Long Live The Vision if not the man.

चौधरी छोटूराम ने सैंट स्टीफंस कालेज से बी.ए पास की , आगरा कालेज से ला पास किया | वकालत शुरू कर दी | वह सन 1911-12 में आगरा से रोहतक आ गए | उस समय पंजाब के किसान वर्ग की आर्थिक सामाजिक तथा राजनीतिक स्थिति अति दयनीय थी | पिछले डेढ़ सौ वर्षों में प्रकृति ने बार-बार विद्रोह किए | विनाशकारी प्रकोप बरसाए | बारह भीषण अकाल पड़े | महामारी , भुखमरी से लाखों आदमी मर गए | लाखों पशु मौत की गोद में चले गए | नदी-नाले सूख गए , कुएं , जोहड़ सूख गए , खेत सूख गए , फसलें सूख गई | जीवन सूख गया | ऐसी परिस्थिति का अनुचित लाभ उठाकर व्यापारियों ने , दूकानदारों ने , कसाइयों ने और शहरियों ने किसानों की बेबसी पर छापें मारे | टकों के भाव खेत की उपज , टंकों के भाव किसाओं के पशु खरीद लिए | पंजाब और राजपूताना में लाखों एकड़ कृषि भूमि रहन ले ली | 5 रुपया से 50 रुपया प्रति बीघा के हिसाब से किसाओं की ज़मीनें सूदखोरों की बहियों में कैद हो गई | किसान बंधुआ मजदूर हो गए | किसान के जीवन की नाव लंबे समय से डांवाडोल चल रही थी | कई बार डूबने को होती तो अज्ञात कारणों से बच जाती | नाव का कोई खेवैया , मांझी , मल्लाह नहीं था | वह रामभरोसे चल रही थी | किसान विरोधी तत्वों के बीच हिचकोले खा रहा था | इन विरोधियों के विरोध में कौन आए ? कुदरत , शासन और धनवान तीन ही सत्ताए थी , तीनों किसाओं को लूट रही थी | तीनों के हाथ मेहनत - कशों के खून से रंगे हुए थे |
ऐसे हालात में पंजाब के किसान को एक मांझी मिल गया | वह छोटूराम था | चौधरी साहब ने किसान समस्याओं का अध्ययन आरंभ किया | गाँव-गाँव में गए | उनमें बैठकर उनके दुःख सुने | किसानों के चहुतरफा शोषण से वह बहुत दुखी हुए | वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह समस्याएँ सुधारवादी आंदोलन से हल नहीं हो सकती | ये राजसत्ता हाथ में लेकर नियम अधिनियम बनाकर , राजतंत्र का स्वरूप बदलकर दूर की जा सकती हैं | वह हिन्दू-महसभा के संपर्क में आए | परंतु थोड़े ही दिनों में यह अनुभव हो गया कि कोई भी धार्मिक राजनैतिक पार्टी सिर्फ भाविक नारे लगाकर राज हथियाने में विश्वास रखती हैं | हिन्दू ही यदि हिंदुओं का शोषण करे तो हिन्दू महासभा के पास ऐसे शोषण को समाप्त करने का कोई कार्यकर्म नहीं बन सकता | अतः वे हिन्दू महासभा से अलग हो गए | वह कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए | कांग्रेस आज़ादी की लड़ाई लड़ रही थी | कांग्रेस आंदोलन में योगदान देना राष्ट्रिय धर्म था | उनका भविष्य का कार्यकर्म जनसाधारण के लिए आकर्षक था | आज़ादी में उनको अपनी दुर्व्यवस्था में सुधार होने की आशा दिखाई दी | विद्रोह विदेशी शासन सत्ता के विरुद्ध था | अतः उसमें बिलालिहाज जात पात , धर्म-पंथ , शोषणकारी और शोषित सब वर्ग भाग ले रहे थे क्योंकि दुनिया उम्मीद पर कायम हैं | अतः वह देश व्यापी आंदोलन था |
चौधरी साहब जिला कांग्रेस के प्रधान बनाए गए | इस बीच प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हो गया | युद्ध जीतने की हालत में अंग्रेजों भारत को प्रांतीय स्वायत्तता का वायदा दिया था | इसलिए महात्मा गांधी जी ने गुजरात में फौजी भर्ती का अभियान चलाया | पंजाब में चौधरी छोटूराम और उनके साथी इस काम में सरगर्म थे |
युद्ध जीतने के बाद अंग्रेज़ अपने वायदें से मुनकिर हो गए और किसी भी विरोधी आंदोलन का दमन करने के लिए रोल्ट एक्ट जैसे दमनकारी अधिनियम लागू कर दिये | उनका कांग्रेस पार्टी से टकराव हो गया | महात्मा जी ने सन 1920-21 में असहयोग आंदोलन का आह्वान दिया | उनके अनुसार शिक्षा संस्थानों और किसानों को सरकार से हर प्रकार का असहयोग करने का आह्वान किया | छत्र शिक्षा केन्द्रों में न जाए और न फीस दे | किसान मालगुजारी न दें | भारतीय लैंड रैवेन्यू एक्ट के अंतर्गत यदि किसान मालगुजारी आड़ा न करें तो उसकी कृषिभूमि नीलाम की जा सकती हैं | जो नीलामी में लेगा , भूमि उसी की मलकीयत बन जाएगी और वह फिर किसान को वापिस नहीं मिल सकती | चौधरी साहब किसानों के लिए इस प्रकार के घातक आह्वान के विरुद्ध थे | पूँजीपतियों और व्यापारियों को अंग्रेजों से अपने व्यापारिक संबंध तोड़ने का कोई आह्वान नहीं दिया गया |
महात्मा गांधी रोहतक आए | उन्होने वैश्य हाई स्कूल की आधारशिला रखी | एक तरफ वह शिक्षण संस्थान बंद करने का आह्वान दे रहे थे दूसरी तरफ उनकी आधारशिलाए भी रख रहे थे | रोहतक में , गऊकरण तालाब पर । बड़ी कांफ्रेस थी | गांधी जी की उपस्थिती में शिक्षा संस्थानों को बंद करने और किसानों की ओर से मालगुजारी न देने का प्रस्ताव रखा गया | चौधरी साहब ने उसका विरोध किया | उनकी दलील थी कि मालगुजारी न देने की अवस्था में सरकार किसानों की ज़मीनें नीलाम कर देगी | इनकी ज़मीनों को वहीं लोग खरीद लेंगे जो गांधी जी के भक्त भी हैं और सरकार के सहयोगी भी हैं | किसान अपने रोजगार से वंचित हो जाएंगे और मजदूर हो जाएंगे | क्या गारंटी हैं कि आंदोलन के बाद उनकी ज़मीनें उन्हे वापिस मिल जाएंगी ? महात्मा गांधी उनसे सहमत नहीं हुए | चौधरी साहब ने कांग्रेस की इस पॉलिसी के विरुद्ध विद्रोह किया | स्टेज छोड़ कर चले आए और कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया | यह उनका सिधान्त आधारित विद्रोह था |
 
सर छोटूराम ने सन 1921-22 में सर फजलेहुसैन के साथ मिलकर एक नई पार्टी गठित की - " पंजाब इतिहाद पार्टी " उसका भिविष्य का कार्यकर्म और सिधान्त - किसानों का उत्थान , उनके अधिकारों को सुरक्षित करना , उनकी समस्याओं का हल और शोषण का उन्मूलन करना निर्धारित किया |
पंजाब इतिहाद पार्टी का प्रारूप तथा स्वरूप :-
सन 1923 में सर फजलेहुसैन और चौधरी छोटूराम ने एक नई किसान तहरीक को जन्म दिया | वे दोनों एक विचार , एक भावना और एक राजनीतिक प्रोग्राम लेकर एक मंच पर इकट्ठा हुए |

एक का मुसलमान होना और दूसरे का हिन्दू , इस बात की तरफ संकेत था कि उनका मंच सांप्रदायिकता पर गहरी चोट लगाएगा |
एक पंजाबी और दूसरे का हरियाणवी होना , इस बात का संकेत था कि इस मंच से एक तरंग उठेगी जो जमना नदी से जेहलम नदी तक जल और धरती को यकरंग कर देगी |

एक का राजपूत होना और दूसरे का जाट , इस बात का संकेत था कि इस मंच से एक आवाज़ उठेगी जो जातिवाद को उलांघकर एक कमेरे वर्ग का आधारशिला रखेगी |
इस मंच के दो रूप थे | एक जमींदारा लीग (मालिक किसानों और खेत मजदूरों का संघ ) और दूसरा इतिहाद पार्टी | एक आर्थिक और दूसरा राजनैतिक | जमींदारा लीग ने किसानों और देहातियों को उनकी आर्थिक और सामाजिक समस्याओं का ज्ञान कराया | आपसी मतभेद को मिटाया और दोस्त व दुश्मन की पहचान कराई | इतिहाद पार्टी ने राजनैतिक तौर पर इनकी समस्याओं की गुत्थियों को सुलझाया और उनका समाधान किया |
 
