sanjaymalik
New member
विवेक इब्बे तै गुडिया का न्योता भी आवेगा, आठीम ने ![/QUOTE]
Bhai sab eb to pados me dunde te bhi 8 kanya na mila, sab k navrantre chal re se.....kuch pahla ratio kam hai.
विवेक इब्बे तै गुडिया का न्योता भी आवेगा, आठीम ने ![/QUOTE]
Bhai sab eb to pados me dunde te bhi 8 kanya na mila, sab k navrantre chal re se.....kuch pahla ratio kam hai.
क्या हमारी (जाटों की ) धार्मिक आस्थाएँ बदल रही हैं !
शनिवार को में जाटों की एक मीटिंग में शामिल हुआ था ! में हैरान था कि, तकरीबन सारे मेम्बेर्स हरियाणा और उत्तरप्रदेश के अलग जिलों से थे और ज्यादातर पुरुष!
शाम को घर आने के बाद , करमवीर चहल जी का थ्रेड " नवरात्रों कि शुभकामनाएं " और दुसरे भाई ,बहनों के रेस्पोंस भी पढ़े !
तब मुझे लगा, में और मेरे जैसे कुछ ही लोग हैं जो इन चीजो पर विश्वास नहीं करते या नहीं मानते ! ८-९ साल पहले , भारत में रहते हुए मैंने कभी नहीं सुना था कि जाट भी इस तरह के झमेलों में पड़ चुके हैं! खाश कर पुरुष मेम्बेर्स के रेस्पोंस देख कर में सच में चोंक गया !
पर दुर्गा माता, नवरात्रे आदि के दोरान व्रत रखना इत्यादि बहुत खुछ नया है , खास कर जाटों के लिए !
Not sure why you are taking such a big offense. You are betraying a lack of faith in your own faith! Is your aastha (faith) so weak that a person questions a particular ritual, aur usse thes pahuch jaati hai? To question is not only a fundamental human right, but duty as well; all scientific progress starts with questioning.
सुनीता जी, देशवाल सर ने कब बोला है की नवरात्रे (or whatever) रखना अपराध है??
your post seems to harsh (and for no reason)!!![]()
You are again trying to hurt by what you have written bracket
Dear Kapil
There is no question of being offensive, One should always remeber whether he/she is not going to hurt some one by asking any question.
Your beliefs seems to be quite vulnerable. Nah? I heard fastings give you mental strength, unevident still.
It is your perorgative to get hurt or take positvely which you dont believe. If criticism hurts, it is for right thing.
Samar
My faith is intact on its place, It's not criticism, some people always try to hurt others
i do not know about haryana but i have seen one person fasting in my area from each family in "navratras". My father used to fast and after him my eldest brother started fasting.
for rakesh: In my area, jats still do not use fire crackers on diwali. We celebrate it as peaceful as possible only with lots of "diyas", lights and candles and loads of sweets. Holi also still has almost the same things, fire crackers, colors next day, visiting each other in village. Early morning, one person from each family goes to the fields and brings some green leaves/small branch of "khejdi/jaanti" tree. Singing "faag" is loosing its importance now as people go away for may purposes, work late nights etc. I must say that playing holi with devar/bhabhi is not that much evident now but it was as my mother tells.
Gangaur and teez are other festivals celebrated in shekhawati area of rajasthan. "melas" are organized on both these occasions.
about sunita ji's post: She has asked a question about our dressing changes and no one is questioning about that and she is trying to say that people change their customs/traditions/beliefs according their own comfort and if some one else does the same, they start questioning. Why did we change our dressing sense, why do not we still wear dhoti, kurta, pagdi and raw leather jutis.
It looks like i go to office at 9 am and you do not or vice versa, why? Is this a relevant question?
I think, its up to the person what he likes and we should not comment on someone's beliefs, rather we should respect it. If someone asks you why you are not following certain things then you have every right to question whatever you feel about that. No one is forcing/asking you to do things against your will so let others do what they like to do.
