जाटों को ही क्यों आतंकित और परेशान किया जाए ! पंजाब मे सभी समुदायों , जैसे ब्राह्मण , खत्री , शिया , सुन्नी , आरोड़े , अग्रवाल , महाजन , कायस्थ , कुरैशी , अरई, अवन, सैयद , मोमिन और भी न जाने कितनों के अपने अलग जातिय सम्मेलन होते रहते हैं | राजपूत , गुजर ,सैनी ,लबाना और अहलुवालिया सभाए हैं | खालसा ब्राथरहूड जैसी सोसाईटिया हैं , अथवा विभीन्न समुदायों के अपने मजहबी सम्मेलन हैं | इस के अतिरिक्त हमे कभी कभी कश्मीरियों और पारसियों के विषय मे भी सुनने को मिलता हैं | पिछले दो वर्षो के दौरान ' चैंबर ऑफ ट्रेड एंड कॉमर्स ' भी काफी चर्चित रहा हैं | इन मे से कुछ पेशो से संबन्धित हैं | कश्मीरी सम्मेलन अपने एक व्यवसाय से संबन्धित हैं | हिन्दू , मुसलमान और सिख अपने स्वयं के मजहब का ख्याल किए बिना इन मे भाग लेते रहे हैं | यदि कोई कबीला अथवा समुदाए एक से अधिक धर्मो मे फैला हुआ हैं , ऐसे कबीले अथवा समुदाए के सभी लोग अपनी जाति-समुदाए के संगठनो कि गतिविधियों मे भाग लेते हैं - जैसे हिन्दू और मुसलमान , अथवा हिन्दू और सिख , अथवा हिन्दू , मुसलमान और सिख बिना धार्मिक विश्वास का लिहाज किए , और बिना किसी औपचारिकता के ! परंतु हमने किसी भी ओर से कोई शिकायत या आपत्ति नहीं सुनी हैं | वास्तव मे ही यह बात आश्चर्यजनक हैं कि अपना संगठन बनाने पर केवल जाट समुदाए को ही क्यों त्रासा और प्रताड़ित किया जा रहा हैं | हिन्दुओ का कहना हैं कि क्या मुसलमान -गैर मुसलमान , जमींदार -गैर जमींदार और शहर देहात के नाम पर विभाजन पर्याप्त नहीं थे । जो अब एक नया विभाजन जाट-गैर जाट के नाम से जोड़ा जा रहा हैं ? आर्य समाजियों का कहना हैं कि इस प्रकार का भेद वेदो और महर्षि दयानंद के सिद्धांतों के विरुद्ध हैं | सीखो कि आपत्ति हैं कि जाट-गैर जाट का भेद पंथ के खिलाफ हैं और सीखो का विभाजन करने के लिए किया जा रहा हैं | मुसलमान यह दलील देते हैं कि इस प्रकार कि भेद-रेखा खींचना कुरान के नियमो के खिलाफ हैं और मुसलमानों को कमजोर करने के लिए ऐसा किया गया हैं |
ये शिकायते और आपत्तियाँ चिंताजनक भी हैं और उत्साहवर्धक भी | धार्मिक विषय हमारी महासभा के कार्य क्षेत्र के बाहर हैं | हम किसी धर्म के सिद्धांतों पर चोट नहीं करते ; और हम ऐसा करे भी क्यों ? क्योंकि हमारा तो विशास है कि एक अच्छा मुसलमान , एक अच्छा हिन्दू , एक अच्छा सिख और एक अच्छा ईसाई , एक अच्छा इंसान , एक अच्छा पंजाबी , एक अच्छा हिंदुस्तानी , और एक अच्छा पड़ोसी भी होगा ! हम मजहबी राजनीति पर किसी बहस कि इजाजत नहीं देते | जाट महासभा शुद्ध राजनीति को भी टालती हैं | अपनी व्यक्तिगत हैसियत मे प्रत्येक जाट किसी भी तरह कि राजनीति का प्रचार करने और किसी भी सामाजिक संगठन का सदस्य बनने के लिए स्वतंत्र हैं | क्या यह हमारे प्रति अन्याय नहीं हैं कि इन हालातों मे भी कुछ लोग हम पर विभाजन पैदा कर के किन्ही धार्मिक संगठनो को कमजोर करने कि साजिश का आरोप लगाते हैं ? इस से अधिक अनुचित और क्या होगा ?