सर छोटूराम की लेख माला 'बेचारा जमींदार -पहला भाग' से लेख ....
उपेक्षित गाँव
अब तक मैंने अपनी पसंद के विषयों पर जो कुछ लिखा हैं उस से पाठकों ने अनुमान लगा लिया होगा कि किसान सदियों -सदियों तक तरह तरह की मुसीबत झेलता रहा हैं | यह सब उस के भीतर जमी-जड़ी हुई एक अजीब सी निष्ठा की भावना के कारण हैं कि वह कभी भी अपने शोषकों और दमंकारियों के खिलाफ मुंह तक खोलने को विवश नहीं हुआ हैं ; और न ही उसने उन की एहसान फरामोशी के विचारों को अपने दिमाग में घुसने और पनपने दिया हैं | पूरब की प्यार प्रेम की परम्परा ने उसे अपने होंठ सिये रखने और अपनी स्मृति -प्रक्रिया को जड़ बनाए रखने की प्रेरणा दी हैं | उस के विचार में कथन , शिकायत , समर्पण जैसी कोई चीज न केवल आस्था के नियमों के विरुद्ध हैं बल्कि प्रेम के मूल सिद्धांतों का अपमान भी हैं | कितना अज्ञानी आदमी हैं यह ! ओ मासूमियत की मूरत ! पश्चिमी सभ्यता के उदयकाल से ही निष्ठा जैसे गुणों की बातें उड़न छू हो गई हैं | निस्वार्थ प्रेम एक बीती बात बन कर रह गया हैं | अब निष्ठा के नियमों और प्यार के मार्ग संबन्धित अपनी किताबें अर्थात शिक्षाए ताक पर रख दे | इन मुद्दों पर नई किताबें छप गई हैं , अब इन्हे पढ़ | इन पुस्तकों के थोड़े से पृष्ठों का अवलोकन करने के बाद तू जान जाएगा कि शांति का स्थान ऊंची चिल्लाहट , बड़बड़ाहट और भन्नाहट ने ले लिया हैं | जहां पहले खुद पर्दे में रहने कि शिक्षा थी अब वहाँ स्वानुन्श्सा ( अपनी आप बड़ाई ) और स्व-प्रदर्शन अर्थात खुद का दिखावा का बोलबाला हैं |
जो हो सो अच्छा ! लेकिन इस सब से यह साफ हो गया हैं कि किसान एक ऐसे लद्दू पशु की भांति हैं जिस पर सरकारी करों का चाहे जितना बोझ आसानी से लादा जा सकता हैं | पुराना बोझ उस की पीठ पर ज्यों का त्यों हैं , और प्रशाकीय व्यवस्थाओं के विभिन्न स्तरों पर या क्षेत्रों में एक नया बोझ और लादा जाना हैं | कोई इस बात की परवाह नहीं करता कि यह मानव रूपी ऊंट कितना बोझ सह सकता हैं | देर-सवेर इस की कमर टूटनी निश्चित हैं - देर-सवेर उस का टूट जाना अनिवार्य हैं | यह सब तो करों के बोझ के संबंध में हुआ | अब करों द्वारा प्राप्त धन को खर्च करने में सरकार की उचित एवं न्याया-संगत निर्णय करने की क्षमता का अवलोकन और मूल्यांकन देखिये | किसान लोग आम तौर पर गावों में रहते हैं , जब कि गैर-जमींदारों कि जनसंख्या का एक बड़ा भाग शहरों में बसता हैं | फिर यह कहना गलत नहीं होगा कि कस्बों के लिए खर्च किया गया धन शहरियों के लिए किया गया हैं ; जब कि गावों पर खर्च किया गया धन किसान के कल्याण के लिए हैं | यदि इस दृष्टिकोण से खर्च को देखें तो यह मानना पड़ेगा कि छोटा किसान तो कहीं गिनती में ही नहीं हैं | मैं समस्या के इस पहलू पर विस्तार से चर्चा करना चाहूँगा | अगर खर्च की गई पाई-पाई का हिसाब लगाया जाए तो कस्बों में प्रति व्यक्ति खर्च एक रुपया आएगा और देहात में यह एक या दो पैसे प्रति व्यक्ति रहेगा | पूरी सालाना आमदनी में से शहरों पर यदि एक रुपया खर्च किया जाता हैं तो देहात के लिए यह राशि चार या छः पैसे रहती हैं | कहने का तात्पर्य यह हैं कि करों का 80 से 90 प्रतिशत भाग किसानों से वसूला जाता हैं , जबकि उन के ऊपर खर्च केवल 10 प्रतिशत किया जाता हैं | गैर जमींदार मुश्किल से दस-पंद्रह प्रतिशत कर अदा करते हैं जब कि कुल खर्च का नव्बे प्रतिशत (90%) उन के हिस्से में जाता हैं | महान आश्चर्य ! देहात के लोग 90% कर भार उठाएँ और उन की भलाई के लिए खर्च 10% हो ! दूसरी ओर कस्बों में बसने वाले लोग कुल कर-भार का केवल दस प्रतिशत वहन करें और लाभ 90% का लें !
जब तक मैं तथ्यों को कुछ विस्तार से न कह दूँ , पाठकगण शायद मेरे कथन को पूरी तरह समझ नहीं पाएंगे ! इसलिए मैं खर्च की विभिन्न मदों का उन के नाम के अनुसार विवरण देना चाहूँगा | हमारे प्रांत का धन कहाँ खर्च किया जाता हैं ? यह सड़कों , महाविध्यालयों , विध्यालयों , हस्पतालों , जन-स्वास्थ , भवनों के निर्माण तथा वेतन और पैंशन आदि पर खर्च होता हैं | देहात में कितनी सड़के हैं और उन की क्या हालत हैं ? अनुपात के हिसाब से दस-बीस गावों पर मुश्किल से एक गाँव जिला बोर्ड द्वारा बनाई गई सड़क पर होगा ; और संभवतया पचास गावों पर एक गावों कोलतार की पक्की सड़क पर होगा || शेष सब मार्ग कच्चे - रेतीले हैं ; सब में घुटनों गहरी जलती-तपती हुई रेत , और बरसात के मौसम में घुटनों घुटोन पानी कीचड़ ! ये टेढ़े मेढ़े रास्ते हैं ; जगह-जगह गड्ढे और खंदक हैं | परिणामतः किसान की गाड़ी टूट जाती हैं या बैल की टांग टूट जाती हैं | कीचड़ और पानी के कारण औरतें तो इन पर चल ही नहीं सकती | लेकिन किसान के कष्टों की कौन परवाह करता हैं | सुधरी हुई सड़के भी साधारण देहाती रास्तों से अच्छी नहीं हैं | लेकिन इन में फर्क यह हैं कि इन्हे दोनों ओर के किसानों द्वारा अतिक्रमण कर के संकरा नहीं बनाया जा सकता | बाकी सब कठिनाइयाँ वैसी ही हैं जैसी कच्चे रास्तों में | इन सड़कों पर कोई पुलिया टूट जाती हैं तो सालों तक इस की मुरम्मत नहीं होती क्योंकि इन सड़कों पर कमिश्नर या डिप्टी कमिश्नर की कार को नहीं दौड़ना | यदि कभी सौभाग्यवश इन अधिकारियों में से किसी की कार का इन सड़कों पर से गुजरना हो जाए , अथवा कोई शिक्षित व्यक्ति , या जिला बोर्ड का कोई कर्मचारी , जो कार्यकारी अभियंता का मातहत न हो , ओवरसियर तक इसकी सूचना पहुंचा दे तो मुरम्मत की संभावना हो सकती हैं | और इस के विपरीत , लाहौर , अमृतसर , रावलपिंडी , सियालकोट , अंबाला और दिल्ली जैसे बड़े शहरों को देखिये | कितनी चौड़ी सड़के हैं ; कितना अच्छा इन का रख-रखाव होता हैं | उन पर कोलतार बिछाया गया हैं और इतनी साफ एवं स्वच्छ हैं कि इन पर पड़ी हुई सुई भी दस कदम की दूरी से दिखाई दे जाए | यदि गाँव को जाने वाले किसी रास्ते पर , अथवा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की किसी रेतीली सड़क पर जुआ जैसी कोई बड़ी चीज भी गिर जाएगी -गर्मी के मौसम में तो यह रेत में दाब जाएगी , और यदि मौसम बरसात का हुआ तो पानी और कीचड़ में खो जाएगी |
अब कालेजों और स्कूलों के विषय में ! सभी शहरों में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग स्कूल और कालेज हैं | किसी भी लड़की अथवा लड़के को शिक्षा प्राप्त करने के लिए माँ-बाप की देख रेख में दूर कहीं बाहर नहीं जाना पड़ता | फीस और किताब कापियाँ आदि के खर्च में ही शिक्षा पूरी हो जाती हैं | शहरी विध्यार्थियों के भोजन और आवास पर कुछ खर्च करना नहीं पड़ता , और यातायात का भी कोई खर्च नहीं | एक तिहाई अथवा एवं चौथाई खर्च में शिक्षा पूरी हो जाती हैं | माँ-बाप की तेज नजरों के सामने रहने के कारण वे बुरी आदतों से भी बच जाते हैं | इस के ठीक विपरीत गरीब किसान को अपने बेटे की शिक्षा पर तीन चार गुना अधिक खर्च करना पड़ता हैं | चरित्र की रक्षा संबंधी कारणों से वह अपने बेटों को दूर के स्कूलों में भेजने के प्रति उदासीन भी होता हैं | साधारण सुविधाओं के भी आभाव में अपनी बेटियों को तो उसे अशिक्षित ही रखना पड़ता हैं |
देहात में बहुत कम हस्पताल हैं , और जहां कहीं भी हैं , बुरी हालत में हैं | कुछ मामलों में तो वे आवश्यक एवं उपयुक्त औजारों के बिना ही हैं | जबकि स्टाक में दवाइयाँ नहीं होती हैं | मरीजों को दाखिल करने के लिए जगह नहीं हैं | पाँच से दस मील के फासले पर नाम मात्र की कुछ स्वास्थ संबन्धित सुविधाए उपलब्ध हैं | परंतु शहरों में उपलब्ध सुविधाओं में उन का कोई मुक़ाबला नहीं , जैसे मार्बल पत्थर से बने फर्श , शीशे के दरवाजे और अंतरंग रोगियों के लिए हवादार खुली बारीगें - ऐसे हस्पताल ! जो लोग फैमिली वार्ड में किराए पर कमरा लेना चाहे उन के लिए भी सुविधा उपलब्ध हैं | पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग हस्पताल भी हैं जिन में क्रमशः पुरुष और महिला डाक्टर विशेषज्ञ होते हैं | नर्सिंग सेवादार ,नर्से और दूसरे बहुत सारे कर्मचारी रोगियों की देख भाल के लिए होते हैं | ताजा और कीमती दवाइयाँ हमेशा उपलब्ध रहती हैं | डार्क रूम एक्सरे क्लीनिक , ऑपरेशन थियेटर , आकर्षक भवन , फुलवाड़ी , बड़ी-बड़ी बैरकें , घास के लिए विस्तृत लान और दूसरी ऐसी सजावटें जो आगंतुक को ऐसी लगें मानों यह हस्पताल न होकर वाजिद अलिशाह का कोई महल हैं | यदि किन्हीं खास-खास जगहों में दवाइयों आदि की गंध न आती हो तो कोई अपरिचित व्यक्ति इन हस्पतालों को किसी राजा अथवा नवाब का महल समझने की भूल कर सकता हैं |
contd...
 
