Mere sapne

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vivektaliyan

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मेरे सपने :)

मेरे मन का गीत यहाँ पर,
कौन भला सुनने वाला.
साथ बैठ के प्रेम से उसको,
कौन भला गुनने वाला.

सोचा है के चाँद पे जाऊं,
या उसको ही जमीन पे लाऊं.
सोचा है के उडूं मैं इतना,
गरुड़राज भी उड़ा ना जितना.

सोचा सागर तल तक जाऊं,
मत्स्यों से जी भर बतियाऊं .
कुबेर ने देखा ना जितना ,
अंजुरी में मोती भर लाऊं.

या जंगल में ही जा बैठूं,
जहाँ राजनिती, कूटनिती ना हो.
देख नृत्य लता, वल्लरियों का.
अली गुंजन रस में खो जाऊं.

जाऊं हिमालय पर ही शायद,
बाल भागीरथी से मिल आऊं .
युगों से साधनारत जो है,
उस यति से बतियाऊं.

निष्कलंक झरनों का कल कल,
सुनूँ ,बांसुरी मैं भी बजाऊं.
वहीं किसी भील की बूटी से,
मन के सारे दर्द मिटाउन.

देवदार के वृक्ष तिकोने,
देखूं और जब मैं थक जाऊं.
श्वेत तुषार के नर्म बिछौने,
पर जाकर मैं सो जाऊं.

या फिर चढूं बरगद बाबा पर,
चिडियों की चीं चीं सुनने को.
चकवा-चकवी का कोलाहल,
या फुदकती गिलहरी देखने को.

या छोटा ही मैं हो जाऊं,
कतार में मैं भी लग जाऊं,
पीछे इस चींटी रानी के.
मूलमंत्र कुछ सीख लूं मैं भी,
कठिन परिश्रम करते जाने के.

पिछवाडे गड्ढे में जाके,
मेढक से टरराना सीखूँ.
इतनी सीलन और बदबू में,
हँसना और मुस्काना सीखूँ.

या फिर जाऊं मरघट पर मैं,
श्वान,श्रीगाल,कौवों गिद्ध से मिलने.
कुछ कहने को उनसे अपने दुःख,
और कुछ गम उनके भी सुनने.

इतने सपने देख तो लिए,
कौन इन्हें बुनने वाला.
मन का मंदिर बंद हो गया ,
मदिरालय खुलने वाला.

मेरे मन का गीत भला,
कौन यहाँ सुनने वाला.


कभी कभी जब बचपना तारी हो जाता है तब लिखता हूँ ऐसे...........
:)
 
आत्म गरल के दीप


आत्म गरल के दीप

आत्म गरल के दीप हमेशा,
सुबह जलाए जाते हैं.
मीत बिछोह के गीत बड़े ही,
सुर में गाए जाते हैं.

माँ की ममता के चर्चे,
बटुओं में पाए जाते हैं.
बाबू जी के दिए वचन,
तकिये को सुनाये जाते हैं.

हर बहना की है पुकार यही,
आँसू पर अधिकार नहीं.
नीले पीले , काढे रुमाल,
बस दिल से लगाए जाते हैं.

वो छुटके की ,
पाती सा कुछ.
वो मिट्टी के,
हाथी सा कुछ.
वो अम्मा की ,
धोती सा कुछ.
वो छुटकी की,
चोटी सा कुछ.
या पापा की,
छाती सा कुछ.

अब भी, जब भी ,
दिख जाता है .
हम हहर सा,
जाया करते हैं.

मृग तृष्णा की आस ना हो.
या लोगों को अहसास ना हो.
कोशिश करते हैं लेकिन,
किलकारी से,
सिसकारी से.
स्वर कुछ तो,
निकल ही जाते हैं.

आत्म गरल के दीप हमेशा,
सुबह जलाए जाते हैं.
मीत बिछोह के गीत बड़े ही,
सुर में गाए जाते हैं.
 
कुछ पन्ने तन्हाइयों से..........
मैंने कहा नहीं...

आज मैं उससे मिला था,
वही आँखें, वही गाल,
आवाज की लोच,
चलने का अंदाज.
आज!!!! उससे कह ही देता,
पर उसने सरनेम बदल लिया है.


माँ.......

