Long Live The Vision if not the man.

samarkadian

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Ch Chottu Ram, your vision for the community is timeless.

Remembering you and your vision on your Birthday today.

Thank you for being there when it was needed most. The marod of Jat is because of you. You made us the owner of the land.

Great super power bless all of us so that anyone from the whole community could be a bit like your's ideas.

May the worst of our past would be the least of our future.

Cheers!
 
Ch Chottu Ram, your vision for the community is timeless.

Remembering you and your vision on your Birthday today.

Thank you for being there when it was needed most. The marod of Jat is because of you. You made us the owner of the land.

Great super power bless all of us so that anyone from the whole community could be a bit like your's ideas.

May the worst of our past would be the least of our future.

Cheers!

Salute to chaudhary saahab!

chaudhary sahib apna birthday basant panhcmi ko manaya karte the
 
जो गुड गवर्नेंस की बात करते हैं उन्हे तो एक बार सर छोटूराम को पढ़ लेना चाहिए .....
तेरे ही चर्चे हैं आज हर जगह ...
पाकिस्तान मे भी रहबर-ए-आज़म के चर्चे हैं ...
<span style="color: rgb(20, 24, 35); font-family: Helvetica, Arial, 'lucida grande', tahoma, verdana, arial, sans-serif; font-size: 14px; line-height: 19.3199996948242px;">
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-तुम शूद्र क्यों हों? छोटूराम पूछते।
-ऐसा ब्राह्मणों ने कहा है। शूद्र जवाब देते।
-उन्होंने तो हम जाटों को भी शूद्र कहा है। क्या हम उनकी सुनते हैं?
-धर्म में तो लिखा है कि हम शूद्र हैं। झुके हुए शूद्र चेहरे जवाब देते।
-उनके धर्म में तो ये भी लिखा है कि विधवा पुनर्विवाह पाप है। लेकिन जाट तो विधवा पुनर्विवाह करते हैं। वो तो नहीं मानते उनकी लिखी हुई बकवासें। छोटूराम कहते।
(शूद्र चुप रहते लेकिन आज हम जवाब जानते हैं। जाटों ने उस समय की ब्राह्मणवादी मानसिकता का सफलता पूर्वक सामना किया। क्योंकि वो संगठित थे, उनके पास ज़मीने भी थीं और वो आत्मनिर्भर भी थे। जबकि शूद्रों के साथ ऐसा नहीं था। ऐसा नहीं है कि जाटों को इसकी क़ीमत नहीं चुकानी पड़ी। उन्होंने चुकाई, अपना इतिहास और अपने नायक खोकर। ब्राह्मण लेखकों ने उन्हें गहरे दफ़ना दिया।) खैर.......

ये छोटूराम कौन थे?
२४ नवंबर १८८१ को एक किसान परिवार में पैदा हुए दीनबन्धु छोटूराम संभवत: देश के पहले समाजवादी चिंतक थे। जिन्होंने ताउम्र गरीब किसानों के हक़ की लड़ाई लड़ी। मुस्लिम और वैदिक धर्म की कट्टरता से वो एकसाथ लड़े। देशभर के किसान संघर्षों के वे एकमात्र नेता थे। लगान माफ़ी से लेकर जमींदारी प्रथा के उन्मूलन में, उन्होंने सार्थक और ठोस परिणाम दिये। मोहम्मद अली जिन्ना को पंजाब की धरती पर राजनैतिक शिकस्त देना उनकी एक बड़ी और क्रांतिकारी घटना थी। लेकिन जब जिन्ना की लौ बुझने की कगार पर थी, गाँधी ने उनसे मुंबई में मुलाकात कर जिन्ना के राजनैतिक जीवन को जीवनदान दे दिया, जो एक अखंड भारत के लिए श्राप साबित हुआ। वो अखंड भारत के लिए अन्तिम साँस तक लड़े। उन्होंने भीमराव अंबेड़कर की तरह जाटों में राजनैतिक चेतना और नवजागरण का संचार किया। मगर अफ़सोस की देश की आज़ादी के बाद मनुवादी सत्तातंत्र ने उनके इतिहास और कार्यों पर मिट्टी डालने का काम किया। जैसा कि वो पिछली हज़ारों शताब्दियों से करते आ रहे थे।
(हर प्रबुद्ध पाठक को दीनबन्धु छोटूराम को पढ़ना चाहिए और ख़ासकर उन पर लिखी सूरजमल सांगवान की पुस्तक -‘किसान संघर्ष तथा विद्रोह’)
 
चौधरी छोटूराम – हीरक जयंती

चौधरी छोटूराम का 61वा जन्म दिन प्रथम मार्च सन 1942 को जाट हाई स्कूल (रोहतक) के मैदान पर हीरक जयंती के रूप मे मनाया गया था | जिन महत्वपूर्ण लोगो ने इस मे भाग लिया उन मे भरतपुर के महाराजा सवाई बृजेन्द्र सिंह , सर सेठ छाजूराम और सभी धर्मावलम्बी जाट दो लाख से अधिक शामिल थे | उत्सव की अध्यक्षता पंजाब के प्रधान मंत्री सर सिकंदर हयात खां ने की | इकसठ हजार रूपये की राशि चौधरी साहब को भेंट की गई |
इस अवसर पर चौधरी छोटूराम द्वारा दिया गया भाषण .....

भाइयों और दोस्तों ,

आप मे से बहुतों ने - जैसा कि आप सोचते हैं - यूनियनिस्ट पार्टी द्वारा प्राप्त की गई उपलब्धियों में मेरे द्वारा अदा की गई भूमिका के लिए मेरी भूरी-भूरी , गुदगुदाने वाली प्रशंसा की हैं | मैं जब कि इन चापलूसी भरे उल्लेखों के लिए ह्रदय से आप का आभार व्यक्त करता हूँ , आप फौरन समझ जाएंगे कि मैं यहाँ दलगत राजनीति पर चर्चा प्रारम्भ करने का इच्छुक नहीं हूँ | यह एक ऐसा अवसर हैं जिस पर मैं-औचित्यपूर्ण ढंग से पिछले कुछ वर्षों में यूनियनिस्ट पार्टी द्वारा किया गए विशेष वैधानिक एवं प्रशासनिक उपायों , जिनके द्वारा - जैसा कि आप सोचते हैं - शोषित जनता को आर्थिक मुक्ति मिली हैं , लेकिन जिन के आस-पास इतना अधिक कटुतापूर्ण विवाद खड़ा हुआ हैं , और आज भी हो रहा हैं , के बचाव अथवा प्रशंसा में कुछ कह सकता हूँ ! किसी तरह , अगर मैं अपनी राजनीति के सहज एवं स्वाभाविक विकास का वर्णन करूँ तो-यह आप के लिए किसी भी भांति अरुचिकार नहीं होगा , और हो सकता हैं कि इस के द्वारा आप लोगो मुझे समझने मे मदद मिले |

मेरा जन्म और लालन - पालन देहाती परिवेश मे हुआ जिसमे मुझे देहाती जनता द्वारा झेली जा रही मुसीबतों , बाधाओं , दुख-तकलीफ़ों एवं कटु अनुभवो को निकटता और गहराई से देखने का मौका मिला | यह भीतरी अनुभव मेरे सम्पूर्ण मानसिक एवं नैतिक विकास के मार्ग को प्रभावित किए बिना नहीं रह सका | इसके साथ साथ इस मुद्दे पर निरंतर गहराई से चिंतन एवं कार्य करते रहने के कारण जाट जाति के लिए - जिसमे मैं जन्मा था - बेहद प्यार पैदा हो गया था | संकृत के एक श्लोक ने , जिसे मैंने सन 1897 में अपनी एक पाठ्य पुस्तक 'हितोपदेश' मे पढ़ा था , मेरे युवा दिल में उस उत्कट इच्छा का बीज बो दिया था , जो बाद के वर्षों मे स्व-जाति का शैक्षिक , सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक उत्थान करने के लिए एक उन्माद कि हद तक बढ़ गया | इस दोहे का साधारण हिन्दी मे अनुवाद इस तरह हैं - संसार परिवर्तनशील हैं | होना और मरना यहाँ एक सहज , स्वाभाविक एवं सामान्य प्रक्रिया हैं | कौन ऐसा हैं जो पैदा हो कर मरेगा नहीं , अथवा मर कर पैदा नहीं होगा ? परंतु वास्तव में जन्म लेना सार्थक उस का समझना चाहिए जिस के जन्म लेने से उस कि जाति-वंश का उत्थान हुआ हो |

दिल्ली में मेरे विध्यार्थी जीवन के सात वर्षों के दौरान मैं उच्च एवं सभ्य घरानों से आने वाले विध्यार्थियों के गहरे संपर्क मे आया | उन के साथ मेरे संबंध सदा मधुर रहे , परंतु मैत्रीपूर्ण हंसी मज़ाक के दौरान शहर के ये साथी देहात से आने वाले स्कूल और कालेज के अपने सहपाठियों के सदा ही अशिष्ट , गंवार , भांड , असभ्य और मूंढ के रूप मे देखते थे | जाटों के हिस्से में खास तौर से इन विशेषणों का बहुत बड़ा भाग आता था ! हालांकि ये विशेषण पूरी तरह से मज़ाक में , बिना दुख पहुंचाने की इच्छा के और किसी दुर्भावना के प्रयुक्त किए जाते थे , परंतु यह सोच लेना व्यर्थ होगा कि ये किसी भावना के गहरे तल से नहीं आते थे ! हालांकि ये देखने में साधारण और मासूमियत भरे लगते थे तो भी इन मे मेरी जाति के प्रति अपमान और तिरस्कार का भाव प्रवाहित हो रहा होता था ! हृदय विदारक खोज चलती रही और हितोपदेश के दोहे द्वारा मेरे हृदय मे रोपे गए बूटे को संपोषण प्रदान करती गई ! मैंने चार वर्षों से कुछ अधिक समय आगरा में बिताया (जून 1908 से सितंबर 1912) जहां मैंने कानून में स्नातक की परीक्षा पास की और वकालत शुरू की | उन चार वर्षों के दौरान मैंने आगरा और मेरठ संभागों की स्थानीय पारिस्थतियों का गहन अध्ययन किया | वहाँ से प्राप्त जानकारी ने जाटों की दशा सुधारने की दिशा में मेरे अन्तर्मन की आवाज़ पर कार्य करने की मेरी इच्छा को और बल प्रदान किया ! वास्तव में कुछ स्थानीय मित्रों के सहयोग से मैं कुछ कम महत्व के परंतु उपयोगी कार्यक्रम प्रारम्भ करने में सफल हुआ ; परंतु मुझे आश्चर्य हुआ कि संयुक्त प्रांत ( उत्तर प्रदेश ) आर्य प्रतिनिधि सभा ने मेरे सहयोगियों द्वारा किया जा रहे जातिय कल्याण के कार्यों पर प्रतिबंध लगाने कि मांग की | प्रतिनिधि सभा के इस कदम ने मेरे उत्साह को दोगुना कर दिया !

