, रोहतक, थानेसर, पानीपत, करनाल, पाई, कैथल, सिरसा, हाँसी, नंगली, जमालपुर, हिसार आदि सभी स्थान विद्रोहियों के केन्द्र रहे हैं । उपरोक्त सभी स्थानों पर कुछ न कुछ दिन आजादी के दीवानों की हकूमत रही है । इस लेख में मैं केवल जाटों से सम्बन्धित कुछ बातें लिखूंगा । बाकी लोगों के संबन्ध में अन्य लेखों में ।
१० मई को मेरठ से जो चिन्गारी छूटी वह ११ को देहली आ पहुँची । मेरठ की फौजों में सबसे अधिक हरयाणे के जाट और राजपूत थे । उनके बाद अहीर । उन फौजी सिपाहियों द्वारा यह आग सारे प्रदेश में व्याप्त हो गई । उस समय तक रोहतक बंगाल के गवर्नर के मातहत था, तथा कमिश्नरी का हेड-क्वार्टर आगरा । यहाँ के डिप्टी कमिश्नर जॉन एडमलौक थे । २३ मई को बहादुरगढ़ में शाही फौज ने प्रवेश किया और २४ मई को रोहतक पहुंची । डिप्टी कमिश्नर गोहाने के रास्ते करनाल भाग गया । रहे हुए अंग्रेज अधिकारी मारे गये । जेल के दरवाजे खोल दिये गये, कचहरी को आग लगा दी गई । शाही दस्ते ने शहर के हिन्दुओं को लूटना चाहा पर जाटों ने ऐसा न करने दिया । दो दिन ठहर कर विद्रोहियों ने खजाने से दो लाख रुपया निकाल लिया । मांडौठी, मदीना, महम की चौकियाँ लूट ली गईं । सांपला तहसील में आग लगा दी गई । सभी अंग्रेज स्त्रियों को जाटों ने मुस्लिम राजपूतों (रांघड़ों) के विरोध के बावजूद सही सलामत उनके ठिकानों पर पहुंचा दिया । गोहाना पर गठवाले जाटों ने कब्जा जमा लिया । ३० मई को अंग्रेजी फौज अंबाला से रोहतक चली, पर देशी फौजों के बिगड़ने से श्यामड़ी के जंगल में हार गई । बचे खुचे अंग्रेज दिल्ली को भागे । लुकते-छिपते ये लोग १० जून को सांपला पहुंचे । डिप्टी कमिश्नर सख्त धूप न सह सकने के कारण अंधा हो गया । रोहतक के विद्रोही १४ जून को दिल्ली पहाड़ी की लड़ाई में सम्मिलित हुए थे । जब अंग्रेज रोहतक पर किसी तरह भी काबू न पा सके तो मजबूर होकर उन्होंने २६ जुलाई सन् ५७ को एक घोषणा द्वारा जींद के महाराजा स्वरूपसिंह को सौंप दिया । दिसम्बर के अन्त तक जहां लोग अंग्रेज से लड़ते रहे, वहां जाटों की खापें आपस में भी एक दूसरे पर आक्रमण करती रहीं और बीच-बीच में रांघड़ों और कसाइयों से भी लड़ते रहे ।
जब गदर समाप्त हुआ तो प्रायः सभी गावों के मुखिया लोगों और खासकर नम्बरदारों को फांसी पर चढ़ा दिया गया था । झज्जर के चारों ओर की सड़कें उल्टे लटके मनुष्यों की लाशों से सड़ उठीं थीं । मुसलमान राजपूत गांवों के नम्बरदारों को तथा श्यामड़ी गांव के १० जाट नम्बरदारों व १ ब्राह्मण को रोहतक की कचहरियों व शहर के बीच नीम के वृक्षों पर (वर्तमान चौधरी छोटूराम की कोठी के सामने के वृक्षों पर) फांसी पर लटका दिया गया था । फांसी देने से पहले दसों जाट नम्बरदारों को बुलाकर अंग्रेज हाकिमों ने पूछा - बोलो क्या चाहते हो ? जाटों ने कहा कि हमारे ग्यारहवें साथी मुल्का ब्राह्मण को छोड़ दो । मुल्का ब्राह्मण ने अपने साथियों से अलग होने से इन्कार कर दिया । उसे भी उनके साथ ही फाँसी दे दी गई । सारी लाशें गाँव में लाकर जलाईं गईं । फांसी पाने वालों के खोज करने के बाद ९ नाम जान सका, दो का पता न चला । क्रमशः नाम ये हैं - मुल्का ब्राह्मण, हरदयाल, श्योगा, हरकू, बहादुरचन्द, जमनासिंह, हरिराम, शिल्का, भाईय्या (सब जाट) ।
कप्तान हडसन १६ अगस्त सन् ५७ को १२ बजे रोहतक पहुंचा था । उसने कुछ लोगों को इकट्ठे देखकर गोली चला दी जिससे १६ आदमी मारे गये । यह घटना चारों ओर के देहात में फैल गई । अगले दिन १७ अगस्त को सिंहपुरा, सुन्दरपुर, टिटौली आदि के १५०० आदमी चढ़ आये, जिनमें से ५० रणभूमि में ही खेत रहे । झज्जर के नवाब अब्दुर्रहमान को २३ दिसम्बर १८५७ को फांसी के तख्ते पर लटका दिया गया । २१ अप्रैल १९५८ को बल्लभगढ़ नरेश नाहरसिंह फांसी पर झुला दिये गये और उन्हीं के साथ नवाब झज्जर के तीन वजीरों में से एक वजीर बादली के गुलाबसिंह जाट भी फांसी पर चढ़ा दिये गये । राव तुलाराम व राव कृष्णगोपाल ने जो अतुल पराक्रम दिखाया, वह स्वर्णाक्षरों में अंकित होने योग्य है । इसी अर्से में बहादुरगढ़, दादरी, फर्रुखनगर के नवाब समाप्त कर दिये गये । फर्रुखनगर के नवाब मुहम्मद अली खाँ को फांसी दी गई और उनके ११ साथियों को गोली से उड़ा दिया गया । महाराजा नाहरसिंह के साथ फांसी पाने वालों में कुंवर खुशहालसिंह और ठाकुर भूरेसिंह भी थे ।
हिसार में सन् ५७ में हरयाणवी फौज की लाइट पलटन तैनात थी और १४वां घुड़सवार रिसाला था । पंजाब के तत्कालीन चीफ कमिश्नर सर जान लारेन्स ने एक अनुभवी सेना नायक जनरल वान कोटलैंड को भेजा । हिसार, सिरसा, हांसी और उनके देहात में जहाँ भी, जो भी अंग्रेज फंसा, समाप्त कर दिया गया । जहाँ रोहतक-करनाल के युद्धों में सिक्खों ने अंग्रेजों की सहायता की, वहां हिसार के युद्ध में महाराजा बीकानेर के ८०० सिपाही अंग्रेज की ओर से लड़े । हांसी के देहात में जो मारकाट मची, वह रोंगटे खड़े करने वाली है । जो अमानवीय अत्याचार यहाँ हुए, वह लिखे नहीं जा सकते । यदि उनका मुकाबला किया जा सकता है तो सन् १९४७ के नरमेध से । जमालपुर मंगली आदि गांव राख के ढ़ेर बना दिये गये । युद्ध की समाप्ति पर देहात से पकड़कर १५० के लगभग लोगों को फांसी पर सरे आम लटका दिया गया ।
.....continued.
Deswal saab Badi khushi hui pad ke.
regards,
Mr.Nandal
please go through it.....if u want to more Mr.Dharmpal Dude is in better position to satisfy your queries.
thanks
http://en.wikipedia.org/wiki/Kaliraman
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