यदि देहात में और शहरों में होने वाले खर्च में तुलना करें तो कुछ चौकाने वाले तथ्य सामने आते हैं | कस्बों में भूमिगत पाइपों के जरिये पीने का शुद्ध-स्वच्छ पानी सप्लाई किया जाता हैं ; दूसरी ओर गाँव में बहुत से ग्रामीण बहुत स्थानो पर बरसात का इकट्ठा हुआ गंदा पानी पीने को मजबूर हैं ; जबकि कुछ अन्य स्थानों पर पाँच कोस तक की दूरी से ऊंटों पर पानी लाया जाता हैं | और जहां कहीं कुएं हैं वहाँ उन की सफाई और पानी को पीने लायक बनाने की कोई व्यवस्था नहीं हैं | वृक्षों के पत्ते और टहनियाँ झड़ और टूट कर कुओं में गिर जाते हैं जिनके सड़ने पर पानी सड़ने लगता हैं और दुर्गन्द पैदा करता हैं | पक्षियों के पंख आदि कुओं में गिरते रहते हैं | विशेषतया बरसात के मौसम में कुओं के पानी में प्रायः ही कीड़े पैदा हो जाते हैं ; लेकिन इसे साफ करने की कोई व्यवस्था नहीं हैं |
कस्बों में ईंटों से बनी पक्की गलियाँ , और कोलतार की सड़के हैं | बरसात और गंदे पानी के निकास के लिए नालियाँ हैं | लेकिन गावों की गलियाँ , खास तौर पर वर्षा के मौसम में , साक्षात नरक का नजारा प्रस्तुत करती हैं | गलियों में घुटनों तक कीचड़ होती हैं | पशुओं का गोबर और पेसाब सड़ उठता हैं | कोई नालियाँ नहीं और न ही पाने के निकास की कोई अन्य व्यवस्था हैं | गाँव की बस्तियों से सटते उपलों और कूड़े के ढेर (कुरड़ी-बिटोडा) लगे रहते हैं | जगह-जगह पानी इकट्ठा होकर सड़ उठता हैं | जिस से मच्छरों को जन्मने और पलने के लिए उपयुक्त एवं अनुकूल स्थान मिल जाता हैं | यद्द्पि गाँव की जलवायु को स्वास्थ्यवर्धक माना जाता हैं फिर भी आबादी वाले क्षेत्रों में तो स्थिति इनती भयावह होती हैं कि अगर किसान अपना बहुत सा समय बाहर खेतों आदि में न बिताता हो तो एक चिरकालिक मरीज बन गया होता | एक हिन्दुस्तानी की औसत आयु की सीमा तक भी न पहुँच पता |
कस्बे छोटे हों या बड़े इन में रौशनी की उपयुक्त व्यवस्था होती हैं | बिजली की रौशनी केरोसीन की रौशनी की उपेक्षा सस्ती होती हैं | शहरों में बिजली से चलने वाले पंखे हैं जो मानव-चालित पंखों की तुलना में सस्ते होते हैं | सुबह शाम सैर करने के लिए बाग-बगीचे और पार्क हैं | गावों में इस प्रकार की सुविधाए किसी भी तरह उपलब्ध नहीं हैं |
शहरों मे बसने वाले कुछ लोग बिना सोचे समझे ही कह बैठते हैं - ' इस संबंध में गाँव वालों की भला क्या शिकायत हो सकती हैं ? हम इन सुविधाओं के एवज में नगर पालिकाओं को पैसा देते हैं | इस में किसानों अथवा सरकार का क्या एहसान हैं ? ' परंतु कोई अशिक्षित व्यक्ति ही इस प्रकार की बातों से बहकाया जा सकता हैं | प्रथम तो वहाँ बहुत सी ऐसी सुविधाए हैं जो सरकारों द्वारा दी गई हैं ; शहरी लोग इन के लिए कुछ नहीं देते | लाहौर के लारेंस रोड़ गार्डन जैसे कई बाग - बगीचों का रख-रखाव सरकार द्वारा किया जाता हैं | पक्की सड़के , प्रकाश की व्यवस्था , पानी के टैंक , नालियाँ आदि सुविधाओं के लिए जो नगर पालिकाओं के अधिकार क्षेत्र मे आती हैं - सरकार द्वारा 50 से ले 70 प्रतिशत तक का अनुदान दिया जाता हैं | सो , इन के निर्माण पर शहरियों द्वारा खर्च किए गए प्रत्येक आठ आना पर सरकार को भी आठ आना , और प्रायः इस से भी ज्यादा खर्च करना पड़ता हैं |
नए भवन के निर्माण और पुरानों की मुरम्मत पर भी सरकार करोड़ो रुपए खर्च करती हैं | इस खर्च का नव्बे प्रतिशत शहर्प्न मे लगता हैं | इन भवनों से शहरों की शोभा हैं , और इन से केवल शहर वालों को लाभ मिलता हैं | गाँव के लोगों के लिए तो इस विभाग (पीडबल्यूडी) में ठेकेदार के तौर पर नाम दर्ज कराना भी कठिन हैं | क्योंकि उन की कार्यकारी इंजीनियर तक कोई पहुँच नहीं होती | सारे अधिकारी गैर जमींदार और शहरी हैं | गाँव वालों के उनसे कोई संबंध नहीं हैं , और वे फलों और मिठाइयों की डालियाँ देने की कला से भी अनभिज्ञ हैं ! चापलूसी करना भी उन्हे नहीं आता | परिणाम यह होता हैं कि इन भारी लागत वाले भवनों से किसानों को किसी तरह का कोई फायदा नहीं पहुंचता ; न तो ठेकेदार के तौर पर , न सामान ढुलाई और न ही दिहाड़ी मजदूरी के रूप में | यहाँ तक हैं कि खर्च करने का तरीका भी स्वेच्छापूर्ण हैं , और इस मामले में मोहम्मद शाह रंगीले और आसिफउद्दोला को भी मात दे दी जाती हैं ! अकेले रोहतक जिले में ही सैकड़ों ऐसे स्कूल हैं जो धन के अभाव में पिछले बीस वर्षों से गावों के कच्ची चौपालों में चल रहे हैं | ऐसे प्राइमरी स्कूलों के लिए कोई धन नहीं हैं | जबकि लाहौर में एक छात्रावास भवन के निर्माण पर आठ लाख रुपया खर्च कर दिया जाता हैं |
किसान कमाता हैं और गैर किसान मौज से खाता हैं ; किसान जी-तोड़ मेहनत करता हैं और गैर किसान आनंद-सुख भोगता हैं ; किसान से लिया जाता हैं , केवल गैर किसान पर खर्च करने के लिए | नंगे बदन , नंगे पाँव और खाली पेट-किसान कमाता हैं , साहूकार की तिजोरियाँ भर्ता हैं तथा सरकार के खजाने में बढ़ोतरी करता हैं | परंतु उसका रसोई घर सदा खाली रहता हैं , फिर भी वह पूरी तरह बे-फिक्र हैं | पत्नी भूखी हैं , बच्चे भूख से मर रहे हैं , खुद खाली पेट हैं ! यह कैसी व्यवस्था हैं ? जवाब साफ हैं | किसान में दूरदर्शिता का अभाव हैं ' वह आलसी हैं -प्रमादी हैं ; मोटे दिमाग वाला हैं | वह अनुचित एवं अत्यधिक समर्पण की भावना का शिकार हैं और खुद को सब का बंधुआ मजदूर समझ बैठा हैं ! ' ऐ-किसान ! ज़मीन से नजरें हटा , ऊपर आसमान की तरफ देख यदि तू सम्मान और प्रगति चाहता हैं तो
" किया रिफते-लज्जत से ना दिल को आशना तूने ,
गुजारी उम्र पस्ती में मिसाले-नक्शे -पा तूने "

( तूने कभी प्रगति और उत्थान और शिखर का स्वाद नहीं चखा हैं | अपितु सारी उम्र अवनति , अधोगति -नीचे गिरते जाने की स्थिति में रहकर बिताई हैं , और पावों के निशान की भांति सदा पैरों तले कुचला गया हैं )
(स्रोत- सर छोटूराम : कथन एवं लेखन )
 
दिसंबर सन 1936 में दूसरा विश्वयुद्ध आरंभ हो गया | वाइसराय बैवल ने सारे भारत के प्रान्तों के प्रीमियरों की मीटिंग बुलाई | मद्रास से श्री राजगोपालचर्य आये और पंजाब से चौधरी छोटूराम | वाइसराय यह चाहता था कि युद्ध जरूरत के लिए खाध्यवस्तुओं विशेषकर गेहूं का भाव सस्ते से सस्ता किया जावे | गेहूं सरकार ने खरीदना था | वह 6 रुपया प्रति मन का भाव नियत करना चाहते थे | श्री राजगोपालचर्य कांग्रेस के प्रतिनिधि थे | उन्होने वाइसराय का सुझाव मान लिया | चौधरी छोटूराम इसका विरोध किया और कहा कि गेहूं मद्रास नहीं , पंजाब का किसान पैदा करता हैं | 10 रूपये प्रति मन से कम का गेहूं नहीं देंगे | वाइसराय ने दबाव ही नहीं दिया बल्कि धम्की भी दी कि हमें युद्ध में व्यापारी वर्ग की सहायता लेनी हैं | वे भाव सस्ता चाहते हैं | सरकार लड़ाई में इतना महंगा भाव नहीं देगी और किसान को सरकारी भाव पर गेहूं देना पड़ेगा | चौधरी छोटूराम ने उत्तर में कहा कि हमने व्यापारी का नहीं किसान का लाभ देखना हैं | किसान युद्ध के लिए जवान भी दे और घाटा खा कर गेहूं भी दे , दोनों बात नहीं हो सकती | लड़ाई व्यापारी से नहीं किसानों के बेटों से जीती जाएगी | चौधरी साहब का इस विषय पर टकराव हो गया | चौधरी साहब मीटिंग में से खड़े हो गए और कह दिया कि मैं 10 रूपये प्रति मन से कम किसान का गेहूं नहीं दूंगा | वरना खड़ी फसल में आग लगवा दूंगा |
चौधरी साहब मीटिंग से चले गए | वाइसराय ने चौधरी छोटूराम को गिरफ्तार करने का सुझाव दिया | सरदार सिकंदर हयात खान वाइसराय के पास गए | उसको चौधरी छोटूराम के प्रभाव और लोकप्रियता से अवगत कराया कि चौधरी छोटूराम पंजाब के किसान और सिपाही का महान नेता हैं | सरदार सिकंदर हयात खान ने बताया कि इसको बुलाकर समझौता करना ही ठीक है, क्योंकि यह बहुत अडिय़ल आदमी है। जो मुंह से शब्द निकाल देता है, उन्हें हर हालत में पूरा करता है। जब लार्ड वेवल ने उन्हें पुन: बुलाया तो सर छोटूराम कहा कि बाहर खड़े किसान तो अब मेरी बात भी नहीं मान रहे हैं वे तो गेहूं का मूल्य 11 रुपए प्रति मण लेने पर अड़े हुए हैं और तो और अब तो मुझे भी उनकी बात अच्छी लग रही है। और अब तो हम 11 रुपए प्रति मण के भाव लेंगे। लार्ड वेवल को मजबूर होकर 11 रुपए प्रति मण गेहूं का भाव स्वीकार करना पड़ा | ऐसा था चौधरी छोटूराम का नेतृत्व |
 