हम यह बात साफ कर देना चाहते हैं कि हम ऐसी किसी भी स्थिति मे कोई सम्झौता नहीं करेंगे जहा हिन्दू-मुसलमान -सिख और ईसाई , हमे पुश्तैनी दास मानते हो , अथवा दसो कि भांति हमारे साथ बर्ताव करे ! और न ही हम उन के इस तथाकथित अधिकार को मानेंगे कि वे -हिन्दू-सिख- मुसलमान-ईसाई-जाटों को पशु कि भांति किसी भी धार्मिक कार्यकर्म मे अथवा अन्य क्रिया-कलापों मे अपनी मर्जी के मुताबिक जब चाहे और जहा चाहे हांक ले जाये ! हम ऐसे धार्मिक आक्रमण को सहन नहीं करेंगे | हम अपने तौर अपने तरीके से सभी धर्मो और उन के गुरुओ पीर-पैगंबरों , ऋषि-मुनियो और देवी-देवताओ को सम्मान देते हैं |
जाति और धर्म के कारण भेद का बहाना : हिन्दू धर्म के सुधारक जैसे आर्य समाज ; और इसी प्रकार दूसरे भी , जैसे मुसलमान और सिख यह कहते हैं कि जातिवाद एक अभिशाप हैं , जिसे कबीला संस्था जीवित रखे हुए हैं ! इस बात को सभी मानेंगे कि जातिवाद और जन्म-भेद , जहा तक उन का संबंध धर्म और अध्यातम से हैं , बिलकुल भीन्न हैं | लेकिन हमे इन शब्दों के अर्थो को गंभीरता और बारीकी से समझने का प्रयास करना चाहिए | इस का अर्थ हैं कि कोई भी व्यक्ति किसी खास परिवार मे जन्म लेने से महान नहीं बन जाता ; और न ही जन्म के आधार पर किसी को स्वर्ग मे स्थान मिलने वाला हैं | इसी प्रकार यह बात भी नहीं हैं कि किसी खास धर्म या परिवार मे जन्म के आधार पर , आध्यात्मिक दर्ष्टिकोन से , स्वर्ग मे किसी को छोटा या बड़ा समझा जाएगा ! कर्मो कि गुणात्मक द्रष्टि से विवेचना कर के अच्छों को इनाम और बुरों को सजा मिलेगी ! यदि कोई यह कहे कि आध्यात्मिक क्षेत्र कि भांति ही सांसारिक मामलों मे भी पालन पोषण , जाति-खून निरर्थक और महत्वहीन हैं , और कि आध्यात्मिक क्षेत्र कि भांति ही दुनियावी मामलों मे भी लोगो को धर्म को छोड़ कर अन्य किसी भी आधार का वर्गीकर्त नहीं किया जा सकता , और कर्मो के अलावा और कोई संगत और सार्थक मापदंड नहीं हैं , तो यह बात ठीक नहीं लगती ! सांसारिक क्षेत्र मे परिवार , पालन-पोषण , विधत्ता , धन , अधिकार , दर्जा और प्रभाव ऐसे तत्व हैं जो किसी व्यक्ति के महत्व का निर्धारन करते हैं ! इसी प्रकार रक्त-संबंध और लालन-पालन बिलकुल स्वाभाविक बाते हैं , और कई बार ये ऐसे आध्यात्मिक गुणो को पैदा कर देते हैं जो वासत्व मे अद्भुत और सम्माननीय होते हैं |
यह कहना भी पूरी तरह गलत हैं कि जन्म और जाति के संबंधो को स्वीकार करना और इन्हे महत्व देना आध्यात्मिक अथवा धार्मिक मान्यताओ , मार्यदाओं, और आदेशो के विरुद्ध हैं | यूरोप के ईसाई समुदाय स्वयं को एंगेलों सैक्शन , जर्मन , नोर्दिंस , लैटिन्स आदि कहने मे कोई शर्म महसूस नहीं करते | एशिया के मुस्लिम समुदाए खुद को तुर्क , अरब और अफगान कहते हैं , परंतु इस प्रकार के कथनो के बारे किसी को कोई आपत्ति नहीं | उत्तर-पश्चिम सीमा पार के हमारे पड़ोसी बड़े गर्व से अपने को यासाफिञ्जय , और महासूद और वज़ीरी कहते हैं | अलीगढ़ के एक नौजवान ने मुझे बताया कि रसूल करीम बड़े गर्व से कहा करता था : ' मैं मोहम्मद हू; मैं अरब हू और मैं हाशमी भी हू ' |
यदि तुर्क और अफगान स्वयं को क्रमशः तुर्क और अफगान कहने से , गैर -मुसलमान नहीं हो जाते ; ब्राह्मण और खत्री स्वयं को ब्राह्मण और खत्री कहने से गैर हिन्दू नहीं बन जाते ; अहलुवालिया और रामगढ़िया स्वयं को क्रमशः अहलुवालिया और रामगढ़िया कहने से गैर -सिख नहीं बन जाते ; तो जाटों को , यदि वे स्वयं को जाट कहते हैं , इस्लाम विरोधी , सिख विरोधी अथवा वैधिक सिद्धांतों के विरोधी के रूप मे पेश करने का क्या औचित्य हैं ?
दूसरे लोग अपने नामों के साथ अपनी जातियों को उपनाम के रूप मे जोड़ते हैं , यथा , सैयद , कुरैशी , सिद्दीकी , अंसारी , शर्मा , नातन , वर्मा , सोढ़ी , बेदी , जेटली , चावला , चड्डा , बजाज आदि; और उन के विरुद्ध कोई फतवा अथवा धर्मादेश , हिन्दू , सिख , अथवा इस्लाम धर्म के नाम पर जारी नहीं किया जाता ! इसके विपरीत अगर कोई अपने आप को जाट कौम का बेटा कह देता हैं तो ऐसा लगता हैं मानो वह अपने धर्म से गिर गया हो | वह भ्रष्ट हो जाता हैं , और भगवान विरोधी बन जाता हैं ; और उसने बहुत बड़ा पाप कर दिया , उसे नरक मे फेंकना पड़ेगा ! धर्म के ये ठेकदार भी जाट सगठनों कि भर्त्सना और बदनामी करते हैं और उन्हे बुरी नजर से देखते हैं | यह क्या आध्यात्मवाद हुआ ? यह कैसा वैदिक संदेश हैं ? इस धर्मदेश या फतवा का क्या आधार हैं ? कितनी निरर्थक हैं ये दलील ! ये कैसा इंसाफ हुआ ?
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