Shayari (Part 2)

कन्धे तो मिले बहुत रोने के लिएकुछ देर रुके और फिर चलते बनेकिन्तु नहीं मिला ऐसा कोई हमदमहम कहते रहें और वे सुनते रहें.
 
चलने दो जरा आँधियां सच और हकीकतो की, न जाने कौनसे झौंके में मुखौटे उड़ जाएं किस किस के.
 
जिनकी आँखे आँसुओं से नम नहीं, क्या समझते हो उसे कोई गम नहीं,
तुम तड़प कर रो दिए तो क्या हुआ, गम छुपा के हँसने वाले भी कम नहीं।
 
कर रहा था ग़म\-ए\-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आये
हर रग़\-ए\-ख़ूँ में फिर चराग़ाँ हो
सामने फिर वो बे\-नक़ाब आये

'फ़ैज़' की राह सर\-ब\-सर मंज़िल
हम जहाँ पहुँचे कामयाब आये
 
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

न तन में ख़ून फ़राहम न अश्क आँखों में
नमाज़े-शौक़ तो वाजिब है बे-वज़ू ही सही

किसी तरह तो जमे बज़्म मैकदे वालो
नहीं जो बादा-ओ-साग़र तो हा-ओ-हू ही सही

गर इंतज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल
किसी के वादा-ए-फ़र्दा की गुफ़्तगू ही सही

दयारे-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोई
तो 'फ़ैज़' ज़िक्रे-वतन अपने रू-ब-रू ही सही
 
ज़रा सी बात पर बरसों के याराने गए,
इतना तो हुआ, कुछ लोग पहचाने गए,,
 
दो चार नही मुझे सिर्फ एक दिखा दो,
वो शख्स जो अन्दर भी बाहर जैसा हो

.

उड़ने दो इन परिंदों को आजाद फिजाओं में,
गर होंगे तुम्हारे तो लौट के आएंगे किसी रोज..
 
जब भी अवसर मिलता है, 'दर्पण' से ही क्षमा माँग लेता हूँ,
मैंने सबसे अधिक मन भी तो, 'स्वयँ' ही दुखाया है !!
 
कितने वर्षों का सफ़र ख़ाक हुआ।।


जब उसने पूछा कहो कैसे आना हुआ।।
 
मुझे देखने से पहले साफ़ कर... अपनी आँखों की पुतलियाँ ग़ालिब...
कहीं ढक ना दे मेरी अच्छाइयों को भी..नज़रों की ये गन्दगी तेरी.

बस यहीं काम हैं...फ़ुर्सत भी बोहोत हैं...
तुम हमारे...हम तुम्हारे...ऐब ढुंढते हैं..


सर-ऐ-आम ये शिकायत है ज़िन्दगी से,
क्यूँ मिलता नहीं मिजाज मेरा किसी से...


चल रहे है जमाने में रिश्वतो के सिलसिले ........
तुम भी कुछ ले~दे कर, मोहब्बत कर लो.....!!!!


कहने वालों का कुछ नहीं जाता,
सहने वाले कमाल करते हैं
कौन ढूंढें जवाब दर्दों के,
लोग तो बस सवाल करते हैं'

गए है जबसे शहर में कमाने को लड़के ,
हमारे गाँव में त्यौहार भी नहीं आते।


---------

बस यूँ ही लिखता हूँ .. वजह क्या होगी ..??

राहत ज़रा सी ..
आदत ज़रा सी ..!
 
हिचकियों पर हिचकियाँ मैं रातभर भरता रहा,वो सो रहा था तो फिर मुझे कौन याद करता रहा.. ?
 
मैं अपने चाहने वालो की ख़ातिर ही जान दे देता..
मगर ग़रीब की जान का मुआवज़ा कम है..
 
ना वह साध रहे , ना वह साँप रहे
ना वह शौंक रहे , ना वह थोक रहे

(थोक - कुनबे )
 
परख यदि हीरे की करनी है तो कभी अंधेँरे मे मिलो ऐ-मित्र,


अन्यथा धूप में तो काँच के टुकडे भी चमकते हैं।
 
जिंदगी में बडी शिद्दत से निभाओ
अपना किरदार,
कि परदा गिरने के बाद भी तालीयाँ
बजती रहे…


इतना भी गुमान न कर आपनी जीत पर ऐ बेखबर
शहर में तेरे जीत से ज्यादा चर्चे तो मेरी हार के हैं।….
 
Zindagi ko bahut kareeb se dekha hai humne,
Jalladon ko farishte bante dekha humne.
Apna hosla na chhod saki ,
Zindagi ko badalte dekha hai humne.


Rhne de teri yaadon ke ujale mere sang,
Na jaane kis gali m jindagi ki shaam ho jaye
 
हज़ारों ऐब ढूँढ़ते है हम दूसरों में इस तरह,
अपने किरदारों में हम लोग,फरिश्तें हो जैसे….!!!!

बिना लिबास आए थे इस जहां में,
बस एक कफ़न की खातिर,
इतना सफ़र करना पड़ा….!!!!
 
ये हवा का तो एक बहाना था
ज़र्द पत्तों को गिर ही जाना था
वो जो टूटा तो हम भी टूट गये
ताल्लुक जो बहुत पुराना था...!
 
Back
Top