सन 1912 के पतझड़ में मैं रोहतक आ गया | आर्य समाज के उदभव और सरकार द्वारा किए जा रहे अनुचित दमनकारी कृत्यों , जो सन 1908 में शुरू हो गए थे और मेरे रोहतक आगमन के समय तक पूरी तरह बंद नहीं हुए थे , के कारण उत्साहित एवं उत्तेजित प्रगतिशील ताक़तें पहले से ही मौजूद थी और मार्ग-दर्शन एवं नेतृत्व का इंतजार कर रही थी | कट्टर कार्यकर्ताओं का एक दल , जिस मे उल्लेखनीय अपवाद के रूप में चौधरी लाल चंद और कुछ सेवानिवृत सेना अधिकारियों को छोड़ कर सभी आर्य समाजी थे , कार्य करने के लिए तैयार बैठे थे | आपस में सलाह-मशविरा करके जाटों को उन की घोर तंद्रा में से झिंझोड़ कर जगाने के लिए एक तेज अभियान शुरू किया गया | प्रत्युत्तर शानदार रहा | निहित स्वार्थों वाले लोगों ने शोषण और शिकार के अच्छे अवसर दूसरों के प्रदान कर रहे थे , उस को जगाने के प्रयासों का-संभावित और असंभावित दोनों दिशाओं से घोर विरोध हुआ !

हमारे प्रारम्भिक प्रयास अपनी जाति के सामाजिक , आर्थिक और शैक्षिक उत्थान की दिशा मे किए गए थे | लेकिन हम ने अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति भावना जागृत करने की अपनी इच्छा को भी छिपाकर नहीं रखा था और इस जागरण के स्थानीय राजनीतिक महत्व पर पर्याप्त ज़ोर दिया | हमारे इन प्रयासों को विफल करने , और एक जाति विशेष (जाट) को जो हरियाणा नामक भू-भाग की रीढ़ थी , इस औचित्यपूर्ण , प्रभावशाली स्थिति तक पहुंचाने से रोकने के लिए जो कोशिशें की गई , उन कोशिशों ने उस बलवती भावना को जिसका मूल संस्कृत के उक्त श्लोक में निहित था , पूरी तरह जीवन्त और ऊर्जापूर्ण बना दिया |

परंतु अपने जीवन के इस पड़ाव पर जबकि मैं मुख्यतया केवल जाटों के उत्थान के प्रति चिन्तित बना रहता था , मैंने एक तरह से अन्तः प्रेरणा द्वारा यह भी जान लिया था , कि पूरे पंजाब को निहित-स्वार्थों के वर्चस्व से बचाने के लिए , धर्म का लिहाज किए बिना , सभी कृषक जातियों को इकट्ठा करने के लिए काफी विस्तृत जाल फैलाना पड़ेगा | हिन्दू और मुसलमानों की सभी किसान जातियों का सहयोग लेने के कुछ छिट-पुट प्रयास किए गए | दुर्भाग्य से ये प्रभावहीन सिद्ध हुए जबकि जाटों (हिन्दू जाटों) को अलग-थलग कर देने की विरोधियों द्वारा कोशिशें की गई जिसके कारण प्रत्येक हाथ जाटों का विरोधी बन गया | परंतु कटु आलोचनाओं और घोर उतेजनापूर्ण विरोधी कार्यवाहियों के बावजूद के बावजूद हमने जाटों का हाथ अन्य सब के विरुद्ध उठवाने के प्रलोभन को रोके रखा !

पिछले महायुद्ध के भड़क उठने , और इसके चलते जाटों द्वारा दिये गए शानदार योगदान ने पूरे अम्बाला डिविजन में इनको अपनी स्थिति सुढृध करने में मदद दी |

यहाँ मैं अपनी सोच की एक और विशेषता का उल्लेख करना चाहूँगा | राजनीतिक पराधीनता और विदेशी शासन मेरे लिए उतने ही त्रासदायक थे जीतने किसी भी अन्य देशभक्त भारतीय के लिए ; और जैसे एक साधारण मनुष्य के लिए होने चाहिए | इसलिए मैंने सक्रिय रूप से स्वयं को कांग्रेस के साथ जोड़ लिया , और प्रथम जिला कांग्रेस कमेटी (रोहतक) का अध्यक्ष बन गया , और चार वर्षों तक जिले में उपलब्ध सीमित साधनों , सीमित मंच और मेरे द्वारा संचालित उर्दू साप्ताहिक ' जाट गज़ट ' द्वारा इसकी नीतियों का प्रचार करता रहा |

मैं यहाँ एक आंतरिक संघर्ष की ओर अवश्य संकेत करूंगा , जिसने मुझे चिन्तित एवं विचलित किया | शुरू में मैं एक कट्टर आर्यसमजी था , और स्वभावतः संप्रदायवादी भी ! धर्म और जाति से ऊपर उठकर पंजाब के जमींदारों का एक संयुक्त मोर्चा बनाने की मेरी इच्छा के साथ इस मजहब और जाति की भावना का टकराव हुआ | मैं निश्चित रूप से एक कट्टर जाट और कट्टर किसान था , और इस तरह एक साम्प्रदायकि भी ! राष्ट्रवादी होने के लिए घिसी-पीटी आवश्यकताओं और मान्यताओं के साथ इस का टकराव हुआ | मैं बाहर और भीतर दोनों तरह से कांग्रेसी था , और इसलिए सरकार विरोधी भी ! इसका ( कांग्रेसपने का ) मेरी इस मान्यता के साथ विरोध था कि एक पिछड़ा हुआ वर्ग और जिस वर्ग से मैं संबन्धित था यह निश्चय ही पिछड़ा हुआ था - सरकार के साथ लड़ाई गवारा नहीं कर सकता |

इस सब आंतरिक उथल-पुथल ने एक कठिन समस्या मेरे द्वारा समाधान किए जाने के लिए प्रस्तुत कर दी | लंबे और गहन चिंतन के बाद मैंने एक समाधान खोज लिया जो मेरे विचार से पूर्णतया संतोषजनक था | समाधान यह था ;

अ) ' मजहब को अवश्य ही राजनीति से अलग कर देना चाहिए और एक राजनीतिक संगठन को आर्थिक हितों के आधार पर चलना चाहिए ' | इसलिए मैंने धर्म को निजी जीवन में इस के उपयुक्त स्थान पर बदल कर आसीन करने का निर्णय कर लिया |

ब) ' मेरे मतानुसार निर्बलों की सेवा और गिरे हुओं को उठाना मानवीय कर्तव्यों का सार हैं | कृषक वर्ग सब से बड़ा हैं और फिर भी भारतीय समाज का सर्वाधिक निर्दयतापूर्वक शोषित हिस्सा हैं | ये कृषक जातियाँ कम से कम पंजाब में तो एक सुदृढ़ , सुगठित राजनीतिक संगठन को अस्तित्व में लाने के लिए तैयारशुदा मुद्दे उपलब्ध कराती हैं | यदि समान आर्थिक हितों वाले समाज के रूप में इन्हे संगठित किया जाए , तो पहले तो पंजाब मे , और फिर इसकी देखा-देखी पूरे भारत में सांप्रदायिक सदभाव पैदा हो सकेगा , और इस प्रकार इसको राजनीतिक मुक्ति की नींव राखी जा सकेगी | इस आधार पर इनका एक संगठन बनने से जाटों सहित दीन-दुखियों और दबे-कुचलों के सब से बड़े वर्ग के लिए सांझे लाभ सुरक्षित हो जाएंगे | इस प्रकार संगठित होने पर वे सभी शोषित-पीड़ित वर्गों के प्रहरी व नायक बन जाएंगे ! तार्किक दृष्टि के कृषक जातियों का संगठन सांप्रदायिक होगा फिर भी राष्ट्रवाद के हितों की रक्षा मेरे प्रिय 'वर्गवाद' के मुक़ाबले किसी भी तरह कम नहीं होगा |

स) परंतु इस जाति के लोगो को एक जाति के रूप में सारे के सारे -कांग्रेस के साथ जुडने के विरुद्ध चेताया जाये ; परंतु इस जाति के उन लोगों को जो शिक्षित हैं और अपनी राजनीतिक गतिविधियों की उलझनों-झंझटों और परिणामों को समझ सकते हैं , कांग्रेस में शामिल हो जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए | तर्क-वितर्क , वाद -विवाद की इस प्रक्रिया में चाहे दूसरों को यह रास न आए - मेरे भीतर उबल रहे लावे को शांत कर दिया | मैंने बहुत वर्षों तक इन्ही सिद्धांतों पर काम किया | बहुत से उन आर्य समाजियों से मेरे विचारों को गलत ढंग से समझा और विरोध किया , जो इन विचारों को मेरे द्वारा जाटों को हिन्दू समाज से अलग करने के लिए किया जा रहा एक प्रयास समझ बैठे थे ! अधिकारी वर्ग में कांग्रेस के साथ मेरे सम्बन्धों को लेकर मेरे प्रति काफी नाराजगी हुई , जबकि जमींदारों के संगठन की मेरी वकालत को उन पुराने कांग्रेसियों ने अविश्वास की भावना से देखा जो मुझे ठीक से नहीं समझते थे !

cont..
 