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सांप्रदायिकता के विरुद्ध विद्रोह :-
मार्च सन 1944 में मोहम्मद अली जिन्नाह लाहौर में मेजर खिजर हयात खान और चौधरी छोटूराम की धर्मनिरपेक्ष , सांप्रदायिकताविरोधी इतिहाद पार्टी (यूनियनिस्ट पार्टी ) की वज़ारत को ' मुस्लिम लीग वज़ारत ' का लेबल लगाने का ध्येय लेकर आये थे | पंजाब एसम्ब्ली में मुसलमान सदस्यों के बहुमत का लाभ उठाना चाहते थे | प्रिमियर मेजर खिजर हयात खान उसकी कुनीति को ताड़ गए | उनका विचार बना कि जिन्नाह हिन्दू मुस्लिम तनाव पैदा करेगा और सांप्रदायिक दंगे भड़काएगा क्योंकि उसकी राजनीति का यह आधार रहा हैं | अतः मेजर खिजर हयात साहब ने चौधरी छोटूराम की सलाह से जिन्नाह पर पंजाब में प्रवेश न करने का प्रतिबंध लगाने से जिन्नाह का राजनैतिक हव्वा बन जाएगा और उसका महत्व बढ़ेगा और यह हमारी कमजोरी समझी जाएगी | इसलिए जिन्नाह बे रोक टोक लाहौर आए |
जिन्नाह ने मुसलमान नेताओं से बातचीत की श्रंखला चलाई | इसलामिया कालेज में मुस्लिम कान्फ्रेंस नियोजित कराई और मजहब के नाम पर विषभरे भाषण दिये | उन्होने जाटों और चौधरी छोटूराम पर ताबड़तोड़ हमले किये ताकि मुसलमान उनके खिलाफ हो जाएँ | मुसलमान जाटों को जाति भाव ग्रस्त होने का नारा देकर इसलाम के विरुद्ध ' कुफ़र ' बयान दिया | उसने यहाँ तक कहा कि मुसलमानों के सारे दुःखों का कारण छोटूराम हैं | परंतु वहीं ढाक के तीन पात रहे | मुहम्मद अली जिन्नाह ने एसम्ब्ली के मुसलमान सदस्यों से अलग-अलग मिलने का प्रयास किया परंतु सबका उत्तर यह था कि हमारी पार्टी की तरफ से सिर्फ मेजर खिजर हयात खान और चौधरी छोटूराम ही बात करेंगे | हम उनके साथ हैं | उन्होने देख लिया था कि पिछले 8 वर्षों में पंजाब के मालिक किसान , मजदूर तथा पिछड़ा वर्ग यहाँ तक कि छोटे दुकानदार का बिना धर्म व जाति के भेदभाव के कितना हित किया गया हैं , कितना अच्छा भाईचारा रहा हैं | अंत में विवश होकर जिन्नाह ने चौधरी साहब से मिलने का समय मांगा | नवाब ममदोत की कोठी पर मुलाक़ात हुई | तीन दिन तक विचार विमर्श होता रहा | भारतीय और प्रांतीय राजनीति पर बहस चली | दो क़ौमों की थ्योरी और देश विभाजन की नीति को चौधरी छोटूराम ने दो-टूक अस्वीकार कर दिया और मुसलमान जमींदार सदस्यों ने फैसला दे दिया कि वह व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर अटूट श्रद्धा से इतिहाद पार्टी (यूनियनिस्ट पार्टी ) से जुड़े हुए हैं |
अंत में मेजर खिजर हयात खान ने कह दिया कि वह सिकंदर जिन्नाह पैक्ट को भी नहीं मानते क्योंकि पैक्ट का एक पक्ष (फरीक) सर सिकंदर हयात का देहांत हो चुका हैं | प्रिमियर खिजर हयात खान ने जिन्नाह को हुकम दिया कि वह 24 घंटे के अंदर पंजाब छोड़ दें वरना उसको गिरफ्तार करके पंजाब सीमा से बाहर निकाल दिया जाएगा | जिन्नाह रात को ही पंजाब छोड़ गए और शेख मुहम्मद अब्दुल्लाह पर अपना राजनैतिक दावपेंच चलाने के लिए कश्मीर पहुँच गए , वहाँ पर भी उनको मुंह की खानी पड़ी |
बाद में जिन्नाह ने बयान दिया कि -- " पंजाब में मुस्लिम लीग वज़ारत बनाने में चौधरी छोटूराम बड़ी भारी रुकावट हैं | वह इस बात पर अड़ें हुए हैं कि पंजाब असेंबली का प्रत्येक मुसलमान मैम्बर इतिहाद पार्टी (यूनियनिस्ट पार्टी ) का प्राईमरी मैम्बर हैं और उसके साथ बंधा हुआ हैं | यह पोजीशन मेरे लिए स्वीकार्य नहीं हैं | "
चौधरी टीकाराम ने अपनी कृति में लिखा हैं कि -- " जिन्नाह साहब अपनी बाजी और दाव हार गए | यहाँ यह बात ज़ोरों पर हैं कि पंजाब सरकार पंजाबियों की हैं , पंजाबियों के लिए हैं और किसी को कोई हक इसमें दखल देने का नहीं हैं | .... एक बार फिर आर्थिकवाद ने मजहबी जनून को शिकश्त दी और रहबरे आजम की कायदे आज़म पर जीत हुई | "
 
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" पुत्रा दे बैर ना मुके , माँ मुक गई पंजाबा दी "
पाकिस्तान के एक चैनल पर महाराजा रणजीत सिंह पर एक परिचर्चा .... जो लोग कहते हैं कि हमने ' गुड गवर्नेंस' की हैं उनको असल में तारीख का नहीं पता उनको तो सर छोटूराम पढ़ लेना चाहिए | पंजाब की अगर हुकमरानी को पढ़ना हैं तो सिर्फ सर छोटूराम को पढ़ लें महाराजा रणजीत सिंह तो बहुत बड़े मॉडल हैं |

परिचर्चा में रहबर-ए-आज़म सर छोटूराम के लिए अपने वज़ीर-ए-आला का भी मज़ाक उड़ा दिया .... कुछ तो बात हैं कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ......ऐसे ही नहीं फैन हम रहबर-ए-आज़म के ... बेशक आज सर छोटूराम के पंजाब का धर्म के नाम पर बंटवारा कर दिया गया हो पर रहबर-ए-आज़म आज भी पश्चिमी पंजाब के पंजाबियों के दिलों जिंदा है |


" जब पंजाब की धरती पर जिन्नाह के मुस्लिम फिरकापरस्ती के काले बादल मंडराने लगे और उसने यूनियनिस्ट पार्टी में सेंध लगानी चाही , और जब शहरी हिन्दू लाचार होकर अपने घरों में घुस गए , गांधी-नेहरू भी जिन्नाह के आगे घुटने टेक चुके थे , तब रहबर-ए-आज़म सर छोटूराम ने कायदे आजम जिन्नाह की ओर ताल ठोकी , उसे ललकारा , पटकी दी और जलील करके पंजाब से बाहर खदेड़ दिया | यह कोई सहज काम नहीं था , खास तौर पर मुस्लिम बहुल पंजाब में | "

जय छोटूराम
जय योद्धेय

 
4 नवंबर 1940 को लाहौर में छात्रों की एक सभा को संबोधित करते हुए सर छोटूराम ने स्पष्ट किया कि : :" मैं दिल से राष्ट्रवादी हूँ | कुछ संगठनों ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए मुझे एक बुरे से बुरे सांप्रदायिक व्यक्ति के रूप में पेश किया है , या पेश करने की कोशिश की है | लेकिन मैं बता देना चाहता हूँ कि सांप्रदायिक विचारधारा मुझे रास नहीं आती है | यदि महात्मा गांधी मौलाना आज़ाद में विश्वास व्यक्त करते हुए , और जवाहर लाल नेहरू आसफ अली के साथ मिलकर काम करने से सांप्रदायिक नहीं बने , तो मैं पंजाब के लोगों के हित में सर सिकंदर हयात खान से सहयोग करते हुए राष्ट्रवादी क्यों नहीं रह सकता ? "
 