मौत हर बार मेरे दर से,
यूँ तनहा लौट जाती है.
जोर उसका कम नहीं लेकिन,
कुंडी,
माँ की दुआ खोलने आती है.


खून सूख गया....

तुम्हे शिकायत है ,
मैंने बहुत दिनों से,
कोई गीत नहीं लिखा,
लाल स्याही में.
वो स्याही नहीं थी,
पगली!!!!


अगर

अगर मैं अमजद होता,
तो भी तुम मेरे साथ खाते ??
हाथ मिलाते मुझसे,
भाभी से मिलवाते??
माथे पर ये शिकन??
घबराओ मत,
मैं अविनाश ही हूँ.
तुम अमजद के काबिल नहीं.


मुझे यूँ याद रखो...

रब मुझे खुशी ना देना,
ना ही देना दौलत का अम्बार.
बस देना शक्ती तुम इतनी,
बाँट सकूँ दुनिया में प्यार.
याद ना आऊं लोगों को मैं,
ना लगे उन्होंने प्रीत है खोयी.
याद करे अगर भी तो ऐसे...
जैसे फूल पलाश मैं कोई .
......
जिन्दगी की रहगुजर में ,
साथी मिला था कोई.
आँखों को हंसा गया वो,
पलकें अकेली रोई.


तुम्हारी याद

तेरा नाम लिख लिख के,
कलम मैं तोड़ देता हूँ.
मेरी आँखों में जो तेरी,
इक तस्वीर सी है,
चमक ना खो दे वो अपनी,
न ही पड़ जाए वो धुंधली,
मैं तेरी याद में आंसू ,
बहाना छोड़ देता हूँ.
 
पाँच साल से

:)
पाँच साल से

तुम्हारे खतों का आना,
मेरा पढ़ना, रोना,
चुपके से.

और कभी कभी,
खिलखिला देना,
चांदनी बिखरा के.

जारी है,
सतत, अनवरत,
पाँच साल से.

पूछना तुम्हारा,
कैसे हो???
अच्छे होगे.......
खुश ही होगे,

मैं भी ठीक हूँ,
चिंटू के पापा भी.
खरीदी पिछले महीने,
नयी एक गाडी है.

सतत, अनवरत.
पाँच साल से.

कैसे लिखूं???
पाँच साल पहले,
तुमने दिल तोडा था.
अब धड़कन टूट रही है,
मुझे दिल की बीमारी है,
पाँच......................साल से........
 
अगर मुझे देना तो...........

अगर मुझे देना तो...........

अर्जुन सा कौशल ना देना,
ना देना कर्ण सा तेज.
एकलव्य सा धीरज देना,
और भीष्म सी शर की सेज.

हनुमान सा बल ना देना,
ना राम धनुष की टंकार.
भरत सा निश्छल मन तुम देना,
कुश की वीणा के कुछ तार.

शंकर का त्रिशूल ना देना,
ना केशव का छल व्यवहार.
देना ही हो तो दे देना,
राजा नल सा ह्रदय उदार.

जयंत सामान रूप ना देना,
ना देना वेदों का सार.
हरिश्चंद्र के कंधे देना,
उठा सकें जो सच का भार.

धर्मराज सा पुण्य ना देना,
ना विष्णु का सा अधिकार.
देना भाग्य मुझे श्रवण सा,
जान सकूँ मात पिता पर वार.

मुझे सीता सा शील ना देना,
ना देना मीरा की चाहत.
जो यम् के भी कदम डिगा दे,
उस सावित्री सी दो ताकत.

कल्पतरु की आस ना देना,
ना देना अमृत की प्यार.
लोगों की आँखों में देना,
तुम मुझ पर विश्वास.

मुझको चाहे जीत ना देना,
ह्रदय का सच्चा गीत ना देना.
शीश कटा दूं पर मैं अपना ,
कहे जो कोई मीत पुकार.
 
बात बहुत मामूली है…

रात तब नहीं होती जब अंधेरा आ जाता है,
रात तब होती है जब उज़ाला चला जाता है……
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!

दर्द तब नहीं होता जब कोई भुला देता है,
दर्द तब होता है जब वो याद बहुत आता है……..
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!