Ps: No offence is intended to anyone.
जैसा की करमवीर जी ने जिक्र किया मैंने जो देखा था उस समय और आज की मनायताओ में बहुत अंतर आ चुका है ! नवरात्रे पहले भी होते थे पर व्रत नहीं रखे जाते थे ! पहले जाटो का मुख्य काम खेती होता था जोकि बहुत मेहनत का काम है ! व्रत इत्यादि रखने से काम पे असर पड़ता था ! नवरात्रे से पहले श्राध भी पहले से ही होते हैं हरियाणा में इन्हें कनागत कहते हैं ! नवरात्रे के पहले दिन सांझी डाली जाती थी ! कुंवारी कन्या के हाथ से सांझी डलवाते थे क्योंकि उसे देवी सामान पवित्र मानते हैं ! दशहेरे वाले दिन इस सांझी को लड़किया झुंड बनाकर गीत गाते हुए गाँव के जोहड़ (तालाब) में बहा देती थी ! सांझी के सिर्फ चेहरे को ही मटकी में रख कर और ज्योत जला कर बहाया जाता है ! सांझी का जोहड़ को पार करना आने वाले साल में अकाल का पर्तीक माना जाता है सो गाँव के लड़के उन मटकियों को जोहड़ में ही फोड़ देते हैं ! उसके बाद लड़कियां कबड्डी जैसे खेल खेलती हैं और गीत गाते हुए घर वापस चली जाती हैं !
दीवाली पर बम पटाखे भी नहीं चलते थे दीवाली के लिए दिए जलते थे खीर हलवा आदि बनता था ! हीडो नाम की मशरूम जैसी चीज होती थी जो बारिश के दिनों में पेडो की जड़ में पैदा होती है ! उसे पूरा दिन तेल में भिगो कर रखा जाता था जिस से वो बहुत सारा तेल पी लेती थी और रात को बहुत देर तक जलती रहती थी !
फाग पर दिन में होली खेली जाती थी और रात में बम पटाखे जलते थे ! होली वाले महीने को फाग कहते हैं और फाग में सिर्फ भाभी को देवर को भिगोने का हक़ होता है ! भाभी के साथ ही होली खेल सकते थे !होली का दिन जाट समाज में कोई मायने नहीं रखता था हाँ रात को पटाखे वगरह जलाते थे ! फाग वाले दिन भाभियाँ कपडे का कोरडा बना कर देवर को मारती हैं और देवर भाभी को भीगोता है ! अब सब बदल रहा है दीवाली को पटाखे जलते हैं हीडो को कम ही लोग जानते हैं कोई किसी से भी होली खेलने लग जाता है ! परिवर्तन समय का नियम है लेकिन अपने रीतीरिवाजो को बदल कर हम कौनसा परिवर्तन चाहते हैं ?
Deswal ji mujhe is baare mein jyada to nahi pata par meine ye sab dekha hai. Jo dekha aur yaad hai wahi likh raha hoon.राकेश भाई
विशार्जन से दो दिन पहले एक छोटे बच्चे का चित्र भी सांझी के साथ बना दिया जाता है !
बचपन में ऐसा सुनते थे, वो सांझी का भाई है , उसे लिवाने आया है !
आपने जो चित्र पोस्ट किये हैं उन भी एक बालक सांझी के बाएं और खडा है !
आप क्या जानते हैं इसके बारे में ?
क्या सांझी किसी देवी का प्रतिक है ?
अगर सांझी किसी देवी का प्रतिक है, तब वह बालक कौन है?
क्या हमारी (जाटों की ) धार्मिक आस्थाएँ बदल रही हैं !
शनिवार को में जाटों की एक मीटिंग में शामिल हुआ था ! मीटिंग किसी सज्जन के घर थी! जाहिर है गृह स्वामी ने चाय नाश्ते का भी प्रबंध किया हुआ था ! मुझे छोड़ कर शायद ही किसी ने कुछ खाया होगा ! सभी का न खाने का कारन एक ही था, की भाई मैंने व्रत रखा हुआ है ! नवरात्रे चल रहे हैं ! में हैरान था कि, तकरीबन सारे मेम्बेर्स हरियाणा और उत्तरप्रदेश के अलग जिलों से थे और ज्यादातर पुरुष!