मैंने सन 1920 तक कांग्रेस में काम किया , जब इस के कलकत्ता सैशन में असहयोग आंदोलन को इस की आधिकारिक स्वीकृति मिली | महात्मा गांधी का आग्रह था कि उद्देश्य की सफलता के लिए असहयोग आंदोलन को व्यापक स्तर पर ले जाना होगा और इस को शुरू से आखिर तक न केवल कर्म से बल्कि मन और वचन से भी अहिंसक बनाए रखना होगा | कानून की अवहेलना , और करों की अदायगी न करना आंदोलन के दो मुख्य आधार थे | मैंने कभी नहीं माना , और कभी नहीं मन सकता , कि वास्तव में व्यापक स्तर पर चलाया जाने वाला असहयोग आंदोलन क्रियात्मक रूप से शांतिपूर्ण अथवा अहिंसक रह पाएगा ! मन और वचन से अहिंसा तो केवल देवताओं में ही संभव हो सकती हैं ; और हम सब जानते हैं कि आम लोगों कि भीड़ - और चाहे जो हो पर पर-देवमंडली नहीं कहीं जा सकती | मेरे विचार से कानून की अवहेलना करना , और करों की अदायगी करने से इंकार करना सशस्त्र विद्रोह के समान हैं और उन मौलिक सिद्धांतों पर सीधा कुठाराघात हैं जिन पर मानव - समाज का ढांचा टीका हुआ हैं | इस का अनिवार्य परिणाम रक्त-पात , हिंसा , अव्यवस्था और भटकाव हैं | आंदोलन का मूल आधार ही - जिस पर इस की आशाएँ और सफलताए आश्रित थी - मेरे मतानुसार , मेरी नम्रतापपूर्ण राय में इस तरह अस्वस्थ , अनुचित और सब मानवीय अनुभवों के विरुद्ध होने से , मैं इस परिणाम पर पहुंचा कि असहयोग आंदोलन एक निरर्थक , व्यर्थ का मामला हैं , और मैंने कांग्रेस से त्याग पत्र दे दिया |

इस प्रकार कांग्रेस से मेरा संबंध टूट गया | पहले तो राय बहादुर चौधरी लालचंद की मंत्री के रूप में नियुक्ति को लेकर , और बाद में उन की जगह मेरी नियुक्ति को लेकर , हमारे गैर-जमींदार हिन्दू भाइयों द्वारा अपनाए गए रवैये के कारण मेरा दृढ़ विश्वास और दृढ़ हो गया कि राजनीति में धर्म एक अवांछित गांठ हैं | पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1929 में अपने अध्यक्षीय भाषण में , या बाद को लाहौर में दिए गए किसी भाषण में कहा था कि राजनीति दस में से नौ भाग अर्थ शास्त्र में निहित हैं , यहीं मेरी राजनीति का भी मुख्य आधार हैं | वस्तुतः इस मान्यता में मेरा अडिग विश्वास हैं कि सांझे आर्थिक हितों की विवशता का बल ही अंततः सांप्रदायिकता के आकर्षण का प्रभावशाली इलाज हो सकता हैं | कृषि क़ानूनों पर विधान सभा में हुई बहसे जिन में सभी पूँजीपतियों ने धर्म और जाति से ऊपर उठकर इन क़ानूनों का डट कर , एक जुट होकर विरोध किया था , और व्यापारियों की हालिया हड़ताल , जिस में सभी व्यापारी राजी होकर शामिल हो गए , मेरी इस मान्यता की सत्यता का अंतिम सबूत हैं - यदि इसे किसी सबूत की जरूरत हैं तो !

कुछ ही देर पहले मैंने स्वीकार किया था कि मैंने अपना जीवन एक सांप्रदायिक के रूप में प्रारम्भ किया था | परंतु मेरी वेर्ग -भावनाए इतनी शक्तिशाली एवं विजयकारी सिद्ध हुई कि इन्होने मेरे संप्रदायवाद को पूरी तरह ग्रस लिया | सांप्रदायिकता के चिरकाल से पाँव जमाए हुए अंतिम चिन्ह भी , हिन्दू समाज के एक वर्ग विशेष , तथा इसके द्वारा संचालित एवं नियंत्रित प्रैस द्वारा , आम तौर से हिन्दू जमींदारों और खासतौर पर मेरे और हिन्दू जाटों के विरुद्ध छेड़े गए निंदापूर्ण , बदनाम करने वाले , मिथ्या और भ्रामक तथा कभी न थमने वाले दुष्प्रचार के परिणामस्वरूप , सन 1930 तक आते -आते पूरी तरह समाप्त हो गए थे | यह अभियान आज भी जारी हैं , और मैं , एक यूनियनिस्ट , किसी भी स्थान और किसी भी दिशा से बहकर आ रही अथवा आने वाली तूफानी हवाओं से टकर लेने के लिए छाती ताने लड़ा हूँ |

मैं अपने जीवन का एक और रहस्य खोल दूँ , जिस मार्ग पर चलना मैं अपना कर्त्तव्य -कर्म मानता हूँ उस मार्ग का दृढ़तापूर्वक अनुसरण करने में मुझे मुख्यतया इस दैवी विचार से शक्ति और प्रेरणा मिलती रही हैं , जिस को यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर कुरुक्षेत्र के प्रसिद्ध युद्ध-क्षेत्र में पाँच हजार वर्ष से भी अधिक पहले उदभाषित किया गया था |
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं :-
" तुम परितोष की किसी आशा अथवा दंड के भय के कारण अपने कर्त्तव्य पाठ से नहीं डिगोगे ; तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में हैं , इसके परिणाम पर नहीं ;
अपने कर्त्तव्य -पालन में तुम सुख दुख , लाभ हानि , जय-पराजय के प्रति उदासीन रहोगे " | गीता से दूसरे स्थान पर , पूरब के शायर -विचारक डॉक्टर सर मोहम्मद इकबाल द्वारा प्रचारित लचीला दर्शन मेरे मन में गहरा बैठ गया | मानवता को संबोन्धित करते हुए इकबाल कहता हैं :
: दृढ़ विश्वास , अथक परिश्रम और सब को जीत लेने वाला अनुराग , जीवन -युद्ध में वीरों के सच्चे शस्त्र हैं |
आत्मविश्वास और आत्मोत्थान के महत्व पर बल देते हुए डा. इकबाल कहते हैं :
" अपने व्यक्तित्व को इतनी अधिक ऊंचाइयों तक उठा लो कि भगवान को विवश होकर स्वयं तुम से पुछना पड़े - ' तुम क्या चाहते हो ?"
किसानो को संबोधित करते हुए पूरब का कवि कहता हैं :
" तुम हृदय की कमजोरी के शिकार क्यों बने हुए हो ? अपने अंदर झांक कर देखो , यहाँ तूफानों की ताकत छिपी पड़ी हैं |"

डा. इकबाल और भगवान कृष्ण की शिक्षाओं में मेरा गहरा विश्वास हैं | यही विश्वास मेरी राजनीति का निर्माण करता हैं | मैंने अपनी ही मान्यता के अनुसार गरीबों की सेवा करने और गिरे हुओं को उठाने का मार्ग चुना हैं ; और किसान वर्ग को कमजोरी का प्रतीक मान कर-सामाजिक उत्पीड़न और आर्थिक शोषण करने वाली ताकतों से बचाव और मुक्ति के लिए सेवा के अग्रणी पात्र के रूप में छांटा हैं | गरीबों और दलितों के प्रति मेरे प्यार को कोई , अन्य वर्गों अथवा किसी वर्ग -विशेष के प्रति मेरी दुर्भावना अथवा घृणा समझ लेने की भूल न करे | मुझ में किसी भी व्यक्ति अथवा वर्ग के विरुद्ध कोई दुर्भावना-द्वेष नहीं हैं, और मैं उन को क्षमा करने के लिए सदा तत्पर रहता हूँ , जो अनजाने में अथवा भ्रमवश मेरे प्रति दुर्भावना रखते हैं ! लेकिन इस का यह मतलब नहीं हैं कि मैं उन पर चोट करने के अपने अधिकार को छोड़ रहा हूँ , जो जान-बुझ कर , तथ्यों को पूरी तरह समझते हुए भी , मुझ पर चोट करना चाहते हैं !
अपनी बात समाप्त करने से पहले मैं यहाँ पर इकट्ठा हुए दोस्तों , खासतौर पर युवा पीढ़ी के लोगों के लिए , जिन के ऊपर हमारे देश का भविष्य निर्भर हैं , कुछ शिक्षाप्रद शब्द कहना चाहूँगा :-

अ) उस समय तक शांति से , निश्चलता से , गंभीरता से सोचते रहो जब तक तुम्हारा उद्देश्य तुम्हारे सामने प्रकट न हो जाए | जब उद्देश्य एक बार स्पष्ट रूप से निश्चित हो गया तो अपनी दृष्टि दृढ़तापूर्वक इस पर टीका कर कठिनाइयों से बिना विचले , पराजय से बिना निराश हुए, व्यवधानों से बिना डरे और विरोधियों के चिढ़ाने से बिना खिन्न हुए, इस का अनुसरण करो;

ब) धर्म को राजनीति से दूर रखो | धर्म (मजहब) निहित स्वार्थो वाले चालबाज लोगो द्वारा, आप को स्पष्ट एवं स्वतंत्र चिन्तन के मार्ग से दूर रखने के लिए आप को पिलाई जाने वाली वार्निश हैं – नशीली दावा हैं ;

स) बहुमत के निर्णय के आगे नतमस्तक हो जाओ – जैसे कि यह स्वेच्छा और स्वविवेक से किया गया आप का अपना फैसला हो ;

द) व्यक्ति के हितों को समाज के हितों से नीचे (दोयम दर्जे के) मानने का सुचारु ढंग से निरंतर अभ्यास करते रहो-जब तक यह एक स्थायी आदत न बन जाए ;

इ) एक बार दे दिये जाने पर नेता के आदेश का पालन बिना सवाल उठाए करो;

फ) यदि तुम किसी पिछड़ी जाति से हो तो किसी बाहर वाले का नेत्रत्व स्वीकार करने से दृढ़तापूर्वक इंकार कर दो | बाहर के लोगो के नेत्रत्व मे चलने वाले लोगो मे स्वतन्त्रता-प्रियता , स्वाभिमान , आत्म-गौरव, आत्म-सम्मान, स्वयं-सहायता का भाव और स्वावलम्बन आदि उन महान गुणों का विकास कभी नहीं हो सकता जो अकेले ही सफलता और प्रगति की कुंजी थामे हुए हैं |

(courtesy-सर छोटुराम : कथन एवं लेखन )
 
स्टूडेन्ट्स कान्फे्रंस
सन् 1934 के दिसम्बर महीने में 'अखिल भारतीय जाट स्टूडेन्ट्स कान्फे्रंस का आयोजन मास्टर रतनसिंह के संयोजकता में पिलानी कस्बे में किया गया। कॉलेज के विद्यार्थी तथा प्रोफसरों ने भारी परिश्रम किया। कॉन्फे्रंस का प्रधान सर छोटूराम को बनाया गया व कुंवर नेतराम सिंह स्वागताध्यक्ष थे। सर छोटूराम का जुलूस हाथी पर सज-धज के निकला जिसे देखने को सारा शहर उमड़ पड़ा। चौधरी रामसिंह, ठाकुर झम्मनसिंह, ठाकुर देशराज, सरदार हरलाल सिंह आदि गणमान्य व्यक्ति भी पधारे। विभिन्न प्रान्तों एवं देहातों से बड़ी तादाद में किसान शरीक हुए थे। इस सम्मेलन में युवाओं ने नई जान फूंक दी। सर छोटूराम ने उस वक्त यातायात के साधन ना होते हुए भी जगह-जगह घूमकर किसानों में जागृति पैदा की जिसे यह सामाज कभी भूल नहीं सकेगा। आज भी किसानी और किसान को बचाने के लिए युवावर्ग हिचकोले ले रहा है। अब वह दिन दूर नहीं कि किसान क्रांति आकर रहेगी।
 