Sir Chhoturam dwara shiksha ke kshetr me kiye gae karya , aaj mid -day meal , gaon me club aadi ka credit koi aur le raha hain , jabki in sabki shuruaat to choudhary sahab ne 1936 me wazir bane tabhi se kar di thi ....
सर छोटूराम का योगदान -1
अप्रैल 1938 में विकास मंत्री के तौर पर पद संभालने के बाद सर छोटूराम ने शिमला को छोड़कर शेष सभी जिलों की एक एक तहसीलों में विकास कार्य - योजनाओं का शुभारंभ किया , जो एक व्यापक देहात - विकास अभियान के रूप में सार्थक हुआ | इस दिशा में की गई प्रगति का संक्षपित ब्यौरा विकास मंत्री सर छोटूराम ने विधान सभा में दिया था :
1. शिक्षा :- 1938-39 और 1939-40 के वर्षों में शिक्षा विभाग ने देहात विकास योजना के अधीन इस को दिए गए धन का उपयोग जिलों की चुनी हुई तहसीलों में मॉडल स्कूलों की स्थापना करके किया हैं | 1938-39 में कुल अट्ठाईस स्कूल प्रारम्भ किए गए थे और इतनी ही संख्या में इस वर्ष खोले गए हैं | इस योजना का मुख्य उद्देश्य इन स्कूलों को हर प्रकार से आदर्श बनाना हैं | मिसाल के तौर पर इन में सर्वाधिक प्रवेश और सामान्य उपस्थिती सुनिश्चित की जाएगी ; इन के पास आधुनिक यंत्र और शिक्षा संबंधी सामान रहेगा ; इन से जुड़े हुए फार्मों में कृषि शिक्षा दी जाएगी | इनमें संबन्धित क्षेत्र की आवश्यकता के अनुरूप शिक्षा देने के लिए अच्छे से अच्छे तरीके इस्तेमाल किए जाएंगे ; इन स्कूलों में विभिन्न श्रेणियों में शिक्षा को देहाती रुझान का स्वरूप प्रदान किया जाएगा ; जहां तक सम्भव होगा इनमें सह-शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जाएगा ; इन स्कूलों में लड़कों के लिए दूध की व्यवस्था की जाएगी , मेडिकल अधिकारी निरीक्षण करेंगे और आवश्यकता पड़ने पर समुचित उपचार देंगे ; माता -पिता दिवस भी मनाए जाएंगे ; विशेष रूप से उस उद्देश्य के लिए चुने गए अध्यापक ग्रामोत्थान के कार्यों में रुचि लिया करेंगे ; सब प्रकार की शारीरिक शिक्षा देने और ग्राम क्लबों का संगठन करने में मार्गदर्शन करेंगे ; इन में चुस्त स्काउट-दल , और सम्भव हुआ तो बैंड भी होंगे ; ये स्कूल अपनी पत्रिका भी निकाला करेंगे , सरकारी दुकाने और समितियां चलाएँगे | इनमें रेडियो भी होंगे , और इनका रुझान - हॉबीज आदि के माध्यम से काम-धंधों से संबन्धित शिक्षा देने की ओर रहेगा | इसके लिए इन स्कूलों का उपयोग शिक्षा - प्रसार-अभियान को गति देने के लिए भी किया जाएगा |
क्रमश
 
सर छोटूराम का योगदान - 2
2) चिकित्सा :- वर्ष 1938-39 के लिए ग्राम विकास कार्यक्रम प्रथम अगस्त 1938 के दिन शुरू किया गया था | इस कार्यक्रम के अधीन तेईस तहसीलों के अठहतर स्वास्थ्य अधिकारियों को आदेश दिये गए थे कि वे जहां तक संभव हो प्रति सप्ताह कम से कम चार मुख्य गावों को दौरा मौका पर सेवाएँ उपलब्ध कराने के लिए करेंगे | वर्ष भर की अवधि में 312 गावों के निवासियों को उन के दरवाजे पर जाकर मेडिकल सहायता उपलब्ध कराई गई |
1938-39 के कार्यक्रम के अतिरिक्त 23 तहसीलों के , सरकार द्वारा चुने गए 78 स्वास्थ्य अधिकारियों ने वर्ष 1939-40 के तहत मुख्य गावों का दौरा जून 1939 से शुरू करने की ज़िम्मेदारी ली हैं , और चिकित्सा अधिकारियों द्वारा यह कार्यक्रम ज़ोर-शोर से चलाया जा रहा हैं |
 
सर छोटूराम का योगदान -3
3) जन-स्वास्थ्य :- वर्ष 1938-39 के दौरान शिमला जिला को छोड़कर 2600 रुपए प्रति जिला के हिसाब से कुल 78400 रुपए की राशि विशेष विकास कोष में से निम्न कार्यों पर खर्च की गई
अ) सफाई-कुओं का प्रावधान करने में ;
ब) नालियाँ बनाने और गलियाँ पक्का करने के लिए प्रशिक्षित श्रम उपलब्ध कराने के लिए |

दो हजार रुपए की राशि जिला शिमला को बावली -निर्माण हेतु दी गई | उपरोक्त कार्य प्रगति पर हैं और आशा हैं कि दिए गए धन का सदुपयोग होगा |
वर्तमान वित्त-वर्ष के लिए 275200 रुपए की राशि निम्न - वर्णित कार्यों पर खर्च करने के लिए मंजूर की गई हैं |
i) सफाई कुओं का प्रावधान (dumping wells) 36000 रुपए
ii) नालियों को पक्का बनाने के लिए प्रशिक्षित कारीगर उपलब्ध कराना 40000 रुपए
iii) अनुसूचित जातियों के लिए पानी के लिए कुएं खुदवाना 10000 रुपए
iv) विशेष पेयजल आपूर्ति के लिए 10000 रुपए

स्थानीय स्व-शासी संस्थाओं से उपरोक्त के संबंध में योजनाए मांगी गई हैं , और जब वे मिल जाएंगी तो कार्य प्रारम्भ कर दिया जाएगा |
 
सर छोटूराम का योगदान - 4
4. कृषि :- विशेष देहात विकास योजना में कृषि विभाग का योगदान जिला स्तरीय कृषि प्रदर्शनों और व्यापक प्राचार के रूप में निहित हैं , जो विशेष अस्थाई स्टाफ भर्ती करके , जिस में एक कृषि सहायक तथा दो मुक़द्दम और आवश्यक साजो सामान होता हैं , हर उस तहसील में कराए गए जो देहात विकास कार्यक्रम हेतु चुनी गई हैं | स्टाफ की नियुक्ति विधिवत की गई हैं | जिन के पास कृषि संबंधी अनुभव था वे सीधे मुक़द्दम लगा दिये गए और कृषि सहायकों की नियुक्ति चुनिन्दा तहसीलवार आवशयक प्रशिक्षण देने के बाद की गई हैं | इस अतिरिक्त स्टाफ के कर्तव्य बिलकुल वही और वैसे ही हैं जो विभाग के जिला स्तरीय प्रदर्शनी एवं प्रचार स्टाफ के हैं | ये वास्तव में उन के काम के पूरक हैं |
इस अतिरिक्त स्टाफ के माध्यम से वर्ष के दौरान नए कार्यक्षेत्र खोलने और जमींदारों को अधिक व्यापक स्तर पर सुधारे बीज व कृषि के नए-नए तरीके अपनाने , सिंचाई वाले कुएं में जल-आपूर्ति में सुधार करने , फसलों को कीड़ों , रोगों आदि से बचाने , सहायक उद्योग , जैसे फलदार वृक्ष लगाना , दुधारू पशु पालना , मधु मक्खी व मुर्गी पालन आदि अपनाने एवं परिचित कराने के कार्य किए गए |
 
सर छोटूराम का योगदान - 5
5. पशु-चिकित्सा विज्ञान :- इस कार्यक्रम के अधीन इस विभाग के लिए मंजूर की गई योजनाओं के ब्यौरा निम्न हैं :-
i) प्रारम्भिक पशु चिकित्सा केंद्र :- कुल 12136 रुपए की लागत से चुनी हुई तहसीलों में 121 प्रारम्भिक चिकित्सा केंद्र खोले गए हैं |
ii) एक दिवसीय पशु-प्रदर्शनी :- छोटी-छोटी जगहों पर , जहां से आस-पास के लोग सुबह आ कर शाम को घर लौट सके , सात मील के दायरे में , एक-दिवसीय पशु-प्रदर्शनी लगाई गई , इनाम दिए गए और खरीद -बेच का काम हुआ | इन प्रदर्शनियों में कुल 9747 रुपए के इनाम दिए गए | इनामों के कारण पशु-पालन का धंधा अधिक आकर्षक बना हैं , और पशु - पालकों की दिलचस्पी अच्छे पशु रखने और पालने में बढ़ी हैं |
iii) फूट-बाथ्स का निर्माण :- पशुओं को मुंह -खुर की बीमारियों से बचाने के लिए कुल 6709 रुपए की लागत से फूट-बाथ्स ( वह स्थान जहां औषधि मिश्रित जल में पशुओं के पाँव धोए जा सकें ) बनवाए हैं |
iv) पर्वतीय पशु-पालन में सुधार :- जिला कांगड़ा में पर्वतीय पशु पालन मे सुधार के लिए कुल 3132 रुपए की राशि खर्च की गई हैं जिस में छोटे पशु - पालकों को अनुदान दिए गए हैं और एक दिवसीय पशु-प्रदर्शनी लगाई गई हैं |
v) बकरी टिश्यू वायरस को बढ़ाया देना :- सीरम और वैक्सीन (Serum & Vaccine) के भंडारण हेतु 300 रुपए की कुल लागत से 5 रेफ्रीजेरेटर खरीदे गए हैं | कुल 1776 रुपए की राशि पंजाब पशु कॉलेज लाहौर में ' 1320700 खुराक बकरी - टिश्यू उत्पादन ' पर खर्च की गई हैं |
 
सर छोटूराम का योगदान - 6
6) सहकारिता :- वर्ष 1938-39 के दौरान इस कार्यक्रम को चलाने हेतु कील 100000 (एक लाख) रुपए का अनुदान दिया गया | उतना ही धन वर्ष 1939-40 में 125000 रुपए के अनुदान दिए गए | इस प्रकार योजना हेतु दो वर्ष के लिए सरकार द्वारा प्रदत्त राशि 325000 रुपए बनती हैं | दो लाख रुपए मार्च 1940 तक खर्च कर दिए जाने की उम्मीद हैं और शेष धन 1940-41 के दौरान खर्च किया जाएगा | इन अनुभवों के अधीन निम्न योजनाए कार्यरत हैं : 1) चकबंदी
2) नॉन क्रेडिट एंड बैटर लिविंग के लिए स्टाफ की व्यवस्था
3) कृषि उपज , अनाज आदि के मूल्य की राशि के भुगतान को बढ़ावा देना
4) प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
5) वर्तमान सोसाइटियों का प्रचार एवं सुधार
6) अन्न भंडारण केंद्र और दूसरे अलाभकारी (जो लाभ कमाने के लिए नहीं बल्कि सेवा की भावना से किए जाए ) कार्यक्रम
7) अन्न संग्रह हेतु सेंट्रल बैंक के ग्रांट
8) किसानों को अच्छी किस्म के डेट-प्लांट खरीदने में मदद
9) अन्न भंडारण के लिए अन्नागारों का निर्माण
10) कर्जा समझौता योजना
11) डिक्रियों के निष्पादन एवं निरसन (एलिमिनेश्न )
12) अंडों का स्तर - निर्धारण एवं बिक्री केन्द्रों हेतु विशेष सहायता
13) फल-वृक्षारोपण समितियों के लिए विशेष उप निरक्षक के वेतन हेतु योगदान
14) घी की बिक्री के प्रावधान हेतु विशेष सहायता
15) आढ़तियों / दुकानों के लिए विशेष ऑडिटरों के वेतन के आधे भाग का अनुदान
16) उतम रहन सहन एवं अच्छी खेती बाड़ी समितियों को जन-हित में सहायता
17) पशु एवं भेड़ पालन समितियों द्वारा सांडों और मेंढ़ों का खर्च चलाने के लिए सहायता
18) भूमि कटाव - निरोधक उपायों के लिए अनुदान
19) ईंख की पिराई के लिए कोल्हू लगाने के लिए अनुदान
20) महिलाओं के लिए घरेलू कार्यों में प्रशिक्षण हेतु कक्षाएँ
21) ऊन कताई समितियों के लिए सहायता के लिए प्रावधान
22) अच्छी नस्ल के पशुओं के लिए गुजारा भत्ता अनुदान
23) सुधारे बीजों की आपूर्ति एवं अन्य खर्चों के लिए