मैं तब नहीं थकता जब बहुत चल लेता हूँ,
मैं बहुत थक जाता हूँ जब खुद को अकेला पाता हूँ…
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!


ज़ुल्म तब नहीं बढ़ता जब लोग बुरे हो जाते हैं,
ज़ुल्म तब बढ़ जाता है जब अच्छे लोग सो जाते हैं….
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!
 
मैं और मेरा बचपन

मैं और मेरा बचपन
बचपन में कितना खुश था
मैं था और मेरे चन्द खिलोने !
बचपन में मेरी गुडिया की शादी के लिए कितने गुड्डे थे ,
आज बहन के हाँथ पीले करने में व्यस्त हूँ !........................
बचपन में बुढी दादी का चश्मा लगाकर घूमता था,
आज माँ के चश्मे का कांच लगवाने की फुरसत नहीं ..!
बचपन में लोरी सुनकर सोता था माँ की गोद में ,
आज पत्नी की उलझी , जुल्फों को सुलझाने में व्यस्त हूँ !
 
रात तब नहीं होती जब अंधेरा आ जाता है,
रात तब होती है जब उज़ाला चला जाता है……
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!

दर्द तब नहीं होता जब कोई भुला देता है,
दर्द तब होता है जब वो याद बहुत आता है……..
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!

मैं तब नहीं थकता जब बहुत चल लेता हूँ,
मैं बहुत थक जाता हूँ जब खुद को अकेला पाता हूँ…
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!


ज़ुल्म तब नहीं बढ़ता जब लोग बुरे हो जाते हैं,
ज़ुल्म तब बढ़ जाता है जब अच्छे लोग सो जाते हैं….
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!

Really Gud
 
bahut badiya vivek bhai.....very nice poem..

मैं और मेरा बचपन
बचपन में कितना खुश था
मैं था और मेरे चन्द खिलोने !
बचपन में मेरी गुडिया की शादी के लिए कितने गुड्डे थे ,
आज बहन के हाँथ पीले करने में व्यस्त हूँ !........................
बचपन में बुढी दादी का चश्मा लगाकर घूमता था,
आज माँ के चश्मे का कांच लगवाने की फुरसत नहीं ..!
बचपन में लोरी सुनकर सोता था माँ की गोद में ,
आज पत्नी की उलझी , जुल्फों को सुलझाने में व्यस्त हूँ !
 
अगर मुझे देना तो...........

अर्जुन सा कौशल ना देना,
ना देना कर्ण सा तेज.
एकलव्य सा धीरज देना,
और भीष्म सी शर की सेज.

हनुमान सा बल ना देना,
ना राम धनुष की टंकार.
भरत सा निश्छल मन तुम देना,
कुश की वीणा के कुछ तार.

शंकर का त्रिशूल ना देना,
ना केशव का छल व्यवहार.
देना ही हो तो दे देना,
राजा नल सा ह्रदय उदार.

जयंत सामान रूप ना देना,
ना देना वेदों का सार.
हरिश्चंद्र के कंधे देना,
उठा सकें जो सच का भार.

धर्मराज सा पुण्य ना देना,
ना विष्णु का सा अधिकार.
देना भाग्य मुझे श्रवण सा,
जान सकूँ मात पिता पर वार.

मुझे सीता सा शील ना देना,
ना देना मीरा की चाहत.
जो यम् के भी कदम डिगा दे,
उस सावित्री सी दो ताकत.

कल्पतरु की आस ना देना,
ना देना अमृत की प्यार.
लोगों की आँखों में देना,
तुम मुझ पर विश्वास.

मुझको चाहे जीत ना देना,
ह्रदय का सच्चा गीत ना देना.
शीश कटा दूं पर मैं अपना ,
कहे जो कोई मीत पुकार.
भाई काबीले तारीफ़ लीखा है आप ने ! भगवान तुम्हारी लेखनी को सलामत रखे !!!
 
तुमसे पूछूँ


तुमसे पूछूँ


माँ......
मैं कैसा भी रहूँ,
तुम मेरी ही कह्लाओगी ना?

मेरी हर हार पर दुखी हो कर,
सर सहला कर समझाओगी ना?
जीत कर आता हूँ तो,
जी भर कर देखती हो जैसे.
वैसे ही मेरी हार पर भी,
ममता अपनी लुटाओगी ना??