युवा वर्ग व नारियों को उचित प्रतिनिधित्व
चौधरी छोटूराम ने युवावर्ग तथा महिलाओं को राजनीति में उचित स्थान दिया। वे कहते थे कि युवावर्ग तथा महिलाओं के बगैर राजनीति सारहीन है। प्रत्येक चुनावी वर्ष में उम्मीदवारों का बदलाव जरूरी है ताकि अन्य उम्मीदवारों को आने का मौका मिले। बार-बार एक ही व्यक्ति या एक ही परिवार के व्यक्तियों को उम्मीदवार बनाने से समाज में आक्रोश पैदा हो जाता है। जिस प्रकार फसलें फेर-बदल कर बोनी चाहिए, राजनीति भी इस सिद्धान्त से अछूती नहीं। योग्य तथा योग्यता के सिद्धान्त के आधार पर उम्मीदवारी तय की जाए। पढ़े-लिखे उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जाए। बदलाव करना नितान्त आवश्यक है।
 
जागीरदारी प्रथा - लगान वसूली व बेगारों में निर्दयता
रियासती काल में ठिकानें जागीरदारों के अधीन थे। जागीरदार उनसे अनेक प्रकार की श्रमसाध्य और जानलेवा बेगारें लेते थे। ये जागीरदार बड़े ही निरंकुश और अत्यन्त मनमानी करने वाले माने जाते थे। जागीरदार की मर्जी ही कानून था। यदि किसान से लगान वसूली नहीं होती तो किसान को पकड़कर ठिकाने के गढ़ या हवेली में लाया जाता और उसके साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया जाता था, जैसे - काठ में डाल देना, भूखा रखना आदि दण्ड - उपाय, जो एक जघन्य अपराधी के खिलाफ भी प्रयोग में नहीं लिए जाते थे। गरीब किसान के लिए यह अत्यंत लज्जाजनक किन्तु आक्रोश पैदा करने वाली स्थिति थी। इन सजाओं की कोई सीमा न थी, कोई कानून न था, कोई व्यवस्था न थी और कोई विधि-विधान भी न था। खड़ी खेती कटवा लेना, पशु खुलवाकर हांक ले जाना, घर-गृहस्थी के बर्तन, कपड़े लते उठा लेना और किसान की मुश्कें कसवा देना साधारण बात थी। दाढ़ी-मूछें उखाड़ लेना, भूमि से बेदखल कर देना कोई बड़ी बात न थी। किसान तथा उसके परिजनों को गोली का निशाना तक बनाया जाने लगा था। जागीरदार की हवेली में हाथ का पंखा दलितों से खिंचवाया जाता था और थोड़ी चूक करने पर अपशब्द बोले जाते थे।

सामाजिक दमन चक्र
सामाजिक दमन का चक्र कितना गम्भीर था, इसका अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ पिछड़ी जातियों के लोग वहां के सवर्ण जातियों के लोगों के सामने चारपाई पर नहीं बैठ सकते थे। उनके सामने पांचों कपड़े नहीं पहन सकते थे। यह लोग किसी तीर्थ में स्नान भी नहीं कर सकते थे। जागीरदार के घर बेटी पैदाहो गई तो एक मण अनाज की लाग किसान पर थी जिसे 'बाई जामती की लाग' कहते थे और लड़की की शादी होने तक हर साल गाजर, मूली, शकरकन्द की एक क्यारी किसान को देनी पड़ती थी। नाच-गानों का मेहनताना 5 सेर अनाज ढाढ़ी का व 5 सेर भगतण को किसान को ही देना पड़ता था।

जुते पैरों से नहीं निकालने दुंगा-
वर्ष 1941 में चैधरी साहब शेखावटी के मंडावा कस्बे में आए हुए थे। जागीरदार की हवेली के सामने से किसानों के साथ जा रहे थे। तभी सभी किसानों ने अपनी जुतियां पैरों से निकालकर हाथों में ले ली। चै0 छोटुराम के पूछने पर बताया कि यदि ऐसा नहीं करेंगें तो जागीरदार के लठैत हमें मार देगें। तब पूरी भीड़ में चैधरी साहब ने जागीरदार को ललकारा और कहा कि आज ये जुतियां मै मेरे किसान भाईयों को पहना कर जा रहा हूॅं अगर किसी ने छटी का दूध पिया है और किसी की मां ने अजवायण खाई है तो आज के बाद इनके पैरों से जुतियां निकलवा कर दिखाए। तब से लेकर आजतक किसानों की जुतियां निकलवाने की हिम्मत किसी ने नही की। अतः किसान भाईयों ध्यान रखना आज जो जुतियां आपके पैरों में है ये दीनबन्धु सर छोटुराम जी की पहनाई हुई है।
 
'कतरन लाग से नाइयों तथा नायकों को मुक्ति

नायक तथा बावरी जातियां भेड़-बकरियां पालती थी। भेड़-बकरियों के बाल तथा ऊन कतरने पर ठिकानों ने 'कतरन लाग लगा रखी थी। इसी प्रकार नाइयों द्वारा बाल काटने का धन्धा करने पर इस कतरन लाग का भुगतान करना पड़ता था। सर छोटूराम ने 26 जुलाई 1941 को मारवाड़ के गांव रतनकुडिय़ा तथा पहाड़सर में भेड़-बकरी पालकों को इक्ट्ठा कर 'कतरन लाग के विरूद्ध प्रदर्शन कर इस 'कतरन लाग से इन्हें मुक्ति दिलाई।
 
'बुनकर लाग का उन्मूलन कर बुनकरों को राहत

बुनकर जो अधिकतर जुलाहे मेघवाल समाज से होते थे जो डेवटी की रजाई का कपड़ा, खेस, चादर तथा मोटा कपड़ा रोजी रोटी कमाने के लिए बुनकर बेचते थे। सूत गृहणियां कातकर उन्हें देती थी और वे उस सूत से उनकी इच्छानुसार वस्तुएं बुनकर दे देते थे। शेखावाटी तथा मारवाड़ और विशेषतौर पर जयपुर, पाली तथा बालोतरा में यह काम जोरों पर था। ठिकानेदारों न इस काम पर 'बुनकर लाग रखा रखी थी। जिसका विरोध 4 वर्षों तक सन् 1937 से 1941 तक सर छोटूराम ने अपनी अगुवाई में करके समाप्त कराया। बालोतरा में 9 अगस्त 1941 को ठिकानेदारों ने जुलाहों के घरों को लाग नहीं देने पर आग लगा दी जिससे सारा कपड़ा जल गया। सर छोटूराम वहां गए और 8 दिन भूख हड़ताल की तब जाकर जोधपुर के राजा का सन्देश आया कि यह लाग समाप्त कर दी गई है। सर छोटूराम ने 28 मेघवाल परिवारों को नुकसान की भरपाई के लिए रु. 1500/- प्रत्येक परिवार को राजा से दिलवाने की मांग पर अड़ गए। तीन दिन बाद राजा ने प्रत्येक परिवार को रु. 1500/- देने की घोषणा की। ऐसे संघर्ष सर छोटूराम ने मंत्री पद पर रहते हुए किसानों और दलितों की भलाई के लिए किए जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता।
 
राजपुताना में कुम्हारों पर लगी 'चाक लाग' को समाप्त कराया

दीनबन्धु सर छोटूराम ने राजपुताने के राजाओं तथा ठिकानेदारों द्वारा कुम्हारों के घड़े व मिट्टी के बर्तन बनाकर बेचने पर 'चाक लाग लगा रखी थी जो रु. 5/- वार्षिक अदा करनी पड़ती थी। राजाओं का कहना था कि जिस मिट्टी से कुम्हार बर्तन व घड़े बनाकर बेचते हैं वह मिट्टी राजाओं की जमीन की है, इसलिए यह लाग देनी पड़ेगी। सर छोटूराम ने 5 जुलाई 1941 को बीकानेर में कुम्हारों को इक्ट्ठा कर महाराजा गंगासिंह से बातचीत कर इन्हें इस 'चाक लाग से मुक्ति दिलाई। कुम्हारों ने खुश होकर सर छोटूराम को एक सुन्दर 'सुराही' जिसमें पानी ठण्डा रहता हैं भेंटकर सम्मान किया। सर छोटूराम ने मरते दम तक वह सुराही अपने पास रखी।
 
सर छोटू राम हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। वर्ष 1944 में उन्होंने मुस्लिम बाहुल क्षेत्र लायलपुर अब फैसलाबाद में मुल्लओं और डिप्टी कमीश्नर के विरोध के बावजूद बड़ी रैली करने में सफलता हासिल की। इस रैली में 50,000 के करीब लोगों ने हिस्सा लिया। सर छोटू राम उस वक्त तो इस बँटवारे टाल गए लेकिन राष्ट्र विरोधी ताकते एक अलग इस्लामिक देश - पाकिस्तान के गठन में कामयाब हो गई और राष्ट्र का विभाजन 1947 में हो गया। चौधरी साहब बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहते थे ‘हम मौत पंसद करते हैं, विभाजन नहीं।’ सर छोटूराम ने किसान के बेटे की शिक्षा पर बल दिया। उन्होंने जाट गजटियर पत्रिका का प्रकाशन कर किसान-मजदूर के लिए शिक्षा का अभियान चलाया। गुरुकुल और जाट शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करवाई। उनकी सहायता से शिक्षा ग्रहण पाने वालों में दलित वर्ग से पूर्व केंद्रीय मंत्री चौ. चांदराम और पाक के नोबेल पुरूस्कार विजेता अब्दुस सलाम उल्लेखनीय हैं। नोबेल पुरस्कार मिलने पर अब्दुस सलाम ने कहा था कि ‘अगर सर छोटूराम ना होते तो अब्दुस सलाम इस मुकाम पर ना होते।’ सर छोटूराम की प्रतिभा को हमें आज के संदर्भ में देखना-समझना है। जब तक उनकी विचारधारा युवा वर्ग में जागृत नहीं होगी तब तक उनकी ग्रामीण क्रांति पूर्ण नहीं हो सकती । सर छोटू राम का सफर इतना आसान नहीं था। एक मध्यम किसान परिवार में जन्मे बच्चे के दिल में एक साहूकार से पिता को बे-इज्जत होते देख जो भावना पैदा हुई वह प्रतिशोध नहीं कुछ कर गुजरने की ललक थी। अपनी मेहनत और बुद्धि की बदोलत उन्होंने सैंट स्टीफन कॉलेज दिल्ली से स्नातक की डिग्री हासिल की।
 