शाम को घर आने के बाद , करमवीर चहल जी का थ्रेड " नवरात्रों कि शुभकामनाएं " और दुसरे भाई ,बहनों के रेस्पोंस भी पढ़े !
तब मुझे लगा, में और मेरे जैसे कुछ ही लोग हैं जो इन चीजो पर विश्वास नहीं करते या नहीं मानते ! ८-९ साल पहले , भारत में रहते हुए मैंने कभी नहीं सुना था कि जाट भी इस तरह के झमेलों में पड़ चुके हैं! खाश कर पुरुष मेम्बेर्स के रेस्पोंस देख कर में सच में चोंक गया !
इसलिए ये प्रशन जाटलैंड मेम्बेर्स से कर रह हूँ , क्या हमारी धार्मिक आस्थाएँ बदल रही ? में समझता हूँ , जाटों का एक बड़ा वर्ग आर्यसमाज से प्रभावित रहा! कुछ जाट, दुसरे पंथो में भी विश्वाश करते रहे हैं !पर दुर्गा माता, नवरात्रे आदि के दोरान व्रत रखना इत्यादि बहुत खुछ नया है , खास कर जाटों के लिए ! आप सब क्या समझाते हैं कि क्या सच में ही हमारी धार्मिक आस्थाएँ बदल रही हैं ? क्या इसका जाट समाज के मूल सवरूप पर कोई असर पड़ेगा?
क्या हमारी (जाटों की ) धार्मिक आस्थाएँ बदल रही हैं !
शनिवार को में जाटों की एक मीटिंग में शामिल हुआ था ! मीटिंग किसी सज्जन के घर थी! जाहिर है गृह स्वामी ने चाय नाश्ते का भी प्रबंध किया हुआ था ! मुझे छोड़ कर शायद ही किसी ने कुछ खाया होगा ! सभी का न खाने का कारन एक ही था, की भाई मैंने व्रत रखा हुआ है ! नवरात्रे चल रहे हैं ! में हैरान था कि, तकरीबन सारे मेम्बेर्स हरियाणा और उत्तरप्रदेश के अलग जिलों से थे और ज्यादातर पुरुष!
शाम को घर आने के बाद , करमवीर चहल जी का थ्रेड " नवरात्रों कि शुभकामनाएं " और दुसरे भाई ,बहनों के रेस्पोंस भी पढ़े !
तब मुझे लगा, में और मेरे जैसे कुछ ही लोग हैं जो इन चीजो पर विश्वास नहीं करते या नहीं मानते ! ८-९ साल पहले , भारत में रहते हुए मैंने कभी नहीं सुना था कि जाट भी इस तरह के झमेलों में पड़ चुके हैं! खाश कर पुरुष मेम्बेर्स के रेस्पोंस देख कर में सच में चोंक गया !
इसलिए ये प्रशन जाटलैंड मेम्बेर्स से कर रह हूँ , क्या हमारी धार्मिक आस्थाएँ बदल रही ? में समझता हूँ , जाटों का एक बड़ा वर्ग आर्यसमाज से प्रभावित रहा! कुछ जाट, दुसरे पंथो में भी विश्वाश करते रहे हैं !पर दुर्गा माता, नवरात्रे आदि के दोरान व्रत रखना इत्यादि बहुत खुछ नया है , खास कर जाटों के लिए ! आप सब क्या समझाते हैं कि क्या सच में ही हमारी धार्मिक आस्थाएँ बदल रही हैं ? क्या इसका जाट समाज के मूल सवरूप पर कोई असर पड़ेगा?
extremes are bad...u may worship n all..but sometimes its quite ludicrous...beyond me!
We use essential cookies to make this site work, and optional cookies to enhance your experience.