हाथ नन्ही उँगलियों में थमा कर,
चलना सिखाया था एक दिन.
आज भी ठोकर लगेगी ,
तो हुलस हुलस जाओगी ना??

बड़ा हो गया हूँ ,
जमाने की खातिर.
मगर थाकुंगा तो,
अपने आँचल में सुलाओगी ना??

करूं लाख भूलें,
मारोगी मुझको.
फिर हल्दी लगा कर,
चोटों पर पछ्तोगी ना??

कभी पैर भटके,
तो पहले की माफिक.
उमेठ के कानों को,
सही राह मुझको दिखाओगी ना??

जली कच्ची रोटी,
कभी मैं पका के.
खिलाऊं जो तुमको,
अभी भी ख़ुशी से वो खाओगी न??

होली के पुए दिवाली के लड्डू,
हाथों से अपने खिलाओगी ना?

मुझे दुबला पतला अब भी कहोगी,
रस्ते पे पलकें बिछाए रहोगी.
मेरी छिकों पर भी,
मनौतियाँ हजारों चढाओगी ना??

बचपन में जब जब,
तुम जाती थी मंदिर.
तुम्हे ना पा के घर में,
मैं था जार रोता.
आज भी मेरी हर याद में आ,
तुम मुझको हर पल रुलाओगी ना??

मैं कैसा भी होऊं,
तुम्हारा रहूंगा.
हर जनम में मुझको बेटा,
अपना ही बेटा बनाओगी ना??
 
माँ की उपमा ....

माँ की उपमा

मैया , मेरे से ये कोक पीया नहीं जाता
मुझे तेरा नींबू पानी याद आता है.

ये चिली पनीर और मंचुरियां भी ना,
गले में घाव करते हैं.
किसी सूप सॉस में ,
तेरी टमाटर की चटनी का ,
तनिक भी कहाँ स्वाद आता है?

ये बैल बाटम नहीं जंचते रे,
मैया तेरा सिला,
ढीला कुरता अब भी बड़ा भाता है.

कभी जलाती है लू तो,
तेरे आँचल को ढूँढता हूँ
एसी पंखे बंद कर देता हूँ,
तेरा खजूरी पंखा उन्हें मुंह चिढाता है.

सुबह बहुत आंसू बहाता हूँ अम्मा,
बेद टी देख कर टोस्ट के साथ.
वो चरणामृत, लाचीदाना,और तुलसी का पत्ता
मुझे जला जला सा जाता है.
 
दूरी......

दूरी.....

तुमसे नौ सौ ,
संतानबे किलोमीटर
की दूरी,
रोज तय करता था.
ख़्वाबों में.
अब दो साल ,
हुए मिले हुए.
तुम ब्याह के,
बगल वाली गली ,
आ गयी हो ना??
 
इकलौता वादा...

इकलौता वादा...

कब कहा,
मैं पानी पर चल जाऊँगा.
कब कहा,
मैं चाँद तोड़ कर लाऊंगा.
कब कहा,
मैं राह में फूल बिछाउंगा.
कोई वादा तो,
किया नहीं.
के हर ख़ुशी दिलाऊँगा.
पर कभी रोना मत,
दुखी तुम होगे, अश्क मैं बहाउंगा.
 
याद......

याद......

कल इक लड़की को,
गुझिया खाते देखा.
आंसू टपक पड़े,
बहुत याद आयी.
गुझिया नहीं,
अम्मा की हथेली.
 
Are ! Very very good efforts Vivek :)
Surprisingly, you are a good poet dear. :) :)
Tumahare is roop ke to aaj darshan huye hai... varna me to tumko vo hi "Happy B'day" thread vala Vivek hi samjhata tha... :p
Kudos to you dear :)
I hope for your bright future. :) :)




इकलौता वादा...
कब कहा,
मैं पानी पर चल जाऊँगा.
कब कहा,
मैं चाँद तोड़ कर लाऊंगा.
कब कहा,
मैं राह में फूल बिछाउंगा.
कोई वादा तो,
किया नहीं.
के हर ख़ुशी दिलाऊँगा.
पर कभी रोना मत,
दुखी तुम होगे, अश्क मैं बहाउंगा.
 
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