सन 1935 का विधेयक

सन 1935 की प्रांतीय स्वायत्तता के अधीन समाज मे बहुत से परिवर्तन हुए | लोकतान्त्रिक संस्थाओं को पोषित एंव प्रोत्साहित किया जाना था | चुनने और कार्य करने की स्वतन्त्रता पर अपेक्षाकृत अधिक ज़ोर दिया दिया गया था | मान्यताओं और दृष्टिकोणों मे बदलाव के साथ ही पंचायतों की कार्य प्रणाली की संभावनाओं मे भी परिवर्तन आना जरूरी था | अतः एक नया कानून पेश किया गया और स्वयं चौधरी छोटूराम ने पंजाब के विकास मंत्री के तौर पर इसका समर्थन किया | लीक से हटकर एक नई बात यह थी कि अछूतो को भी मताधिकार दिया गया | नए कानून के तहत पंचायतों को सौपे गए कार्य इस प्रकार थे :-
1) अफीम के , खाने मे प्रयोग , मदिरा पान , वेश्यावृति , दहेज , धर्म के नाम पर भिक्षावृति , बाल-विवाह , साम्प्रदायिक एवं धार्मिक आडंबर आदि सामाजिक बुराइयों पर रोक लगा कर सभी वर्गों एवं जातियों का समुचित उत्थान सुनिश्चित करना |
2) प्रोढ़ शिक्षा को प्रोत्साहन देना |
3) लड़कियों की शिक्षा की समुचित व्यवस्था करना |
4) अछूतो को , उन के लिए नए कुएं बनवा कर , अथवा सांझे कुओं को इस्तेमाल करके का अधिकार देने और मंदिरों आदि में प्रवेश की इजाजत देने के द्वारा समाज में समान स्तर प्रदान करने की कोशिश करना |
5) ग्रामीणों से स्वैच्छिक सेवाएँ लेकर सड़कों के निर्माण के लिए सरकार से अनुदान प्राप्त करना |
6) अच्छी नस्ल के सांडों की व्यवस्था करना |
7) छोटे-मोटे विवादों को सुलझाने के लिए न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करना |
8) पशु-पालन को प्रोत्साहन देना |
9) खाद के गढ़ो का प्रबंध करना |
10) खुर की बीमारियों से ग्रस्त पशुओं के लिए हौज बनवाना जहां ऐसे पशुओं को दवाई मिश्रित पानी से नहलाया जा सके |
11) चूल्हा टैक्स लगाना और इस प्रकार जमा किए गए धन को सांझे हितों के लिए इस्तेमाल करना |
12) जो लोग उद्योग को पेशे के रूप मे अपनाना चाहें उन के लिए कुटीर एवं लघु उद्योग लगाने मे उद्योग विभाग की सहायता करना |
13) प्राथमिक शिक्षा की अनिवार्यता को सुनिश्चित करना |
14) अपराधियों को पकड़ने मे पुलिस की मदद करना |
15) उनके विभाग से संबन्धित सभी मामलों में राजस्व अधिकारियों की सहायता करना |
 
किसान के नाम --- छोटूराम का पैगाम
चौधरी छोटूराम का विश्वास था की किसानो के हितों की रक्षा करने वाले कानून बना कर उनको बहुत राहत पहुंचाई जा सकती हैं | किन्तु उनके कष्टो का पूरी तरह से निराकरण तभी हो सकता हैं जब वे अपना व्यवहार और द्रष्टिकोण बदले | उसके लिए किसान की रूढ़िवादिता से खिन्न होकर तथा उसे बदलने की प्रेरणा देते हुए चौ छोटूराम ने कहा था – “ किसान क्या हैं ? पुरानी सभ्यता की यादगार हैं , पुरानी संस्कृति का एक अवशेष हैं | समुंद्री जहाज , रेल, तार , बेतार, हवाई जहाज आदि , वैज्ञानिक आविष्कारों ने पृथ्वी की दूरियों को समेत दिया , समुन्द्र की तह मे और आकाश की गहराइयों मे विनाशकरी हथियारों की पहुँच का विस्मयकारी प्रमाण प्रस्तुत हैं , पर किसान हैं जो कि अपनी चाल नहीं बदलता | जमाना बदला , राज्य बदला हालात बदले और पड़ौसी बदले , अगर कोई नहीं बदला तो किसान | वही हल , वैसे गाड़ी वहीं रहट और कोल्हू , वही कस्सी और वही खुरपा |
वे चाहते थे कि किसान जमाने के साथ बदले | नई हवा को पहचाने और संगठित होकर अपने अधिकारों कि लड़ाई लड़े | शहरी लोग संगठित हैं इसी लिए वे सरकार से सारी सुविधाए हासिल कर लेते हैं और किसान असंगठित होकर शोषण का शिकार होता रहता हैं | उन्होने लिखा हैं –
“ यदि शहर वालों को थोड़ी-सी तकलीफ होती हैं आसमान सिर पर उठा लेते हैं , अखबारों मे शोर मच जाता हैं , प्लेटफार्मो मे धुआंधार भाषण होने लगते हैं | इससे सरकार का इंद्रासन हिल उठता हैं और तुरंत शिकायतों को चाहे वे बनावटी ही क्यों न हों , इंतजाम किया जाता हैं , उनकी दिलजोई करने के उपाय ढूँढे जाते हैं | पर हाय रे किस्मत | किसान भूखा हैं , कर्जे के बोझ से इसकी कमर टूटी जा रही हैं , लेकिन इसकी तरफ कोई ध्यान देने की तकलीफ गवारा करने के लिए तैयार ही नहीं |”
ऐसी स्थिति देखर चौ छोटूराम ने किसान को कहा था –
“ क्या तूने कभी सोचा हैं कि तेरी इस कदर बेकदरी क्यों हैं ? तू इस कदर गरीब कि हालत मे क्यों हैं ? बतलाऊ ? तूने अपनी शक्ति को नहीं पहचाना | तूने अपने सामर्थ्य से काम नहीं लिया | तूने आज तक अपने आपको कमजोर और हीन समझा हैं | दूसरे भी तुझे ऐसा ही समझ रहे हैं | तू उठ , अपने को संगठित कर, अपनी शक्ति को पहचान और हीन तथा निर्बल भावना से अपना दामन छुड़ा | फिर देख क्या होता हैं
 
अखिल भारतीय जाट महासभा के लायलपुर अधिवेशन मे 9 अप्रैल 1944 को चौधरी छोटूराम ने एक ऐतिहासिक भाषण दिया था , और जाट गज़ट मे इसे शब्दाश: प्रकाशित किया गया था | चौधरी साहब का उस वक़्त का यह भाषण आज के माहौल मे सभी धर्मो के जाटों के लिए एक सबक हैं | यह थोड़ा लंबा जरूर हैं पर सभी जाट भाइयो से अनुरोध हैं की एक बार इसे जरूर पढे और इस पर सोच विचार करे की हम उस महान आत्मा की विचारधारा पर कितना अमल कर रहे हैं | चौधरी छोटूराम के इस भाषण मे पूरी जाट कौम की तरक्की का मंत्र हैं | कुछ लोगो का मानना हैं अब जमाना बदल गया हैं परंतु इस भाषण को पढ़ने से और आज के हालत को देखते हुए तो ऐसा लगता हैं कि हम आज भी उसी मोड़ पर खड़े हैं |

भाइयों , दोस्तों

' हम एक ऐसे नाजुक दौर से गुजर रहे हैं कि हमें अपनी गतिविधियों एवं भाषणों मे बहुत सावधानी बरतनी चाहिए | इस मौके पर यदि हम कोई गलत कदम उठा लेते हैं तो हमारे आंदोलन को अपूरणीय क्षति पहुँच सकती हैं | हमारे द्वारा बोला जाने वाला हर शब्द उचित एवं संतुलित होना चाहिए | हमारे विरोधियों और आलोचकों की कमी नहीं हैं | वे हमारे कथनों की व्याख्या अपनी सहूलियत के मुताबिक ऐसे तरीके से करेंगे कि हमारे उद्देश्यों को नुकसान हो और हमारे विरुद्ध हर प्रकार का भ्रामक प्रचार किया जा सके | इसलिए मैं काफी सोच-समझकर , और पूरी जिम्मेवारी के साथ , पंजाब , भारत और पूरी दुनिया को दृष्टि मे रखकर बोलने जा रहा हूँ |

सर्व प्रथम मैं जाट आंदोलन के उद्देश्यों , कार्यकर्मों और कार्यक्षेत्र के विषय में बताना चाहता हूँ | बहुत से भ्रम हैं , और बहुत सी शंकाए पैदा कर दी गई हैं , और हमारे विरुद्ध मिथ्या प्रचार किया जा रहा हैं | जान - बूझकर अथवा अंजाने मे उल्टी और बेहूदा आलोचनाए की गई हैं जिसके कारण गैर-जाट समुदाए में या तो भ्रम पैदा हो गया हैं , या हो सकता हैं कि उन के द्वारा पैदा कर दिया गया हैं |

जाट महासभा की स्थापना सन 1905 में हुई थी | मैं इस के अस्तित्व मे आने के समय से ही इस का सदस्य चला आ रहा हूँ | इसकी गतिविधिया मुख्यता संयुक्त प्रांत (यू.पी) के उत्तरी -पश्चिमी जिलों , पंजाब के दक्षिणी -पूर्वी जिलों और किसी सीमा तक राजपूताना के उत्तरी-पूर्वी राज्यों तक सीमित हैं | पिछले कुछ वर्षों से इसे पंजाब के मध्यवर्ती जिलों में जाना जाने लगा हैं | पिछले वर्ष सभा के लाहौर अधिवेशन में पंजाब के लिए एक प्रांतीय महासभा की स्थापना करने का निर्णय लिया गया था , और इसका कार्य बिलकुल संतोषजनक रहा हैं | लाहौर चूंकि पंजाब की राजधानी हैं , और वहाँ से कई अखबार निकलते हैं , इसलिए प्रायः अनजाने में ही इन समाचार पत्रों के माध्यम से जाट महासभा को काफी प्रचार मिला हैं |