(अ) चकबंदी का कार्य जमींदारों के लिए कल्याणकारी सिद्ध हुआ हैं | समितियों और इन के सदस्यों की संख्या में बहुत बढ़ोतरी हुई हैं | चकबंदी के अतिरिक्त निम्न कार्य भी सफलतापूर्वक किए गए हैं ;
1) खेती के अयोग्य भूमि को कृषि -योग्य बना दिया गया हैं
2) बारानी ज़मीन को चाही में बदला गया हैं
3) सड़कों और रास्तों का प्रावधान किया गया हैं
4) पशु चारागाहों के लिए भूमि आरक्षित कर दी गई हैं
5) खाद के गढ़ों हेतु भूमि अलग छोड़ दी गई हैं
6) धार्मिक उद्देश्यों के लिए भूमि आरक्षित कर दी गई हैं
7) पशुओं के लिए जोहड़ बनाए गए हैं
8) बच्चों के खेलने के लिए क्रीडा-स्थल बनाए गए हैं
9) नए कुओ की खुदाई की गई हैं और झलारों की मुरम्मत की गई हैं

(ब) उत्तम रहन -सहन एवं अऋण समितियों :- इन समितियों से होने वाले लाभों को ऊन सब लोगों ने स्वीकार किया हैं जो ग्राम्य जीवन से सरोकार रखते हैं | समितियों और सदस्यों दोनों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी हो रही हैं | ये समितियां पुस्तकालय चला रही हैं , पशुओं के लिए पग-डंडियाँ बना रही हैं , लड़कियों के स्कूल चला रही हैं | स्वच्छता , आवश्यक टिकाकरन , घरों में रोशनदान , अफीम के प्रयोग पर पाबंदी और गैर कानूनी तरीके से शराब बनाने को रोकने की ओर ध्यान दे रही हैं ; ये गावों की पंचायतों और जिला देहात सुधार समिति से सहयोग करके जीवन बेहतर बनाने वाले आर्थिक , सामाजिक , भौतिक एवं नैतिक निर्माण में अत्यंत प्रभावशाली साधन बनी हुई हैं |
(स) दूसरे सहकारी कार्यक्रम :- इन क्रियाकलापों का पूरा विवरण देने में तो बहुत समय लग जाएगा , परंतु यह बात विश्वास के साथ कही जा सकती है कि ये कार्यक्रम सुचारु रूप से चल रहे हैं और जिन व्यक्तियों अथवा संस्थाओं का इन से संबंध है ऊन के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं |
 
सर छोटूराम का योगदान - 7
वर्ष 1938-39 के दौरान इस कार्यक्रम के लिए नौ योजनाओं को मंजूरी दी गई थी | वर्ष 1939-40 के दौरान पुरानी योजनाएँ चालू रही तथा और नई नौ योजनाएँ इनामे जोड़ दी गई | पिछले दो वर्षों के दौरान उपरोक्त 18 योजनाओं द्वारा प्राप्त उपलब्धियों का विवरण इस प्रकार हैं :-
1) पंजाब में सरेस -निर्माण के लिए चलते फिरते कार्यदल :- ये कार्यदल चमड़ा उदद्योग से निकलने वाले कचरे तथा मांसादी से सरेश तैयार करने कि विधि सिखाते हैं और इस प्रकार चर्म -उदद्योग वाले क्षेत्रों में इस ने उपयोगी कार्य किया हैं | अब तक यह दल रिवाड़ी और जिला रोहतक में जा चुका हैं और अब मुल्तान में कार्यरत हैं | इस दल द्वारा 25 शिक्षार्थियों के प्रशिक्षित किया जा चुका हैं जिसके फलस्वरूप सरेश बनाने के तीन कारखाने रोहतक में और एक रेवाड़ी में शुरू हुआ हैं |
2) पंजाब में आवश्यक तेल उदद्योग एवं सब्जी सुधार चलते फिरते कार्य दल :- यह पार्टी तेल आदि और साबुन में उन्नत तरीकों से प्रशिक्षण देती हैं | अब तक यह दल हिसार और रोहतक जिलों का दौरा कर चुका हैं और अब गुड़गाँव जिला में कार्य कर रहा हैं | अब तक 19 शिक्षार्थियों को खस का तेल , साबुन और बालों में लगाने के तेल बनाने के कार्यों में प्रशिक्षित कर चुका हैं | इस के परिणामस्वरूप तीन कारखाने लगे हैं , दो एलनाबाद और एक मिर्जापुर , जिला हिसार में | साबुन और तेल बनाने का एक कारख़ाना रोहतक रोहतक जिले के झज्जर कस्बे में भी लगा हैं |
3) देहाती क्षेत्रों में बाण-रस्सा निर्माण उदद्योग विकास चल कार्यदल :- इस का प्रारम्भ करने में समय लगा क्योंकि विभाग को योग्य प्रशिक्षक नहीं मिल सके थे और इसके अतिरिक्त देहाती क्षेत्रों के लिए उपयुक्त मशीनों का निर्माण किया जाना था | इस पार्टी ने अब पठानकोट तहसील के घरोटा में कार्य करना शुरू कर दिया हैं | यह बाण - रस्सी बनाने के प्रशिक्षण देती हैं |
4) पंजाब में सरपट पौधरोपन विकास योजना :- सरपट से बास्केट , टोकरी , कुर्सियाँ , मेज आदि के उदद्योग पर कश्मीर स्टेट का एकाधिकार रहा हैं , क्योंकि सरपट की आपूर्ति कश्मीर से ही उपलब्ध हैं | इस उदद्योग का प्रयोग सरकारी औदद्योगिक विदद्यालय रावलपिंडी में किया गया हैं , और बहुत सफल सिद्ध हुआ हैं | लेकिन उस उदद्योग को भली-भांति चलाने के लिए पंजाब में सरपट का उत्पादन करना आवश्यक हैं | इसके लिए चार सरपट पौधशालाए प्रांत के चार भिन्न भिन्न स्थानों पर स्थापित की गई हैं ; यानि सालिग्राम में , रावलपिंडी उदद्योग -विदद्यालय के परिसर में , तथा पालमपुर और सुजानपुर में | अब तक पौधरोपन का कार्यक्रम संतोषजनक एवं उत्साहवर्धक रहा हैं |
5) पंजाब में लोहारगिरी की सहायता के लिए चलता - फिरता प्रदर्शन दल :- जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हैं यह पार्टी लोहारों को कृषि में काम आने वाले लोहे के औजारों , घरेलू वस्तुओं एवं बर्तन बनाने में प्रशिक्षण देने के लिए शुरू कि गई हैं | इस पार्टी ने अपना कार्य गुड़गाँव जिले के धौज नामक स्थान पर शुरू किया हैं | इसने स्थानीय लोहारों को प्रशिक्षित किया हैं | अब उसी जिले की पलवल तहसील के औरंगाबाद में चली गई हैं |
6) कुल्लू में ऊन साफ एवं संस्कारित करने का केंद्र :- कहना चाहिए कि कुल्लू घाटी में वहाँ का मुख्य धंधा ऊन की कताई और बुनाई हैं लेकिन इस के विकास में बुनकरों तथा काती गई और साफ की गई ऊन के अभाव में बाधा पहुंची हैं | इस बाधा को दूर करने के लिए कुल्लू में ऊन की छंटाई , सफाई , संस्करण आदि के लिए केंद्र स्थापित किया गया हैं | मशीनें लगा दी गई हैं और हाल ही में केंद्र में कार्य शुरू हो गया हैं |
7) देहाती क्षेत्रों में महिलाओं के लिए चलती-फिरती प्रदर्शन पार्टी :- यह दल ग्रामीण महिलाओं को कटाई , सिलाई , कढ़ाई , बुनाई , खिलौना - निर्माण आदि की हस्तकलाओं में प्रशिक्षण देती हैं | इस दल ने रावलपिंडी जिला के तहसील से काम शुरू किया जहां एक वर्ष के दौरान 97 महिलाओं को प्रशिक्षित किया जा चुका हैं | यह पार्टी वहाँ अत्यंत लोकप्रिय सिद्ध हुई , और अब वहाँ के डिप्टी कमिश्नर की प्रार्थना पर इसे केम्बलपुर में भेज दिया गया है |
8) रेशम के धागे को नलकियों पर चढ़ाने के प्रशिक्षण के लिए चलती फिरती प्रदर्शनी पार्टी :- यह पार्टी रेशम के तारों को चरखी पर चढ़ाने का प्रशिक्षण देती हैं | पिछले वर्ष के दौरान इस ने गुरदासपुर , अमृतसर , होशियारपुर , शेखपुरा , कांगड़ा और सियालकोट जिलों के 55 गावों में प्रदर्शन दिये | 12 महिलाओं सहित 2000 से अधिक लोगों को चरखी के काम में पशिक्षन दिया |
9) पंजाब में मिट्टी - बर्तन उदद्योग के विकास हेतु चल पार्टी :- इस पार्टी ने हाल ही में गुजरांवाला में कार्य शुरू किया हैं | यहाँ के कुम्हार इस में बहुत रुचि दिखा रहे हैं और 18 प्रशिक्षणार्थियों को भर्ती किया गया हैं |
10) पंजाब में ग्रामीण लड़कों की एक विशेष संख्या के लिए भत्तों का आरक्षण :- इस योजना के तहत कपड़ा रंगाई और छपाई शाहदरा में सात रुपए प्रतिमास वाले दस भत्ते ग्रामीण क्षेत्रों के विध्यार्थियों को दिये गए हैं और इसी तरह दस रुपए भत्ते कसूर के सरकारी 'चर्म-कर्मी शिक्षणालय ' में दिये गए हैं |
11) पंजाब में रंगाई प्रदर्शन हेतु चलती फिरती पार्टी :- यह पार्टी कपड़ों और धागों की पक्की रंगाई का प्रदर्शन करती हैं , और इसके अतिरिक्त धुलाई एवं छपाई में प्रशिक्षण भी देती हैं | इस पार्टी ने चकवाल में कार्य आरंभ किया हैं और बहुत लोकप्रिय सिद्ध हुई हैं |
12) पंजाब में ऐरिकल्चर (रेशम कीड़ा पालन) का प्रारम्भ कराना :- पंजाब में ऐरिकल्चर की योजना को अप्रैल 1939 में मंजूरी दी गई थी | इस योजना पर कार्य आरंभ किया जा चुका हैं और आवश्यक प्रदर्शन एवं प्रशिक्षण हेतु सुजानपुर , दीना नगर , बटाला , होशियारपुर और कालका में प्रशिक्षण स्टाफ लगा दिया गया हैं |
13) पंजाब में सरकारी सहायता प्राप्त रेशम के कीड़े पालने वालों के लिए योजना :- इस योजना के तहत चुने हुए रेशम-कीड़ा पालकों को रेशम के कीड़े पालने और इन का बीज बनाने में सहायक सामान जुटाने में सहायता दी जाती हैं | यह योजना चालू वर्ष में शुरू की गई थी और इस के तहत लाभान्वित होने वाले 150 पालकों का चयन किया गया हैं |
14) अमोनियम क्लोराइड निकालने और बनाने हेतु उन्नत तरीकों का प्रदर्शन एवं प्रशिक्षण देने के लिए चल-पार्टी के कार्यक्रम को चालू वर्ष के दौरान मंजूरी दे दी गई हैं और इसने तहसील कैथल के गुमथला में कार्य शुरू कर दिया हैं |
15) कच्चा पोटाश के क्रूड कारबोरेट के लिए प्रदर्शन दल :- यह पार्टी पोटाश के क्रूड कारबोरेट के निर्माण का प्रशिक्षण देती हैं | इसे शिमला के कोट खाई क्षेत्र में प्रदर्शन हेतु लगाया गया हैं |
16) ऊन कताई और बुनाई प्रदर्शन चल-पार्टी , रावलपिंडी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए :- इस दल की स्थापना की मंजूरी जून के अंत में मिली थी | इस पार्टी के शीघ्र कार्य आरंभ करने के लिए प्रबंध किए जा रहे हैं |
17) चमड़े का काम (चर्मकारी के प्रदर्शन के लिए प्रथम चल पार्टी) :- चमड़े पर काम के लिए एक प्रदर्शन पार्टी दल नाकाफी रहा था | सो दूसरी पार्टी को मंजूरी दे दी गई हैं | इस पार्टी द्वारा काम शुरू करने के प्रबंध लगभग पूरे हो गए हैं ; और अंबाला डिवीजन में इस की स्थापना के लिए किसी उपयुक्त स्थान का चयन करने का काम जारी हैं |
 
