vivektaliyan
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मेरे सपने 
मेरे मन का गीत यहाँ पर,
कौन भला सुनने वाला.
साथ बैठ के प्रेम से उसको,
कौन भला गुनने वाला.
सोचा है के चाँद पे जाऊं,
या उसको ही जमीन पे लाऊं.
सोचा है के उडूं मैं इतना,
गरुड़राज भी उड़ा ना जितना.
सोचा सागर तल तक जाऊं,
मत्स्यों से जी भर बतियाऊं .
कुबेर ने देखा ना जितना ,
अंजुरी में मोती भर लाऊं.
या जंगल में ही जा बैठूं,
जहाँ राजनिती, कूटनिती ना हो.
देख नृत्य लता, वल्लरियों का.
अली गुंजन रस में खो जाऊं.
जाऊं हिमालय पर ही शायद,
बाल भागीरथी से मिल आऊं .
युगों से साधनारत जो है,
उस यति से बतियाऊं.
निष्कलंक झरनों का कल कल,
सुनूँ ,बांसुरी मैं भी बजाऊं.
वहीं किसी भील की बूटी से,
मन के सारे दर्द मिटाउन.
देवदार के वृक्ष तिकोने,
देखूं और जब मैं थक जाऊं.
श्वेत तुषार के नर्म बिछौने,
पर जाकर मैं सो जाऊं.
या फिर चढूं बरगद बाबा पर,
चिडियों की चीं चीं सुनने को.
चकवा-चकवी का कोलाहल,
या फुदकती गिलहरी देखने को.
या छोटा ही मैं हो जाऊं,
कतार में मैं भी लग जाऊं,
पीछे इस चींटी रानी के.
मूलमंत्र कुछ सीख लूं मैं भी,
कठिन परिश्रम करते जाने के.
पिछवाडे गड्ढे में जाके,
मेढक से टरराना सीखूँ.
इतनी सीलन और बदबू में,
हँसना और मुस्काना सीखूँ.
या फिर जाऊं मरघट पर मैं,
श्वान,श्रीगाल,कौवों गिद्ध से मिलने.
कुछ कहने को उनसे अपने दुःख,
और कुछ गम उनके भी सुनने.
इतने सपने देख तो लिए,
कौन इन्हें बुनने वाला.
मन का मंदिर बंद हो गया ,
मदिरालय खुलने वाला.
मेरे मन का गीत भला,
कौन यहाँ सुनने वाला.
कभी कभी जब बचपना तारी हो जाता है तब लिखता हूँ ऐसे...........
मेरे मन का गीत यहाँ पर,
कौन भला सुनने वाला.
साथ बैठ के प्रेम से उसको,
कौन भला गुनने वाला.
सोचा है के चाँद पे जाऊं,
या उसको ही जमीन पे लाऊं.
सोचा है के उडूं मैं इतना,
गरुड़राज भी उड़ा ना जितना.
सोचा सागर तल तक जाऊं,
मत्स्यों से जी भर बतियाऊं .
कुबेर ने देखा ना जितना ,
अंजुरी में मोती भर लाऊं.
या जंगल में ही जा बैठूं,
जहाँ राजनिती, कूटनिती ना हो.
देख नृत्य लता, वल्लरियों का.
अली गुंजन रस में खो जाऊं.
जाऊं हिमालय पर ही शायद,
बाल भागीरथी से मिल आऊं .
युगों से साधनारत जो है,
उस यति से बतियाऊं.
निष्कलंक झरनों का कल कल,
सुनूँ ,बांसुरी मैं भी बजाऊं.
वहीं किसी भील की बूटी से,
मन के सारे दर्द मिटाउन.
देवदार के वृक्ष तिकोने,
देखूं और जब मैं थक जाऊं.
श्वेत तुषार के नर्म बिछौने,
पर जाकर मैं सो जाऊं.
या फिर चढूं बरगद बाबा पर,
चिडियों की चीं चीं सुनने को.
चकवा-चकवी का कोलाहल,
या फुदकती गिलहरी देखने को.
या छोटा ही मैं हो जाऊं,
कतार में मैं भी लग जाऊं,
पीछे इस चींटी रानी के.
मूलमंत्र कुछ सीख लूं मैं भी,
कठिन परिश्रम करते जाने के.
पिछवाडे गड्ढे में जाके,
मेढक से टरराना सीखूँ.
इतनी सीलन और बदबू में,
हँसना और मुस्काना सीखूँ.
या फिर जाऊं मरघट पर मैं,
श्वान,श्रीगाल,कौवों गिद्ध से मिलने.
कुछ कहने को उनसे अपने दुःख,
और कुछ गम उनके भी सुनने.
इतने सपने देख तो लिए,
कौन इन्हें बुनने वाला.
मन का मंदिर बंद हो गया ,
मदिरालय खुलने वाला.
मेरे मन का गीत भला,
कौन यहाँ सुनने वाला.
कभी कभी जब बचपना तारी हो जाता है तब लिखता हूँ ऐसे...........