भारत में जाटों की कुल जनसंख्या डेढ़ करोड़ (1941) से अधिक हैं , और यह मुख्यता भारत के उत्तर-पश्चिम भाग मे इकट्ठी हैं | इन में से एक बड़ी संख्या हिन्दू जाटों की हैं | सिख और मुसलमान जाटों की संख्या भी काफी बड़ी हैं | कुछ हजार ईसाई जाट भी हैं | अधिकतर जाट देहाती क्षेत्रों मे बसे हुए हैं और भूमि जोत पर आश्रित हैं | शैक्षणिक सुविधाए , व्यापारिक एवं औधोगिक गरीविधियाँ शहरों और कस्बों मे केन्द्रित हैं ; इसलिए शिक्षा और आर्थिक पिछड़े हुए हैं | परिणामतः शिक्षा और धन से उनका सामाजिक स्तर भी नीचा हैं | जाट बहुत सी बुराइयों के भी शिकार हो रहे हैं | यदि किसी कौम के पास शिक्षा और धन का अभाव हो और इसका सामाजिक स्तर भी नीचे धंस गया हो , तो इसके राजनीतिक स्तर और महत्व का वर्णन करने की बजाए कल्पना कर लेना ही अच्छा होगा | यह वास्तव मे ही आश्चर्य की बात हैं कि पंजाब में जाटों की संख्या पूरे भारत की कुल जाट आबादी के आधे से भी ज्यादा हैं , परंतु यहाँ उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हैं | इन की आबादी के एक छोटे से भाग को छोडकर वे भिन्न भिन्न नाम की जोतों (जमाईं) के स्वामी हैं | प्रत्येक फसल की कटाई के बाद वे करोड़ो रुपया भूमिकर और सिंचाई कर के रूप मे सरकार के देते हैं | प्रत्येक जिले से हजारों की संख्या मे जाट सेना मे भर्ती हैं | इन में लाखों की संख्या में इस विश्व-महायुद्ध के दौरान (1939-45) सेना मे गए हैं | उन्होने शोर्य , पराक्रम और बलिदान का ऐसा शानदार प्रदर्शन किया हैं जिस पर दुनिया भर की सर्वाधिक बहादुर कौम भी गर्व करे | लेकिन इस सब के बावजूद जाटों के विषय में कोई नहीं सोचता हैं किसी को भी इन की चिंता नहीं हैं ! दूसरी जातियों के लोग , जिन की संख्या नगण्य सी हैं इनकी वीरता और बलिदान का फल भोग रहे हैं | इन के (जाटों के) दम पर लाभान्वित होने वाले ये लोग कभी ही देश के लिए कोई आर्थिक या सैनिक योगदान देते होंगे , परंतु क्योंकि ये शहरों मे बसते हैं इस कारण शिक्षा के क्षेत्र मे उन्नति कर गए और अफसर बन गए हैं | जाटों के शोर्य और बलिदानों का आकलन तमगों (मेडल्स) के आधार पर अच्छी तरह से किया जा सकता हैं | भारतियों को दिये गए सात विक्टोरिया क्रासों ( सर्वोच्च सैनिक सम्मान ) मे से तीन पंजाबियों ने जीते हैं , और ये सभी ( तीनों ) जाट हैं | इन मे से सूबेदार रिछपाल और छैलूराम वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गए | इस जिले का हवलदार प्रकाश सिंह जीवित हैं | एक भारतीय को दिया गया डी.एस.ओ का एक मात्र तमगा कैप्टन मेहर सिंह पुत्र सरदार त्रिलोक सिंह ने जीता हैं जो इसी जिले का जाट हैं | वे लोग , जिन की कौम को कोई श्रेय प्राप्त नहीं हैं , परंतु मजहब-हिन्दू , मुसलमान , सिख , ईसाई के नाम पर दूसरों की सेवाओं का फल चखने के आदि हो गए हैं , किसी दूसरी कौम की पहचान बनने देना नहीं चाहते ! वे केवल यह चाहते हैं कि इन धर्मो मे आने वाली बड़ी कौमो के त्याग और बलिदान का लाभ वे अकेले ही लेते रहे-डकारते रहे ! उन के द्रष्टिकोण से इस से अच्छा कुछ नहीं कि अपने आप थोड़ी सी भी तकलीफ उठाए बिना अथवा प्रयत्न और त्याग - बलिदान किए बिना सारे लाभों को वे ही भोगते रहे ! यद्द्पि पंजाब के जाटों की सामाजिक और शैक्षिक स्थिति अन्य प्रान्तों मे बसने वाले जाटों की अपेक्षा थोड़ी से बेहतर हैं , परंतु जो स्तर काफी पहले प्राप्त कर लेना चाहिए था उस से अब भी काफी नीचे हैं | ' पंजाब जाट महासभा ' की स्थापना जाटों की स्थिति मे सुधार लाने के लिए की गई थी | इस की बहुत सारी गतिविधियों मे लाहौर से एक दैनिक अखबार निकालना शामिल करने का निर्णय लिया गया हैं | इसकी जानकारी मिलते ही हमारे बहुत सारे भाई विचलित हो गए हैं और अपना मानसिक संतुलन एवं शांति खो बैठे हैं ! वे बहुत चिंतित हैं ! इन भाइयों के चैन के लिए मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि जाट महासभा के उद्देश्यों मे ऐसा कुछ भी नहीं हैं जिस से इन को नुकसान पहुचता हो ! हम जाटों की सामाजिक-आर्थिक दशा सुधारना चाहते हैं | हमारा उन की धार्मिक राजनीति से कुछ लेना देना नहीं हैं | हमारे जलसों के मंचों पर धार्मिक बहस को कोई जगह नहीं मिलेगी | हम स्वयं को इस तरह की राजनीति मे नहीं उलझाएंगे | हम राजनीतिक मामलों मे केवल इस हद तक संबंध रखेंगे कि हिन्दू , मुसलमान , सिख और इसाइयों के नाम पर जो भी विशेषाधिकार दिये जाते हैं उन मे जाटों को उन का उचित हिस्सा अवश्य मिले | हिस्से से थोड़ा कम मे भी हम चला लेंगे | यदि कोई राजनेता हमारे हितों की रक्षा का आश्वासन दे दे , या जाटों के लिए निर्धारित ( आरक्षित ) किसी उच्च पद पर किसी उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति की नियुक्ति कर दी जाती हैं तो हम सहन कर लेंगे ; लेकिन यदि हर मामले मे , हर बार अयोग्य व्यक्ति जाट समुदाय के अधिकारों का अतिक्रमण करते रहे तो स्वाभाविक हैं कि हमे शिकायत होगी !

हम आर्थिक सांझा हितों की राजनीति से नहीं डिगेंगे | उदाहरण के लिए , मूल्यों पर नियंत्रण का मामला , आवश्यक उपजों को पंजाब अथवा देश से बाहर भेजने पर पाबंदी का मामला , प्रान्त के उद्योगो और व्यापार में हिस्सेदारी , कृषि उपजों के लाने ले जाने पर चुंगी महसूल आदि ये सब आर्थिक सवाल हैं , परंतु इन सब का राजनीतिक महत्व भी हैं | लेकिन ये सब सवाल अपने स्वरूप मे ऐसे हैं कि कोई भी कृषक जाति इन के ऊपर जाटों से मतभेद नहीं करेगी |

हम दूसरों के धार्मिक संगठनो मे कभी हस्तक्षेप नहीं करेंगे ; लेकिन हम इस बात को खुशी से स्वीकार करते हैं कि जब तक भारत के संविधान ( भारत संबंधी अङ्ग्रेज़ी कानून , भारत विधेयक 1935 ) के तहत राजनीतिक अधिकारों का बंटवारा मजहबों पर आधारित , हर धर्म के लोगो को धार्मिक आधार पर संगठित होने और अपने संगठनो को मजबूत करने का अधिकार हैं | क्योंकि कोई भी समुदाए जो इस तरह संगठित नहीं होगा वह घाटे मे रहेगा | हमारे जाट समुदाए मे हर व्यक्ति कि छूट होगी कि चाहे वह कांग्रेस मे शामिल हो जाए अथवा हिन्दू महासभा , अकाली दल , लिबरल फ़ैडरेशन या इंडियन क्रिश्चियन एशोसिएशन मे अपने विश्वास और अपनी मान्यता के अनुसार इन मे से किसी मे शामिल हो जाए | अपनी व्यक्तिगत हैसियत मे वह पाकिस्तान कि मांग कर सकता हैं ; या भारत की एकता व अखंडता के लिए प्रचार कर सकता हैं अथवा पूर्ण स्व-शासन की मांग कर सकता हैं ; परंतु कोई भी इन बातों का विरोध अथवा समर्थन जाट महासभा के मंच से नहीं कर सकेगा |

हमने ( जाट महासभा ने ) राजनीति से अलग रहने का निर्णय इसलिए नहीं लिया हैं , क्योंकि हमारे लिए इन मुद्दो का महत्व नहीं हैं ; इस लिए भी नहीं कि हम किसी ताकत से भय खाते हैं , बल्कि इसलिए लिया हैं कि इस के दो खास कारण हैं | पहला यह कि राजनीति के क्षेत्र मे काम करने वाले असीमित साधनो वाले दूसरे संगठन हैं | जाटों के पास साधन सीमित हैं , जिन को जाटों के आर्थिक , शैक्षिक और सामाजिक स्तर को दूसरी प्रगतिशील जातियों के स्तर के समानान्तर लाने के कार्यों पर खर्च किया जाना चाहिए | उचित शिक्षा प्राप्त कर लेने पर वे जिस किसी भी पार्टी मे जाएंगे , उस पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ समानता के दर्जे और टीम-भावना से कार्य कर सकेंगे | एक गरीब अशिक्षित जाट को किसी भी पार्टी मे कोई सम्मान अथवा पद नहीं मिलेगा | वह तो केवल एक संदेशवाहक छोकरा या नेताओं का व्यक्तिगत नौकर बन कर वह रहेगा ! दूसरे आम राजनीति मे सभी जाटों का मतैक्य नहीं हैं , और न ही सकना स्वाभाविक एवं संभव ही हैं | यहाँ बीरदारी के मंच से उन्हे राजनीतिक चर्चा करने की इजाजत देने से आपसी झगड़े होंगे | हमारा जाट महासभा के मंच को केवल आर्थिक , शैक्षिक और सामाजिक उत्थान के मुद्दो पर चर्चा तक सीमित रखने का यही कारण हैं |

जाट महासभा का किसी दूसरी कौम से कोई विवाद या टकराव नहीं हैं | हमारे आंदोलन का केवल मात्र उद्देश्य अपनी बीरदारी के आर्थिक शैक्षिक एवं सामाजिक उत्थान करने की दिशा मे रचनात्मक एवं ठोस उपाय करना हैं | हमें आम तौर पर सभी समुदयों और जातियों के साथ सहयोग कर के काम करना हैं ; और शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की नीति के बावजूद यदि कोई हमारे प्रति दुर्भावना रखे तो दोष हमारा नहीं हैं ! हम दूसरी जातियों के साथ उस हद तक सहयोग करेंगे , जहा तक करना मनुष्य के लिए संभव हैं | हम सब के प्रति प्यार-प्रेम बनाए रखेंगे | हम सांप्रदायिक सदभाव की प्राप्ति के लिए सदा प्रयत्नशील रहेंगे | हम पारस्परिक विद्वेष , घृणा और तनाव के मूल कारणो को समाप्त करने की शिक्षा मे प्रयासरत रहेंगे | यदि इस सब के बावजूद कोई हमारी कौम को ज़ोर ज़बरदस्ती , बिना उचित कारणों के कुचलने की कोशिश करेगा तो हम अपना बचाव करने के लिए मजबूर होंगे , वह भी उस हद तक जहां तक आत्मरक्षा के लिए आवश्यक होगा |


contd...
 