सर छोटूराम का योगदान - 8
8) महिला-कल्याण से संबधित कार्य :-
1) महिला सहायक और उस का स्टाफ :- सरकार ने पहले ही सन 1939 में , कमिश्नर देहात पुननिर्माण पंजाब (महिला पक्ष) के कार्यक्रम में सहायक देने के लिए एक महिला सहायक एवं उसका स्टाफ , जिसमें एक कलर्क और एक चपरासी हैं , नियुक्त कर दिया गया था | महिला सहायकता को महिला-कल्याण -कार्यक्रम में सहायता देने के लिए लाहौर में एक प्रादेशिक महिला कल्याण समिति की स्थापना की गई हैं | इस कार्यक्रम को गति देने के लिए जिलों में महिला कल्याण सलाहकार समितियां बनाई गई हैं | महिला वर्ग में समाज सेवा को स्थायी बनाने के लिए सभी महिला समाज सेविकाओं का सहयोग लिया जा रहा हैं |
2) महिला कल्याण कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण :- ग्रामीण महिला कार्यकर्ताओं को घरेलू कार्यों में प्रशिक्षण देने के लिए प्रदेश भर के सभी 28 जिलों से चुनी हुई 28 प्रशिक्षणार्थियों से शुरू कर के लाहौर में प्रशिक्षण स्कूल चालू किया गया था | नौ महीने के प्रशिक्षण के पश्चात सितंबर 1939 में 28 महिलाओं को सभी जिलों में व्यापक विकास कार्यों ( महिला पक्ष ) के लिए चुनी गई तहसीलों के गावों में लगा दिया | नौ महीने का प्रशिक्षण पूरा हो जाने पर इन महिला प्रशिक्षणार्थियों को विकास योजना के दूसरे वर्ष के लिए व्यापक विकास कार्यों हेतु चुनी जाने वाली तहसीलों के गावों में लगाया जाएगा |
3) महिला-कल्याण कार्यकर्ताओं को रोजगार :- 28 लड़कियों का प्रथम दल जिसे सितंबर 1939 से चुनी हुई तहसीलों में लगाया था | अपना कार्य सुचारु रूप से शुरू कर चुका हैं | वे अपनी-अपनी नियुक्ति के गावों में महिला कल्याण केंद्र स्थापित करने के कार्य में व्यस्त हैं और उन में से बहुतों को ग्रामीण महिलाओं का सहयोग प्राप्त करने में सफलता मिली हैं |
 
सर छोटूराम का योगदान - 9
9) प्रचार योजना
1) नमूने (मॉडल) एवं चल चित्र :- प्रांत की ग्रामीण जनता को देहात उत्थान कार्यक्रम को सरलता से समझाने के लिए नमूने और जादुई प्रकाश-चलचित्र तैयार किए गए हैं | इन्हें मेलों , प्रदर्शनियों , पशु प्रदर्शनियों और जलसों आदि में दिखाया जाता हैं | ये जन-प्रशिक्षण का सर्वोत्तम साधन सिद्ध हुए हैं |
2) सामान्य स्कूल अध्यापकों को प्रशिक्षण :- देहात पुनरुत्थान के कार्यों में चार सामान्य स्कूलों के शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जा चुका हैं | वे लोग यही प्रशिक्षण देहात के अन्य आम स्कूलों को दे सकेंगे , जो ग्रामीणों के बीच में रहने के कारण ग्रामोत्थान का सर्वोत्तम साधन सिद्ध होंगे |
3) ग्रामोफोन रिकॉर्डज :- ग्रामोफोन रिकॉर्ड तैयार करने के लिए गानों और भजनों का संग्रह किया गया हैं | मेले , प्रदर्शनियों , जलसों आदि में ग्रामोफोन रिकॉर्ड बजाए जाते हैं और ग्रामीण जनता के लाभ के लिए ग्रामीण कार्यकर्ताओं में बांटे गए हैं |
4) पारितोषिक एवं मुलाबले :- देहात कल्याण से जुड़े हुए विषयों पर निबंध आमंत्रित किए जाते हैं और सर्वोत्तम निबंधों पर इनाम दिए जाएंगे | अच्छी नस्ल के पशु-पालकों , घरों में सफाई-स्वच्छता रखने वालों तथा देहात - विकास की दिशा में सराहनीय कार्य करने वाले ग्रामीण कार्यकर्ताओं को भी इनाम दिए जाएंगे |
5) नाटक :- देहाती नाटक लिखने और खेलने की कला में 23 शिक्षकों को प्रशिक्षित किया गया हैं , जो मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा देने के भी सर्वोत्तम साधन हैं | इस अनुदान में से थोड़ी सी सहायता देकर शिक्षकों को स्कूलों में ड्रामा पार्टियां खड़ी करने को कहा गया हैं |
6) प्रसारण :- देहात के लिए विशेष कार्यक्रम प्रसारित किए गए | ग्रामीणों की रुचि और उनकी सुनने-समझने की योग्यता को ध्यान में रखते हुए सीधी बातचीत की बजाए वाद-विवाद का तरीका अपनाया गया हैं | नाटकों की बहुत मांग रही हैं | इसको प्रचार का सर्वोत्तम प्रकार पाया गया हैं | 22 नाटकों का प्रसारण किया गया जो ग्रामों में प्रचलित विभिन्न प्रकार की सामाजिक बुराइयों तथा अच्छे एवं बुरे रीति - रिवाजों से संबन्धित थे | बाजार-भाव प्रतिदिन के कार्यक्रम का आवश्यक अंग हैं |
 
सर छोटूराम द्वारा देहात पुननिर्माण करने की दिशा में किए गए निम्न उपाए :-
1) गावों में शुद्ध , ताजा एवं मीठा पेयजल उपलब्ध कराने की योजना शुरू की गई |
2) सर छोटूराम का यह दावा था कि हिसार , मुजफ्फर गढ़ , झेलम व अन्य जिलों में पानी आपूर्ति पर लाखों रुपए खर्च किए गए थे |
3) किसानों द्वारा अपनी उपज गावों से दूर मंडी में ले जाने को प्रोत्साहन देने के लिए सड़कों को पक्का किया गया |
4) ग्रामीण औषधालयों में चिकित्सा अधिकारी नियुक्त किए गए | आसानी से न पहुँच पाने वाले स्थानों के विशेष मामलों में सेवाएँ देने के लिए विशेष प्रोत्साहन दिया गया |
5) गावों में जच्चा-बच्चा हस्पताल एवं जच्चा-बच्चा केंद्र स्थापित किए गए |
6) जमींदार (किसान ) कल्याण-कोष की स्थापना की गई थी | किसानों की ऋण संबन्धित जरूरतें पूरी करने में इस कोष की महत्वपूर्ण भूमिका रही और इस के द्वारा किसान को सूदखोर महाजन के खूनी पंजे से बचाया जा सका |
 