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जाटों को ही क्यों आतंकित और परेशान किया जाए ! पंजाब मे सभी समुदायों , जैसे ब्राह्मण , खत्री , शिया , सुन्नी , आरोड़े , अग्रवाल , महाजन , कायस्थ , कुरैशी , अरई, अवन, सैयद , मोमिन और भी न जाने कितनों के अपने अलग जातिय सम्मेलन होते रहते हैं | राजपूत , गुजर ,सैनी ,लबाना और अहलुवालिया सभाए हैं | खालसा ब्राथरहूड जैसी सोसाईटिया हैं , अथवा विभीन्न समुदायों के अपने मजहबी सम्मेलन हैं | इस के अतिरिक्त हमे कभी कभी कश्मीरियों और पारसियों के विषय मे भी सुनने को मिलता हैं | पिछले दो वर्षो के दौरान ' चैंबर ऑफ ट्रेड एंड कॉमर्स ' भी काफी चर्चित रहा हैं | इन मे से कुछ पेशो से संबन्धित हैं | कश्मीरी सम्मेलन अपने एक व्यवसाय से संबन्धित हैं | हिन्दू , मुसलमान और सिख अपने स्वयं के मजहब का ख्याल किए बिना इन मे भाग लेते रहे हैं | यदि कोई कबीला अथवा समुदाए एक से अधिक धर्मो मे फैला हुआ हैं , ऐसे कबीले अथवा समुदाए के सभी लोग अपनी जाति-समुदाए के संगठनो कि गतिविधियों मे भाग लेते हैं - जैसे हिन्दू और मुसलमान , अथवा हिन्दू और सिख , अथवा हिन्दू , मुसलमान और सिख बिना धार्मिक विश्वास का लिहाज किए , और बिना किसी औपचारिकता के ! परंतु हमने किसी भी ओर से कोई शिकायत या आपत्ति नहीं सुनी हैं | वास्तव मे ही यह बात आश्चर्यजनक हैं कि अपना संगठन बनाने पर केवल जाट समुदाए को ही क्यों त्रासा और प्रताड़ित किया जा रहा हैं | हिन्दुओ का कहना हैं कि क्या मुसलमान -गैर मुसलमान , जमींदार -गैर जमींदार और शहर देहात के नाम पर विभाजन पर्याप्त नहीं थे । जो अब एक नया विभाजन जाट-गैर जाट के नाम से जोड़ा जा रहा हैं ? आर्य समाजियों का कहना हैं कि इस प्रकार का भेद वेदो और महर्षि दयानंद के सिद्धांतों के विरुद्ध हैं | सीखो कि आपत्ति हैं कि जाट-गैर जाट का भेद पंथ के खिलाफ हैं और सीखो का विभाजन करने के लिए किया जा रहा हैं | मुसलमान यह दलील देते हैं कि इस प्रकार कि भेद-रेखा खींचना कुरान के नियमो के खिलाफ हैं और मुसलमानों को कमजोर करने के लिए ऐसा किया गया हैं |

ये शिकायते और आपत्तियाँ चिंताजनक भी हैं और उत्साहवर्धक भी | धार्मिक विषय हमारी महासभा के कार्य क्षेत्र के बाहर हैं | हम किसी धर्म के सिद्धांतों पर चोट नहीं करते ; और हम ऐसा करे भी क्यों ? क्योंकि हमारा तो विशास है कि एक अच्छा मुसलमान , एक अच्छा हिन्दू , एक अच्छा सिख और एक अच्छा ईसाई , एक अच्छा इंसान , एक अच्छा पंजाबी , एक अच्छा हिंदुस्तानी , और एक अच्छा पड़ोसी भी होगा ! हम मजहबी राजनीति पर किसी बहस कि इजाजत नहीं देते | जाट महासभा शुद्ध राजनीति को भी टालती हैं | अपनी व्यक्तिगत हैसियत मे प्रत्येक जाट किसी भी तरह कि राजनीति का प्रचार करने और किसी भी सामाजिक संगठन का सदस्य बनने के लिए स्वतंत्र हैं | क्या यह हमारे प्रति अन्याय नहीं हैं कि इन हालातों मे भी कुछ लोग हम पर विभाजन पैदा कर के किन्ही धार्मिक संगठनो को कमजोर करने कि साजिश का आरोप लगाते हैं ? इस से अधिक अनुचित और क्या होगा ?

हम यह बात साफ कर देना चाहते हैं कि हम ऐसी किसी भी स्थिति मे कोई सम्झौता नहीं करेंगे जहा हिन्दू-मुसलमान -सिख और ईसाई , हमे पुश्तैनी दास मानते हो , अथवा दसो कि भांति हमारे साथ बर्ताव करे ! और न ही हम उन के इस तथाकथित अधिकार को मानेंगे कि वे -हिन्दू-सिख- मुसलमान-ईसाई-जाटों को पशु कि भांति किसी भी धार्मिक कार्यकर्म मे अथवा अन्य क्रिया-कलापों मे अपनी मर्जी के मुताबिक जब चाहे और जहा चाहे हांक ले जाये ! हम ऐसे धार्मिक आक्रमण को सहन नहीं करेंगे | हम अपने तौर अपने तरीके से सभी धर्मो और उन के गुरुओ पीर-पैगंबरों , ऋषि-मुनियो और देवी-देवताओ को सम्मान देते हैं |

जाति और धर्म के कारण भेद का बहाना : हिन्दू धर्म के सुधारक जैसे आर्य समाज ; और इसी प्रकार दूसरे भी , जैसे मुसलमान और सिख यह कहते हैं कि जातिवाद एक अभिशाप हैं , जिसे कबीला संस्था जीवित रखे हुए हैं ! इस बात को सभी मानेंगे कि जातिवाद और जन्म-भेद , जहा तक उन का संबंध धर्म और अध्यातम से हैं , बिलकुल भीन्न हैं | लेकिन हमे इन शब्दों के अर्थो को गंभीरता और बारीकी से समझने का प्रयास करना चाहिए | इस का अर्थ हैं कि कोई भी व्यक्ति किसी खास परिवार मे जन्म लेने से महान नहीं बन जाता ; और न ही जन्म के आधार पर किसी को स्वर्ग मे स्थान मिलने वाला हैं | इसी प्रकार यह बात भी नहीं हैं कि किसी खास धर्म या परिवार मे जन्म के आधार पर , आध्यात्मिक दर्ष्टिकोन से , स्वर्ग मे किसी को छोटा या बड़ा समझा जाएगा ! कर्मो कि गुणात्मक द्रष्टि से विवेचना कर के अच्छों को इनाम और बुरों को सजा मिलेगी ! यदि कोई यह कहे कि आध्यात्मिक क्षेत्र कि भांति ही सांसारिक मामलों मे भी पालन पोषण , जाति-खून निरर्थक और महत्वहीन हैं , और कि आध्यात्मिक क्षेत्र कि भांति ही दुनियावी मामलों मे भी लोगो को धर्म को छोड़ कर अन्य किसी भी आधार का वर्गीकर्त नहीं किया जा सकता , और कर्मो के अलावा और कोई संगत और सार्थक मापदंड नहीं हैं , तो यह बात ठीक नहीं लगती ! सांसारिक क्षेत्र मे परिवार , पालन-पोषण , विधत्ता , धन , अधिकार , दर्जा और प्रभाव ऐसे तत्व हैं जो किसी व्यक्ति के महत्व का निर्धारन करते हैं ! इसी प्रकार रक्त-संबंध और लालन-पालन बिलकुल स्वाभाविक बाते हैं , और कई बार ये ऐसे आध्यात्मिक गुणो को पैदा कर देते हैं जो वासत्व मे अद्भुत और सम्माननीय होते हैं |

यह कहना भी पूरी तरह गलत हैं कि जन्म और जाति के संबंधो को स्वीकार करना और इन्हे महत्व देना आध्यात्मिक अथवा धार्मिक मान्यताओ , मार्यदाओं, और आदेशो के विरुद्ध हैं | यूरोप के ईसाई समुदाय स्वयं को एंगेलों सैक्शन , जर्मन , नोर्दिंस , लैटिन्स आदि कहने मे कोई शर्म महसूस नहीं करते | एशिया के मुस्लिम समुदाए खुद को तुर्क , अरब और अफगान कहते हैं , परंतु इस प्रकार के कथनो के बारे किसी को कोई आपत्ति नहीं | उत्तर-पश्चिम सीमा पार के हमारे पड़ोसी बड़े गर्व से अपने को यासाफिञ्जय , और महासूद और वज़ीरी कहते हैं | अलीगढ़ के एक नौजवान ने मुझे बताया कि रसूल करीम बड़े गर्व से कहा करता था : ' मैं मोहम्मद हू; मैं अरब हू और मैं हाशमी भी हू ' |

यदि तुर्क और अफगान स्वयं को क्रमशः तुर्क और अफगान कहने से , गैर -मुसलमान नहीं हो जाते ; ब्राह्मण और खत्री स्वयं को ब्राह्मण और खत्री कहने से गैर हिन्दू नहीं बन जाते ; अहलुवालिया और रामगढ़िया स्वयं को क्रमशः अहलुवालिया और रामगढ़िया कहने से गैर -सिख नहीं बन जाते ; तो जाटों को , यदि वे स्वयं को जाट कहते हैं , इस्लाम विरोधी , सिख विरोधी अथवा वैधिक सिद्धांतों के विरोधी के रूप मे पेश करने का क्या औचित्य हैं ?

दूसरे लोग अपने नामों के साथ अपनी जातियों को उपनाम के रूप मे जोड़ते हैं , यथा , सैयद , कुरैशी , सिद्दीकी , अंसारी , शर्मा , नातन , वर्मा , सोढ़ी , बेदी , जेटली , चावला , चड्डा , बजाज आदि; और उन के विरुद्ध कोई फतवा अथवा धर्मादेश , हिन्दू , सिख , अथवा इस्लाम धर्म के नाम पर जारी नहीं किया जाता ! इसके विपरीत अगर कोई अपने आप को जाट कौम का बेटा कह देता हैं तो ऐसा लगता हैं मानो वह अपने धर्म से गिर गया हो | वह भ्रष्ट हो जाता हैं , और भगवान विरोधी बन जाता हैं ; और उसने बहुत बड़ा पाप कर दिया , उसे नरक मे फेंकना पड़ेगा ! धर्म के ये ठेकदार भी जाट सगठनों कि भर्त्सना और बदनामी करते हैं और उन्हे बुरी नजर से देखते हैं | यह क्या आध्यात्मवाद हुआ ? यह कैसा वैदिक संदेश हैं ? इस धर्मदेश या फतवा का क्या आधार हैं ? कितनी निरर्थक हैं ये दलील ! ये कैसा इंसाफ हुआ ?


contd...
 
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आपत्तियों के मुख़्य कारण: इन आपत्तियों का कारण न तो इस्लाम के प्रति समर्पण भाव हैं; न सिख पंथ के प्रति सेवा भावना इसका कारण हैं ; न हिन्दू धर्म कि रक्षा भाव ! परंतु इस का कारण निहित स्वार्थों कि रक्षा कि कोशिश हैं ! हमारी जाट कौम गहरी नींद मे थी ; उन्नति -प्राप्त वर्ग , खास तौर पर शहरी शिक्षित वर्ग , और व्यापारी वर्ग हमारे अधिकारों को चटकर जाते थे | जब उन्होने देखा कि जाट इकट्ठे हो रहे हैं -संगठित हो रहे हैं , और अपने अधिकारों पर दावा जताने लगे हैं , तो वे (शहरी) बेचैन हो उठे हैं ! उन ने सोचा धार्मिक मुद्दे सहायक हो सकते हैं | वे जाटों को मूर्ख और असभ्य मानते रहे थे ; वे उन कि सादगी और अज्ञानता का मज़ाक उड़ाते रहे थे ; जाटों कि साफ़गोई को उन मे सभ्यता और संस्कृति का आभाव माना जाता था ! वे लोग अब इन भोले -भाले , सहनशील , गूंगे बहरे और अशिक्षित गरीब जाटों के जाग जाने के कारण दुखी हैं , चिंतित और विचलित हैं ; और उन लोगो ने उन्हे नींद मे ही बनाए रखने के लिए षड्यंत्र रचा हैं ; इन के साथ भेड़-बकरियों कि तरह बर्ताव करते रहने , और इन कि जुबानों और दिमागो को धर्म कि नशीली खुराक देकर बंद कर देने का षड्यंत्र रचा हैं ; वे डरे हुए हैं कि जाट यदि जाग गए तो उन मे बदले कि भावना आ सकती हैं ! धार्मिक निहित स्वार्थो के अतिरिक्त राजनीतिक स्वार्थ भी हैं | इस तरह के राजनेताओ और उन कि पार्टियों मे न तो कोई सेवा भाव होता हैं और न ही आध्यात्मिक भावना उत्साह | जो लोग हमारा विरोध कर रहे हैं , चिलल-पों कर रहे हैं और हमारे विरुद्ध झूठा प्रचार कर रहे हैं , वे आम तौर पर अपने धर्म अथवा मजहब के प्रति भी निष्ठावान नहीं हैं ! दूसरे शब्दो मे उन मे अपने मत के अनुसार प्रतिदिन प्रार्थना करने जैसे धार्मिक अनुष्ठान करने का अभ्यास नहीं हैं | ये ही संस्थाए , पार्टिया , और समुदाए हैं , जो आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र मे किए जा रहे हमारे प्रयासो को विफल कर देते हैं , और हमारी सभी उपलब्धियों को चट कर जाते हैं ! वे हमारे शोषक हैं , शुभेच्छु और प्यारे नहीं | वे केवल मात्र अपनी भलाई मे रुचि रखते हैं | वे हमारी कष्ट कमाई पर डाका डालने कि योजनाए बना रहे हैं ; वे हमारी जागृति , प्रगति और आत्मरक्षा एवं आत्मोत्थान के उपायों और प्रयासो को देख कर बेचैन हैं , बौखलाए हुए हैं ; यह देखकर उदास हैं कि उन का प्रिय शिकार शीघ्र ही बच निकालने वाला हैं ! वे हम पर दोषारोपण करके , और अपने पापों और कुक्र्त्यों पर पर्दा डालने कि कोशिश करते हैं; वे बहुत चालाक बनने कि कोशिश करते हैं , जैसे कि वे हमारे भाग्य-विधाता हों, हमारे जीवन-दाता हों और हमारे भविष्य के निर्माता हों ! ये लोग हमारी जागृति को देख कर भय का अनुभव कर रहे हैं ; वे हमारी उन्नति को पचा नहीं पा रहे हैं और बहुत बेचैन हों उठे हैं ! हमारी जागृति को वे अपनी मौत का संकेत मान रहे हैं ; भगवान का मुखौटा लगाए हुए ये शैतान बेचैन हैं ! इसका दोष हम पर कैसे लगाया जा सकता हैं ? जाटों ने अब सच्चे भगवान और सच्चे गुरु को पहचान लिया हैं !

हमारा जवाब यह हैं : हमारा किसी से झगड़ा नहीं हैं ; हम सब धर्मो का आदर करते हैं , किसी के धार्मिक मामलो मे दखल नहीं देते ; हम धार्मिक कट्टरपंथियों से दूर रहना चाहते हैं ; हम आपसी सूझ-बुझ मे विश्वास रखते हैं जिस के कारण हम समाज को लाभकारी सेवाएं देने कि स्थिति मे हैं | शुभ कार्यों के लिए हमारी सेवाए सदा उपलब्ध रहती हैं | हमारी ओर से कोई भी जाट अपनी सोच और अपनी आस्था के अनुसार किसी भी साधारण अथवा सांप्रदायिक-राजनीतिक पार्टी मे शामिल होने और अपने सहयोग -सहायता से उसे मजबूत करने मे स्वतंत्र हैं | हम शुद्ध राजनीति - क्षेत्र मे भी अलग-अलग जगहों पर खड़े हैं | इस पृथकता के कारण मैं पहले बता ही चुका हू , हमारा संबंध केवल अर्थ-प्रधान राजनीति से हैं -अर्थात सांप्रदायिक आधार पर अधिकारों को निर्धारन हों जाने के बाद हम न्यायोचित एवं वैधानिक तरीके से उन अधिकारो कि सीमा मे रह कर उन का उचित हिस्सा हासिल करने कि कोशिश कर रहे हैं | हम सभी समुदायों के साथ पूर्ण सदभाव से रहना चाहते हैं - हम गरिमापूर्ण ढंग से मिल-जुल कर रहना चाहते हैं ; विशेष रूप से किसान जातियों के साथ प्रेम , आवश्यक एकता एवं सहयोग के साथ | हमारा समुदाय पिछड़ा हुआ हैं | हम देश के कमाऊ पूत हैं | दूसरी पिछड़ी जातियों के साथ हमारी हमदर्दी हैं | हम अपनी बिरादरी के आर्थिक एवं शैक्षिक स्तर को सुधारना चाहते हैं , और हम यह भी चाहते हैं कि दूसरी जातियों को भी अपने पिछड़ेपन से मुक्ति पा लेनी चाहिए ! इस उद्देश्य को लेकर हमारे बीच कोई विवाद नहीं हैं | हम सभी निहित स्वार्थो के साथ लड़ेंगे | आपसी सूझ-बुझ के साथ हमे एक दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिए | देश तब ही सम्पन्न बनेगा जब हम पिछड़ेपन से मुक्ति पा लेंगे | पूरा समाज खुशहाल होगा | हम स्वयं को संगठित कर के जाट बिरादरी कि विशेषताओ को सँजोकर रखना चाहते हैं और अपनी सभी सामाजिक कुरीतियों को दूर करना चाहते हैं | ' जाट्स एंड संसार कबील गालदा ' -यह हमारी कौम कि कमजोरी हैं | हमारे विरोधी सब अवसरों पर इस का लाभ उठाते हैं | हमे इस कमजोरी को दूर करना हैं | हमारा 90 प्रतिशत कार्यकर्म आर्थिक ,शैक्षिक और सामाजिक सुधारों और उत्थान से संबंधित हैं | इस के बावजूद यदि कोई हमारे खून का प्यासा बनेगा तो हम जैसे को तैसा कि भावना से प्रत्याक्रमण करेंगे -मुंह तोड़ जवाब देंगे ! हम धर्म के क्षेत्र और इसकी सीमाओं को अच्छी तरह समझते हैं , और इन सीमाओं के भीतर हम धर्म को पूरा सम्मान देते रहेंगे , लेकिन हम किसी भी धर्म कि गलत व्याख्या और इसका दुरुपयोग कर के हम को मूर्ख बनाने कि इजाजत नहीं देंगे | सांसारिक मामलों मे जन्म और खून के रिश्तों को हम मजबूत , ठोस एवं पवित्र संबंध और बंधन मानते हैं | हम इस निम्न शेर मे व्यक्त शास्वत सत्य मे विश्वास करते हैं :

" हमने ये माना मजहब जान हैं इंसान कि |
कुछ इसके दम से कायम शान हैं इंसान कि
रंग-ए-क़ौमियत मगर इससे बदल सकता नहीं |
खून आबाए -रग तन से निकल सकता नहीं | "
 
चौधरी छोटूराम ने जिन्नाह को पंजाब से भागने पर मजबूर कर दिया था | इस पर हिंदुस्तान टाइम्स ने 28 अप्रैल 1944 के अंक मे एक कार्टून छापा था |

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रहबर-ए-आजम दीनबंधु चौधरी छोटूराम ने किसान कौम मे जागृति लाने व किसानो के हक की आवाज़ उठाने के लिए सन 1916 मे '' जाट गज़ट " नाम से एक साप्ताहिक अखबार शुरू किया था
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