सर छोटूराम द्वारा देहात क्षेत्रों में अछूतो की आवश्यकताओं की ओर विशेष ध्यान दिया गया था | जिसका संक्षपित ब्यौरा इस प्रकार हैं :-
1) उन को पंचायतों के चुनावों में मत देने का अधिकार दिया गया |
2) बेगार लेने पर कानूनी पाबंधी लगाई गई |
3) सभी कुएं उन के उपयोग के लिए खोल दिये गए और अपने अलग कुएं बनाने के लिए विशेष सुविधाएं दी गई |
4) सर छोटूराम ने सदन में घोषणा की थी कि अछूतो के चेहरे पर से भेद-भाव का दाग मिटाने के लिए उन में तीन हजार एकड़ भूमि आवंटित किए जाने के आदेश दिए गए हैं |इस से उन्हें उच्च जातियों के हिंदुओं के निकट आने में मदद मिली हैं |
5) ग्रामीण उदद्योग को अनुदान दिए गए तथा आसान शर्तों पर कर्ज उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया |
6) एक विशेष अनुपात में अछूतो के लिए मुंशी और जिलेदार के पद आरक्षित किए गए |
7) कर्जा समझौता बोर्डो ने कर्ज संबंधी मामलों को आसान एवं सुविधाजनक बनाने में किसानों को मदद दी |
8) सर छोटूराम के अथक प्रयासों के कारण राज्य सेवाओं में किसानों के लिए आरक्षण का प्रावधान संभव हो पाया | पाँच प्रतिशत आरक्षण अछूतो के लिए कर दिया गया |
9) देहात पुननिर्माण के कार्यक्रम में शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया | सर छोटूराम ने एक बार सदन में गर्जना की , " अतीत में सरकारों द्वारा देहाती वर्गों की शिक्षा के प्रति अपनाया गया उपेक्षाभाव और उन की आर्थिक स्थिति सुधारने में बरती गई लापरवाही का ही परिणाम था कि किसान सूदखोर के पंजे में फसता चला गया | किसान की वर्तमान विवशता बहुत सीमा तक सरकार की अपराधपूर्ण लापरवाही के कारण हैं |
 
सर छोटूराम का योगदान
स्वभाव और शिक्षा दोनों ही तरह से सर छोटूराम की ग्रामीण लोगों के उत्थान मेन गहरी दिलचस्पी थी | ग्राम्य जीवन का शायद ही ऐसा कोई पहलू हो जो विकास के मामले उनकी खोजी नजर से ओझल हो पाया हो | सर छोटूराम ने अपने पहले मंत्री-काल (1924-26) के दौरान ही ग्रामीण पुनरुत्थान की प्रक्रिया निश्चित , नियोजित एवं व्यवस्थित कर ली थी | मंत्रिपद पर न रहने के बाद भी स्वयं को उन समस्याओं से जोड़े रखा जो ग्रामीण उत्थान के मार्ग में रोड़ा बनी हुई थी | सन 1935 में विधान सभा के सत्र के दौरान उन्होने बहुत से सवाल उठाए थे , और उस समय के स्थानीय स्व-शासन मंत्री पंजाब , डॉ गोकलचंद नारंग द्वारा दिये गए जवाबों से सरकार द्वारा देहात -उत्थान की दिशा में किए गए प्रयासों का अतिरिक्त ब्यौरा :
1) हाल में 23 सरकारी औदद्योगिक स्कूल हैं , जिनमें से एक रेवाड़ी के देहाती क्षेत्र में स्थित है जिसमें शहरी लड़कों की अपेक्षा देहाती लड़कों की संख्या अधिक हैं | कुल्लू के स्कूल में लगभग सभी विध्यार्थी ग्रामीण क्षेत्र से हैं | शेष स्कूल और संस्था कस्बों में हैं लेकिन इन में से बहुत सो में ग्रामीण क्षेत्र के दस्तकारों को प्रशिक्षित करने , और प्रशिक्षण के बाद उन्हें घरेलू उद्द्योग धंधों के रूप में काम पर लगाने का विशेष प्रावधान किया गया हैं |
2) इन स्कूलों में सिखाई जाने वाली दस्तकारी , यथा बढ़ईगीरी , लोहारगिरी , वार्निश बनाना , रंगाई और छपाई , चमड़ा रंगने और चमड़े का सामान बनाना आदि मुख्यतः घरेलू उद्योग और ग्रामीण क्षेत्रों की जरूरतों के मुताबिक है | इसी प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कहा जा सकता है कि लियाकत पुर के सरकारी औदद्योगिक स्कूल में देहाती क्षेत्रों के किसानों कि जरूरते पूरी करने के लिए हाल ही में कृषि-औजारों का निर्माण शुरू किया गया हैं |
3) वर्तमान में डॉ घुमंतू प्रदर्शन दल हैं , अर्थात चलती-फिरती बुनाई प्रदर्शन पार्टी हैदराबाद , जो कि मियावाली जिले का एक गाँव हैं , और ऊन कताई - बुनाई चलती- फिरती प्रदर्शन पार्टी हिसार | इन दोनों दलों ने ग्रामीण लोगों को प्रशिक्षित करने में ढेर सारा कार्य किया हैं | इतना अधिक कि दूसरे जिलों में इन की बहुत मांग हैं |
4) सरकारी औध्योगिक स्कूलों में से छह में बुनकरों के लिए प्रौढ़ कक्षाएँ हैं | यह आशा की जाती हैं कि इन प्रौढ़ कक्षाओं के जरिये धरेलु दस्तकार और देहाती क्षेत्रों के बुनकर मुख्यतया लाभान्वित होंगे |
5) आधुनिकतम औजारों एवं कल-पुर्जों के निर्माण - कार्य , हौजरी उद्योग एवं पक्की रंगाई आदि के क्रियात्मक प्रदर्शनों का आयोजन , उद्योग विभाग द्वारा मेलों , त्यौहारों एवं प्रदर्शनियों के अवसरों पर , जहां किसान और दूसरे देहाती लोग भरी संख्या में आते हैं , किया जाता हैं |
6) हथकरघा बुनकरों को उन्नत कल-पुर्जों से परिचित कराने के लिए उद्योग विभाग का कपड़ा निरीक्षक ऊन केन्द्रों का दौरा करता रहता हैं , जहां हथकरघा से बुनाई का काम होता हैं |
7) कलात्मक महत्व की कृतियों और डिज़ाइनों की आज की मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन कार्यों में कला एवं चित्रकारी कर्मियों , जिन में देहाती क्षेत्रों के लोग भी शामिल हैं , की सहायता से लाहौर में कला एवं चित्रकारी केंद्र स्थापित किया गया हैं |
8) चमड़ा - रंगाई उद्योग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से , ग्रामीण चर्म रंगाई कर्मियों को आधुनिकतम जानकारी देने के लिए सन 1928 में एक चलते-फिरते प्रदर्शन दल का आरंभ किया गया था | इसने मुख्यतः देहाती क्षेत्रों का दौरा किया | इस दल ने जरायम पेशा लोगों के प्रशिक्षण के लिए विशेष प्रबंध किया , जिनके इन प्रदर्शनों द्वारा पर्याप्त लाभान्वित होने की सूचना हैं | सन 1934 से जालंधर में एक केन्द्रीय प्रशिक्षण संस्थान का खुलना संभव हो पाया , जो कुछ प्रशिक्षित लोगों के अतिरिक्त देहाती क्षेत्र के चमारों को भी प्रशिक्षण दे रहा हैं |
9) देहाती क्षेत्रों के उद्योगों , जैसे बुनाई , जैम बनाना , चमड़ा रंगना , कटलरी , चीनी गुड़ बनाना , खिलौने बनाना , तेल के मिल लगाना आदि को बढ़ावा देने के लिए एक लाख रुपए के कर्जे दिये गए हैं |
10) विभाग ने देहाती क्षेत्रों में लाख (पदार्थ) के उद्योग की संभावनाओं का पता लगाने का काम हाथ में लिया हैं |
11) नए खर्चों की सूची में हस्तकलाओं में प्रशिक्षण देने के लिए महिलाओं की चलती-फिरती प्रदर्शन पार्टी के लिए प्रावधान किया गया हैं | यह पार्टी देहाती क्षेत्रों में महिलाओं को कढ़ाई और सुई के काम (कसीदाकारी ) जैसी हस्तकलाओं में प्रशिक्षण देने का काम शुरू करेगी |
12) रेशम के कीड़ों के पालन के विकास की योजना सरकार के विचारधीन है , जिससे किसानों और देहाती क्षेत्रों के दूसरे रेशम कीड़ा-पालकों को लाभ होगा |

सर छोटूराम चाहते थे कि पंजाब का नाम दुनियाँ भर में हो और अपने निरंतर प्रयासों से वह वास्तव में ही ऐसा कर पाए | इन सबके लिए उनकी प्रशंसा हुई और कुल दस वर्ष से कुछ अधिक के थोड़े से मंत्रित्व-काल में ही उन्होने पंजाब को सर्वाधिक उन्नत प्रान्तों की श्रेणी में ला दिया था | यद्द्पि उनकी योजनों और कार्यों का केंद्र बिन्दु गरीब किसान था तथापि उन्होने अन्य वर्गों , विशेषकर दलित की आवश्यकतों की भी अनदेखी नहीं की | वह उन्हे दूसरी जमींदार जातियों के बराबर लाना चाहते थे | इस उद्देश्य के प्राप्ति के लिए उन्होने सरकार द्वारा नई तोड़ी गई और कृषि योग्य बनाई गई हजारों एकड़ भूमि अछूतो में बँटवाई | उन का विचार था , और इस में उन के साथ उन के समर्थन और विरोधी समान रूप से सहमत थे , कि पंजाब के देहात की उन्नति में ही पूरे देश की उन्नति निहित हैं | जिस किसी भी क्षेत्र में उनकी सेवाएँ ली गई वहीं स्पष्टरुपेण उत्तम परिवर्तन हुआ | भारत के आधुनिक आर्थिक इतिहास में उनके द्वारा किए गए अग्रणी एवं आदर्श उपायों के लिए उन्हे जन-नेता के रूप में जाना-समझा गया हैं |
 
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